यह ब्लॉग खोजें
(बचायें शिशु
को कुपोषण से)
अपने घर के बच्चों को,हम दें
कैसा भोजन आहार
दूर कुपोषण भागे उनसे, ना ही
पड़ें वो कभी बीमार।
बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर हमारे समाज में कई भ्रान्तियां
हैं। मसलन बच्चे को अगर सामान्य सर्दी,जुकाम या हल्का बुखार है तो उसे टीके नहीं लगवाने
चाहिये---बच्चे को यदि पोलियो ड्राप्स पिला दिया गया तो उसके नपुंसक होने का खतरा
है--आदि--आदि।ऐसी ही एक भ्रान्ति और है कि बीमारी में बच्चे का आहार यानि भोजन बंद कर देना चाहिये। मातायें भी ऐसा ही सोचती हैं कि छोटे बच्चे को बीमारी में कम
खाना देना चाहिये। जबकि सच्चाई यह नहीं हैं।
बीमार बच्चे को तो स्वस्थ
बच्चे से भी ज्यादा खाने की जरूरत होती है।क्योंकि भोजन ही बच्चे को बीमारियों से लड़ने की ताकत और ऊर्जा देता है।इसलिये बीमारी में उसे बराबर खाना दें। इतना ही नहीं बीमारी के बाद उसे थोड़ा ज्यादा
खाना देने की जरूरत रहती है। इससे बीमारी के दौरान बच्चे के अन्दर आई कमजोरी जल्दी खत्म होगी और वह जल्दी स्वस्थ होगा।
बच्चों की आम बीमारियां जैसे
अतिसार,श्वसन तंत्र का तीव्र संक्रमण,बुखार आदि बच्चे के पोषण के स्तर पर असर डालती हैं। उसके * विकास में बाधा *भूख
में कमी * पाचन शक्ति में कमी लाने के साथ *ऊर्जा की जरूरत बढ़ाती हैं।*दस्त व
उल्टी उसके शरीर से पोषक तत्व निकाल देते हैं।
बच्चा जब भी हो
बीमार,कैसे बनें उसके तीमारदार ?
संक्रमण से कुपोषण और फ़िर कुपोषण से संक्रमण का
चक्र बच्चे के उचित इलाज के साथ-साथ निम्न तरीके से टूट सकता है-----
*4 से 6 माह के बच्चों की मातायें बीमारी में भी बच्चे को स्तनपान कराना जारी
रखें। तथा थोड़ी-थोड़ी देर पर ज्यादा बार
स्तनपान करायें।
* बीमारी में थोड़ा बड़े बच्चों की मातायें भी उन्हें स्तनपान कराना और खाना
देना जारी रखें।
*भूख न लगने पर बच्चों को मातायें --- कम खाना थोड़ी-थोड़ी देर पर दें।---मुलायम ठोस खाना दें जो निगलने में आसान
हो।---बच्चों को खाने के लिये उकसायें साथ ही उनकी पसन्द का खाना दें।
*6 माह से 2साल की उम्र वाले बच्चों की मातायें बीमारी के बाद उन्हें अतिरिक्त
खाना व चिकनाई दें।
*विटामिन ‘ए’ न मिलने पर बच्चों में गंभीर
बीमारियां,अंधापन भी आ सकता है। अतः बीमारी के दौरान भी उसे विटामिन ‘ए’ युक्त भोजन अवश्य दें।
*बच्चा जब स्वस्थ होने लगे तब भी उसे ये सभी भोजन खिलाते रहें।
श्वसन तंत्र के संक्रमण में क्या दें?
*बच्चे को बीमारी में भी सामान्य बच्चों की ही तरह स्तनपान/भोजन करायें।बीमारी
के बाद उसे ज्यादा दूध पिलायें/खाना
खिलायें।
*नाक बंद हो तो साफ़ कर दें। अधिक मात्रा में तरल पिलायें। स्तनपान थोड़ी-थोड़ी
देर बाद व देर तक करायें।
*अगर बच्चे को खाने,पीने में दिक्कत हो तो उसे तुरन्त स्वास्थ्य
कार्यकर्ता,चिकित्सक को दिखलायें।
अतिसार के
दौरान क्या करें?
*स्तनपान जारी रखें*यदि बच्चा स्तनपान न करे सामान्य दूध दें।बच्चा 6 माह से
कम का हो और ठोस आहार न लेता हो तो दूध
में आधा पानी मिलाकर दें।(यह पानी भी स्वच्छ होना चाहिये)
*यदि बच्चा छः माह का या बड़ा हो तथा ठोस आहार लेता हो तो----
0अनाज य अन्य माड़युक्त
भोजन,दाल,सब्जी,एक या दो चम्मच तेल मिलाकर दें0फ़लों का रस या केला मसल कर दें0ताजा
बना,अच्छी तरह पका खाना मसलकर उसे खिलायें0खाने के लिये बच्चे को
उत्साहित करें0दिन में कम से कम छः बार थोड़ा-थोड़ा खिलायें0दस्त ठीक होने के बाद
भी बच्चे को वही भोजन अतिरिक्त मात्रा में रोज दो सप्ताह तक दें।
*यदि दस्त ज्यादा दिनों तक बना रहे तो
ऊपर बताये गये भोजन के अलावा उसे—
0ऊपरी दूध आधा पानी मिलाकर या
मट्ठा,छाछ दें0अच्छीतरह पकाया अनाज,तेल,सब्जियों का सूप,दाल का पानी दिन में छः बार
दें0दस्त बन्द होने के बाद भी बच्चे को वही भोजन बराबर देते रहें0एक माह
तक बच्चे को सामान्य से एक बार अधिक खाना दें।
*और सबसे अन्तिम महत्वपूर्ण बात यह
है कि पर्याप्त तरल देने के बाद भी यदि बच्चे का दस्त न बन्द हो या उसमें
निर्जलीकरण(शरीर में पानी की कमी) के लक्षण दिखें तो बच्चे को फ़ौरन चिकित्सक को
दिखलायें।
0000
नेहा शेफ़ाली
ज़ेवियर्स इन्स्टीट्युट आफ़ कम्युनिकेशन्स
मुम्बई
कुछ अलग करने की चाहत और जज्बे से भरपूर हैं--- रामकिशोर।
रविवार, 8 सितंबर 2013
किसी भी देश के
बच्चे अगर वहां के भविष्य हैं तो युवा वहां की वर्तमान शक्ति। इतिहास गवाह है कि किसी
भी देश का इतिहास बदलने और बनाने दोनों में ही युवा शक्ति का ही हाथ रहता है। मगर
अफ़सोस की बात है कि आज हमारे देश में दिशाहीन,दिग्भ्रमित और निराश युवाओं की एक
लंबी फ़ौज खड़ी है। जिनमें शक्ति है,जोश है और कुछ कर दिखाने कि तमन्ना भी। लेकिन
उसके पास कोई
स्पष्ट रास्ता नहीं
है जो उसे अपनी मंजिल तक पहुंचा सके।
युवाओं की इसी फ़ौज में कुछ चेहरे
ऐसे भी हैं जो तमाम परेशानियों,दुखों के
पहाड़ों को तोड़ कर भी उसके बीच से अपने रास्ते खुद बना रहे हैं और लगातार सफ़लता की
मंजिल की ओर बढ़ भी रहे हैं।
आज ऐसे ही एक युवा से हम आपको मिलवा रहे
हैं। इनका नाम है रामकिशोर कन्नौजिया उमर है 27 साल। हाई स्कूल फ़ेल मगर कुछ नया
करने के जोश से भरपूर।पेशा हमारे आपके सौन्दर्य में अपने हाथ से प्रेस किये कपड़ों
से चार चांद लगाना।
रामकिशोर रहते तो हैं
जानकीपुरम में।पर सेक्टर-21 में इनकी कपड़े प्रेस करने की गुमटी है।और इसी गुमटी
में संजो रखे हैं इस युवा ने हजारों सपने,जिन्हें पूरा करने के लिये ये दिन-रात
मेहनत करते हैं।
इनकी दिनचर्या से ही आपको इनकी
मेहनत,जोश,लगन,और जज्बे का अंदाजा लग जायेगा।ये रोज सुबह 4 बजे उठ कर साइकिल से
जानकीपुरम से इन्जीनियरिंग कालेज चौराहे जाकर वहां से अखबारों का बंडल उठाते हैं।
8 बजे तक सारे अखबार जानकीपुरम से लेकर इंदिरानगर तक में बांट फ़ुर्सत पाते हैं।
फ़िर 8 बजे अपनी प्रेस की दूकान खोलते हैं।जब तक इनका प्रेस गरम होता है तब तक ये
थोड़ा चाय नाश्ता कर लेते हैं।फ़िर आठ बजे से इनका कपड़ों पर प्रेस करने का काम शुरू
होता है जो रात के 8 बजे तक चलता है।
अभी हाल में ही रामकिशोर ने अपना
काम थोड़ा और बढ़ाने की कोशिश की है।इन्होंने अपनी गुमटी में ही मोबाइल रिपेयरिंग और
मोबाइल टाप-अप,रीचार्ज आदि का नया काम भी शुरू किया है।जब प्रेस के काम से खाली
रहते हैं तो मोबाइल का काम देख लेते हैं।
और सबसे बड़ी बात यह है कि
रामकिशोर ये सारी मेहनत,सारा काम अपने शौक(सिनेमा,होटल,बाइक,महंगे कपड़े खरीदना
आदि)पूरे करने के लिये नहीं करते।जो कि आज के हर युवा कर रहा है।एक बार बातचीत के
दौरान इन्होंने
मुझसे बताया कि, “भाई साहब मैं चाहता हूं कि मेरे अम्मा बाबू अब
ये काम(कपड़े प्रेस और धुलाई) न करें और आराम करें। उन्होंने बहुत दिन काम कर लिया।
इसी लिये मैं इतनी हाड़ तोड़ मेहनत कर रहा।”
आप खुद ही सोचिये आज जब तमाम पढ़ा
लिखा युवा महंगे मोबाइल,तेज चाल वाली बाइक,शापिंग माल,होटेलिंग,बीयर पीने जैसे शौक
पूरे करने के लिये मेहनत कर रहा---या फ़िर असफ़ल होने पर सारी शिक्षा,ऊंची डिग्रियों
के बावजूद चेन स्नैचिंग या दूसरे गलत काम की तरफ़ भाग रहा---ऐसे में रामकिशोर जैसे
युवा क्या उनके प्रेरणास्रोत नहीं बन सकते?
काश कि रामकिशोर जैसी ईमानदारी,
सोच,जज्बा और लगन आज के हर युवा में पैदा हो सके तो शायद हमारे देश और समाज की
तस्वीर निश्चित तौर
पर बदल सकती है।
00000
डा0हेमन्त कुमार
Read more...
लेबल:
कुछ अलग करने की चाहत,
जज्बा।,
युवा,
रामकिशोर,
Youth
बच्चों का हो पूर्ण विकास— अगर मिले किसी कला का साथ--।
शनिवार, 17 अगस्त 2013
“साहित्य संगीत कला
विहीनः,साक्षत पशु पुच्छ विषाण हीनः”—मतलब यह कि साहित्य संगीत और कला से विहीन मनुष्य
पूंछ और सींग रहित पशु के समान होता है। यह श्लोक बहुत पहले लिखा गया था।पर इसकी
सार्थकता हमेशा रहेगी। वैसे तो इसमें कही गई बातें हर व्यक्ति के ऊपर लागू होती
हैं लेकिन अगर हम इस श्लोक को बच्चों के विकास के संदर्भ में देखें तो इसकी
प्रासंगिकता आज के समय के लिये और भी बढ़ जाती है।
आज बच्चों के अंदर जो
उच्छृंखलता,उद्दण्डता और विद्रोही होने के हालात पैदा हो रहे हैं उसके पीछे बहुत
से कारण हैं।बच्चों के चारों ओर का वातावरण,उनका पारिवारिक माहौल,स्कूल की
स्थितियां,दोस्तों की संगत,टी0वी0,इण्टरनेट इत्यादि। इन्हीं में से एक कारण है
उनका कला जगत से दूर होना। आज आपको बहुत कम परिवार ऐसे मिलेंगे जहां बच्चों को किसी
कला से जोड़ने की कोशिश होती दिखाई पड़े।ज्यादातर अभिभावक चाहते हैं कि उनका बच्चा
पढ़ लिखकर इंजीनियर,डाक्टर,
आई0ए0एस0,पी0सी0एस0 या कोई बड़ा अफ़सर बन जाय। और इसके लिये वे बच्चों को अच्छे
से अच्छे स्कूल में दाखिला दिलवायेंगे। कई-कई ट्यूशन और कोचिंग सेण्टर्स भेजेंगे हजारों रूपये खर्च करेंगे।मतलब सुबह से शाम तक सिर्फ़ और सिर्फ़
पढ़ाई।थोड़ा बहुत जो समय बचा वो टी0वी0,इण्टरनेट के हवालें। नतीजा सामने है।बच्चों
के ऊपर बढ़ता मानसिक दबाव,तनाव,रिजल्ट खराब होने पर डिप्रेशन,हीन भावना जैसी
मनोग्रन्थियां बच्चों को जकड़ने लगती हैं।कहीं बच्चा अधिक निराशा में पहुंचा तो वो
आत्महत्या तक करने की कोशिश कर बैठता है।
जबकि इन सारी दिक्कतों से अभिभावक
अपने बच्चों को बचा सकते हैं। सिर्फ़ उसे किसी भी कला से जोड़ कर।चाहे वह गायन
हो,नृत्य हो,स्केचिंग,पेण्टिंग म्युजिक,अभिनय या फ़िर कोई अन्य कला हो। इनसे जुड़ने से बच्चे के अंदर आत्मविश्वास पैदा
होगा। उसे लगेगा कि वह किसी चीज में तो दक्ष है।
ऐसा नहीं है कि आज समाज से
या परिवार से कलाओं का लोप हो गया है। कलाओं का स्थान आज भी परिवारों में है।
परन्तु आज उसका स्वरूप,मकसद बदलता जा रहा है।बहुत से परिवारों में आज भी बच्चों को
नृत्य,संगीत,अभिनय आदि कलाओं का प्रशिक्षण दिलवाया जा रहा है। लेकिन उसके पीछे
उनका मकसद व्यावसायिक हो गया है न कि बच्चों का आत्मिक विकास। वे चाहते हैं कि
उनका बच्चा आगे चलकर उस कला के माध्यम से
धन कमा सके। जब कि ऐसा नहीं होना चाहिये। किसी भी कला का सर्वप्रथम
उद्देश्य बच्चों को या किसी भी व्यक्ति को एक अच्छा इन्सान बनाना होता है। उसे
अनुशासन सिखाना होता है।व्यावसायिकता तो बहुत आगे की बात होती है। और फ़िर यह जरूरी
नहीं है कि हर बच्चा गायन सीख कर सोनू निगम या अभिनय सीख कर शाहरुख खान बने ही।
लेकिन इतना तय है कि वह बच्चा उस कला के माध्यम से अनुशासित जरूर हो जायेगा।समय की
पाबन्दी जरूर सीखेगा।मेहनत करना जरूर सीखेगा। उसके अंदर आत्मविश्वास जरूर पैदा
होगा—कि वह भी कुछ करने लायक
है।
हमारे अभिभावकों को भी यह बात
समझनी चाहिये कि यदि वे अपने बच्चों को पढ़ाई के,स्कूल के तमाम दबावों और तनावों से
छुटकारा दिला सकते हैं तो इस काम में कोई भी कला निश्चित रूप से किसी
दवा,चिकित्सक,मनोचिकित्सक से बढ़ कर कारगर सिद्ध हो सकती है। इतना ही नहीं कला भी
उसके सम्पूर्ण विकास में उतनी ही सहायक होगी
जितना कि पढ़ाई-लिखाई या खेलकूद। मैं इस बात को पुष्ट करने के लिये यहां एक
उदाहरण दूंगा। मैंने अपने एक मित्र से कहा कि आप अपने बेटे को शैक्षिक दूरदर्शन के
कार्यक्रमों में क्यों नहीं भेजते?बस इतना कहना था कि वो उखड़ गये मेरे ऊपर।
उन्होंने सीधे-सीधे मुझसे कह दिया कि “मैं अपने बच्चों को बर्बाद नहीं करना चाहता। और अब दुबारा
कभी मुझसे यह बात मत कहना।” मैं उनका गुस्सा देख कर चुप हो गया। लगभग पांच छः साल के
बाद मेरे वही मित्र अपने बच्चे को लेकर मेरे पास आये। उस समय उनका बच्चा कक्षा 8
में था। उन्होंने मुझसे कहा कि “इसे कुछ याद ही नहीं होता।दिन रात पढ़ता रहता है। और भेजे
में कुछ घुसता ही नहीं।खेलने कूदने में भी मन नहीं लगता।कुछ कह दो तो रोने लगता
है।” वो अपने बेटे के भविष्य
को लेकर काफ़ी चिन्तित भी लग रहे थे।मैंने उन्हें शान्त कराया। और उनसे अनुरोध करके
उनके बेटे को मैंने एक इन्स्ट्रुमेण्टल म्युजिक की क्लास ज्वाइन करवा दी। लड़के ने
बांसुरी बजाना सीखना शुरू किया। और छःमहीने बितते बीतते उस बच्चे का पूरा स्वभाव ही बदल गया। उसका सारा गुस्सा,सारी
उद्दण्डता गायब। वह अब पढ़ने में भी रुचि लेने लगा था। उनका वही जिद्दी,शैतान बच्चा
हाई स्कूल,इण्टर प्रथम श्रेणी में पास हुआ। फ़िर इन्जीनियरिंग पास किया।आजकल वही बच्चा एक मल्टीनेशनल कम्पनी में है।
- बच्चे को अनुशासित
बनाती है।
- बच्चे के अंदर
आत्मविश्वास भरती है।
- वह किसी भी काम को
एक व्यवस्थित और साफ़ सुथरे ढंग से करना भी सीखता है।
- उस कला के माध्यम
से बच्चे का मानसिक तनाव भी खतम होता है।
- उस कला में रोज नये
प्रयोगों के करने से उसका बुद्धि कौशल भी बढ़ता है।
- वह अपने भावी जीवन
में भी हर काम को बहुत ही सलीके से और कलात्मक ढंग से पूरा करता है।
- कला बच्चे के अन्दर
कुछ नया करने ,सृजित करने का उत्साह भी पैदा करती है।
- कला बच्चे के
व्यक्तित्व को सौम्य,हंसमुख और मिलनसार बनाती है।
- और सबसे बड़ी और अहम
बात यह कि कोई भी कला आपके बच्चे के व्यक्तित्व को सम्पूर्ण बनाती है।
इसलिये सभी अभिभावकों के साथ ही सभी शिक्षकों से भी यही कहूंगा कि बच्चों
को किसी भी कला से जोड़कर देखिये आपको हर रोज उसके व्यक्तित्व,व्यवहार,कौशल और
प्रदर्शन का एक नया और अनूठा आयाम दिखाई पड़ेगा।
0000
ड़ा0हेमन्त
कुमार
Read more...
सुरक्षित रखें किशोरों का जीवन
रविवार, 28 जुलाई 2013
बहुत सीधा सा जवाब है इस
प्रश्न का।क्या आप,हम अपने बेटे को उसके जन्मदिन या कालेज में अव्वल दर्जे में पास
होने की खुशी में उसे बाइक या स्कूटर की चाभी पकड़ाते समय उसकी उम्र या शारीरिक
क्षमता पर ध्यान देते हैं?क्या हम उससे कभी कहते हैं कि बिना हैल्मेट लगाए बाइक मत
चलाना,दोस्तों के साथ रेस मत लगाना,या स्टंट मत दिखाना।शायद कभी नहीं। बस आपने उसे
नई गाड़ी की चाभी दी और साहबजादे फ़ुर्र।बच्चा भी खुश और हम भी खुश।उस समय किसे
ध्यान है हैल्मेट,स्टंट और रेस का। जी हां,यह एक कड़वी सच्चाई है। हमारी और सभी
अभिभावकों की गलती की। और हमें सारी बातें,सारे कानून,ट्रैफ़िक रूल्स तब याद आते
हैं जब कोई अनहोनी हो जाती है। पर तब तक बहुत देर हो चुकी रहती है।
हम अगर ध्यान दें तो सड़कों पर
फ़र्राटा भरने वाले बाइक सवारों में बड़ी संख्या ऐसे किशोरों की भी होती है जो अभी
कानूनी तौर पर बाइक या तू व्हीलर चलाने के हकदार नहीं होते।जिनके पास ड्राइविंग
लाइसेंस या तो होता ही नहीं या फ़िर फ़र्जी तरीके से गलत डेट आफ़ बर्थ डाल कर दलालों
के माध्यम से बनवाया गया होता है। और इस फ़र्जीवाड़े में भी हम उस बच्चे का पूरा साथ
देते हैं।भविष्य में आने वाली विपत्तियों को नजर अन्दाज करते हुये। और अपनी इस
गलती को हम यह तर्क देकर ढंकने की कोशिश करते हैं कि भाई जमाना ही आज यह कर रहा
है। तो हमने कौन सी गलती कर दी।
हमारी इस सोच के पीछे है भेड़ चाल
चलने की आदत। हर समाज में लोगों को भेड़ चाल चलने की आदत होती है। हमारे देश में यह
कुछ अधिक ही है। हम सब भी इसी देश और समाज के अभिन्न अंग हैं।होता यह है कि बच्चे
के हाई स्कूल या इण्टर का इम्तहान नजदीक आते ही हम उसे लालच देने लगते हैं कि बेटा
इतने परसेंट नम्बर लाओ तो युम्हें बाइक दिलवा देंगे।बच्चा मेहनत करके आपके मन
मुताबिक नम्बर ले आया। अब उसे बाइक देना तो हमारी मजबूरी बन गई। या फ़िर बच्चे के
दोस्तों ने बाइक ले ली और वह भी जिद कर बैठा।अब घर में सुबह शाम,हफ़्तों की
बहस,पत्नी की जिद,बहनों की मिन्नतें---और आप पिघल गये।किसी तरह कर्ज लेकर बाइक की
चाभी पकड़ा ही दी बच्चे के हाथों में।
और ऐसी ही घरेलू
परिस्थितियों,लाड़ प्यार ने आज सड़कों पर फ़र्राटा भरने के लिये आज किशोरों को आजाद
छोड़ दिया है।बिना उन्हें यह सिखाये कि गाड़ी धीरे चलायें,हैल्मेट लगाकर चलें और
ट्रैफ़िक के नियमों का पालन करें। और नतीजा अखबारों में रोज ही दो चार दुर्घटनाओं
की खबरें। इन दुर्घटनाओं में भी ज्यादा गलती इन्हीं किशोरों की।क्योंकि एक बार
बाइक पर बैठने के बाद न उनका नियन्त्रण बाइक पर रहता है न ही मन पर ।वो बाइक चलाते
समय खुद को जान अब्राहम य रित्विक रोशन समझते हैं और यहां की सड़कों को मुम्बई-पुने
हाइवे। हैल्मेट तो वे फ़ैशन के तौर पर हाथ या बाइक में लगे हुक में लटका देते हैं
इस पर भी सोने में सुहागा यह हो जाता है कि मोबाइल का इयर फ़ोन कान में लगा कर तेज
म्युजिक का आनन्द लेना भी वो नहीं भूलते। भले ही पीछे आती कार या ट्रक के हार्न की
आवाज उन्हें न सुनाई पड़े।
जरा सोचिये हम सभी अपने
परिवार और खासकर बच्चों से कितना प्यार करते हैं।यह मानव स्वभाव है।इसे हम बदल भी
नहीं सकते।लेकिन उन परिस्थितियों को जिनसे मजबूर होकर हम अपने बच्चों को खतरनाक
तेज गति वाले दुपहिया वाहन पकड़ा देते हैं,बदलना तो हमारे हाथ में है। क्या उसका यह
शौक हम तब तक के लिये नहीं टाल सकते जब तक कि उसे वाहन के साथ ही उसकी गति पर
नियंत्रण रखना सीख जाय।क्या हम उसे बर्थडे या अन्य किसी खुशी के मौके पर बाइक से
नीचे का कोई छोटा उपहार देकर अपना प्यार नहीं जता सकते?या उसे यह नहीं समझा सकते
कि बेटा कुछ और बड़े हो जाओ तब तुम्हारे लिये
बाइक खरीद देंगे।
इन सबके बावजूद भी मान लीजिये आपको
अपने बेटे की जिद,परिवार,समाज के दबावों के आगे झुक कर मजबूरी में भी अपने बच्चे के
लिये दुपहिया वाहन खरीदना ही पड़ता है तो कुछ बातों पर ध्यान रखकर और उसे कुछ
हिदायतें देकर आप और हम उसके जीवन को सुरक्षित रख सकते हैं।
- सबसे पहले बच्चे को
अच्छी तरह ट्रैफ़िक के नियम और चिह्नों,संकेतों से परिचित करा दें।
- उसे यह बात समझाएं
कि हैल्मेट उसकी जीवन की सुरक्षा के लिये है न कि फ़ैशन दिखलाने या हैण्डिल
में लटकाने के लिये।
- बच्चा जब तक 18वर्ष
की उम्र का न हो जाय उसे अकेले बाइक/स्कूटर न चलाने दें। आप उसके पीछे बैठ कर
साथ में जाएं। इससे गति को वह नियन्त्रित रखना सीखेगा। और कहीं गलती करने पर
आप उसे समझा सकेंगे।
- बच्चे को कभी बिना
हैल्मेट पहने वाहन न चलाने दें।
- उसे वाहन की पूरी मशीनरी
और कल पुर्जों से परिचित कराएं ताकि वह उन्हें समझ कर उन पर नियन्त्रण रख
सके।
- बच्चे को यह तथ्य
अच्छी तरह समझा दें कि शहर के भीड़ वाले ट्रैफ़िक में थोड़ी थोड़ी दूर पर आने
वाले चौराहों और सिग्नल्स के कारण 80कि मी की रफ़्तार और 40किमी की रफ़्तार में
चलने वाले दो व्यक्तियों के गन्तव्य पर पहुंचने में मुश्किल से दो चार मिनट
का अन्तर आयेगा। इसलिये जान जोखिम में डालने की जगह धीमी गति से चलना ज्यादा
फ़ायदेमन्द रहेगा।
- बच्चे को समझाएं कि
कान पर मोबाइल या म्युजिक का इयरफ़ोन लगाकर कभी वाहन न चलाये।
- उसे बतायें कि
मध्यम गति से चलने पर वह पेट्रोल की बचत भी करेगा।
- उसे समझायें कि
दोस्तों के उकसाने पर भी वह बाइक की रेस न लगाये,न ही स्टण्ट करने की कोशिश
करे।
- और सबसे महत्वपूर्ण
बात यह कि बच्चों को अच्छी तरह समझाएं कि मानव जीवन अनमोल है।यह हमें बस एक
बार मिलता है।इसे बहुत सम्हाल कर रखना होगा।
ये कुछ ऐसे बिन्दु हैं जिन पर विचार कर इन पर अमल करके हम सभी अपने प्यारे
और होनहार बच्चों का जीवन सुरक्षित करके उन्हें लम्बी उम्र प्रदान कर सकते हैं।
0000000
डा0हेमन्त कुमार
Read more...
लेबल:
किश्प्र,
सड़क दुर्घटनाएं,
सुरक्षा,
accidents.,
Teenagers
समय की आवश्यकता है----पाठ्यक्रम में रंगमंच
शनिवार, 11 मई 2013
| प्रसिद्ध नाटक "कहानी तोते राजा की" का एक दृश्य |
मनोवैज्ञानिकों और
समाजशास्त्रियों के अनुसार बच्चों के सर्वांगीण विकास में रंगमंच का एक बहुत बड़ा योगदान
है।यही वह माध्यम है जिसके द्वारा बच्चा एक बड़े समुदाय के साथ जुड़ सकता है।जन
सामान्य के सामने अपने को प्रस्तुत करने की उसकी झिझक दूर होती है और उसकी वाक
शक्ति का विकास होता है। उसके अंदर समूह में कार्य करने के साथ ही नेतृत्व की
क्षमता भी विकसित होती है।
शिक्षा में रंगमंच की
अवधारणा कोई नई बात नहीं है। इसकी आवश्यकता का अनुभव सर्व प्रथम यूरोप में किया
गया। जहां सन 1776 में मैडम जेनेसिस ने “थिएटर आफ़ एजूकेशन” की स्थापना की और बच्चों को प्रशिक्षित करके नाटकों का
मंचन किया। इस प्रकार रंगमंच को शिक्षा में लाने की शुरुआत हुई। हमारे देश में भी
समय के साथ इसकी आवश्यकता महसूस की गयी। और सन 1965 में शैक्षिक रंगमंच की शुरुआत
हुयी।किन्तु यह प्रयास मात्र चर्चाओं और गोष्ठियों का विषय बन कर रह गया। वर्ष
1980 के बाद संगीत नाटक अकादमी,राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और भारतेन्दु नाट्य
एकेडमी की ओर से किये गये प्रयासों से कुछ चेतना तो आई पर वह अपना कोई स्वरूप नहीं
बना पाया।
बच्चे किसी भी देश के
भविष्य होते हैं।बचपन से ही यदि उनमें रंग संस्कार पड़ जायें तो यह प्रत्यक्ष या
परोक्ष रूप से उनके सर्वांगीण विकास में सहायक होगा।इस माध्यम से बच्चों में
कल्पना शक्ति,वाक्शक्ति,अनुभूति
प्रदर्शन,अभिव्यक्ति की क्षमता,चलने फ़िरने का ढंग,नेतृत्व क्षमता एवं व्यक्तिगत
कौशल का विकास होता है।रंगमंच बच्चों को जिम्मेदार बनाता है।उनमें अनुशासन के साथ
साथ समयबद्धता के गुण लाता है। यही वो तत्व हैं जो लोकतन्त्र की नींव हैं और
बच्चों को एक जिम्मेदार नागरिक बनाते हैं।परन्तु यह देखकर दुख होता है कि इस विधा
का जितना लाभ बच्चों को मिलना चाहिये उतना लाभ बच्चे उठा नहीं पा रहे हैं।मात्र
गर्मी की छुट्टियों और विद्यालयों के वार्षिक उत्सवों तक बाल रंगमंच को सीमित करके
कहीं हम उनके विकास में बाधक तो नहीं बन रहे हैं? यह एक चर्चा का विषय है।
बाल रंगमंच प्रशिक्षक के
नाते यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि जो नाटक बच्चों के लिये मंचित किये जाते
हैं,उन्हें बच्चे बड़ी ही रुचि से देखते हैं।यदि नाटक बच्चों की मानसिकता को ध्यान
में रखकर लिखा गया है तो बच्चों पर उसका प्रभाव पड़ेगा ही,क्योंकि बच्चों में
अनुकरण की अपूर्व शक्ति होती है। दृश्य एवं श्रव्य –दोहरा माध्यम होने के कारण इसका प्रभाव भी दोहरा होता है।
वर्तमान समय में व्यक्ति परिवार और समाज की व्यस्तताएं कुछ ज्यादा ही बढ़ गयी हैं। जिसके कारण कदम-कदम पर भटकाव बढ़ रहा है।
सामाजिक परिवेश प्रदूषित सा हो रहा है।टेलीविजन और इण्टरनेट संस्कृति का दुरुपयोग
हमें अपसंस्कृति की ओर ले जा रहा है।इसका प्रभाव बच्चों पर कुछ ज्यादा ही पड़ रहा
है। ऐसे में बाल रंगमंच जैसे सार्वजनिक और सशक्त माध्यम की प्रासंगिकता और बढ़ जाती
है। बच्चों की इसमें सीधी सहभागिता होने के कारण बच्चों में आत्मविश्वास,सृजनात्मक
क्षमता,संवेदनशीलता और टीम वर्क की भावनाएं स्वतः ही जागृत हो जाती हैं। अपनी
वाक्शक्ति के प्रदर्शन से वे आत्मविश्वास से भर जाते हैं।कभी-कभी यह भी देखा गया
है कि कुछ ऐसे बच्चे जिनमें हकलाहट की समस्या थी थियेटर ज्वाइन करने के बाद उनकी
समस्या खतम हो गयी। उनमें खोया हुआ आत्म विश्वास वापस आ गया। ऐसे बच्चों में एकाग्रता,स्मरण शक्ति भी बढ़ती है।
उनमें एक आंतरिक अनुशासन आता है। यह जागरूकता उन्हें अपने समय और परिवेश के साथ
सीधे जोड़ने का काम करती है।
एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि
बच्चा 6 वर्ष की आयु तक 40 प्रतिशत और 18 वर्ष की आयु तक 80 प्रतिशत संस्कार ग्रहण
कर लेता है। और ये संस्कार उस बच्चे के साथ जीवन भर चलते हैं।केवल 20 प्रतिशत
संस्कार ही आगे जुड़ते हैं या परिवर्तित होते हैं। बच्चों द्वारा खेले जाने वाले
बाल मनोविज्ञान पर आधारित नाटक ही सही मायनों में बाल रंगमंच कहलाता है।जटिल से
जटिल विषयों को भी रंगमंच के माध्यम से आसानी से समझाया जा सकता है। बाल रंगमंच के
विकसित न हो पाने का एक कारण और भी है। अधिकांश माता पिता रंगकर्म को पढ़ाई से अलग
मानकर उसे पढ़ाई में बाधा मानते हैं। सारा माहौल पढ़ाई और कैरियर पर ही केन्द्रित
रहता है। ऐसे में रंगमंच जैसे माध्यम को समझने या अपनाने की न तो कोई इच्छा होती
है और न ही इसके लिये अलग से कोई समय।
बाल रंगमंच का व्यापक
और प्रभावी विकास तभी हो सकता है जब इसे स्कूली पाठ्यक्रम और शिक्षा से अनिवार्य
रूप से जोड़ा जाए। इसकी उपादेयता को स्वीकार तो सभी करते हैं पर शासन द्वारा इस
दिशा में कोई प्रयत्न न किये जाने के कारण बात आई-गई रह जाती है।
विगत दो दशकों से बाल रंगमंच
के प्रति लोगों का रुझान बढ़ा है। जागरूकता भी आई है। पर यह केवल कुछ बड़े शहरों तक
ही सीमित है। यदि बाल रंगमंच की संभावनाओं को कुछ अधिक व्यावहारिक आधार मिले तो
इसका विकास निश्चित ही सम्भव है। इसके लिये शासन,विद्यालय,अभिभावक तथा रंगकर्मियों
को मिलकर कुछ ठोस सामूहिक प्रयास कर अपने दायित्व निभाने होंगे।
0000
अभिनव पाण्डेय
मोबाइल-07275866955
युवा रंगकर्मी अभिनव पाण्डेय ने भारतेन्दु नाट्य एकेडमी,लखनऊ से रंगकर्म सीखा
है।अभिनव पाण्डेय ने कई टी0वी0 सीरियल्स में सहायक निर्देशक का कार्य करने के साथ
ही कुछ डाक्युमेण्ट्री फ़िल्मों का भी निर्माण किया है। टी वी से जुड़ने के बावजूद
इनका मन और दिल रंगकर्म में अधिक बसता है,खासकर बच्चों के साथ काम करना इन्हें
अधिक प्रिय है। दिल्ली,पुणे, लखनऊ,मुम्बई में काम करने के बाद फ़िलवक्त कानपुर में
रहकर बच्चों के लिये रंगमंच की पृष्ठभूमि
बनाने का काम कर रहे हैं।
·
Read more...
उनकी दुनिया
बुधवार, 1 मई 2013
मैं बनाना चाहता हूं
एक बहुत बड़ी दुनिया
जिसका विस्तार हो
लाखों करोड़ों और अनन्त असीमित
आकाश के बराबर।
जहां हर बच्चे के हाथ में हों
रंग बिरंगे गुब्बारे
रूई और ऊन से बने
सुंदर खिलौने
हर बच्चे के कन्धों पर हो
एक बैग प्यारा सा
बैग में हों ढेरों
नई नई कहानियां
खूबसूरत दुनिया के हसीन गीत
हर बच्चे को मिल सके
पेट भर खाना।
जहां हर बच्चा
मुक्त रहे दुनिया के दुर्दान्त
बमों के धमाकों और संगीनों
भयावह सायों से
न पड़े उनके ऊपर
कोई मनहूस साया
खद्दरधारियों की लिजलिजी
और सड़ान्धयुक्त राजनीति का
और न सेंक सके
कोई भी बड़ा अपनी अपनी
रोटियां किसी मासूम की
असमय हुयी मौत पर।
जहां हर बच्चा खेल सके
सुन्दर हरे भरे मैदान में
फ़ूलों की रंग बिरंगी क्यारी के बीच
और हर बच्चे की आंखों में
तैर रहे हों
कुछ खूबसूरत
तितली के पंखों से कोमल सपने
जिनके सहारे वो बिता सके
अपना अनमोल जीवन
और महसूस कर सके
इस दुनिया में अपने वजूद को।
तो बताइये क्या आपने भी
कोई ऐसी दुनिया बसाने
का ख्वाब अपने मन में संजोया है?
0000
हेमन्त कुमार
लेबल:
उनकी दुनिया,
कविता,
बचपन,
बच्चे,
children's world.
पहली बारिश में
सोमवार, 22 अप्रैल 2013
मौसम की पहली बारिश में जब
जमीन की देह भाप बनकर
उड़ती है
खुशबू से तर हो जाती है हवा
धुआंसा आकाश
खिड़की पे बेचैन उतर आता है।
जमीन की देह भाप बनकर
उड़ती है
खुशबू से तर हो जाती है हवा
धुआंसा आकाश
खिड़की पे बेचैन उतर आता है।
दस्तक देते हैं झकोरे
हल्की टकोर जिस्म को
नदी बना देती है
रसमसाती है इक आदिम चाहना
रगो-रेश में
बेहया इरादे जगते हैं
देर तक।
हल्की टकोर जिस्म को
नदी बना देती है
रसमसाती है इक आदिम चाहना
रगो-रेश में
बेहया इरादे जगते हैं
देर तक।
मेंहदियां गंध में
भींगता है आंगन
उतरकर लहू में
घुलती है शाम
शराब बन जाती है
महुआ सी फूलती है
वर्जित इच्छाएं।
भींगता है आंगन
उतरकर लहू में
घुलती है शाम
शराब बन जाती है
महुआ सी फूलती है
वर्जित इच्छाएं।
अंखुआती है देह पर कोंपलें
अनवरत
पाप के
फरेब के इस मौसम में
मुझे तुम,
बस तुम याद आते हो !
अनवरत
पाप के
फरेब के इस मौसम में
मुझे तुम,
बस तुम याद आते हो !
0000
कवियत्री—जयश्री
राय
ई-मेल—jaishreeroy@ymail.com
Read more...
लेबल:
कविता,
जयश्री राय।,
पहली बारिश में
घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का------
शनिवार, 9 मार्च 2013
स्कूलों में जाकर अक्सर अभिभावक यह शिकायत करते हैं कि उनके “बच्चे का मन पढ़ाई में लगता ही
नहीं है।” या कि “मास्साब आप कैसे पढ़ाते हैं कि
इसे कुछ याद ही नहीं रहता।”कभी कभी यह भी शिकायत करते हैं कि “ आप इसे होमवर्क नहीं देते
इसीलिये यह घर पर कुछ पढ़ता ही नहीं।” कुछ अभिभावकों को मैंने यह भी कहते हुये सुना है कि “अरे फ़लां स्कूल---अब तो बेकार हो
चुका है—कभी होती थी वहां भी
अच्छी पढ़ाई--- अब तो बस उस स्कूल का नाम भर रह गया है।”
यानी कि बच्चा घर में पढ़े न,उसका मन
पढ़ने में न लगे,वह हमेशा टी0वी0 से चिपका रहे,खेलता रहे -----इन सब की जिम्मेदारी
स्कूल की और मास्साब की। अभिभावक ने ले जाकर स्कूल में नाम लिखा दिया और उनकी जिम्मेदारी
खत्म।अब बच्चे के पढ़ने,विकसित होने,अच्छे नंबर लाने सबका दारोमदार मास्टर जी के
ऊपर।
यहां सवाल यह उठता है कि
क्या बच्चों के पढ़ाने,लिखाने की अभिभावक या मां बाप की कोई जिम्मेदारी नहीं
है?क्या उनकी जिम्मेदारी बस बच्चे को स्कूल तक पहुंचाने की है?जबकि बच्चा स्कूल
में 24घण्टों में से सिर्फ़ 5-6 घण्टे रहता है। बाकी के 18घण्टे वो आपके साथ बिताता
है। स्कूल तो एक जगह भर है जहां उसे शिक्षा का एक रास्ता बताया जाता है। सीखने
सिखाने की एक प्रक्रिया से परिचित करा कर ज्ञान के एक अथाह समुद्र की तरफ़ बढ़ाया
जाता है। ज्ञान के इस समुद्र में बच्चे को तैरना सिखाया जाता है। अब इस अथाह
समुद्र के नये तैराक को एक कुशल,बेहतरीन तैराक बनाने में शिक्षकों के साथ
अभिभावकों की भी बहुत बड़ी भूमिका होती है। जब तक वो अपनी भी जिम्मेदारियां नहीं
निभायेंगे बच्चा ज्ञान के सागर का एक कुशल तैराक नहीं बन पायेगा।पढ़ने लिखने में आगे नहीं बढ़ सकेगा।
बच्चे को पढ़ने लिखने के लिये सबसे जरूरी चीज है अच्छे और खुशनुमा माहौल की।
स्कूल में भी और घर पर भी। खुशनुमा माहौल का मतलब है ऐसा माहौल जिसमें बच्चा सहज
ढंग से शान्तिपूर्ण वातावरण में पढ़ लिख सके। उसके ऊपर किसी तरह का मानसिक दबाव न
हो। वह संकुचित या भयभीत न रहे। वह अपने मन में उठने वाले प्रश्नों को आपसे बिना
किसी संकोच के पूछ सके। माना कि ऐसा वातावरण उसे स्कूल में अध्यापकों की कृपा और
सहयोग से मिल जाता है। लेकिन क्या हम उसे घर पर ऐसा माहौल दे पा रहे हैं? अगर दे
रहे हैं तो बहुत अच्छा है। यदि नहीं तो क्यों? और साथ ही हमें यह भी विचार करना
पड़ेगा कि हम अपने घर का कैसा माहौल बनायें जिसमें बच्चा अच्छे ढंग से पढ़ लिख सके।
यहां मैं कुछ ऐसे ही महत्वपूर्ण बिन्दुओं की ओर इंगित करूंगा जिन पर ध्यान देकर आप
घर का वातावरण बच्चों की पढ़ाई के अनुकूल बना सकते हैं।
*शान्तिपूर्ण माहौल—
बच्चों को पढ़ने के लिये सबसे
जरूरी शन्तिपूर्ण माहौल होता है। बच्चों की पढ़ाई के समय उनके पढ़ने की जगह पर तेज आवाज में बातचीत न
करें। टी0वी0,रेडियो धीमी आवाज में बजायें। यदि उनके पढ़ने के समय में घर में कोई
मेहमान आ जाता है तो कोशिश करें कि बच्चे की पढ़ाई डिस्टर्ब न हो। मेहमानों को आप
दूसरे कमरे में बैठा कर उनका स्वागत कर सकते हैं।
*समय का निर्धारण---
स्कूल के अलावा बच्चे 18घण्टों का जो
समय आपके साथ बिताते हैं उनका सही उपयोग करना बच्चों को आप ही सिखला सकते हैं।
इसके लिये यह जरूरी है कि आप अपने बच्चे के लिये एक संक्षिप्त टाइम टेबिल बनायें।
जिसमें उसके सुबह उठने,स्कूल जाने,खेलने कूदने,मनोरंजन ,पढ़ाई और सोने का समय
निर्धारित हो। यह जरूरी नहीं कि आपका बच्चा एकदम उसी समय सारिणी पर चले। जरूरत
पड़ने पर उसमें आप या बच्चा फ़ेर बदल भी कर सकते हैं। लेकिन इससे उसके अंदर काम को
समय पर और सही ढंग से करने की आदत पड़ेगी।
*टी0वी0,कम्प्युटर का समय निश्चित करें---
आजकल बच्चों का ध्यान सबसे
ज्यादा टी0वी0,वीडियो गेम्स और कम्प्युटर में लगता है। आप इससे उन्हें पूरी तरह
रोक नहीं सकते।क्योंकि आज तो इलेक्ट्रानिक माध्यमों का ही युग है। इनके बिना वह
बहुत सारे ज्ञान और सूचनाओं से वंचित रह जाएगा। लेकिन इस पर बहुत ज्यादा समय देना
भी स्वास्थ्य की दृष्टि से उचित नहीं है। इसलिये अपने बच्चों को इन माध्यमों के
फ़ायदों और हानियों से परिचित करा दें।
तथा इनके उपयोग का समय भी तय कर दें। जिससे वह अपना समय अन्य गतिविधियों को भी
दे सके।
*खुद भी पढ़ें---
बच्चों को पढ़ाई के लिये उचित माहौल
देने के लिये यह बहुत जरूरी बिन्दु है। क्योंकि बच्चे बहुत सी बातें अनुकरण से भी
सीखते हैं। आप को कोशिश यह करनी चाहिये कि आप बच्चों के पढ़ने के समय में खुद भी
अपनी रुचि की कोई पुस्तक,पत्रिका या अखबार पढ़ें। आपको पढ़ता देखकर बच्चे के अंदर भी
पढ़ाई के प्रति रुचि जागृत होगी। उसे यह महसूस होगा कि मेरे पिता या मां भी मेरे
साथ पढ़ रहे हैं।
*कुछ बाल पत्रिकाएं और रोचक बाल साहित्य बच्चों को दें----
हर भाषा में आजकल हर उम्र के
बच्चों के लिये बहुत सी पत्रिकाएं बाजार में उपलब्ध हैं। आप अपने बच्चे की आयु के
अनुरूप कुछ बाल पत्रिकाएं घर में लायें। उनसे बच्चों का मनोरंजन तो होगा ही,उनके
ज्ञान में बढ़ोत्तरी भी होगी। क्योंकि इन पत्रिकाओं में सिर्फ़ कहानी,कविता ही नहीं
बल्कि बच्चों के लिये ढेरों सामग्री रहती है। जैसे चित्रों में रंग भरने,वर्ग
पहेली,च्त्र देखकर कहानी लिखने,वाक्य पूरा करने,आदि के अभ्यास इनसे बच्चे की
बुद्धि तीव्र होने के साथ उसका मनोरंजन भी होगा। और पत्रिकाओं में सामग्री की
विविधता के कारण उसकी पढ़ने में रुचि भी
जागृत होगी।
यहां कुछ अभिभावक यह प्रश्न
उठा सकते हैं कि बच्चों के ऊपर वैसे ही बस्ते का इतना बड़ा बोझ है। उसमें ये
पत्रिकायें या बाल साहित्य---?उनके प्रश्न का सीधा सा जवाब यह है कि जैसे आप आफ़िस
में अपने काम से ऊबने लगते हैं तो क्या करते हैं?दोस्तों से गप शप,टहलना घूमना।फ़िर
तरोताजा होकर अपना काम शुरू कर देते हैं। ठीक वैसे ही बच्चों की ये पत्रिकाएं या
बाल साहित्य,बच्चों के लिये थोड़े समय का मनोरंजन का काम करेगा। यानि कि वो कुछ समय
के लिये कोर्स की किताबों से हट कर ज्ञान के ऐसे संसार में जायेंगे जहां उन्हें
ज्ञान और मनोरंजन दोनों मिलेगा।जहां उनकी कल्पनाओं के भी पंख लगेंगे। उन्हें आनन्द
की अनुभूति होगी।
*बच्चों को घर पर ही कभी कभी रोचक शैक्षिक फ़िल्में दिखाएं---
आज तो पढ़ाई में भी इलेक्ट्रानिक
माध्यमों का वर्चस्व होता जा रहा है। पत्रिकाओं की ही तरह बाजर में हर कक्षा,हर
विषय की पाठ्यक्रम आधारित या पूरक कार्यक्रमों की सी0डी0 उपलब्ध हैं। यद्यपि इनकी
संख्या अभी उतनी नहीं है जितनी होनी चाहिये। आज हर घर में टी0वी0 और सी0डी0प्लेयर
भी मौजूद हैं। आप बच्चों के लिये उनकी कक्षा के अनुरूप शैक्षिक फ़िल्मों या
इण्टरैक्टिव(ऐसे कार्यक्रम जिसमें बच्चे के लिये भी काफ़ी कुछ करने की गुंजाइश रहती
है।) कार्यक्रमों की सी0डी0लाकर बच्चों को दिखायें। इनसे भी बच्चों
के अंदर पढ़ने की रुचि पैदा होगी।
ये कुछ ऐसी छोटी छोटी बातें
हैं जिन पर ध्यान देकर इन्हें अपनाकर आप अपने घर का माहौल बच्चों की पढ़ाई लिखाई के
अनुरूप बना सकते हैं बच्चों के अंदर पढ़ने लिखने की रुचि जगा सकते हैं। उन्हें यह
महसूस करा सकते हैं कि उनके पढ़ने की जगह सिर्फ़ स्कूल में ही नहीं बल्कि घर पर भी
है।
डा0हेमन्त कुमार
मंगलवार, 20 नवंबर 2012
कीमत
पुरस्कार
सम्मान
मरणोपरान्त……परमवीर
चक्र
और अब मुआवजा……शोक
संवेदना पत्र,
ये पांच शब्द ईजाद
किये हैं
हमारी संसद ने
पिछले पैंसठ सालों
में
भूख से
कुलबुलाती अंतड़ियों का
पेट भरने के लिये।
फ़िक्स कर दिया है
रेट
हमारी संसद ने
देश की जनता के
हर काम हर कुर्बानी
उनके साथ घटने वाली
घटनाओं,दुर्घटनाओं
और
हादसों का।
लिखने पर किसी
खद्दरधारी की
यशोगाथा
मिलेगा सम्मान या
पुरस्कार अंगवस्त्रम
पत्रं पुष्पं और
रूपये इक्यावन हज़ार
कारगिल में शहादत पर
मिलेगा मरणोपरान्त
चक्र
और छोड़ दिया जायेगा
परिवार
राम भरोसे/सड़क पर
भटकने को।
मरने पर किसी
दुर्घटना/बिल्डिंग कोलैप्स
या किसी मेले की
भगदड़ में
परिवार को मिलेंगे
रुपये
दो,एक लाख या फ़िर पचास
हजार।
अगर गलती से भी मौत
हो जाती है किसी
युवक की
नौकरी खोजने के
दौरान
किसी सेप्टिक टैंक
में गिरने
या धूप में बेहोश
होने से
(कहने को—असली वजह है भूख)
तो मृतक के परिवार
को मिलेंगे
रूपये पच्चीस हजार
नगर प्रशासन से,
और पचास हजार
प्रधानमंत्री सहायता
कोष से।
इन सब से भी अलग
अगर आप मर जाते हैं
किसी थू थू/धिक्कार
या शक्ति प्रदर्शन
रैली के दौरान
प्लेटफ़ार्म पर मची
भगदड़ में
ट्रक पलटने अथवा
मंच ढहने पर उसके
नीचे दबकर
तो
इत्मिनान रखिये आप
आपके शवदाह का खर्च
भी
परिवार वालों को
नहीं उठाना होगा
आपका शव
बहा दिया जाएगा किसी
नदी में
या दफ़ना दिया जाएगा
कब्रिस्तान में
क्योंकि आपके शव की
शिनाख्त ही
नहीं हो सकी थी
फ़िर कुछ दिनों के
बाद
आपके परिवार को
मिलेगा
रैली की आयोजक
पार्टी
की ओर से
सिर्फ़ एक शोक
संवेदना पत्र।
अब ये
तय करना है आपको
कि आपको कौन सी मौत
चाहिये
हमारी संसद तो
हर तरह से तैयार है।
0000
हेमन्त कुमार
बैग में क्या है---?
शुक्रवार, 10 अगस्त 2012
(हिन्दी में बच्चों को लेकर कविताएं
बहुत ज्यादा नहीं हैं।बहुत कम रचनाकार बच्चों को अपना विषय बनाते हैं या फ़िर उनके
अन्तर्मन में झांकने की कोशिश करते हैं। जबकि आज बच्चों की हालातों के बारे में हम
सभी को सोचना लिखना चाहिये। आज मैं शैलजा पाठक की एक ऐसी ही कविता प्रकाशित कर रहा
हूं।
मुंबई---महानगर—कक्षा सात में पढ़ने वाली एक
मासूम लड़की की आत्महत्या की खबर किसी भी संवेदनशील मन व्यक्ति को विचलित और
उद्वेलित कर देगी।इस घटना ने शैलजा पाठक के अन्तर्मन को कितना अधिक व्यथित किया था
ये बात हम उनकी इस कविता में देख सकते हैं--- )
बैग में क्या है?
बिस्कुट है पानी है
परियां हैं कहानी है
(बच्चे इतना ही जानते हैं चाहते
हैं)
लेकिन बैग में इनके
बिखरा सा भारत है
नदियां हैं झरने हैं
नेता के धरने हैं
बैग में मेरे
मम्मी के सपने हैं
टीचर का गुस्सा है
नम्बर हैं अक्षर हैं
पीठ पर भार सा
बिजली के तार सा
सहमा हुआ चिपका हूं
बैग के अंदर तो
आगे की सोच है
छूने से डरता हूं
हमको भी कहने दो
अपनी सी करने दो
मैं तुम्हारी जिन्दगी हूं
पर मेरी भी जिन्दगी है
जी नहीं पाऊंगा जो तुम यूं करोगे
कब कहूं कि बोझ है ये
थक गया हूं
कब कहूं कि चाहता कुछ और हूं मैं
मैं बता सकता हूं अपने मन की
तुमसे
तुम जरा सा वक्त दो मुझको सुनो
तुम
रोपते क्यों हो
नहीं है जिंदगी जिसमें हमारी
थोपते क्यों हो ये मुझ पर
जो नहीं बनना है मुझको
चाहते हो क्यों वही
जो दे नहीं सकता हूं तुमको
नन्हीं सी आंखों में
भविष्य का बोझ मत थोपो
अंकुर हूं पनपने से पहले
मौत की गोद में मत सौंपो------।
0000
लेबल:
कविता,
बच्चे,
बैग में क्या है,
शैलजा पाठक।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)




.jpg)




.jpg)
.jpg)










