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सूरज सी हैं तेज बेटियां -------

शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

          31 अक्टूबर का दिन भारत ही नहीं पूरी दुनिया के लिये बहुत खास था। खास इस लिये कि इसी दिन दुनिया के सात अरबवें शिशु का जन्म हुआ। और वह भी एक लड़की के रूप में। हमारे अपने प्रदेश लखनऊ के माल कस्बे में पैदा हुयी नरगिस को दुनिया की सात अरबवां  शिशु बनने का गौरव मिला। पूरी दुनिया से उसे बधाइयां मिली। वह अखबारों,न्यूज चैनल की सुर्खियों में आई। धरती पर नरगिस का खूब जोरदार स्वागत हुआ।संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून से लेकर मल्लिका सारभाई,सुनीता नारायण जैसी हस्तियों और तमाम स्वयंसेवी संस्थाओं ने नरगिस के उज्ज्वल भविष्य की कामना की।कुल मिलाकर पूरी दुनिया में उसके पैदा होने की चर्चा से एक जश्न का माहौल बन गया।एक तरह से देखा जाय तो दुनिया भर की बेटियों के लिये यह बहुत ही शुभ अवसर था।
        लेकिन अगर हम सच्चाई की बात करें तो हमारे देश में परिदृश्य काफ़ी भयावह है। हमारे देश और समाज में आज भी लड़कियों को वह दर्जा नहीं मिल सका जो उसे मिलना चाहिये।आज भी हमारे देश में कन्या का जन्म एक अभिशाप माना जा रहा है। तमाम सरकारी कानून और बन्दिशों के बावजूद आज भी लोग पैथालाजी सेन्टर्स पर जाकर भ्रूण लिंग परीक्षण करवा रहे हैं।आज भी ऐसी बर्बर मानसिकता के लोग हैं जो आनर किलिंग जैसे पाशविक कारनामे करते हैं। आज भी सड़क पर चलने वाली लड़कियां सुरक्षित नहीं। और इसी का नतीजा है कि 2011 की जनगणना के अनुसार हमारे देश में शून्य से छह साल की उम्र में एक हजार लड़कों के पीछे लड़कियों की संख्या महज 914हो गयी है।यानि कि लड़के लड़कियों की संख्या में भी अन्तर बढ़ रहा है।
           यहां सवाल यह उठता है कि यह अन्तर कम कैसे किया जाय?लोगों की मानसिकता कैसे बदली जाय?लड़कियों को उनका हक कैसे दिलवाया जाय?समाज की सोच कैसे बदली जाय?
     हमें इन प्रश्नों का उत्तर सीधे अपने परिवार से ही ढूंढ़ना पड़ेगा।क्योंकि परिवार हमारे समाज की इकाई है।परिवार से ही लड़की और लड़के के बीच अन्तर की शुरुआत होती है। और  इस अन्तर को खतम करने की शुरुआत और रास्ते भी हमें अपने परिवार में ही बनाने होंगे। सबसे पहले हमें यह देखना होगा कि परिवार में हम किस तरह से अपने ही बच्चों में यह भेद पैदा कर रहे हैं।
  • शिशु के जन्म का उत्सव:आज इतने शिक्षित, सभ्य और सुसंस्कृत हो जाने के बावजूद बहुत से परिवार आपको ऐसे मिलेंगे जहां बेटे के पैदा होने पर तो अच्छा खासा जश्न मनाया जाता है। लेकिन अगर कहीं गलती से पैदा होने वाला शिशु बेटी है तो उसके पैदा होने पर जश्न की मात्र औपचारिकता निभा दी जाती है। घर वालों में वह उत्साह नहीं दिखता जो एक नवागत के आने पर होना चाहिये।
  • खानपान में अन्तर:मेरे समझ में यह बात आज तक नहीं आई कि परिवार में खाना खाते समय घर के पुरुषों,लड़कों को खाना पहले क्यों परोसा जाता है और महिलाओं और लड़कियों को बाद में? अगर लड़कियों को पहले खाना खिला दिया जायेगा तो क्या खाना खतम हो जायेगा या उसकी महत्ता कम हो जायेगी? घरों की बात छोड़िये अगर आप शादी विवाह या किसी अन्य समारोह में जायेंगे तो वहां भी यही रीति अपनायी जाती है। जबकि हम हमेशा नारा देते हैं लेडीज फ़र्स्ट का।इतना ही नहीं अक्सर हम यह मानकर कि लड़कों को ज्यादा मेहनत करनी हैउन्हें अधिक पोषक खाना देते हैं और लड़कियों को कम। क्या लड़कियों को पोषण की जरूरत नहीं है?(जबकि सच्चाई यह है कि लड़कियां ज्यादा शारीरिक श्रम करती हैं,उन्हें भविष्य में मां भी बनना है इस दृष्टि से भी उन्हें ज्यादा पोषक खाने की जरूरत रहती है।
  • घरेलू काम काज:आज भी हमरे परिवारों की मनसिकता यही बनी है कि घरेलू कामकाज लड़कियों की जिम्मेदारी है। अगर आपका बेटा बेटी दोनों सामने हैं तो हमेशा आप कहते हैं कि बिटिया जरा एक गिलास पानी पिलानान कि बेटा जरा एक गिलास पानी लाओ। ऐसा हम क्यों करते हैं? यदि पति पत्नी दोनों ही सर्विस करने वाले हैं तो घर लौटने पर पति पत्नी से उम्मीद करता है कि वो एक प्याली चाय बना कर उसे दे। कभी खुद इस दिशा में पहल नहीं करता।घर की सब्जी काटना,बर्तन,चूल्हा चौका,कपड़े धोना इन सबके लिये हम परिवार की लड़कियों को ही क्यों आदेश देते हैं। लड़कों को क्यों नहीं? हमे अपनी इस सोच और मानसिकता को बदलना ही होगा।
  • शिक्षा दीक्षा:अपने ही बच्चों को शिक्षा देने के मामले में भी हम हमेशा लड़कों को ही स्कूल भेजने की दिशा में पहल करते हैं। लड़कियों को बाद में यह अवसर देते हैं।जबकि लड़कियों को शिक्षित करना ज्यादा जरूरी है। इस दृष्टि से कि उसे तो दो घरों की(आपके और ससुराल के) की जिम्मेदारियां सम्हालनी हैं। लड़का तो बस आपके ही परिवार को चलायेगा। यद्यपि इस दिशा में हमारे समाज की सोच थोड़ा तो बदली है लेकिन उतनी नहीं जितनी बदलनी चाहिये। हमें इस बिन्दु पर खास तौर से अधिक ध्यान देने की जरूरत है। कहीं कहा भी गया है कि मां ही पहली शिक्षक होती है। यानि कि आपकी लड़की का पढ़ना लिखना इस लिये भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि वह भविष्य में मां बनेगी। अगर वह पढ़ी लिखी रहेगी तो आपके ,ससुराल के घर को स्सुव्यव्स्थित रूप से संचालित करने के साथ ही अपने शिशु को शिक्षित,संस्कारित करके देश को एक अच्छा जिम्मेदार नागरिक भी प्रदान करेगी।
  • खेलकूद एवम अन्य गतिविधियों के अवसर:आम भारतीय परिवारों में अक्सर यह दृश्य देखने को मिलता है कि लड़के लड़की दोनों स्कूल से आये।और लड़का तो आते ही बस्ता एक तरफ़ फ़ेंक कर भागा सीधे मैदान की ओर। दोस्तों के साथ खेलने के लिये। और लड़की बेचारी बस्ता रखते ही जुट गई मां के साथ घरेलू कामों में हाथ बटाने के लिये। और परिवार का मुखिया यानि पिता बड़े गर्व से अपने दोस्तों,रिश्तेदारों से यह कहता है कि देखो मेरी बिटिया कितनी समझदार है जो स्कूल से आते ही घर के काम में जुट गई। बात उनकी सही है---लड़की तो समझदार है ही। लेकिन क्या उसको खेलने कूदने मनोरंजन का अवसर नहीं मिलने चाहिये?वो खुद कभी अपनी बिटिया से यह कहते कि बिटिया जाओ तुम भी थोड़ी देर अपनी सहेलियों के साथ खेल कूद आओ। लाओ घर के काम मैं करवा देता हूं। हमें अपने परिवारों की यह मानसिकता भी बदलने की जरूरत है।
  • कपड़े पहनावे के स्तर पर अन्तर:कभी भी कोई त्योहार या उत्सव होगा नये कपड़े बनवाने का अवसर हम परिवार में सबसे पहले लड़के को देते हैं। लड़कियों का नम्बर बाद में आता है?क्यों भाई?क्या लड़की को नये कपड़े पहनने का हक नहीं?या उसके कपड़े बनवाने पर आपका खजाना खतम हो जायेगा। आप पहले लड़कियों के कपड़े बनवाने की बात क्यों नहीं करते?हमें इस सोच को भी बदलने की आवश्यकता है।
  • शादी विवाह का निर्णय:लड़के लड़की के अन्तर का सबसे अहम प्रश्न और महत्वपूर्ण बिन्दु है यह हमारे भारतीय समाज का। हम अपने बेटे की शादी तय करते समय तो लड़की देखने,पसन्द नापसन्द,पढ़ाई लिखाई हर मुद्दे पर अपने बेटे को अपने साथ रखते हैं।उसकी सलाह लेते हैं।उसके कहने पर कई कई लड़कियों को देख कर रिजेक्ट कर देते हैं।लेकिन लड़की के लिये?क्या कभी हम शादी विवाह के समय उसकी पसन्द नापसन्द के बारे में सोचते हैं।या उससे पूछते हैं कि बेटी तुम्हें किस नौकरी वाले लड़के को अपना जीवन साथी बनाना है? या कि अभी तुम विवाह करने के लिये मानसिक रूप से तैयार हो? क्या लड़कियों को अपने जीवन साथी के बारे में निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं है? क्या वह मात्र एक हाड़ मास की पुतली है जिसे हम किसी भी व्यक्ति के साथ बांध कर अपने उत्तरदायित्व से छुटकारा पा जाना चाहते हैं?भारतीय समाज और परिवार की इस सोच को भी बदलना ही होगा। तभी हम लड़कियों की बराबरी का दर्जा देने के स्वप्न को पूरा कर सकेंगे।
  • ये कुछ ऐसे महत्वपूर्ण बिन्दु हैं हमारे समाज और परिवार के जिन पर चिन्तन करके,जिनमें बदलाव लाकर ही हम दुनिया की सात अरबवीं शिशु बनने का गौरव पाने वाली प्यारी बिटिया नरगिस और उसके जैसी दुनिया भर की सभी बेटियों को उनका हक़,सम्मान,और समाज में उनकी प्रतिष्ठा को बढ़ा सकेंगे।और कवियत्री पूनम श्रीवास्तव के गीत बेटियां की इन पंक्तियों को साकार कर सकेंगे।
  • सूरज से हैं तेज बेटियाँ/चाँद की शीतल छाँव बेटियाँ/झिलमिल तारों सी होती हैं/दुनिया को सौगात बेटियाँ/कोयल की संगीत बेटियाँ/पायल की झंकार बेटियाँ/सात सुरों की सरगम जैसी/वीणा की वरदान बेटियाँ/घर की हैं मुस्कान बेटियाँ/लक्ष्मी का हैं मान बेटियाँ/माँ बापू और कुनबे भर की/सचमुच होती जान बेटियाँ
                  00000000000
डा0हेमन्त कुमार

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बाजू वाले प्लाट पर

रविवार, 11 दिसंबर 2011

कुछ बच्चे रहते हैं
मेरी बिल्डिंग के
बाजू वाले प्लाट पर
प्लाट पर बनी झोपड़ियों में
बन्द है उनका
अनोखा अद्भुत संसार।

झोपड़ी के एक कोने में है
उनका किचेन
दूसरा कोना बेडरूम
तीसरा ड्राइंग रूम
बाहर का मैदान है उनका
ओपेन टायलेट
जहां वे हगते मूतते
और नाक छिनकते हैं।

इसी झोपड़ी में खोलते हैं
वे आंखें
इसी में खेलते हैं
लड़ते हैं झगड़ते हैं
करते हैं धमाचौकड़ी
उठा पटक और लत्तम पैजार।

फ़िर निकल पड़ते हैं
कन्धे पर एक फ़टा बोरा
और हाथ में एक छड़ी लेकर
पूरे दिन भर के सफ़र पर
शहर की सड़कों की लम्बाई नापने
कूड़े के ढेर से पालीथिन बीनने
और जिन्दगी का गणित
समझने कए लिये।

लम्बी लम्बी सड़कों पर भागता ट्रैफ़िक
गली के नुक्कड़ पर कूड़े का ढेर
शहर की ऊंची बिल्डिंगों का हुजूम
सिनेमा के बड़े बड़े पोस्टर
मल्लिका की देह,ऐश्वर्या के उभार
चाय की चुस्की,बीड़ी का सुट्टा
यही सब है
इन बच्चों का ओपेन स्कूल।

ये बच्चे
देखते हैं बड़ी हसरत भरी निगाहों से
रोज सबेरे हमारे बच्चों को
स्कूल जाते हुये
शाम को घूमने जाते हुये
रात में बर्थ डे पार्टियों में
ठुमके लगाते हुये।

ये बच्चे झांकते हैं
कभी कभी
हमारी बिल्डिंग के भीतर भी
पर नहीं आते अंदर कभी
शायद नहीं पसन्द है उन्हें
अपनी झोपड़ी के
अनोखे अद्भुत संसार को
छोड़ना या उससे बिछुड़ना।
0000
हेमन्त कुमार

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वह सांवली लड़की

रविवार, 4 दिसंबर 2011

(चित्र साभार--युनिसेफ़)

याद आती है अक्सर मुझे
मेरे मोहल्ले की वह साँवली-सी लड़की।
तंग कोठरी में बंद
जिसकी उदास आँखों में
सारा आकाश होता था
मगर सपनों का कहीं कोई रेश नहीं...
न जाने क्यों अनकहे ही मुझे
उसकी चुप्पी सुनाई देती थी बहुत बार।

...जब वह गूंगी आँखों से,
संवाद करती थी हवा और धूप से
और अनायास ठिठक कर,
आकाश में उड़ती किसी पतंग को,
निर्निमेष ताकने लगती थी...
तब पर तोलती-सी लगती थीं उसकी पलकें...
ऐसे में मुझे प्रतीत होता था
उसके सारे रूमानी शब्द भीग गए हैं
उसी के अंदर बहती किसी नमकीन नदी में...।

इच्छा के किसी तरल-से क्षण में
मेरा मन करता था
आकाश के नील में हथेली डुबोकर
उसका फीका-सा जीवन रंग दूँ और-छोर
और मुस्कान की एक सुनहरी तितली
उसके उदास होंठों पर रख दूँ
न जाने कितनी बार उसके लिए
इन्द्रधनुष तोड़ लाया था
आषाढ की नीली संध्या से
मगर कभी उसे दे न सका।

जेब में लिए फिरता रहा
उस क्षण की प्रतीक्षा में
जब वह मेरी तरफ देखेगी
तब मैं थमाऊँगा उसे
वे मुस्कराहट, गीत और स्वप्न
जो अपने हिस्से से उसके लिए,
अब तक बचा रक्खे थे।

मगर ऐसा हो न सका
वह अपने अँधेरे से निकलकर
जिंदगी पर अपना हक़ जताने कभी आ न सकी
और एक दिन ना मालूम खो गयी
अपने सूनेपन में
आहों और आंसुओं की विरासत लिए
ठीक जैसे हमारी लड़कियां
खो जाती है अक्सर
बचपन के आँगन से
ससुराल की जलती अंगीठी में
या फिर अपनी माँ की कोख से...
याद आती है अक्सर मुझे...।
000
कवियत्रीजयश्री राय
                                                        जयश्री राय हिन्दी की चर्चित कहानीकार हैं।गोवा युनिवर्सिटी से हिन्दी साहित्य में पोस्ट ग्रेजुएशन।हिन्दी की लगभग सभी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में कहानियां,कविताएं प्रकाशित।एक कहानी संग्रह एवम एक कविता संग्रह प्रकाशित एवम तीन पुस्तकें प्रकाशनाधीन।कुछ समय तक अध्यापन कार्य।सम्प्रति स्वतन्त्र लेखन।

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पहले कभी-----

शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

पहले तो कभी
नहीं हुआ था
ऐसा हादसा
कि सारी गौरैया
हो गयी हों अचानक फ़ुर्र
आंगन से
और गंगा बाबू
बैठे रहे हों मुट्ठी में चावल लिये
आंगन में अकेले
सारा सारा दिन।

पहली बार हुआ
ऐसा कि
इन्कार कर दिया
कौवों ने
श्राद्ध पक्ष में
पितरों को दिया
दूध भात खाने से ।

कि रमुआ कलुआ
और गांव के सारे बच्चे
सारे सारे दिन भटकते रहें
खेतों की मेंड़ पर
वीर बहूटी की तलाश में
और वीर बहूटी उन्हें न मिल पाये
ख्वाबों की भरी बरसात में  भी।

ऐसा अजूबा हुआ पहली बार
मेरी जिन्दगी में
कि जाड़ा पूरा का पूरा बीत गया
और काका काकी
सारा सारा दिन दुबके रहे
रजाई के भीतर
एक टुकड़ा धूप
के इन्तजार में।
पहले तो कभी
नहीं हुआ ऐसा हादसा।

करवाचौथ पर
गांव की सारी औरतें
हाथों में पूजा की थालियां लिये
करती रहीं चांद का इन्तजार
और धूल धुयें के गुबार से
ढके चांद ने
टूटने ही नहीं दिया व्रत।

पहले तो कभी
नहीं हुये ऐसे हादसे
कि गांव के सारे पुरुष
हलों की फ़ाल पर साम धराये
करते रहे इन्तजार बादल का
और प्रचण्ड धूप लू के थपेड़ों ने
सावन में भी
नहीं पहुंचने दिया
उन्हें खेतों की मेड़ तक।

पहले तो कभी
नहीं हुये ऐसे हादसे
हमारी धरती पर
फ़िर आज ही क्यों
जब कि हम
ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति
को जानने के लिये
धरती के गर्भ को
मथ रहे हैं
टनों इस्पात से बनी मथानी से
और कर रहे हैं कोशिश
हर उस अज्ञात को
जानने की
जो जड़ देगा एक तमगा और
हमारे सीने पर
एक नई ईजाद का।
   0000
हेमन्त कुमार

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कथा,काव्य,यात्रावृत्त और दर्शन का अद्भुत संगम----‘देख लूं तो चलूं’।

बुधवार, 12 अक्टूबर 2011

पुस्तक

देख लूं तो चलूं
लेखक:समीर लाल समीर
प्रकाशक:शिवना प्रकाशन
पी0सी0लैब,सम्राट काम्प्लेक्स बेसमेण्ट
बस स्टैण्ड,सिहोर(म0प्र0)
भारत
मूल्य रू0-100/मात्र


कथा,काव्य,यात्रावृत्त और दर्शन का अद्भुत संगम----देख लूं तो चलूं

                    साहित्य में हर विधा की पुस्तक पढ़ने का अपना अलग आनन्द होता है। कहानी,कविता,नाटक,उपन्यास,व्यंग्य,यात्रा वृत्तान्त सभी विधाओं की अपनी खूबियां होती हैं। सबका अलग अलग प्रभाव और आनंद होता है। और सबसे बड़ी बात यह कि सभी विधाओं के पाठक भी अलग अलग अभिरुचि के होते हैं। किसी पाठक को कविता आनन्दित करती है तो किसी को कथा साहित्य,किसी कू नाटक तो किसी को व्यंग्य। ज्यादातर पाठक किसी एक विधा के लिये ही एक किताब खरीदता और पढ़ता है। इसका कारण यह भी है कि बहुत कम ही पुस्तकें ऐसी मिलेंगी जिनमें आपको हर विधा का रसास्वादन मिल सके।लेकिन हाल ही में प्रकाशित समीर लाल समीर की पुस्तक देख लूं तो चलूं’ इस विषय में अपवाद है।अपवाद इसलिये कि यह उन गिनी चुनी किताबों की श्रेणी में रखी जा सकती है जिसमें आपको साहित्य की अलग अलग विधाओं की रसानुभूति हो सकेगी।यानि कि इसे पढ़ते समय आपको कहानी,कविता,उपन्यास,यात्रावृत्त सभी का आनन्द मिलेगा। मेरी एक आदत है। मैं कोई भी पुस्तक बहुत आराम से पढ़ता हूं। यानि कि ब्रेक लगा लगाकर। लेकिन इस मामले में भी यह किताब अपवाद सिद्ध हुई। यानि कि आदत के विरुद्ध मैं इसे एक ही बैठक में पढ़ गया। जबकि ऐसा मेरे साथ बहुत कम ही हुआ है। कुछ गिनी चुनी किताबें हैं जिन्हें मैं सारा काम छोड़कर पढ़ने लगा था।देख लूं तो चलूं भी उन्हीं किताबों की सूचि में शामिल हो गयी।जबकि इस पुस्तक की कहानी इतनी मात्र है कि लेखक को अपने किसी मित्र के घर गृह प्रवेश की दावत में पहुंचना है। और वह कार से कनाडा के एक हाइवे पर यात्रा कर रहे हैं। सिर्फ़ इतने छोटे से कथ्य को लेकर एक उपन्यासिका लिख देना कलम के एक मजे हुये खिलाड़ी के बूते की बात है। और इस मामले में में समीर जी बधाई के पात्र हैं।
  अपने घर से निकलकर मित्र के घर पहुंचने की इस पूरी यात्रा के दौरान समीर जी ने बड़ी सूक्ष्मता के साथ दो देशों,दो संस्कृतियों,रीति रिवाजों,दो देशों की राजनैतिक स्थितियों,राजनेताओं,जनता के स्वभाव के अन्तर,आदि को बड़े करीने से शब्दों में बांधा है।इस पुस्तक में जहां आपको प्रवासी भारतीयों का दर्द,उनके वतन छूटने की पीड़ा,उनके मन में चल रही उथल पुथल पढ़ने को मिलेगी वहीं दूसरी ओर भारतवर्ष में उनके रिश्तेदारों,उनके हम वतन मित्रों के मन में चलने वाले विचार भी पढ़ने को मिलेंगे। एक मां बाप जिनका बेटा कनाडा,फ़्रांस,जर्मनी,टोक्यो या अन्य किसी देश में नौकरी करने चला गया है।उस मां पिता के मन की छटपटाहट,बेटे के वापस आने की प्रतीक्षा में जाग जाग कर पूरी रात बिताना,आपस की बातचीत में हर वक्त उस बेटे/बहू/बच्चों की चर्चा मन को कहीं गहराई तक आन्दोलित कर जाती है।
         उपन्यासिका का हर प्रसंग अपने आप में एक अलग कहानी होते हुये भी आपस में इस तरह जुड़ा है कि पाठक किताब शुरू करने के बाद समाप्त करके ही छोड़ेगा।चाहे वो प्रवासी हो गये बेटे के इन्तजार में बातों में रात काटने की कोशिश कर रहे वृद्ध दम्पत्ति हों,जर्मनी में समलैंगिकों की पार्टी की घटना हो,ट्रेन में प्रेमी युगल के किसिंग का दृश्य हो,भारतवर्ष में मित्र के पिता के निधन का प्रसंग हो या इस ढंग के अन्य प्रसंग।जिस तरह आप किसी बहुत सुन्दर मकान में प्रवेश करें और उसके कमरे दर कमरे में प्रवेश करते जा रहे हों---और हर दरवाजा आपको एक अलग खूबसूरत कमरे में पहुंचा रहा होएक दरवाजे के अंदर दूसरा,दूसरे के अंदर तीसरा,चौथा और हर बार आपके मुंह से निकले वाहअरेअद्भुतकुछ ऐसा ही अनुभव आप पायेंगे इस पुस्तक को पढ़ते हुये।छोटी छोटी घटनाओं ,प्रसंगों को समीर जी ने जिस प्रकार अपनी हाइवे की कार यात्रा के साथ संयोजित किया है वह अद्भुत है। हर घटना,प्रसंग पढ़कर पाठक चमत्कृत, अभिभूत होता हुआ आगे बढ़ता है। इसमें एक तरफ़ भारत देश है,यहां के गांव हैं,मध्य प्रदेश की यादें हैं तो दूसरी तरफ़ कनाडा है,वहां की संस्कृति है,वहां के लोग हैं,उनका व्यवहार है।
        यहां आपको भाषा और शिल्प का ऐसा अद्भुत अनोखा सामंजस्य मिलेगा जो प्रायःगद्य में कम पढ़ने को मिलता है। भाषा इतनी सहज और प्रवाहमयी कि ऐसा नहीं लगता है कि हम पुस्तक पढ़ रहे हैं।सारे दृश्य एक चलचित्र की तरह हमारी आंखों के सामने से गुजरते जाते हैं। और दृश्यों का यही गुजरते जाना ही इस उपन्यासिका की शैली की सबसे बड़ी विशेषता है। यह किताब पढ़ते हुए मुझे एक और उपन्यास बार बार याद आ रहा था। वो उपन्यास है प्रख्यात समाजवादी चिंतक,आलोचक एवं भूतपूर्व अध्यक्ष,हिन्दी विभाग इलाहाबाद युनिवर्सिटी मेरे गुरु डा0 रघुवंश जी का उपन्यास तन्तुजाल।रघुवंश जी के तन्तुजाल का नायक भी ट्रेन की लम्बी यात्रा में है। और उसकी पूरी यात्रा के साथ घटनाओं,संवेदनाओं, और व्यक्तियों का समूह लेखक से लगभग चार सौ पृष्ठ लिखवा डालता है। पूरी यात्रा में ट्रेन की खटर खट्ट,----सीटी,  स्टेशन,चायवाले वेण्डर,कुली---और उनके बीच से निकलता नायक का चिन्तन ,उसकी सोच,समाज,देश के प्रति उसकी चिन्ताएंऔर भी बहुत कुछ। हां यह बात जरूर है कि रघुवंश जी की भाषा अपेक्षाकृत थोड़ा कठिन और बोझिल है।लेकिन इसके बावजूद वह उपन्यास मैंने कई बार पढ़ा है।
             समीर जी की इस उपन्यासिका में उनके कवि मन,यायावरी प्रवृत्ति, और छोटी छोटी चुटकियां लेकर अपनी बात बढ़ाने की विशेष कला स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है। और उनकी यही चुटकियां,व्यंग्यात्मक शैली उन्हें अन्य लेखकों से अलग करती है।
                         एक और विशेषता इस पुस्तक की जो बहुत प्रभावित करती है कि हर प्रसंग की शुरुआत तो समीर जी बहुत ही मजेदार और हंसमुख वातावरण से करते हैं।पर वह प्रसंग समाप्त होते होते वो पूरे दार्शनिक हो जाते हैं। इतना ही नहीं प्रसंग की समाप्ति पर पहुंच कर तो हमें मानव जीवन की उन सच्चाइयों,उन आदर्शों,उन रास्तों से रूबरू कराते हैं जिन पर यदि दुनिया चले तो शायद धरती की रंगत ही बदल जाय। देशों,सम्प्रदायों,धर्मों,जातियों के सारे विवाद ही समाप्त हो जायं।लेकिन ऐसा संभव हो  तब न…?कुल मिलाकर अगर मैं यह कहूं कि देख लूं तो चलूं घटनाओं,कथ्यों,शब्दों और भाषा का ऐसा अद्भुत कोलाज है जिसे पाठक बार बार पढ़ना चाहेगा।
                        0000
हेमन्त कुमार


समीर लाल समीर
दुनिया में हिन्दी का भला कौन सा ब्लागर,पाठक होगा जो समीर जी से अपरिचित होगा।जबलपुर, मध्य प्रदेश में जन्मे समीर जी अपनी पढ़ाई पूरी करके कनाडा पहुंच गये।जबलपुर से कनाडा तक की इस यात्रा,देश छूटने की पीड़ा,अपने देश भारत के लिये कुछ करने की तमन्ना उनके लेखन में हमें परिलक्षित होती है। कनाडा के प्रतिष्ठित बैंकों में तकनीकी सलाहकार।उड़न तश्तरी ब्लाग के साथ मोहे बेटवा न कीजो(लघुकथा संग्रह),बिखरे मोती(काव्य संग्रह),और देख लूं तो चलूं(उपन्यासिका)
साथ ही 2007 का विश्व के सर्वश्रेष्ठ ब्लागर का सम्मान आपके खाते में है।

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सपने दर सपने

रविवार, 9 अक्टूबर 2011

हम भी दौड़ाते हैं रेल
कभी एक्स्प्रेस कभी सुपर फ़ास्ट
कभी लोकल
अपने कुनबे के सपनों को
नन्हीं सी ढोल में बन्द करके।

अम्मा बापू के सपने
हमारे सपने
सबके सपने
बन्द हैं हमारी छोटी सी ढोल में।
सबके सपनों का बोझ
भूख से कुलबुलाती अंतड़ियां
अलस्सुबह खींच ले जाती हैं हमें
भारतीय रेल की पटरियों पर।

किसी भी एक्स्प्रेस/पैसेंजर ट्रेन
के साथ दौड़ पड़ता है
हमारे सपनों का महल
पहियों की खड़र भड़र
पटरियों की खटर पटर
के साथ मिल जाती है
हमारी ढोल की थाप।

मेरी छोटी बहन
दिखाती है कलाबाजियां
सारे खतरों और भय को
करके दरकिनार
हमारे गले से निकलता बेसुरा
पर बेहद सुरीला गाना
मुन्नी बदनाम हुयी-----
यात्रियों की वाह वाह
फ़रमाइश सहानुभूति के बीच
फ़ैला हुआ हमारा हाथ
हाथों पर गिरते
रूपये एक दो के सिक्के
किसी टीनेजर के कैमरे की
चमकती फ़्लैश
बना देते हैं अनूठा अद्भुत कोलाज
हमारे चारों ओर।

इस कोलाज में बन्द हैं
अम्मा बापू छोटी बहन
हम सभी के सपने
सपनों के साकार होने की उम्मीद में
हम भी दौड़ाते हैं रेल
लखनऊ से मुम्बई
मुम्बई से इटारसी
फ़िर मुम्बई से इटारसी
सुबह से शाम
शाम से रात
सबके सपनों को बन्द करके
अपनी नन्हीं सी ढोलक
की थाप में।
000
हेमन्त कुमार

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जागो लड़कियों

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

बालिका दिवस पर दुनिया की सभी बालिकाओं को  समर्पित मेरी यह
कविता---तथा सभी पाठकों/पाठिकाओं को हार्दिक शुभकामनायें।

जागो लड़कियों

जागो लड़कियों जागो
बना दो अपने हस्ताक्षर
इतिहास के सीने पर।

हर गांव गली चौराहों पर
गूंजें बस
तुम्हारे ही गाये हुये गीत
बता दो इस पूरी दुनिया को
कि तुमने भी
सजा लिया है
वक्त की रफ़्तार को
अपनी सुकोमल लेकिन
धारदार हथेलियों पर।

हवाओं से कह दो
वो भी गुनगुनायें
तुम्हारे गीत और राग
हर दिशा में
झरनों की अठखेलियां भी
अब मिला लें ताल
तुम्हारी ही इजाद की हुई
अनोखी नृत्य मुद्राओं से।

बता दो आज पूरी दुनिया को
कि अब नहीं धड़कता है तुम्हारा सीना
खामोश आंगन की चहारदिवारियों में अकेला
अब तुम्हारी
हर धड़कन के साथ है
चिड़ियों का कलरव
झरनों का संगीत
हवाओं की सरसराहट
फ़ूलों की खुशबू
पर्वतों की ऊंचाइयां
और सागर की उत्ताल तरंगों की
गम्भीर गर्जना।

जागो लड़कियों जागो
बना दो हस्ताक्षर
इतिहास के सीने पर।
000
हेमन्त कुमार

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आने वाली किताब---

शनिवार, 13 अगस्त 2011


बेंगाली गर्ल्स डोण्ट----

लेखिकाएल0ए0शेरमन
प्रकाशक-अमेजन बुक्स
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     किसी ऐसी लेखिका,जिसकी आंखें ही बमों के धमाकों,सैनिकों की क्रूरता और अत्याचार तथा निहत्थे लोगों के चीत्कार के बीच खुली होंके अनुभवों को उसी के शब्दों में पढ़ना अपने आप में एक अलग किस्म का अनुभव होगा। अलग इसलिये क्योंकि लेखिका शिशु होने के नाते इन अनुभवों से खुद भले ही नहीं गुजरी है।लेकिन उसने इन अनुभवों को अपने माता पिता,सगे सम्बन्धियों
  परिजनों से सुना और गहराई से उन परिस्थितियों  को महसूस किया है।
  मैं आज आपको एक ऐसी ही आत्मकथात्मक पुस्तक के बारे में बता रहा हूं।बेंगाली गर्ल्स डोण्ट शीर्षक से यह किताब टाम्पा,फ़्लोरिडा की रहने वाली लेखिका,माडल और अभिनेत्री एल0ए0शेरमन ने लिखी है।
          लकी शेरमन की यह आत्मकथा अमेजन बुक्स ने ई बुक के रूप में प्रकाशित की है। और जल्द ही इसका प्रिण्ट वर्जन भी आने वाला है। यद्यपि मैंने अभी इसका कुछ अंश ही पढ़ा है।लेकिन इसकी कहानी कुछ ऐसी है जो निश्चित रूप से हर वर्ग के पाठक को पूरी पुस्तक पढ़ने के लिये आकर्षित करेगी।
        कहानी की शुरुआत 1971 में पाकिस्तान के विभाजन और बांग्ला देश के निर्माण के साथ होती है। उस समय पाकिस्तानी सेनाओं द्वारा बांगला देश में जो अत्याचार किये गये, निहत्थों का खून बहाने के साथ ही महिलाओं के साथ जिस क्रूरता के साथ बलात्कार और फ़िर हत्या जैसे जघन्य काण्ड किये गये,बच्चों तक को जिस पाशविकता के साथ मारा गया उन सब का यथावत वर्णन आपको इस पुस्तक में मिलेगा।
          इस आत्मकाथात्मक पुस्तक में आपको एक ऐसी लड़की की कहानी पढ़ने को मिलेगी जिसका पूरा परिवार पाकिस्तानी सैनिकों की पाशविकता का शिकार होकर अपनी जन्मभूमि यानि बांग्लादेश छोड़ने को मजबूर हो गया। शेरमन का पूरा परिवार ब्रिटेन चला गया। वहां उस परिवार का जन्मभूमि छोड़ने का दर्द,स्थापित होने का संघर्ष सब कुछ लिखा गया है इस आत्मकथा में।
       15 साल की उम्र में पिता द्वारा जबर्दस्ती बंगलादेश ले जाकर अपनी(पिता की)उम्र के एक व्यक्ति से शादी और फ़िर वहां की घुटन, उससे मुक्ति का मार्ग ढूंढ़ना,अमेरिका जाकर वहां लेखिका द्वारा खुद अपनी पहचान बनाने और नये जीवन की शुरुआत करने का संघर्ष ये सभी घटनायें पुस्तक को रोचक बनाती हैं।शेरमन की इस पुस्तक में आपको बंगाली एवम मुस्लिम संस्कृति दोनों की झलक मिलेगी।
          साथ ही लेखिका द्वारा जीवन के हर पल में खुशी की खोज के साथ ही अपने परिवार के साथ सन्तुलन बनाने का उल्लेख उनके संघर्षशील जीवन का परिचायक है। जीवन के प्रति यह जिजीविषा निश्चित ही पाठकों को कहीं न कहीं प्रभावित करेगी।
           यद्यपि यह किताब अंग्रेजी भाषा में लिखी गयी है फ़िर भी मुझे नहीं लगता कि थोड़ा भी अंग्रेजी की समझ रखने वाले पाठकों को इसे पढ़ने में दिक्कत आयेगी। क्योंकि परिस्थितियों के अनुकूल शब्दों का चयन और भाषा का प्रवाह शेरमन की लेखन शैली की विशेषता है।
                मुझे लगता है कि जीवन संघर्ष,पूर्व और पश्चिम की संस्कृतियों तथा बंगला देश के मुक्ति आन्दोलन को जानने ,समझने और पढ़ने वाले पाठकों को यह किताब जरूर पढ़नी चाहिये।
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हेमन्त कुमार





लेखिकाएल0ए0शेरमन
लेखिका होने के साथ ही एक कुशल माडल और अभिनेत्री हैं। बेंगाली गर्ल्स डोण्टइनकी दूसरी पुस्तक है।



  

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लेबल

. ‘देख लूं तो चलूं’ "आदिज्ञान" का जुलाई-सितम्बर “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” ११मर्च २०१९ ११मार्च 1mai 2011 2019 अंक 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अक्षत अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अपराध अपराध कथा अभिनव पाण्डेय अभिभावक अमित तिवारी अम्मा अरविन्द दुबे अरुणpriya अर्पण पाण्डेय अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आनन्द नगर” आने वाली किताब आबिद सुरती आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उम्मीद के रंग उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक टिपण्णी एक ठहरा दिन एक तमाशा ऐसा भी एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महत्वपूर्ण समीक्षा एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता ओड़िया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथाकार समीर गांगुली कथावाचन कर्मभूमि कला समीक्षा कलाकार कविता कविता। कविताएँ कवितायेँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काफिला नाट्य संस्थान काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किताबों में चित्रांकन किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैंसर-दर-कैंसर कैमरे. कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं क्षणिकाएँ खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीतांजलि गिरवाल गीतांजलि गिरवाल की कविताएं गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चिड़ियाँ पिकनिक करने आईं चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छिपकली छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जन्मदिन जन्मदिवस जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जात। जाने क्यों ? 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