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हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य

गुरुवार, 19 अगस्त 2010

        इधर मुझे लगातार हिन्दी साहित्य से सम्बन्धित कई सेमिनारों,गोष्ठियों और सम्मान समारोहों में जाने का अवसर मिला है।इन गोष्ठियों,सेमिनारों में खूब गरमागरम बहसें हुयीं,साहित्यिक चर्चायें हुयीं।हिन्दी साहित्य पर मंडरा रहे इन्टरनेट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के खतरों की बातें भी की गयीं----लेकिन ये चर्चायें काफ़ी आधी अधूरी सी लगींइनमें कुछ कमी खटक सी रही थी। और वह कमी थी हिन्दी के बाल साहित्य की चर्चा।
            आज जब कि प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य लिखा जा रहा है,प्रकाशित भी  हो रहा है। ऐसे में किसी भी सेमिनार,संगोष्ठी साहित्यिक समारोह में बाल साहित्य की चर्चा न होना इस बात का द्योतक है कि आज भी हिन्दी साहित्य के मठाधीश बाल साहित्य को साहित्य की श्रेणी में नहीं रखते। इतना ही नहीं आप हिन्दी साहित्य के इतिहास और आलोचनाओं से सम्बन्धित पुस्तकें उठा कर देखिये उसमें भी कहीं बाल साहित्य की चर्चा नहीं मिलेगी,या मिलेगी भी तो बहुत नाम मात्र की।
         जब कि वास्तविकता यह है कि खड़ी बोली हिन्दी के आरंभिक काल से ही बाल साहित्य लिखा जा रहा है।सभी बड़े साहित्यकारों ने भी थोड़ा बहुत तो बाल साहित्य लिखा ही है।चाहे वह बच्चों को उपदेश देने के लिये लिखा हो अथवा मनोरंजन के लिये। महादेवी वर्मा,डा0रामकुमार वर्मा,सुमित्रा नंदन पंत,मुंशी प्रेमचन्द सभी ने बच्चों के लिये साहित्य लिखा है।लेकिन उनके इस साहित्य को भी बड़ों के ही साहित्य में ही स्थान दिया गया।
                       उस समय भी बाल साहित्य को दोयम दर्जे का साहित्य ही माना जाता था।इतना ही नहीं उस समय बहुत से साहित्यकारों की यह सोच भी थी कि जो साहित्यकार बड़ों के लिये साहित्य लिखने में असफ़ल हो जाते हैं वो बाल साहित्य लिखना शुरू कर देते हैं। जबकि वास्तविकता इस तथ्य से कोसों दूर है। बाल साहित्य लिखना सामान्य साहित्य लिखने की अपेक्षा बहुत कठिन है।बाल साहित्य वही लिख सकता है जिसे बाल मनोविज्ञान के साथ ही बच्चों की भावनाओं,संवेदनाओं, उनकी  रुचियों अरुचियों के साथ ही उनके स्तर की भाषा की समझ हो। बाल साहित्य लिखने के लिये लेखक को खुद भी बच्चा बनना पड़ता है।
                         आज की समस्या यह है कि बाल साहित्य प्रचुर मात्रा में लिखा जा रहा है। प्रकाशित भी हो रहा है।लोगों में बाल साहित्य को लेकर काफ़ी जागरूकता,उत्सुकता सभी कुछ है। (अब यह जरूर है कि लिखा जा रहा पूरा बाल साहित्य बच्चों के लिये उपयोगी नहीं है। कुछ बाल साहित्यकार तो बहुत अच्छा साहित्य लिख रहे हैं कुछ घटिया। और यह स्वाभाविक भी है।) लेकिन---फ़िर भी बाल साहित्य को वह दर्जा नहीं मिल पा रहा है जो मिलना चाहिये। आज भी बाल साहित्य मुख्य धारा से हटकर हाशिये पर ही पड़ा है।यह तो हुयी बाल साहित्य को पहचान मिलने की समस्या।
                 इसके अलावा भी बाल साहित्य के ऊपर कई संकट हैं।मसलन प्रकाशन,पुस्तकों के आकर्षक उत्पादन और सबसे बढ़ कर बच्चों तक पुस्तकें पहुंचने की।बच्चों के लिये प्रकाशित ज्यादातर किताबों का उत्पादन इतने घटिया स्तर का रहता है कि बच्चे उन्हें पढ़ने के लिये आकर्षित ही नहीं होंगे। ज्यादातर प्रकाशक बाल साहित्य सिर्फ़ सरकारी खरीद के लिये प्रकाशित करते हैं।
                     बाल साहित्य को आगे बढ़ाने की दिशा में नेशनल बुक ट्रस्ट,चिल्ड्रेन्स बुक ट्रस्ट,और भारत सरकार के प्रकाशन विभाग का योगदान महत्वपूर्ण है। इनके अलावा कुछ एन जी ओ जैसे प्रथम बुक्स,नालन्दा,एकलव्य आदि भी बच्चों तक अच्छी आकर्षक और बढ़िया किताबें पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। इन संगठनों द्वारा प्रकाशित बच्चों का साहित्य विषयवस्तु और साज सज्जा दोनों ही दृष्टियों से बेहतरीन कहा जा सकता है।
       कुछ प्राइवेट प्रकाशक भी बच्चों की अच्छी किताबें छाप रहे हैं। लेकिन दिक्कत वही है इन किताबों की पहुंच बच्चों तक नहीं हो पा रही है। ये किताबें भी या तो सरकारी खरीद में जाकर पुस्तकालयों की आल्मारियों में बन्द हो जा रही हैं या फ़िर महंगी होने के कारण बच्चों के अभिभावकों की जेब से बाहर हैं।
                 यद्यपि बच्चों तक किताबें पहुंचाने की दिशा में नेशनल बुक ट्रस्ट का बाल साहित्य केन्द्र(एन सी सी एल) काफ़ी प्रयास कर रहा है। इसकी तरफ़ से देश भर में स्कूलों के साथ ही मुहल्लों में भी पाठक मंचों की स्थापना करवाई जा रही है। तथा उन केन्द्रों को एन बी टी अपने प्रकाशनों के साथ ही दूसरे प्रकाशकों की भी बच्चों की अच्छी किताबें सस्ते मूल्य पर उपलब्ध करा रहा है। साथ ही कई एन जी ओ भी गांवों के साथ ही झुग्गी,झोपड़ी में रहने वाले बच्चों के लिये बाल साहित्य उपलब्ध कराने की दिशा में सक्रिय हैं। फ़िर भी सरकारी स्तर पर इन कार्यक्रमों को और गति देने की जरूरत है।
                      मेरे विचार से हिन्दी बाल साहित्य को हाशिये पर से उठा कर साहित्य की मुख्य धारा में लाने के लिये सरकारी स्तर पर निम्न लिखित प्रयास होने चाहिये।
0 बाल साहित्यकारों को भी साहित्य की मुख्य धारा में स्थान दिलवाना।
0 अच्छा बाल साहित्य लिखने के लिये उचित प्रशिक्षण की व्यवस्था।
0 लिखे जा रहे श्रेष्ठ बाल साहित्य के आकर्षक उत्पादन एवम प्रकाशन की
   व्यवस्था।
0 चूंकि बच्चों की किताबों की डिजाइनिंग,ले आउट, और उत्पादन पर ज्यादा
  खर्च आता है। इसलिये बाल साहित्य के प्रकाशकों को बढिया स्तर का
  कागज सस्ते मूल्य पर उपलब्ध कराने, सस्ती दरों पर किताबों के छपाई
 की व्यवस्था ---अथवा बच्चों के लिये आकर्षक किताबें छापने वाले 
 प्रकाशकों के लिये सरकार की तरफ़ से सब्सीडी देने की व्यवस्था।
 0 और सबसे अन्तिम और मह्त्वपूर्ण बात यह कि प्रकाशित अच्छे बाल साहित्य को बच्चों के हाथों तक पहुंचाने की व्यवस्था।
              यदि हमारी सरकार इन बिन्दुओं पर कुछ ध्यान दे तो सम्भवतः हिन्दी के  बाल साहित्य को उचित दिशा और स्थान मिल सकेगा।
                        00000000
हेमन्त कुमार 

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बारिश का मतलब

गुरुवार, 5 अगस्त 2010

बारिश का मतलब
नहीं होता सिर्फ़
गरम गरम पकौड़ी और चाय
हंसी ठहाका और तफ़रीह
या फ़िर लार्ज या स्माल पेग और मुर्गा
साथ में राजनीति
सास बहू या कहानी घर घर की पर
चर्चा और लफ़्फ़ाजी।

बारिश का मतलब होता है
झोपड़ी के कोने में
पूरे कुनबे का गुड़मुड़िया कर
एक ही बंसेहठी पर बैठना
चारों ओर से फ़टी पालीथिन की छत से
टपकते पानी को एकटक निहारना
झोपड़ी में भर गये पानी में
तैरते हुये खाली बरतनों को देखना
और अररा कर बरस रहे मेघ को
भयभीत नजरों से निहारना।

चिन्ता इस बात की करना कि
पूरा कुनबा
इस झर झर बारिश में
कहां सोयेगा
झोपड़ी के किस कोने में परबतिया
जलायेगी चूल्हा
कहां पकायेगी रोटी
कि भर सके पूरे कुनबे का पेट।

बारिश का मतलब होता है
इस बात की चिन्ता भी कि अगर
हवा और तेज हुयी
फ़िर भरभरा कर गिर जायेगी
कच्ची माटी की भीत तो
पूरा कुनबा शहर के किस कोने में
शरण लेगा
किसी खाली बस स्टैन्ड के शेड के नीचे
नगर निगम के ह्यूम पाइप में
या फ़िर किसी निर्माणाधीन इमारत के बराम्दे में।

बारिश का मतलब होता है
हरखू की चिन्ता
इस बात की कि कल
जब सबके खेतों में चलेगा हल
तो कैसे जोतेगा वह खेत
बिना बैलों के
कहां से आयेगा बीज बोने के लिये।

लेकिन हमें क्या मतलब है
हरखू या परबतिया की चिन्ता से
हमारे लिये तो बारिश का मतलब ही है
बालकनी में बैठकर
चाय या व्हिस्की की चुस्कियां
मुर्गे की टांग या पकौड़ी
और झमाझम बौछार का आनन्द उठाना।
000
हेमन्त कुमार

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बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

               
                        पुस्तक:बाल साहित्यकार कौशल पाण्डेय
                                   सृजन और संवाद
                         संपादन: डा0सुनीता यदुवंशी
                         प्रकाशक: शैलजा प्रकाशन
                                 57-पी,कुंज विहार2
                                 यशोदानगर, कानपुर-208011

                   किसी भी साहित्यकार के पूरे साहित्य को एक साथ एक ही जिल्द में पढ़ना अपने आप में एक अनोखा और विशिष्ट अनुभव होता है।अनोखा इसलिये कि आप एक साथ उस रचनाकार की विभिन्न विधाओं में लिखी गयी रचनाओं का रसस्वादन करते हैं।विशिष्ट इसलिये कि आप उस साहित्यकार की पूरी रचना यात्रा से रूबरू होते हैं।खासतौर से बाल साहित्य के संदर्भ में यह बात ज्यादा सार्थक कही जा सकती है।
                             कुछ ऐसा ही अनुभव प्रतिष्ठित लेखक कौशल पाण्डेय के ऊपर लिखी गई पुस्तक बाल साहित्यकार कौशल पाण्डेय:सृजन और संवाद पढ़कर हमें होता है। इस पुस्तक का संपादन डा0 सुनीता यदुवंशी ने किया है।पुस्तक में श्री कौशल पाण्डेय द्वारा रचित 41 बाल कवितायें,एक लंबी बाल कविता,तीन बाल कहानियां,तीन बाल नाटक तथा बाल साहित्य पर दो लेख संकलित हैं। इनके साथ ही कौशल जी के ऊपर लिखे गये लेखों एवं उनसे लिये गये साक्षात्कार भी शामिल किये गये हैं। यानी कि बाल साहित्य पर काम करने वाले किसी अध्येता को कौशल पाण्डेय के बाल साहित्य को ढूंढने के लिये कहीं इधर उधर भटकना नहीं पड़ेगा। उसे कौशल जी का समग्र बाल साहित्य एक साथ इसी किताब में मिल जायेगा। इस दृष्टि से यह एक महत्वपूर्ण पुस्तक है।
                              अब अगर हम इस पुस्तक में संकलित रचनाओं की चर्चा करें तो कह सकते हैं कि ये समस्त रचनायें एक ऐसे साहित्यकार द्वारा लिखी गयी हैं जिसको बाल मनोविज्ञान,बच्चों की रुचि अरुचि,उनकी भाषा के स्तर की बहुत गहरी समझ है। कौशल जी ने बाल मन के अंदर कितनी गहराई के साथ झांका है इस बात का प्रमाण उनकी बाल कविता दादा जी की चिट्ठीमें देखा जा सकता है---
         दादी जी को हुआ जुकाम/खाए थे दो कच्चे आम/उस पर पिया था ठण्ढा पानी/बोलो है ना ये नादानी।अब न करूंगी गलती ऐसी/कान पकड़ के उट्ठी बैठी/दादा
जी की आई------।
             यानि कि दादी जी की गलती पर उनसे उठक बैठक करवाना एक बालमन की उपज ही तो है।और बच्चों की इसी बाल सुलभ चंचलता को कौशल जी ने बखूबी पकड़ा है। बाल मन की यही चंचलता,उत्सुकता,उसकी कल्पना की उड़ान हमें इस पुस्तक की ज्यादातर कविताओं(कहो कहानी नानी जी,सिंहराज की बीमारी,सुनिये बंदर मामा जी,आज का अखबार,नाव आदि)में दिखाई पड़ती है।
            कौशल पाण्डेय की पकड़ बच्चों की कहानियों पर भी उतनी ही है जितनी कि कविताओं पर। वैसे भी पाण्डेय जी ने बड़ों के लिये कहानियां ज्यादा लिखी हैं। इस संकलन में हालांकि सिर्फ़ तीन ही बाल कहानियां हैं।वह दीवाली, कहानी दुष्ट कौवे की’ औरसीख ऐसे मिली।लेकिन लंबी बाल कविता सोन मछरिया गहरा पानी भी एक गीतात्मक कहानी ही है। और यह भी बाल पाठकों को पूरी कहानी का आनन्द देती है।वह दीवालीकहानी एक अध्यापक और छात्र के मनोभावों को गहराई से उकेरती है वहीं सीख ऐसे मिलीएक घमंडी बच्चे के हृदय परिवर्तन की कथा है। कहानी दुष्ट कौवे की’ अपेक्षाकृत छोटे बच्चों के लिये लिखी गयी कहानी है।
          कौशल पाण्डेय बाल गीतकार,कहानीकार के साथ ही एक सफ़ल नाटककार भी हैं।इस संग्रह में संकलित बाल नाटक आंखें ऐसे खुलीं,पासा पलट गया,जहाँ किशोर छात्रों की उद्दण्डताओं, शैतानियों के साथ उनमें आये बदलाव को रेखांकित करते हैं वहीं सच होता सपना प्रौढों एवं नव साक्षरों को संदेश देने वाला नाटक है।ये तीनों नाटक यद्यपि हैं तो छोटे यानि कम अवधि के। लेकिन आज बच्चों की ज़रूरत के हिसाब से उपयुक्त हैं।क्योंकि अक्सर बच्चों को अपने स्कूलों में मंचन के लिये छोटे नाटकों की ज़रूरत पड़ती है और ये नाटक इन ज़रूरतों को पूरा करेंगे।
          कौशल पाण्डेय की इस सर्जनात्मक यात्रा को और गहराई से समझने,बाल साहित्य कि प्रति उनके समर्पण,प्रतिबद्धता से समझने के लिये हमें उनके द्वारा लिखे लेख तथा उनके ऊपर लिखे गये लेखों और साक्षत्कार को भी पढ़ना आवश्यक है।ये लेख, साक्षत्कार हमें कौशल जी की बाल साहित्य की प्रतिबद्धता, समझ,अंर्तदृष्टि को तो बताते ही हैं,उनके अंदर छिपे बालमन का भी साक्षत्कार कराते हैं। पाण्डेय जी ने अंबिका सिंह वर्मा से बातचीत में इस बात को स्वीकार किया है कि बच्चों के लिये लिखना मेरे लिये आत्मसंतोष की बात है। और उनके अंदर का बाल साहित्य के प्रति यही झुकाव हमें उनकी समस्त रचनाओं में तो दिखाई पड़ता ही है साथ ही उन्हें बाल साहित्य के सर्जकों में एक विशिष्ट स्थान भी प्रदान करता है।
        कुल मिलाकर यह पुस्तक हिन्दी के सभी बाल साहित्य प्रेमियों के लिये तो लाभप्रद है ही,उन शोधार्थियों का भी यह मार्गदर्शन करेगी जो बाल साहित्य के क्षेत्र में शोध करना चाहते हैं।
                   0000
हेमन्त कुमार

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जेठ की दुपहरी

मंगलवार, 15 जून 2010

जेठ की तपती दुपहरी
आग जो बरसा रही
बर्फ़ की चादर लपेटे
ठंढ भी शरमा रही ।

स्याह लावा हर सड़क पर
बस पिघलता जा रहा
चीख प्यासे पाखियों की
दिल को अब दहला रही ।

दूर तक दरकी है धरती
घाव बस सहला रही
सोत पानी का दिखा कर
आंख को भरमा रही।

हर नदी अब भाप बन कर
धुंध में मिल जा रही
तलहटी की रेत भी अब
भय से बस थर्रा रही ।
0000
हेमन्त कुमार

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ओ मां

गुरुवार, 10 जून 2010

      परिस्थितियां हमें कभी कभी इतना विवश कर देती हैं कि हम चाह कर भी कुछ कर नहीं सकते----बस उन हालातों को मूक दर्शक बने देखते रहते हैं और खुद को हवाले कर देते हैं उन हालातों के जिनसे हम जूझ रहे होते हैं। हम मान लेते हैं कि जो प्रकृति करेगी वो ठीक ही करेगी।

ऐसी ही हालातों का शिकार पिछले दिनों मैं भी रहा।---9 मई को जब दुनिया भर में मातृ दिवस मनाया जा रहा था सभी मांओं की लम्बी उम्र के लिये प्रार्थनायें कर रहे थे मैं इलाहाबाद के एक अस्पताल में अपनी मां(अम्मा) को आई सी यू में भर्ती करा रहा था। ----हास्पिटल की फ़ार्मेल्टीज के तहत मुझे उन पेपर्स पर दस्तखत करने पड़ रहे थे जिन्हें पढ़ पढ़ कर मेरे आंसू लगातार मेरे चेहरे को भिगो रहे थे---कि हे ईश्वर मातृ दिवस के दिन मुझसे किन पेपर्स पर दस्तखत करवाये जा रहे हैं----कि यदि मेरी मां को कुछ हो जाता है तो उसकी पूरी जिम्मेदारी मेरी होगी------
                         ------- लेकिन परिवार के सभी लोगों,रिश्तेदारों,मित्रों की दुआओं प्रार्थनाओं के साथ ही घर के सभी लोगों की सेवा एवम प्रार्थना से मेरी मां जल्द ही आई सी यू से बाहर आ गयीं। लगभग 15 दिनों तक अस्पताल में रहने के बाद अब मेरी मां घर आ गयी हैं।धीरे धीरे उनका स्वास्थ्य भी सुधर रहा है।
               पिछले दिनों मैं नेट पर पूरी तरह अनुपस्थित रहा। अब उपस्थित हुआ हूं --- अपनी मां के ही जन्मदिवस पर लिखी अपनी एक कविता लेकर।(यद्यपि यह कविता मैं पहले भी प्रकाशित कर चुका हूं। फ़िर भी मुझे यह कविता बहुत बहुत अच्छी लगती है----)

ओ मां


जब भी मैं बैठता हूं
ढलते सूरज के साथ
बालकनी में कुर्सी
पर अकेला
मेरी आंखों के सामने
आता है कैमरे का व्यूफ़ाइंडर
और उसमें झलकती है
एक तस्वीर
आंगन में तुलसी की पूजा करती
एक स्त्री की
और कहीं दूर से आती है एक आवाज
ओ मां।


जब भी बच्चे व्यस्त रहते हैं
टी वी स्क्रीन के सामने
और मैं बाथरूम में
शेव कर रहा होता हूं
शीशे के सामने अकेला
अचानक मेरे हाथ हो जाते हैं
फ़्रीज
शीशे के फ़्रेम पर
डिजाल्व होता है एक फ़्रेम और
मेरा मन पुकारता है
ओ मां।


जब भी मैं खड़ा होता हूं
बाजार में किसी दूकान पर अकेला
कहीं दूर से आती है सोंधी खुशबू
बेसन भुनने की
आंखों के सामने क्लिक
होता है एक फ़्रेम
बेसन की कतरी
और मेरे अन्तः से आती है आवाज
ओ मां।


जब भी मैं बैठता हूं
देर रात तक किसी बियर बार में
कई मित्रों के साथ पर अकेला
अक्स उभरता है बियर ग्लास में
आटो रिक्शा के पीछे
दूर तक हाथ हिलाती
एक स्त्री का
और टपकते हैं कुछ आंसू
बियर के ग्लास में
टप-टप
फ़िर और फ़िर
चीख पड़ता है मेरा मन
ओ मां।
**********
हेमन्त कुमार



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हमारे विकास के तीन दशकों का जीवंत दस्तावेज----“मुन्नी मोबाइल”

मंगलवार, 20 अप्रैल 2010


पुस्तक:मुन्नी मोबाइल
लेखक:प्रदीप सौरभ
  प्रकाशक:वाणी प्रकाशन
 4695,21-ए,दरियागंज,
नई दिल्ली-110002
                                                                                                                                                                       मुन्नी मोबाइल नाम किसी फ़िल्म या टी0वी0 सीरियल का नहीं बल्कि प्रसिद्ध पत्रकार और लेखक प्रदीप सौरभ के हाल में ही प्रकाशित उपन्यास का है। यह उपन्यास मैनें पिछले पन्द्रह दिनों में तीन बार पढ़ा है। और हर बार इसमें मुझे प्रदीप सौरभ की कलम का एक नया रूप दिखाई पड़ा है।                            
              दरअस्ल यह उपन्यास मात्र एक उपन्यास न होकर हमारे देश में पिछले तीन दशकों में हुये भौतिकता के अन्धाधुन्ध विकास का प्रामाणिक दस्तावेज कहा जा सकता है। मुन्नी नाम की काम वाली और उसका नया मोबाइल---ये तो माध्यम मात्र हैं।
         उपन्यास के मुख्य पात्र तो पत्रकार आनन्द भारती और मुन्नी मोबाइल हैं। उपन्यास का पूरा ताना बाना पत्रकार आनन्द भारती और उनके घर में काम करने वाली बिन्दू यादव उर्फ़ मुन्नी मोबाइल के इर्द गिर्द बुना गया है। आनन्द भारती एक तेज तर्रार और गंभीर पत्रकार हैं। जो मन में ठान लिया उसे पूरा करना उनके जीवन का मकसद बन जाता है।
        मुन्नी मोबाइल है तो घरों में काम करने वाली---बिहार से आकर दिल्ली के साहिबाबाद में बसी हुयी एक साधारण नौकरानी लेकिन उसके चरित्र का भी एक विशिष्ट पहलू है। वह है उसके अंदर की दबंगता और महत्वाकांक्षा। एक आम आदमी की ही तरह उसकी भी इच्छा थी कि उसकी बेटियां पढ़ लिख कर साहब बन जायं। उन्हें लोगों के घरों में बर्तन चौका न करना पड़े। अपनी इसी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिये मुन्नी मोबाइल ने जो सफ़र पत्रकार आनन्द भारती के घर से शुरू किया वो काम वालियों की यूनियन,साहिबाबद के चौधरियों से पंगा,डाक्टरनी के साथ नर्सिंग के अवैध धन्धों,गाजियाबाद और पहाड़गंज रूट की बसों के फ़र्राटा भरते पहियों के साथ चलता हुआ अन्त में कालगर्ल्स के रैकेट और मुन्नी मोबाइल के मर्डर के साथ पूरा होता है।
                 ध्यान देने वाली बात यह है कि जब मुन्नी मोबाइल बस चलाने वाले ठेकेदारों के अड्डे पर जाकर सीधे उनसे कहती है कि मेरा नाम मुन्नी मोबाइल है और बिहार की रहने वाली हूं।मैं किसी से डरती नहीं हूं। आप अपना काम करो और मुझे अपनी बस चलाने दो। तो यह संवाद सिर्फ़ मुन्नी का नहीं रह जाता ।यहां मुन्नी के माध्यम से प्रदीप सौरभ ने बस ठेकेदारों को उस तबके से चेतावनी दिलवायी है जो हमेशा से दबाया जाता रहा है। जो भारत के दूर दराज के गांवों से भागकर महानगरों में सिर्फ़ इस लिये आता है कि ---इन महानगरों में शायद उसका भाग्य उसे दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करवा देगा। लेकिन यहां भी पहले से काबिज रसूखदार ऐसे लोगों को पनपने का मौका नहीं देते।
                      मुन्नी मोबाइल के माध्यम से जहां एक वर्ग विशेष कि गाथा लिखी गयी है वहीं लेखक ने हमारे देश में पिछले तीन चार दशकों में हुये परिवर्तनों ,बदलावों ,भौतिकतावाद की चपेट में आते जा रहे सम्पूर्ण देश,मोबाइल क्रान्ति,कालसेण्टरों के भयावह सच के साथ ही राजनीति में जाति,धर्म,और नारों के साथ जनता की भावनाओं के साथ खेले जा रहे भयावह खेल के सच की एक एक परतों को भी बहुत सच्चाई और निष्पक्षता के साथ उधेड़ा है।
        उपन्यास की शुरुआत से ही पता चल जाता है कि आनन्द भारती किस मिट्टी के बने पत्रकार हैं। वह एक तेज तर्रार और गंभीर पत्रकार हैं। जो मन में ठान लिया उसे पूरा करना उनके जीवन का मकसद बन जाता है। कभी किसी किस्म का समझौता करके जीवन बिताना उन्हें पसन्द नहीं। और उनकी इसी दृढ़ता का परिणाम उन्हें गुजरात में भुगतना पड़ा। ----मोदी को जीत का नशा था। हिन्दू ब्रिगेड भी नशे में चूर थी। चुन चुन कर विरोधियों को निशाना बनाया जा रहा था। मीडिया पहले निशाने पर था। आनंद भारती पर भी हमला हुआ। उन्हें कार से उतार कर पानी से नहलाया गया। पानी के प्लास्टिक पाउचों से मारा गया।फ़िर छोड़ दिया गया। एक बार फ़िर इस हमले में उन्हें भारत माता की जय बोलने के लिये मजबूर किया गया।
                       और यह परिणाम भुगतना पड़ता है आनद भारती को दंगों की आग में जल रहे गुजरात की आंखों देखी,नंगी और भयावह सच्चाई को अखबार में लिख कर आम जनता को पढ़वाने की सजा के रूप में। नरेन्द्र मोदी और उनकी हिन्दू ब्रिगेड को जनता के सामने बिल्कुल नंगा कर देने के एवज में। मुझे यह लिखने में कोई संकोच नहीं कि जीवन की इन सच्चाइयों को उपन्यास में लिखना प्रदीप सौरभ के ही बूते की बात है।
             उपन्यास में हमें आनन्द भारती के तेज तर्रार,खुर्रैट, गम्भीर रूप के साथ ही एक बेहद संवेद्नशील और भावुक हृदय भी देखने को मिलता है जो सिर्फ़ मानसी के लिये सोचता है। इस दिल में हर वक्त हर समय आनन्द भारती के साथ मानसी बसती है। मानसी एक तरह से आनंद भारती के जीवन का प्रेरणा स्रोत भी है। जो हर उस मोड़ पर आनंद भारती के साथ है जब वो किसी अनिर्णय की स्थिति में होते हैं।
   उपन्यास की मुख्य चरित्र मुन्नी की कहानी के साथ ही कई अन्य प्रसंग भी साथ साथ चलते हैं जो उपन्यास को और अधिक रोचक,गतिशील और पठनीय बनाते हैं। आनंद भारती की लंदन यात्रा,पत्नी शिवानी से अलगाव,मानसी से इमोशनल अटैचमेण्ट,सुधा पाण्डेय के साथ कोलकाता यात्रा और आनंद भारती का इलाहाबाद से लगाव। ये प्रसंग उपन्यास की कथावस्तु से सीधे जुड़े न होकर भी उसे आगे बढ़ाने के साथ ही  उपन्यास की मूल कथा को समृद्ध करते हैं।
         मसलन आनंद भारती की लंदन यात्रा एक सम्पूर्ण लेखा जोखा है प्रवासी भारतीयों के मन का,उनके हालातों का और उनके अन्दर वतन से दूर रहने के दर्द का। अपनी जमीन से दूर रहने का यही दर्द,यही संवेदना हमें बार बार आनंद भारती की इलाहाबाद यात्राओं और प्रसंगों में दिखाई पड़ती है। इलाहाबाद के प्रति यह दर्द और संवेदना आनंद भारती का नहीं बल्कि प्रदीप सौरभ के साथ हर उस सर्जक मन का दर्द है जो रोजी रोटी की तलाश में इलाहाबाद से दूर पहुंच गया है। मैं खुद पिछले पच्चीस सालों से इलाहाबाद से दूर हूं और प्रदीप सौरभ की इस पीड़ा को समझ सकता हूं।
          कथानक के साथ ही अगर हम भाषा और शैली की बात करें तो मुन्नी मोबाइल अपने में एकदम अलग तरह का उपन्यास है।यह लीक से हट कर लिखा गया एक नया एक्स्पेरीमेण्ट कहा जा सकता है। इसे पढ़ते समय कभी आपको लगेगा कि हम किसी लेखक की डायरी का अंश पढ़ रहे हैं,कहीं लगेगा कि लेखक रिपोर्टिंग कर रहा है,भावुकता भरे क्षणों में आप इसे कविता के रूप में भी पायेंगे। और उपन्यास की शैली की यह विविधता स्वाभाविक भी है। क्योंकि प्रदीप सौरभ सबसे पहले कवि,फ़ोटोग्रैफ़र और पत्रकार हैं फ़िर उपन्यासकार। और उनका यह कवि,पत्रकार ,फ़ोटोग्रैफ़र और चित्रकार का रूप इस उपन्यास में हमें हर जगह परिलक्षित होता है।
                   कुल मिलाकर मैं  इतना दावे के साथ कहूंगा कि आपको भी अगर भारत के पिछले तीन दशकों के विकास के साथ ही भारतवर्ष में भगवा राजनीति और उसकी आड़ में जनता की भावनाओं,संवेदनाओं और अस्तित्व के साथ चल रहे खिलवाड़ को अगर नंगी सच्चाई के रूप में देखना है तो इस उपन्यास को एक बार जरूर पढ़ने की कोशिश करियेगा----आपको निराशा नहीं होगी।
                                         000000


प्रदीप सौरभ: 
पेशे से पत्रकार।हिन्दुस्तान दैनिक के दिल्ली संस्करण में   सहायक संपादक।हिन्दी के चर्चित कवि,पत्रकार और लेखक।कानपुर में  जन्म। परन्तु साहित्यिक यात्रा की शुरुआत इलाहाबद से। कलम के साथ ही कैमरे की नजर से भी देश दुनिया को अक्सर देखते हैं।पिछले तीस सालों में कलम और कैमरे की यही जुगलबन्दी उन्हें खास बनाती है।गुजरात दंगों की बेबाक रिपोर्टिंग के लिये पुरस्कृत। लेखन के साथ ही कई धारावाहिकों के मीडिया सलाहकार। फ़िलहाल हिन्दुस्तान दिल्ली के संपादकीय विभाग में कार्यरत

हेमन्त कुमार द्वारा प्रकाशित
             

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सारी रात

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

रात रात भर
खदबदाते हैं विचार
अदहन की तरह
मेरा दिमाग बन जाता है
चूल्हे पर चढ़ी पतीली।

कितने कितने विचार
कैसे कैसे विचार
ढेर सारे विचार
अच्छे बुरे सुखद दुखद।

आसमान में उड़ती चिड़िया
बियाबान जंगलों की हरियाली
पेड़ों के बीच भागते हिरनों का झुण्ड
फ़ूल पत्तियां झरने
तपते रेगिस्तान में ऊंटों का काफ़िला
जंगल गांव कस्बे शहर।

तपती सड़कों पर तैरती तेज रफ़्तार
कंक्रीट के जंगल
झोपड़ पट्टियों के बीच
पतंग की डोर लूटते
अधनंगे बच्चे
स्लमडाग मिलेनियर
स्माइल पिंकी
शाहरूख अमिताभ बिपाशा।

अदहन बलकता है
भीतर की भाप जोर लगाती है
ऊपर की तश्तरी गिराने को
ढब ढब की आवाज।

मेरी सांस बन जाती है
लोहार की भट्ठी
दम घुटता है
सीने पर जम जाता है
शिलाखण्ड कोई टूटा हुआ
इतिहास के पन्नों से निकलकर।

खदबदाते विचार
आकार लेते हैं
दुःस्वप्न का

लम्बे लम्बे अंतहीन मैदान
युद्ध करती सेनाएं
योद्धाओं का कोलाहल
हाथियों की चिग्घाड़
घोड़ों की टाप
तलवारों की खनक
छपाक छपाक
कटकर गिरते नरमुंड।

अचानक सब कुछ थम जाता है
एक भयानक धमाके के साथ
आंखों के सामने रह जाता है
सिर्फ़ तेज धार बहता खून
जिस पर कोई नाम नहीं लिखा
हिंदू मुस्लिम सिख इसाई
गोरा काला ताम्रवर्णी
न ही कोई निशान
मंदिर मस्जिद चर्च गुरुद्वारे का
वहां सिर्फ़ दिखता है
बहता हुआ खून
सुर्ख लाल
तेज धार बहता खून।
000
हेमन्त कुमार




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हंस रे निर्मोही हंस

मंगलवार, 30 मार्च 2010

हंसो शेखरू
हंसो सिद्धू
हंसो राजू
हंस रे जानी
हंस,हंस रे निर्मोही हंस।

हंसो कि बचपन भूलता जा रहा है हंसना
हंसो कि लड़कियां भूल रही हैं खिलखिलाना
हंसो कि दम तोड़ रहे हैं यौवन के अरमान
हंसो कि बोझ बन गया है बुढ़ापा
हंसो कि बढ़ रही है पागलों की तादाद
हत्यारों की संख्या में हो रहा है इजाफ़ा
हंसो कि गर्भ में मसल दिये जा रहे हैं भ्रूण
हंसो कि आबाद हो रही हैं नई नई बदनाम बस्तियां
हंसो कि शर्म ने रूप धारण कर लिया है बेहयाई का
हंसो कि संगीत को बेदखल कर दिया है शोर ने
हंसो कि अन्न उपजाने वाले खाने लगे हैं कीटनाशक
हंसो कि बेरूत में कत्ल किये गये बच्चे
हंसो कि कत्लगाह बना दिया गया ईराक को


जार जार रोने के समय में तुम हंसो
जरूर हंसो,इतना हंसो कि टूट जाएं
बेशर्मी की सारी हदें।
    0000


    कवि:शैलेन्द्र
    प्रभारी सपादक जनसत्ता
    कोलकाता संस्करण
    मोबाइल न09903146990
0 श्री शैलेन्द्र हिन्दी के सुपरिचित कवि एवम वरिष्ठ पत्रकार हैं। आपके अब तक तीन काव्य संकलन प्रकाशित हो चुके हैं।कविताओं के साथ ही समय समय पर दिनमान,रविवार,श्रीवर्षा,हिन्दी परिवर्तन,जनसत्ता,कथादेश,पाखी, आदि पत्र पत्रिकाओं में समाचार कथायें,लेख,टिप्पणियां,कुछ कहानियों का प्रकाशन।पत्रकारिता में एक लंबी संघर्षमय यात्रा पूरी करके इस समय जनसत्ता के कोलकाता संस्करण में प्रभारी संपादक पद पर कार्यारत हैं।
हेमन्त कुमार द्वारा प्रकाशित।

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गौरैया से----

शनिवार, 20 मार्च 2010

प्यारी गौरैया
क्यों रूठ गई हो तुम
हमसे
पिछले कुछ सालों से।

मेरा आंगन घर
और खपरैले पर फ़ैली
लौकी की बेल
सब बाट जोह रहे
तुम्हारी वापसी का।

तुम्हारी
चीं चीं चूं चुं से ही
हमारी सुबह होती थी
आंगन में तुम्हारे फ़ुदकने
के साथ ही तो
हम भी
शुरू करते थे धमाचौकड़ी।

प्यारी गौरैया
फ़िर क्यों रूठ गयी हो तुम
हमसे
पिछले कुछ सालों से।

याद होगा तुम्हें भी
हमारा बचपन
सबेरे जब मां आंगन में
बंसेहटी पर हमें
खाना खिलाने बैठती
कितना निडर होकर
तुम आ बैठती थी
बंसेहटी के पावे पर
मां चीखती
बड़ी ढीठ गौरैया।

कहिं तुम इसी से तो
नाराज नहीं हो गयी?

प्यारी गौरैया
सुना है आज
पूरी दुनिया भर में
तुम्हें मनाने
आंगन में वापस बुलाने
और
तुम्हारी प्रजाति बचाने
के लिये
गौरैया दिवस मना रहे हैं
सारे लोग
तुम्हें वापस बुलाने के
ढेरों उपाय और जतन
कर रहे हैं
दुनिया भर के लोग।

प्यारी गौरैया
एक बार ---
सिर्फ़ एक बार तुम
माफ़ कर दो
हम सभी को
लौट आओ फ़िर से हमारे
आंगन और खपरैलों पर
मैं तुम्हें कर रहा हूं आश्वस्त
अब नहीं कहेंगी मां तुम्हें कभी
ढीठ गौरैया
नहीं रंगेंगे पिताजी
तुम्हारे कोमल पंखों को
गुलाबी रंग से
नहीं डांटेगा
तुम्हें कोई भी
शैतान गौरैया कहकर।
बोलो
प्यारी गौरैया
तुम वापस आओगी न
फ़िर से
मेरे आंगन में?
0000
हेमन्त कुमार

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लेबल

. ‘देख लूं तो चलूं’ "आदिज्ञान" का जुलाई-सितम्बर “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” ११मर्च २०१९ ११मार्च 1mai 2011 2019 अंक 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अक्षत अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अपराध अपराध कथा अभिनव पाण्डेय अभिभावक अमित तिवारी अम्मा अरविन्द दुबे अरुणpriya अर्पण पाण्डेय अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आनन्द नगर” आने वाली किताब आबिद सुरती आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उम्मीद के रंग उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक टिपण्णी एक ठहरा दिन एक तमाशा ऐसा भी एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महत्वपूर्ण समीक्षा एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता ओड़िया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथाकार समीर गांगुली कथावाचन कर्मभूमि कला समीक्षा कलाकार कविता कविता। कविताएँ कवितायेँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काफिला नाट्य संस्थान काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किताबों में चित्रांकन किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैंसर-दर-कैंसर कैमरे. कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं क्षणिकाएँ खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीतांजलि गिरवाल गीतांजलि गिरवाल की कविताएं गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चिड़ियाँ पिकनिक करने आईं चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छिपकली छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जन्मदिन जन्मदिवस जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जात। जाने क्यों ? 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