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नियति

शनिवार, 26 सितंबर 2009


इस जंगल में
हर शाम
एक कहर बरपा होता है
सन्नाटा टूटता है जंगल का
बन्दूकों की आवाजों से।

बूट रौंदते हैं
जंगल के सीने को
टूटती हैं
कुछ व्हिस्की और रम की
खाली बोतलें
और एक मासूम पेंडुकी
दम तोड़ देती है
तड़फ़ड़ा कर
चन्द खुरदुरे हाथों के बीच।
00000
हेमन्त कुमार

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रामकली

रविवार, 20 सितंबर 2009

बहुत सालों के बाद
आज इस चेहरे को देखा है
दिमाग पर काफ़ी दबाव देने के बाद याद आया
इसका नाम रामकली है।

रामकली उन दिनों
लहलहाता खेत थी
एक भरा पूरा गुलदस्ता
और जिन्दगी को जीने की
एक अदम्य लालसा थी उसकी आंखों में।

खनखनाती हंसी बिखेरती
महफ़िलों की रौनक रामकली
आज बाजार में सूखी ईख बनी खड़ी है
चेहरे पर गुलाबीपन झड़ गया है और
सुरमई दैत्य फ़ैल गया है पूरे बदन पर
दांतों पर जमी मोटी मैल की परत
रामकली की राम कहानी कह रही है।

उसके बालों की चमक न जाने कहां दुबक गई है
और गालों के गहरे गड्ढे
आंखों के नीचे काली झाइयां
लगता यूं है
जैसे रामकली अपनी तीस साल की
जिन्दगी में ही
कई जीवन जी चुकी है।

और अब वो केवल
अपने छः बच्चों के वास्ते
राशन पानी बटोरने के लिये ही
घिसट रही है।

आपने भी कहीं न कहीं जरूर देखा होगा
रामकली को बाजार दूकान घर
या अपने ही घर में
दूर से ही आसान है उसकी पहचान।

उस का दुर्भाग्य यह है
कि न वो अब पहली जिन्दगी में लौट सकती है
और न ही अपने बच्चों को
दे सकती है
सभ्य दुनिया का परिवेश।
000000000





कवि—प्रताप सहगल
आदरणीय प्रताप सहगल जी हिन्दी साहित्य के प्रतिष्ठित कवि नाटककार एवम उपन्यासकार हैं।प्रताप सहगल जी के अब तक कई नाटक ,कविता संग्रह एवम उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं।आप इस समय दिल्ली विश्व्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर के रूप में कार्यरत हैं। यह कविता प्रताप जी के चर्चित काव्य संग्रह “सवाल अब भी मौजूद है” से ली गयी है।
हेमंत कुमार द्वारा प्रकाशित

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तलाश एक द्रोण की

गुरुवार, 17 सितंबर 2009


मैं जानता हूं कि आज
द्रोण मर चुका है
फ़िर भी मुझे
रहती है तलाश/हर चेहरे में एक द्रोण की।

मैं तलाशता हूं उसे
सुबह से शाम तक
शाम से रात तक
दोपहर की चिलचिलाती धूप में
बरसात के थपेड़ों के बीच
कि शायद कहीं वह----।

मैं उसे तलाश करता हूं
विद्या मन्दिरों के विध्वंसित होते
खंडहरों के बीच
शिक्षालयों की टुटपुंजिया और
लिजलिजी राजनीति के बीच
दिग्भ्रमित एकलव्यों के एक लम्बे
हुजूम के बीच
कि शायद कहीं वह----।

मेरी जिन्दगी की हर शाम
उस द्रोण की तलाश में
काफ़ी हाउस के शोर में
चौराहों के नुक्क्ड़ नाटकों के बीच
बन्द कमरों की गोष्ठियों में
एक शब्दवेधी सन्नाटे के मानिन्द
सरक जाती है
और रात गहरी होने के साथ
मेरे और द्रोण के बीच का
यह शब्दवेधी सन्नाटा
और घना होता जाता है।

मेरे और द्रोण के बीच
बचे हुये सम्पर्क की एक
पतली डोर भी
मेट्रो बार के शोर में
जामों की टकराहट और
सिगरेट के धुयें के बीच
खामोश हो कर
निरन्तर लम्बी होती चली जाती है
और मैं फ़िर अकेला निकल पड़ता हूं
अंधेरी सड़क पर
एक द्रोण की तलाश में।
********
हेमन्त कुमार

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शिक्षक दिवस पर ----मेरे मन में ---------

शनिवार, 5 सितंबर 2009


आज शिक्षक दिवस है। इस शुभ अवसर पर सभी शिक्षक बन्धुओं को हार्दिक बधाई । इस अवसर पर मैं अपने शिक्षक बन्धुओं खासकर प्राथमिक स्कूलों के शिक्षकों से कुछ अनुरोध करना चाहूंगा। कि ------
0बच्चों का मन बहुत कोमल होता है।
0इस उम्र में बच्चों के मन पर जो छाप पड़ती है वह जीवन पर्यन्त
उनके साथ बनी रहती है।
0इस उम्र में सीखी गयी बातें ही उन्हें ताउम्र अच्छाई और बुराई
का भेद करना सिखाती हैं।
0 यही वह उम्र है जब उनका सम्पूर्ण विकास हम कर सकते हैं।
इसीलिये आप
0अपने सभी शिष्यों (बच्चों ) से मित्रवत व्यवहार करें।
0उनके ऊपर दण्डात्मक कार्यवाई(मारना,पीटना,बेंच पर खड़े
कराना,मुर्गा बनाना आदि) न करके उन्हें हर बात प्यार से
समझायें।
0उनके खिलाफ़ कोई ऐसी कार्यवाई न करें जिसका बोझ उसे पूरी उम्र
भर अपने पीठ पर ढोना पड़े।
0उसे भी अपने ही परिवार का एक सदस्य मान कर उसके साथ
सयंमित भाषा एवं व्यवहार अपनायें।
तभी शायद हम
0 दे सकेंगे बच्चों को उनके अधिकार।
0 बना सकेंगे उनका उज्ज्वल भविष्य।
0रोक सकेंगे स्कूलों में ड्राप आउट रेट ।
0 पूरा कर सकेंगे बच्चों के साथ ही सम्पूर्ण साक्षरता का सपना।
0 और ला सकेंगे हर बच्चे के चेहरे पर वह मोहक मुस्कान ---
जिसका वह हकदार है।
माहौल स्कूलों का बना दें ऐसा
बच्चा महसूस करे घर जैसा।
****************
हेमन्त कुमार

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कहानी कहना…… सुनाना………(भाग-4)

मंगलवार, 1 सितंबर 2009

कहानी से चित्र/चित्र से कहानी



कहानी सुनाने, कहानी पढाने या कहने का एक और तरीका है। वह है कहानी को बच्चों से चित्रित करवाना या कुछ चित्रों के आधार पर उनसे कहानी लिखवाना। इस प्रक्रिया में भी सभी श्रोता बच्चे कहानी के साथ तुरंत ही इन्वाल्व हो जाते हैं। उन्हें यह लगता है कि वे केवल कहानी सुनने के लिये यहां नहीं बैठे हैं ।उन्हें कुछ और भी करना है। कहानी सुनाने के इस तरीके का प्रयोग मैंने फ़रवरी 08 में दिल्ली में संपन्न हुए विश्व पुस्तक मेले में बच्चों के लिए आयोजित एक वर्कशाप में किया था।
नॅशनलबुक ट्रस्ट ने पुस्तक मेले में प्रथम ( एन जी ओ) के सहयोग से बच्चों की एक कार्यशाला आयोजित की। मुझे इस कार्यशाला में बच्चों को कहानी सुनाने और उनसे कोई कहानी से संबंधित गतिविधि करवाने के लिए कहा गया। अपने चित्रकार मित्रों से बात चीत के बाद मैंने अपने प्रस्तुतीकरण का खाका तय कर लिया। मैं उस वर्कशाप में अपने साथ अपनी दो-तीन कहानियों की कई छाया प्रतियां करवाकर ले गया। साथ ही उन कहानियों के लिए बनाए गए चित्रों की कई प्रतियां भी। इससे मेरा काम बहुत आसान हो गया था।
मैंने वर्कशाप शुरु होते ही पहले बच्चों से सामान्य बातचीत की। उन्हें एक छोटी कहानी सुनाई। कुछ उनकी कहानियां सुनी। कुछ बच्चों से गाने सुने, कुछ से पहेलियां। यह कार्यक्रम लगभग 15-20 मिनट तक चला। अब तक बच्चे मुझसे और प्रथम के कार्यकर्ताओं से काफ़ी घुल मिल चुके थे। अब मैंने बच्चों को दो समूहों में बॉट दिया। एक समूह उन बच्चों का जो चित्र बनाना चाह रहे थे। दूसरा उनका जो कहानियॉ लिखना चाह रहे थे। फ़िर मैंने दोनों समूहों को कहानी और चित्र बॉट दिये।
और आप यकीन मानिए एक घण्टे बाद बच्चों की कलम से चित्रों को
देखकर जो कहानियॉ निकली : उनकी कल्पनाओं ने जो उड़ान भरी……शायद वहॉ तक मैं भी कल्पना नहीं कर सकता था। मेरी तीन कहानियों के चित्रों से कम से कम 45-50 के आस पास कहानियॉ तैयार हुईं। इतना ही नहीं हर कहानी के शीर्षक…… कथावस्तु……भाषा सबमें एक नयापन्।
ठीक यही बात हुई कहानियों के आधार पर बनाए गए चित्रों की। हर कहानी के बच्चों ने अलग ढंग से चित्र बनाये। हर बच्चे की कल्पना एकदम अलग्……इतना ही नहीं वर्कशाप के अंत में बाकायदा बच्चों ने कहानियॉ सुनाईं……किसी किसी बच्चे ने कहानी के किसी पात्र का अभिनय भी किया। किसी ने कहानी को पद्य के रूप में सुनाने की कोशिश की।
इस वर्कशाप के बारे में इतना विस्तार से बताने का मेरा मकसद सिर्फ़ यह है कि ……… कहानी से चित्र और चित्र से कहानी बनाने के इस औजार को भी कक्षा में हमारे अध्यापक मित्र प्रयोग कर सकते हैं। निश्चित रूप से उन्हें कहानी सुनाने…… पढाने के इस तरीके के अच्छे परिणाम मिलेंगे।
**********
हेमन्त कुमार

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कहानी …कहना ---- सुनाना ( भाग – 3)

गुरुवार, 27 अगस्त 2009


मेरे अब तक के पिछले दोनों लेखों से पाठक, अभिभावक, शिक्षक बन्धु यह बात समझ ही चुके होंगे कि हानी सुनाने में स्वरों के उतार चढाव की क्या भूमिका है? स्वर,गति और लय का क्या महत्व है?

अब मैं आपके सामने कथा वाचन या कहानी कहने का एक तरीका और रख रहा हूं। वह है कहानी को बच्चों से अभिनीत करवाना। इसे कहानी का नाट्य रुपांतरण नहीं कहा जा सकता। क्योंकि किसी कहानी का नाट्य रुपांतरण करते समय हम कथावस्तु का विस्तार भी करते हैं।लेकिन यहां हम सिर्फ़ कहानी में आए पात्रों को बच्चों से अभिनीत करवायेंगे यथावत्…बिना किसी फ़ेर बदल के।

कहानी सुनाने कि या कहने की इस शैली का प्रयोग विशेष रूप से कक्षा शिक्षण के दौरान करना काफ़ी प्रभावकारी रहेगा।इससे बच्चा खुद कहानी के पात्रों से अपना तादात्म्य स्थापित कर सकेगा और उस पात्र की अच्छाइयों बुराइयों को महसूस कर सकेगा। साथ ही कहानी के मूल भाव को समझ सकेगा।

मैं बच्चों की वर्कशाप में अक्सर कहानी कहने की इस शैली का प्रयोग करता हूं।।और नतीजा बहुत आशाजनक निकलता है।सबसे पहला नतीजा तो यह है कि बच्चा तुरंत ही कहानी में इन्वाल्व हो जाता है। दूसरे कहानी सुनाने का यह टू वे कम्युनिकेशन होता है। बच्चा आपकी कहानी का सिर्फ़ श्रोता ही नहीं रह जाता बल्कि आपके साथ बच्चा भी कथा वाचन में एक मुख्य भूमिका के साथ उपस्थित हो जाता है।

कैसे करें यह प्रयोग ?

0 पहला चरण -> मान लीजिये आपको कछुए और खरगोश की दौड़ वाली ही कहानी सुनानी है। तो सबसे पहले आप कक्षा के या श्रोता बच्चों से ही पूछिए कि क्या उन्हें यह कहानी मालूम है?यदि उत्तर नहीं मिले तो आप सबसे पहले संक्षेप में यह कहानी बच्चों को सुना दें।

0 दूसरा चरण -> यदि उत्तर हाँ में मिलता है। यानी बच्चों ने पहले यह कहानी सुनी है। तो उनमें से कुछ बच्चों से आप पहले कछुआ/ खरगोश या अन्य जानवरों के संवाद/बोलियां सुनें। फ़िर उन से कछुए की तरह धीमे धीमे चलने या खरगोश की तरह उछल कर चलने को कहें। आप देखेंगे कि समूह के ज्यादातर बच्चे यह कोशिश जरूर करेंगे। यानि कि उस समय तक बच्चों का पूरा ध्यान इस कहानी की तरफ़ केन्द्रित हो चुका होगा। यही

वह बिन्दु होगा जहां से आप बच्चों को अपने हिसाब से मोड़ सकेंगे।

0 तीसरा चरण -> बस इसी बिन्दु से आप बच्चों को मूल कहानी की तरफ़ ले जाएं। सबसे पहले उन्ही बच्चों में से एक एक से कहानी का वाचन पुस्तक से करवाएं। फ़िर कुछ से मौखिक रूप से कहानी सुनें। उन्हें कहानी में आए कठिन शब्दों के अर्थ बताएं। कठिन शब्दों के सही उच्चारण बताएं। उनसे कहानी के संवाद बुलवाएं। पूरी कहानी की एक बार व्याख्या कर दें। उससे मिलने वाली शिक्षा उन्हें बता दें।

0 चौथा चरण -> फ़िर सबसे अन्तिम चरण के रूप में आप कुछ समय के लिये यह भूल कर कि आप उनके शिक्षक व वे छात्र हैं। उनके साथ घुल मिल जाइए। खेलिये……घमाचौकड़ी करिए। कक्षा के बीच वाली जगह खाली करवाकर उसे मंच बना दीजिए और शुरु कर दीजिए कछुए खरगोश की कहानी अभिनय वाला भाग। हो सकता है कुछ बच्चे शरमाएं। ऐसे में आप सबसे पहले जमीन पर खुद खरगोश की तरह कुलांचे भर कर बच्चों को प्रोत्साहित करिए। निश्चित रूप से कक्षा में अध्यापक को इस तरह उछ्लते देख कर शर्मीले से शर्मीले बच्चे भी आपके इस नाटक में शामिल हो जाएंगे।

अब आप कुछ बच्चों को कछुआ, खरगोश, शेर (निर्णायक), या अन्य जानवरों की भूमिका दीजिए। शेष बच्चों को दर्शक बना दीजिए। अगली बार आप अभिनय करने वाले बच्चों को दर्शक और दर्शक बच्चों को अभिनेता बनाइए। कछुए खरगोश की कहानी के मंचन की इस पूरी प्रक्रिया को पूरे अभ्यास के बाद आप बच्चों से ही पूछिए कि उन्हें कहानी पढाने का कौन सा तरीका पसंद है… सिर्फ़ किताब से पढ्वा देना या इस तरह खेलकूद धमाचौकड़ी वाला……… उत्तर आपको खुद ब खुद मिल जाएगा।

*****

हेमन्त कुमार

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रीतापन

बुधवार, 19 अगस्त 2009


हर बारिश में

तुम्हारे

पास होने का एहसास

बुन देता है एक गुंजलक

मेरे चारों ओर।

बंध जाते हैं

मेरे हाथ पांव

कैद हो जाती हैं सांसें

और गुंजलक खुलने पर

मैं पाता हूं कि

बारिश खतम हो चुकी है

और मैं रीता रह गया हूं।

**********

हेमन्त कुमार

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चिल्ड्रेन्स वर्कशाप आन वीडियो प्रोडक्शन……एक अभिनव प्रयोग

गुरुवार, 6 अगस्त 2009


दुनिया का हर बच्चा अपने आप में अलग और अनोखा होता है। हर बच्चे के भीतर कुछ नया करने ,बनाने की ललक के साथ ही कल्पनाओं का एक विशाल भण्डार छुपा रहता है।यदि इन बच्चों को सही दिशा निर्देश मिले तो ये ऐसे काम भी कर सकते हैं ,जिन्हें हम उनकी पहुंच के बाहर मान लेते हैं ।पिछले दिनों बच्चों की सृजनात्मकता को संवरने का एक ऐसा ही अवसर मिला राज्य शैक्षिक तकनीकी सस्थान ,लखनऊ में।
सी आई ई टी ,नई दिल्ली के सहयोग से इस संस्थान ने बच्चों को वीडियो कर्यक्रम निर्माण से परिचित कराने और उन्हें कुछ नया सिखलाने के लिये 20 से 30 जुलाई 09 तक एक कार्यशाला आयोजित की।कार्यशाला का उद्देश्य परिषदीय विद्यालयों के बच्चों की सृजनात्मकता को बढ़ाना था। इस कार्यशाला में कस्तूरबा गांधी विद्यालय माल,मलीहाबाद एव काकोरी के लगभग 15 बच्चों ने हिस्सा लिया।
कार्यशाला का उद्घाटन संस्थान के निदेशक डा0 दलजीत सिंह पुरी ने किया।कार्यशाला के औपचारिक उद्घाटन के बाद सबसे पहले संस्थान की डिप्टी प्रोडक्शन इन्चार्ज श्रीमती ललिता प्रदीप ने बच्चों से दूरदर्शन के विभिन्न धारावाहिकों के बारे में चर्चा करने के साथ ही उन्हें चैनलों के विस्तार के साथ ही मीडिया में आते जा रहे बदलावों के बारे में बताया।सी आई ई टी नई दिल्ली से आये विशेषज्ञ डा0
लाल सिंह एवम श्री पदम सिंह ने भी बच्चों को शैक्षिक फ़िल्मों के बारे में बताया।
राज्य शैक्षिक तकनीकी संस्थान में दस दिनों तक चली इस कार्यशाला में बच्चों को वीडियो कर्यक्रम निर्माण से सम्बन्धित हर पहलू से परिचित कराया गया।उन्हें संस्थान के लेक्चरर प्रोडक्शन डा0हेमन्त कुमार तथा प्रस्तु्तकर्ता श्रीमती मृदुला सुशील ने वीडियो फ़िल्मों की स्क्रिप्ट लिखना सिखलाया तो प्रस्तुतकर्ता राकेश निगम ने समचार बुलेटिन तैयार करना सिखलाया।सीनियर प्रोड्यूसर श्री विनोद धस्माना ने बच्चों को स्टूडियो एवम आउट्डोर शूटिंग के बारे में जानकारियां दीं।संस्थान के सीनियर कैमरामैन श्री दिनेश जोशी एवम श्री चिक्का मुनियप्पा ने इन बच्चों को कैमरा संचालन के साथ ही एडिटिंग एवम साउन्ड रिकार्डिंग की बारीकियों से परिचित कराया।
फ़िल्म निर्माण के प्रति बच्चों के उत्साह को देखते हुये उन्हें दो समूहों में विभाजित कर दिया गया।बच्चों की ही सहमति से यह तय हुआ कि बच्चों का एक समूह समाचारों पर आधारित कार्यक्रम बाल समाचार का निर्माण करेगा तथा दूसरा समूह अपने शिक्षकों की शिक्षण पद्धति पर आधारित एक हास्य नाटक का निर्माण करेगा। इस समूह विभाजन के साथ ही खुल गया बच्चों के दिमाग का पिटारा। और निकलने लगे उनमें से रोचक समाचार,रोचक घटनायें और रोचक कहानियों के प्लाट।
बच्चों ने अपने समूह के साथ मिलकर शुरू कर दिया समाचारों का संकलन,नाटक के दृश्यों और संवादों का लेखन। बच्चों की यह दिमागी कसरत तीन दिनों तक चलती रही। इन तीन दिनों में बच्चों ने बहुत सारे आइडिया प्रस्तुत किये ,उन पर विचार विमर्श किया।उन्हें रद्द भी कर दिया।फ़िर से नये आइडिया, कहानी का प्लाट ढूंढ़ा और अन्ततः फ़ाइनल न्यूज बुलेटिन बाल समाचार और एक हास्य नाटक अद्भुत विद्यालय की स्क्रिप्टें हेमन्त कुमार के दिशा निर्देशन में तैयार हो गयीं।
25-26 जुलाई दो दिनों तक बच्चे जुटे रहे अपने दोनों कार्यक्रमों के गहन रिहर्सल में। और इस काम में उनको दिशा निर्देश मिल रहा था संस्थान की प्रस्तुतकर्ता मृदुला सुशील एवम अमरेन्द्र सहाय से।इन दो दिनों में बच्चों ने सीखा शुद्ध उच्चारण ,संवाद बोलना,संवादों में स्वरों का उतार चढ़ाव तथा शारीरिक अभिनय के साथ चेहरे पर लाये जाने वाले भावों और भंगिमाओं को।
और 27 एवम 28 जुलाई को तो संस्थान परिसर में अजीब नजारा था। हर गैलरी
में बच्चे रंग बिरंगी ड्रेस पहने हुये टहल रहे थे। कहीं बच्चे लाइट,रोल कैमरा,ऐक्शन्……जैसे कमाण्ड बोलते सुने गये।तो कहीं अपने सवादों को दुहराते हुये।27जुलाई को बच्चों ने संस्थान के मिनी स्टूडियो में अपने समाचार बुलेटिन की और 28 को मुख्य स्टूडियो में अपने नाटक अद्भुत विद्यालय की रिकार्डिंग पूरी की।इन दोनों ही दिनों बच्चों के अन्दर एक अलग ढंग का उत्साह दिखाई पड़ा। आखिर उनका फ़िल्म बनाने का स्वप्न जो पूरा हो रहा था।
29 जुलाई को सभी बच्चे इकट्ठा हुये एडीटिंग रूम में। और नान लीनियर एडीटिंग सेटप पर श्री चिक्का मुनियप्पा द्वारा अपनी फ़िल्मों को एडिट होते देख कर आनन्दित होते रहे। अन्ततः तैयार हो गयी उनकी दोनों फ़िल्में बाल समाचार और अद्भुत विद्यालय।
वीडियो प्रोडक्शन सीखने की इस प्रक्रिया के दौरान बच्चे अनुभवों के विभिन्न
दौरों से गुजरे।कभी लाइट चली गयी कभी कहीं किसी उपकरण का कनेक्शन लूज हो गया।पर इस समय का उपयोग भी उन्होंने गाना गाकर,डांस करके और अभिनय दिखाकर किया।इस वर्कशाप का उद्देश्य बच्चों को वीडियो कार्यक्रमों के निर्माण की पूरी प्रक्रिया से परिचित कराना था न कि उन्हें उसमें निपुण बनाना।इस दृष्टि से यह वर्कशाप पूरी तरह सफ़ल थी।
00000000
हेमन्त कुमार




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अस्तित्व

शुक्रवार, 31 जुलाई 2009


अस्तित्व -1

नेस्तनाबूद करने की
करो
हजार कोशिशें
कर दो
जमीन्दोज मुझे
पाताल की गहराइयों में ।
पर मैं
ऊपर आऊंगा जरूर
एक दिन
धरती का सीना फ़ाड़ कर
तुम्हारी खैरियत पूछने
क्योंकि
मैं एक बीज हूं ।
000000

अस्तित्व -2

माचिस
उठाने से पहले
देख तो लेते
मैं
फ़ूस का नहीं
बारूद का ढेर हूं ।
0000000
हेमन्त कुमार

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एहसास

सोमवार, 20 जुलाई 2009


कब तक खेलते रहोगे
तुम
लुका छिपी का यह खेल
मुझसे
कब तक भटकते रहोगे
इस सूखे रेगिस्तान में
बरसने को आतुर
बादलों की प्रतीक्षा में।

क्या नहीं उठती
कोई हलचल
तुम्हारे अन्तः में
बारिश की रेशमी फ़ुहारों के
स्पर्श को
अपने होठों पर
महसूस करने की।

विश्वास करो मुझ पर
मैं ध्वस्त तो नहीं कर सकता
इस रेगिस्तान को
पर महसूस करा सकता हूं
बारिश की रेशमी फ़ुहारों का स्पर्श
तुम्हारे अन्तः में
तुम एक बार
अपनी आंखों की गहराई में
झांकने का अवसर तो दो।
*****
हेमन्त कुमार


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( कहानी कहना -----कहानी सुनाना एक कला (भाग-2)

सोमवार, 13 जुलाई 2009

स्वर+गति+लय+अभिनय =अच्छी कहानी

मेरे लेखन की शुरुआत आकाशवाणी के इलाहाबाद केन्द्र से हुई थी ।वह भी बच्चों के लिये प्रसारित होने वाले कार्यक्रम ‘बालसंघ’ से ।1974 के आसपास ‘बालसंघ’ कार्यक्रम का संचालन आदरणीय श्री विजय बोस जी किया करते थे ।श्री विजय बोस एक बेहतरीन ड्रामा आर्टिस्ट होने के साथ ही एक बढ़िया प्रस्तोता एवम वाचक भी थे …खासकर कहानियां सुनाने के मामले में तो उनका कोई जवाब नहीं था ।साधारण कहानी को भी विजय भैया इतने बढ़िया ढंग से सुनाते थे कि वह कहानी
खास बन जाती थी । और यही साधारण सी कहानी का खास बन जाना ही बच्चों का मनोरंजन करता है।उन्हें कहानी के प्रति आकर्षित करता और अन्त तक बांधे रहता है।बच्चों को कहानी सुनाना मैनें आदरणीय विजय बोस से ही सीखा था।यद्यपि बचपन में दादी,नानी,अपनी माता जी एवम अन्य बुजुर्गों से भी कहानी सुनी थी ---लेकिन कहानी सुनने का असली तरीका आकाशवाणी में ही सीख सका ।
दरअसल बच्चों को कहानी सुनाते समय हमें कई कलाओं एवम दक्षताओं का इस्तेमाल करना होता है ।इनमें वाचन,अभिनय,चित्रकला,पुतुल(पपेट),चार्ट आदि प्रमुख हैं ।यहां मैं पहले वाचन और अभिनय का ही उल्लेख करूंगा ।क्योंकि ये दोनों ही दक्षतायें कहानी को ज्यादा आकर्षक और प्रभावशाली बनाती हैं।
1-स्वर का उतार चढ़ाव :
यह तो कहानी सुनाने का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है।यदि हम किसी बच्चे या बच्चों के समूह को एकदम साधारण ढग से ,सामान्य स्वर में कोई कहानी सुना देंगे तो वह कहानी कितनी भी अच्छी हो एकदम बेअसर हो जायेगी हो सकता है बच्चे उसे ठीक से सुनें भी न । हो सकता है कुछ बच्चे कहानी सुनते समय सोने लगें । लेकिन यही कहानी अगर कहानी के पात्रों,दृश्यों ,स्थितियों और भावों के अनुरूप अपनी आवाज में उतार चढ़ाव लाकर सुनायी जायेगी तो उसका प्रभाव ही अलग पड़ेगा ।
2-गति एवम लय :
जैसे किसी गीत को लय और गति प्रभावशाली बनाते हैं ,वैसे ही कहानी को भी यही दोनों तत्व सुनने योग्य बनाते हैं ।मान लीजिये कोई परियों की कहानी है ।उसमें परी के विवाह का वर्णन है अब उसे अगर आप कर्कश स्वरों में जल्दी जल्दी सुना देंगे तो क्या उसे बच्चे पसन्द करेंगे---नहीं न । और उसी विवाह के वर्णन को अगर आप थोड़ा कोमल स्वरों में धीरे धीरे सुनायेंगे तो उसका प्रभाव ही एकदम अलग होगा।इसी तरह अगर किसी कहानी में किसी युद्ध का वर्णन है तो आपको उसी दृश्य के अनुरूप अपने स्वरों में थोड़ा तेजी और उत्साह लाना होगा।
3-अभिनय :
कहानी सुनाने में जितनी बड़ी भूमिका स्वर,गति,लय की है उतनी ही बल्कि उससे कहीं ज्यादा अभिनय की है ।आप पूछेंगे वह कैसे ?भाई सीधी सी बात है हम सभी को राम की कहानी पढ़ने, उससे ज्यादा किसी अच्छे कथावाचक से सुनने और उससे भी ज्यादा उसे रामलीला के रूप में देखने में आनन्द आता है ।ठीक यही बात हम हर कहानी के साथ लागू कर सकते हैं।खासतौर से बच्चों को कहानी सुनाते समय तो हमें अपने अन्दर एक अच्छे अभिनेता को जगाना ही होगा।तभी हम कहानी सुनने का पूरा आनन्द बच्चों को दे सकेंगे।
मान लीजिये शेर और खरगोश की ही कहानी बच्चों को सुनानी है ।तो एक तरीका तो यह है कि हम सीधे सीधे सत्यनारायण की कथा की तरह बच्चों को यह कहानी सुना दें और फ़ुरसत पा जायें।दूसरा और मेरे हिसाब से सही तरीका यह है कि हम इस कहानी को धीरे धीरे सुनाने के साथ ही शेर और खरगोश के साथ ही अन्य जानवरों के बीच हुये संवादों को उन्हीं जानवरों की आवाजों में सुनायें। आप खुद सोच कर देखिये बच्चे आपके मुंह से शेर की दहाड़ या खरगोश की डरी हुई आवाज सुन कर कितना आनन्दित होंगे।इतना ही नहीं अगर हम खुद या फ़िर बच्चों से इन पात्रों के अभिनय करवायें तो सम्भवतः कहानी का प्रभाव दूना हो जायेगा ।
हम अभिनय के माध्यम से सिर्फ़ कहानी को ही प्रभावशाली नहीं बनाते हैं ।हम इसके माध्यम से बच्चों को कहानी में शामिल विभिन्न जानवर पात्रों के व्यवहार,उनकी बोलियों,उनके स्वभाव से भी परिचित करते हैं।इतना ही नहीं कहानी यदि किसी ऐतिहासिक घटना पर आधारित है तो उसके पात्रों के माध्यम से उस समय के लोगों की बोलने ,बातचीत की शैली भी सीखते हैं ।
हमारे प्राथमिक स्कूलों के शिक्षक बन्धुओं को तो खासातौर से अपनी कक्षाओं में कहानी सुनाते समय इन तीनों ही तत्वों स्वरों का उतार चढ़ाव,गति एवम लय तथा अभिनय का ध्यान जरूर रखना चाहिये तभी वे एक अच्छे कथावाचक की भूमिका निभा सकते हैं ।
000000000000
हेमन्त कुमार

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चिड़िया

शनिवार, 4 जुलाई 2009

चिड़िया तो आखिर चिड़िया है
उसको बेचारी को कहां पता कि हम
सभ्य हो रहे हैं
और हमारा विकास
पूरी प्रगति पर है ।

चिड़िया तो खोज रही है
सूनी आंखों से
अपना नन्हां सा घोसला
और नन्हें बच्चों को
जिन्हें वह अकेला छोड़
सुबह उड़ गई थी
दानों की खोज में
पर अब तो वहां कुछ भी नहीं
न पेड़ न घोसला न बच्चे ।

उसे तो दिख रहा है
दूर दूर तक फ़ैला हुआ
कंक्रीट और इस्पात का
एक अंतहीन जंगल
पिघले हुये
काले तारकोल की बहती नदियां
और धरती के सीने में
उड़ेला जा रहा
खौलता इस्पात ।

चिड़िया बेचारी तो
हो गयी है स्तब्ध
हमारी सभ्यता
और विकास की तेज
गति को देखकर ।

आखिर वह
अब कहां खोजे
अपना घोसला और बच्चों को
किससे करे फ़रियाद
खाकी वर्दी / खद्दरधारी से
या फ़िर यू एन ओ और
वर्ल्ड पीस फ़ाउण्डेशन के
माननीय सदस्यों से ?

लेकिन
चिड़िया तो आखिर चिड़िया है
उसको बेचारी को कहां पता
कि हम सभ्य हो रहे हैं
और हमारा विकास प्रगति पर है
हमें नहीं कोई मतलब
चिड़िया घोसले
और उसके बच्चों से ।
********
हेमन्त कुमार

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पेड़ बनाम आदमी

शनिवार, 27 जून 2009


पेड़ जितना झेलता है
सूरज को
सूरज कभी नहीं झेलता
पेड़ जितना झेलता है
मौसम को
मौसम कभी नहीं झेलता।

---और पेड़ जितना झेलता है
आदमी को
आदमी कभी नहीं झेलता
सच तो यह है
पेड़ अंधेरे में भी
रोशनी फ़ेंकते हैं
और अपने तैनात रहने को
देते हैं आकार।

------और आदमी उजाले में
जो उगलता है विष
महज पेड़ ही उसे पचाते हैं
पेड़ रात में बगुलों के लिये
तालाब बन जाते हैं
और आत्मसात कर लेते हैं
बगुलाहीन गंध।

पेड़ जब उपेक्षित होते हैं
तब ठूंठ होते हैं
और फ़लते हैं गिद्ध
वही करते हैं बूढ़े बरगद की
लम्बी यात्रा को अंतिम प्रणाम।

अगर उगने पर ही उतारू
हो जाये पेड़
तो चिड़ियों के बीट से भी
अंकुरा सकते हैं
किले की मोटी और मजबूत दीवारों को फ़ोड़
खींच सकते हैं अपनी खुराक
जुल्म की लम्बी और मजबूत परम्परा को
खोखला कर सकते हैं।

पेड़ कभी धरती पर भारी नहीं होते
आदमी की तरह आरी नहीं होते
पेड़ अपनी जमीन पर खड़े हैं
इसीलिये आदमी से बड़े हैं।

पेड़ जितना झेलता है सूरज को
सूरज कभी नहीं झेलता
पेड़ जितना झेलता है मौसम को
मौसम कभी नहीं झेलता
-------और पेड़ जितना झेलता है आदमी को
आदमी कभी नहीं झेलता।
*******
कवि – नंदल हितैषी
हेमंत कुमार द्वारा प्रकाशित ।
*श्री नंदल हितैषी हिन्दी के चर्चित कवि। उत्तर प्रदेश पुलिस से सेवा निवृत्त होने
के बाद फ़िलहाल स्वतंत्र लेखन एवम वृत्त चित्रों के निर्माण में व्यस्त।

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व्यंग्य--हंगामाये वर्कशाप -- बोले तो -- चाकलेटी बच्चे / खुरदुरे बच्चे

सोमवार, 22 जून 2009




इस समय गर्मी की छुट्टियां चल रही हैं।गर्मी की छुट्टियों में शहरी बच्चों की तो मौज ही मौज रहती है।सुबह से शाम तक मौज। हर शहर में गर्मियों की छुट्टियों में बच्चों के लिये एक बहार सी आ जाती है। आप कहेंगे ये कौन सी बहार है भैया जो गर्मियों में ही आती है?अरे जनाब ये बहार होती है वर्कशाप यानी कार्यशालाओं की। जिधर देखिये उधर कार्यशालायें।कहीं बच्चों को नाचना सिखाया जा रहा है तो कहीं गाना,कहीं ऐक्टिंग तो कहीं राइटिंग,कहीं पेन्टिंग तो कहीं क्राफ़्ट ।मतलब ये कि गर्मियां आते ही हर शहर कार्यशालामय हो उठता है।
अभी कल शाम ही मुझे भी एक ऐसी ही वर्कशाप की प्रस्तुति में बतौर दर्शक जाने का सौभाग्य मिला था।ये सौभाग्य मुझे हर साल मिलता है ।कई वर्कशाप होती हैं शहर में। आप लोगों के शहरों में भी होती ही होंगी हर शहर में गर्मी शुरू होते ही जैसे कोई वर्कशाप फ़्लू आ जाता है ।जिधर देखो उधर वर्कशाप । चाहे वो लखनऊ हो दिल्ली हो या भारत का कोई और शहर ।
भाई मजा आ गया स्टेज पर हुई प्रस्तुति देखकर।मैं देख तो रहा था स्टेज पर हो रही बच्चों की उछल कूद को लेकिन सोच रहा था उस बुद्धिमान आदमी के बारे में जिसने इन वर्कशापों को इजाद किया होगा।भाई खूब दिमाग लड़ाया होगा उसने…तभी तो इतने काम की चीज खोजी।
इन कार्यशालाओं से बच्चों का तो फ़ायदा है ही,अभिभावकों को भी बड़ा भारी लाभ मिलता है। आप पूछेंगे कैसे? भाई सीधी सी बात है … महंगाई का जमाना है । छुट्टी होते ही बच्चे हल्ला करेंगे कि पापा कहीं घुमाओ…अब इतनी महंगाई में बेचारे पापा कहां ले जायें बच्चों को। छोटी से छोटी जगह भी ले जायेंगे तो दस हजार का खर्चा।कहां से आयेगा ये पैसा?लिहाजा पांच सौ रुपया टिकाया किसी वर्कशापिये को और तीस चालीस दिनों के लिये बच्चे से फ़ुरसत ।बच्चा भी व्यस्त …वर्कशाप में … और मां बाप भी पा गये फ़ुर्सत गपबाजी करने के लिये।
लेकिन इन वर्कशापों का फ़ायदा सिर्फ़ शहरी बच्चों और मां बाप के लिये ही है…हमारे गांव की आबादी के बच्चों(जिनकी संख्या शहरी बच्चों से कई गुना ज्यादा होगी) को इन वर्कशापों का सुख नहीं नसीब होता। पता नहीं ये वर्कशापिये गांव के बच्चों को इसके योग्य नहीं समझते या फ़िर गांव के मां बाप में कोई नुस्ख है। लेकिन आप खुद सोचिये कितनी बड़ी विडम्बना है ये कि हमारे देश की कुल आबादी का बड़ा हिस्सा गांवों में रहता है और उन गांव के बच्चों के लिये ऐसी कोई वर्कशाप,समर कैम्प,हाबी क्लासेज …कुछ भी नहीं।
जो कुछ भी है वो सब सिर्फ़ शहरी बच्चों के लिये।उन बच्चों के लिये जिनके पास बिजली भी है,टी वी,कम्प्युटर,सिनेमाहाल,चिड़ियाघर,सर्कस,घूमने खेलने के लिये पार्क सभी कुछ है।गांवों के वो बच्चे जो किसी तरह से स्कूल तक पहुंच पाते हैं,जिनकी दुनिया सिर्फ़ और सिर्फ़ गांवों के स्कूलों और कच्ची पक्की गलियों तक ही सीमित है…क्या उनकी तरफ़ इन वर्कशापियों या समर कैम्प के आयोजकों की नजर नहीं पड़ती? सरकार के संस्कृति विभाग की ओर से इन वर्कशापों के लिये अनुदान और ग्रान्ट भी दी जाती है…बहुत सी नाट्य संस्थायें तो सरकार से यही अनुदान लेने के लिये ही बच्चों के इन समर कैम्प्स का आयोजन करती हैं…।बाकी के साल भर उनकी कोई गतिविधि नहीं दिखाई पड़ती। मेरा सिर्फ़ ये कहना है कि सांस्कृतिक कार्य विभाग क्यों नहीं इन वर्कशापियों को गांवों की तरफ़ भेजता…वहां जाकर वो लोग गांव के बच्चों के लिये भी तो कुछ काम करें।कम से कम हमारे गांवों के बच्चे भी तो जानें कि नाटक,वर्कशाप,थियेटर,पेन्टिंग,एक्जीबीशन जैसे शब्दों के माने होता क्या है?या सब कुछ शहरों तक ही सीमित रहेगा?
*********
हेमन्त कुमार

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ग़ज़ल

बुधवार, 17 जून 2009


ईमान की इक लाश की कर रहे थे तुम फ़िकर देखो,
यहां लाशों का बस रहा है इक शहर देखो।

लगी थी आग जो शोलों का अब असर देखो,
किसी ने ढा दिया है हम पे ये कहर देखो।

जुबां पे बन्दिश का जमाना गया गुजर देखो,
मीठी बातों का मिल रहा है अब जहर देखो।

कहा था तुमने मुहैय्या करेंगे सबको मकां,
हो रहा है अब आसमां तले बसर देखो।

कहा था तुमने कि लाश न गिरेगी एक यहां,
अब तो लाशों से पट रहा है ये शहर देखो।
0000000
हेमन्त कुमार

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कहानी कहना ---कहानी सुनाना---एक कला

गुरुवार, 11 जून 2009


कहानी सुनना हर बच्चे को तो अच्छा लगता ही है।इससे बड़े भी अछूते नहीं हैं।कहानी अगर मनोरंजन का साधन है तो दूसरी ओर यह शिक्षा देने का एक जबर्दस्त औजार भी है।पूरी दुनिया में कहानियों का एक ऐसा अनोखा ,अद्भुत समुद्र है जिसमें हर बच्चा,बूढ़ा तैरना चाहता है।
हमारे देश में भी कहानियां सुनाने या किस्सागोई की एक समृद्ध परंपरा रही है।कहानी सुना कर ज्ञान देने और लोगों को शिक्षित बनाने का पहला प्रयोग पं0 विष्णु शर्मा ने अपनी पंचतंत्र की कहानियों में किया था। इसी क्रम में सिंहासन बत्तीसी,बैताल पच्चीसी,पूत बुलाकी, अलिफ़ लैला या अरेबियन नाइट्स की कहानी सुनाने की शैलियों का भी विकास हुआ।
हमारी अन्य भारतीय भाषाओं में भी कहानी सुनाने की अलग अलग शैलियों का विकास हुआ।
अकबर बीरबल की कहानियां भी इसी किस्सागोई की परंपरा में आती हैं।
यदि हम इन सभी शैलियों का विश्लेषण करें तो कहानी सुनाने के कुछ तत्व सब में दिखाई
पड़ेंगे।मसलन रोचकता,मनोरंजन,भाषा की सरलता,प्रवाह,सुनाने वाले की आवाज की विशेषता आदि। बच्चों को कहानी सुनाने की कला में कुछ विशेष बातों को ध्यान में रखना जरूरी है।
1- बाल मनोभावों की समझ:
बच्चों को कहानी सुनाने की सबसे पहली शर्त है कि कहानी सुनाने वाले को बच्चों के मनोभावों,उनकी रुचियों ,उनके ज्ञान की अच्छी समझ हो और वह खुद भी उस समय बच्चा बन जाय ,जब वह कहानी सुना रहा हो।बच्चों के साथ बैठते ही वह कुछ देर के लिये अपने बड़ेपन को
भूलकर अपने बचपन के दिनों में लौट जाय। और याद करे अपनी शरारतों,चुलबुलेपन और धमाचौकड़ियों को। कहानी सुनने वाले बच्चों के साथ कुछ देर खेले कूदे,उन्हें अपना दोस्त बनाये,
उनसे कुछ बातें करे,उनके साथ अच्छी तरह घुल मिल जाय। इससे उसे श्रोता बच्चों का मानसिक स्तर,उनके भाषा ज्ञान को समझने का अवसर मिलेगा। और उसे श्रोता बच्चों के अनुकूल कहानी का चयन करने में आसानी होगी।
2- भाषा की सरलता:
बच्चों की कहानियों की भाषा सरल,सहज एवं प्रवाहमयी होनी चाहिये। शब्द बच्चों के मानसिक स्तर के अनुरूप हों ।जिन्हें बच्चे आसानी से समझ सकें।बच्चे यदि किसी विशेष क्षेत्र के हों तो वहां की स्थानीय बोली के शब्दों को भी कहानी में शामिल करने की कोशिश करनी चाहिये। कहानी के वाक्य जहां तक संभव हो छोटे छोटे बनाने चाहिये,जिन्हें बच्चे आसानी से समझ सकें।यदि कहानी में स्थानीय कहावतों और मुहावरों का इस्तेमाल करें तो ये बच्चों को अतिरिक्त लाभ पहुंचायेगा।(लेकिन ये मुहावरे या कहावतें कहानी में सहज रूप में आयें,अलग से थोपे हुये न लगें।)
कहानी सुनाते समय हमें यह बात जरूर ध्यान में रखनी चाहिये कि हम कहानी सुनाने के साथ ही कहीं न कहीं परोक्ष रूप से बच्चों को भाषा का ज्ञान भी देते चलते हैं।
3-समसामयिकता:
कहानी का चुनाव बच्चों के परिवेश ,उनके रहन सहन और परिवेश के अनुकूल करें।इसके लिये आप कहानी सुनाने से पहले बच्चों से उनकी राय भी ले सकते हैं कि आज वे किस तरह की कहानी सुनना चाहते हैं? मसलन जानवरों की,परियों की,भूतों की,कोई विज्ञान कथा या फ़िर किसी सच्ची घटना पर अधारित कहानी।
एक बात और ,यदि आप कोई पौराणिक या पंचतंत्र आदि की कहानी सुनाने जा रहे हैं तो उसे भी आज के सन्दर्भों से जोड़ कर बच्चों को सुनाना एक अच्छी कोशिश होगी। और बच्चे इसमें रुचि भी ज्यादा लेंगे।
4- रोमांचकता:
बच्चों की कहानी में यदि रोमंचकता का तत्व न हो तो वह कहानी ही कैसी ?
यह कहना है बच्चों के प्रतिष्ठित कहानीकार श्री प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव जी का।मैं भी इस बात से पूरी तरह सहमत हूं।जब तक बच्चों की कहानी में --- अरे ये कैसे हुआ?----अरे अचानक ये कहां से टपक गया?------देखो अब आगे क्या होता है? जैसे प्रश्न न उठें,बच्चों के चेहरे रोमांचित न हों,उनकी आंखें बीच बीच में विस्मय से फ़ैल न जायें ,तब तक भला वह बच्चों की कहानी कहां से कही जा सकती है।
5-उत्सुकता:
उत्सुकता का तत्व भी रोमांचकता से जुड़ा हुआ ही है।बच्चों की कहानी में अगर कहानी सुनाने वाले के हर वाक्य के बाद बच्चों के अंदर ---अब आगे क्या होने वाला है?---अमुक व्यक्ति अब क्या करेगा?----जैसे प्रश्न यदि नहीं उठते हैं तो मेरे विचार से वो कहानी पूरी तरह से फ़्लाप मानी जायेगी। वह कहानी बच्चों को कुछ भी देने में सफ़ल नहीं हो सकतीं। न मनोरंजन न सीख। अब ये उत्सुकता न जगा पाना कहानीकार की असफ़लता भी हो सकती है या फ़िर कहानी सुनाने वाले की शैली की।
कहानी सुनाने वाला यदि कुशल कथावाचक है तो वह एक फ़्लाप कहानी से भी बच्चों का मनोरंजन कर सकता है।ठीक उसी तरह से जैसे एक कुशल निर्देशक किसी समान्य कहानी पर भी सुपरहिट फ़िल्म बना सकता है।
6-कहानी मनोरंजन के लिये ,उपदेश या सीख के लिये नहीं:
मेरे हिसाब से बच्चों को वही कहानी अच्छी तरह बांधे रख सकती है,जो सिर्फ़ और सिर्फ़ बच्चों के मनोरंजन के लिये लिखी गयी हो।कहानी सुनाते समय जहां आप बच्चों को उपदेश या सीख देने की कोशिश करेंगे वहीं कहानी का बंटाधार हो जयेगा। बच्चों को जम्हायी आने लगेगी ,किसी को लघु शंका लग जायेगी तो कोई पानी पीने का बहाना ढूंढ़ लेगा----यानि कि आपकी कथा पंचायत भंग। इसलिये बच्चों को कहानी सिर्फ़ मनोरंजन ,आनंद ,खेल के लिये सुनायें।उपदेश देने के लिये नहीं।यहां मेरे कहने का यह मतलब कदापि नहीं कि कहानी में सीख नहीं हो सकती,हो सकती है पर अपने आप कहानी में आई हुई। अलग से थोपी हुई नहीं।
ये तो कुछ मुख्य बिन्दु थे जिन पर बच्चों को कहानी सुनाते समय जरूर ध्यान देना ही चाहिये। अब आती है बात कहानी सुनाने के तरीकों की ---तो इन पर मैं अपने अगले लेख में चर्चा करूंगा।
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हेमन्त कुमार





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बचपन

रविवार, 17 मई 2009

एक बचपन
मांगता है
रोबोट राकेट
सुबह सुबह
दूसरा रोटी।

एक बचपन
सिर पर उठा लेता है
पूरे घर को
दूसरा बोझ।

एक बचपन
बनता है मदारी
दूसरा जमूरा।

एक बचपन
पढ़ता है पुस्तकें
दूसरा
कठिन समय को।

बचपन होता है
राष्ट्र का भविष्य ।
00000000
कवि:शैलेन्द्र
प्रभारी सपादक ‘जनसत्ता’
कोलकाता संस्करण
मोबाइल न—09903146990
0 श्री शैलेन्द्र हिन्दी के सुपरिचित कवि एवम वरिष्ठ पत्रकार हैं। आपके अब तक तीन काव्य संकलन प्रकाशित हो चुके हैं।कविताओं के साथ ही समय समय पर दिनमान,रविवार,श्रीवर्षा,हिन्दी परिवर्तन,जनसत्ता आदि पत्र पत्रिकाओं में समाचार कथायें,लेख,टिप्पणियां,कुछ कहानियों का प्रकाशन।पत्रकारिता में एक लंबी संघर्षमय यात्रा पूरी करके इस समय ‘जनसत्ता’ के कोलकाता संस्करण में प्रभारी संपादक पद पर कार्यारत हैं।
हेमन्त कुमार द्वारा प्रकाशित।

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ओ मां

शनिवार, 9 मई 2009


जब भी मैं बैठता हूं
ढलते सूरज के साथ
बालकनी में कुर्सी
पर अकेला
मेरी आंखों के सामने
आता है कैमरे का व्यूफ़ाइंडर
और उसमें झलकती है
एक तस्वीर
आंगन में तुलसी की पूजा करती
एक स्त्री की
और कहीं दूर से आती है एक आवाज
ओ मां।

जब भी बच्चे व्यस्त रहते हैं
टी वी स्क्रीन के सामने
और मैं बाथरूम में
शेव कर रहा होता हूं
शीशे के सामने अकेला
अचानक मेरे हाथ हो जाते हैं
फ़्रीज
शीशे के फ़्रेम पर
डिजाल्व होता है एक फ़्रेम और
मेरा मन पुकारता है
ओ मां।

जब भी मैं खड़ा होता हूं
बाजार में किसी दूकान पर अकेला
कहीं दूर से आती है सोंधी खुशबू
बेसन भुनने की
आंखों के सामने क्लिक
होता है एक फ़्रेम
बेसन की कतरी
और मेरे अन्तः से आती है आवाज
ओ मां।

जब भी मैं बैठता हूं
देर रात तक किसी बियर बार में
कई मित्रों के साथ पर अकेला
अक्स उभरता है बियर ग्लास में
आटो रिक्शा के पीछे
दूर तक हाथ हिलाती
एक स्त्री का
और टपकते हैं कुछ आंसू
बियर के ग्लास में
टप-टप
फ़िर और फ़िर
चीख पड़ता है मेरा मन
ओ मां।
**********
हेमन्त कुमार

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दोहे

शुक्रवार, 8 मई 2009


हर चौराहा बन गया,अब नाटक का मंच।
अभिनय उस पर कर रहे ,बगुले बन सरपंच॥

बिका चाय पर आदमी, जला रहा है आंत।
अन्धकार के बीच वह,बीन रहा है तांत॥

पेट सभी भट्ठी हुये,सुलग रही है आग।
सरपंचों के सामने,खेल रहे हैं फ़ाग॥

सभी राम रावण हुये,कौन चलाये राज।
आज द्रौपदी रो रही,कौन बचाए लाज॥
**********
हेमन्त कुमार

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1May.The Day Of Angels

गुरुवार, 30 अप्रैल 2009



(आज मई है। दुनिया भर के उन सभी मेहनतकश साथियों को मैं दिल से नमन करते हुए अपनी शुभकामनायें दे रहा हूँ ,जो दूसरों के सपनों ,हसरतों को पूरा करने के लिए अपने सपनों को दफ़न कर देते हैं ....पूरी उम्र भर के लिए इस मौके पर मैं अपनी ये कहानी प्रकाशित कर रहा हूँ ये कहानी काफी पहले मैनें 'पराग 'पत्रिका के लिए लिखी थी )


कहानी --टिक्कू का फैसला


क्यूं बे छोकरे,काम चाहिए तुझे?”
टिक्कू ने चौंक कर पीछे देखा.गैंडे की तरह मोटा और खुरदुरा शरीर.तेजाब से जला हुआ एक आंख का चेहरा,उस दूसरी बची हुयी आंख में भी फैले हुए लाल डोरे--- एक बेहद बदशक्ल और खौफनाक सा दीखता आदमी खड़ा था उसके सामने.
काम….?”
हाँकाम..और बदले में दाम भी.”इस बार वह आदमी थोड़ा सा हंसा तो उसके पीले दांत देख कर टिक्कू को उबकाई आने लगी.मगर तब तक वह उसके एकदम करीब आकर उसके कंधे पर अपना एक हाथ रख चुका था.टिक्कू वहां से हटने की कोशिश करता उससे पहले ही वह अपनी दूसरी वाली आंख दबा कर बोला,”अबे इतना घबराता काहे कू है?यह अपना इलाका है.इधर से एक चिडिया भी उड़े तो अपुन कू उसके दिल का हाल मालूम हो जाता हैक्या समझा..?अब ये बता तेरा नाम क्या है?

टिक्कू।”वह ऐसे बोल पड़ा जैसे किसी ने जादू के बल पर उसके मुंह से उसका नाम निकलवा लिया हो
ठीक है..ठीक है..टिक्कू हो या पिक्कू ….अपुन को तेरे नाम से जास्ती मतलब नईच रखने का..बस मेरे कू काम से मतलब होता क्या…..?बस कुछ ही दिन में तेरे कू सारा काम समझ जायेगा…”
फ़िर तो वह पीटर की ओर ऐसे ही खिंचता चला गया जैसे सांप की आँखों के सम्मोहन में फंसी हुयी चिडिया.
सचमुच टिक्कू उस दिन अपनी क्लास छोड़कर काम की ही तलाश में निकला था.वह नावेल्टी सिनेमा के पास से गुजर रहा था कि वहीं इस रूप में पीटर से टकरा गया.इन पन्द्रह दिनों में कई बार उसने ख़ुद अपने आप को धिक्कारा, ‘कहाँ फंसा तू?कितना ग़लत काम कर रहा है तू?पुलिस वालों से आख मिचौली के बाद नहीं भी पकड़े गए तो क्याकौन सी खुशी होती है तुझे?बस चंद रुपयों की खातिर.....पचीस तीस रूपयों की खातिर ..पीटर के हाथ अपनी आत्मा बेच दी तूने?छिः

मगर सिनेमा के टिकटों की चोर बाजारी के इस काले धंधे को नहीं छोड़ पाया वह.जब जब उसने छोड़ना चाहा लंबे बुखार के बाद भी कमजोरी से बुत पडी माँ का चेहरा आँखों के सामने खड़ा होता.फ़िर कहाँ से आयेगी उसके लिए दावा?कहाँ से आयेंगी रोटियां?अभी तो वह किसी के यहाँ बर्तन माजने जा नहीं सकती.जायेगी भी तो फ़िर उस दिन की तरह कहीं किसी नाली में गिर पड़ेगी.टिक्कू को सबसे बड़ा डर था कि कहीं माँ को उसके धंधे के बारे में पता चल जाय….कितने अरमान थे माँ के….वह पढ़ लिख कर एक भला सा आदमी बन जाएगा….कहीं अच्छी सी नौकरी करेगा…..पर हुआ क्याटिक्कू ने एक लम्बी साँस ली.
लेकिन आज टिक्कू ने फैसला कर लिया था कि वह अब ये धंधा नहीं करेगा.दुनिया इतनी बड़ी है.कहीं तो काम मिलेगा ही.पीटर ने और भी कितने लड़कों को इस काम में फंसा रखा था.टिक्कू को उन सभी की आँखों में दहशत भरी दिखायी पड़ती.उसने अपने मन की बात को जब अपने साथ काम करने वाले दीपू को बताया…..तो वह बोला तो कुछ नहीं बस अपनी फटीआँखों से उसकी ओर ताकता भर रह गया

आज का धंधा निपटा कर टिक्कू सिनेमा हाल के पीछे वाली गली से गुजर रहा था .अचानक पीटर को अपने सामने देख कर वह हडबडा गया था ..पर जल्दी ही उसने अपना आप को सम्हाल लिया.
क्यूं बे !पर निकल आये हैं तेरे कू?धंधा छोडेगा तू….?मेरा काम नयी करने का?..तेरे भेजे में ये बात आईच कैसे….?पीटर भेड़िये की तरह गुर्राता हुआ सवाल दागता चला गया.
टिक्कू ने लम्बी साँस ली .वह समझ गया था कि दीपू पीटर को सब कुछ बता चुका है.पर टिक्कू डरा नहीं.उसने सधे शब्दों में पीटर से कहा,"दादा मैं कल से ये धंधा करने नहीं आऊंगा.”
तेरा ये आखिरी फैसला है?”
हाँ…”
एक भयानक सी किरर्र….की आवाज हुयी.अंधेरे के बावजूद छूरे की तेज धार टिक्कू की आँखों के आगे चमक उठी.
आयेगा कैसे नहीं?तू नहीं आयेगा तो पीटर तेरी लाश को लायेगा.मैंने तेरे को पैलेच बोला था रे कि इदर कू सब आता तो अपनी मर्जी से है….पर जाने के वास्ते मेरापीटर का मर्जी चलता हैक्या.तेरे भेजे में इत्ती सी बात नयी घुसती रे टिक्कू?
टिक्कू डर कर थर थर कांप उठा.अब तो पीटर उसका घर भी देख चुका थावो आखिर बच कर जाएगा किधर.?कोई रिश्तेदार भी तो नहीं है इस मुम्बई में.
और सुन पीटर जो कहता है वोइच करता है….जा अब्भी भाग जा धीरे सेअभी मैं तेरे को समझाता..है रेऐसा डरने का नहीं….पणकल से काम पर आने का..उसमें मेरे कू टप्पा नहीं देने का..”

किर्र की आवाज के साथ छुरा फ़िर अन्दर हो गया.लौटते हुए पीटर के बूटों की ठक ठकटिक्कू के दिल की धड़कन में डूबती चली गयी.
अगले दिन टाइम पे सब लडके गए.लेकिन टिक्कू नहीं आया.पीटर गुस्से से अपने होठ चबा रहा था.तीन बार वो सिगरेट जला कर फेंक चुका था.इतनी मजाल उस कल के छोकरे कीअभी तक के धंधे में किसी छोकरे ने पीटर के सामने सर उठाने की हिम्मत नहीं कीपण वो सालाहरामी ..टिक्कू..पीटर का गुस्सा बढ़ता जा रहा था.इससे पहले कि वो किसी से कुछ कहता ..टिक्कू उसे सामने से आता दिखलाई पड़ा.वह बिना किसी हिचक के उसकी ओर बढ़ रहा था.जब वह पीटर के सामने कर खड़ा हुआ उसके चेहरे पर डर का कोई निशान नहीं था.
क्यूं …..बे ..कहाँ था अब तक..?ये मैटनी के टिकट कौन बेचेगा..तेरा बाप? “
पीटर टिकटों की गड्डी उसके सामने करते हुए लगभग चीख कर बोला

नहीं,अब मैं ये टिकट नहीं बेचूंगा.”टिक्कू की आवाज में दृढ़ता थी.
तब साला क्या मेरे हाथों से मरने के वास्ते आया इधर…?पीटर बिफर गया.
हाँ मैं मरने ही आया हूँ.मैंने माँ को सब सच सच बता दिया.माँ ने इन पैसों से ख़रीदी हुयी दवा खाने से इंकार कर दिया है.वह खाना भी नहीं खा रही है.पानी तक नहीं पी रही है.”टिक्कू लगभग चीखने लगा था.”माँ कहती है यह पाप की कमाई है.माँ मुझे पढाना चाहती थी..अच्छी सी नौकरी में देखना चाहती थी.ये सब तो हुआ नहीं.उल्टे मेरी वजह से मेरी माँ आज मरने जा रही है.जब मेरी माँ ही नहीं रहेगी तो मैं जी कर क्या करूंगा दादा?लो ,अपना चाकू मेरे सीने में उतार दो.”कहते कहते टिक्कू का गला भर आया. उसने अपनी फटी हुयी कमीज के बटन खोल डाले.हड्डियों का ढांचा भर दीखता उसका सीना पीटर के सामने खुला पड़ा था.वे हड्डियाँ जरूर थीं ..लेकिन उन पर जैसे टिक्कू का फैसला लिखा हुआ था.
एक पल….दो पल….तीन पल…..लेकिन टिक्कू की मौत नहीं आयी.पीटर का चाकू नहीं निकला.उसने धीरे से अपने हाथ टिक्कू के कन्धों पर रख दिए.अगले क्षण टिक्कू को अपने माथे पर गरम बूँदें टपकती अनुभव हुईं.उसने चौंक कर सर ऊपर उठाया.वह आश्चर्य से देखता रह गया.पीटर की जालिम ऑंखें आंसुओं से तर थीं.
टिक्कू ने भरे हुए गले से कहा," टिक्कू…..मैं तेरी माईं को मिलना चाहता रेमैं उसके पैर छूना मांगता ..जिसने तेरे जैसे बेटे कू जनम दिया है रे….चल तूअभ्हीच चल….”
नावेल्टी थियेटर के सामने अजीब माजरा थासाइकिल स्टैंड वाले से लेकर ….टिकट ब्लैक करने वाले सारे छोकरे….. सबबड़ी हैरत से टिक्कू और पीटर को जाते हुए देख रहे थे.
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हेमंत कुमार

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लेबल

. ‘देख लूं तो चलूं’ "आदिज्ञान" का जुलाई-सितम्बर “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” ११मर्च २०१९ ११मार्च 1mai 2011 2019 अंक 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अक्षत अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अपराध अपराध कथा अभिनव पाण्डेय अभिभावक अमित तिवारी अम्मा अरविन्द दुबे अरुणpriya अर्पण पाण्डेय अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आनन्द नगर” आने वाली किताब आबिद सुरती आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उम्मीद के रंग उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक टिपण्णी एक ठहरा दिन एक तमाशा ऐसा भी एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महत्वपूर्ण समीक्षा एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता ओड़िया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथाकार समीर गांगुली कथावाचन कर्मभूमि कला समीक्षा कलाकार कविता कविता। कविताएँ कवितायेँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काफिला नाट्य संस्थान काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किताबों में चित्रांकन किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैंसर-दर-कैंसर कैमरे. कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं क्षणिकाएँ खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीतांजलि गिरवाल गीतांजलि गिरवाल की कविताएं गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चिड़ियाँ पिकनिक करने आईं चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छिपकली छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जन्मदिन जन्मदिवस जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जात। जाने क्यों ? जेठ की दुपहरी टिक्कू का फैसला टोपी ठहराव ठेंगे से डा० शिवभूषण त्रिपाठी डा0 हेमन्त कुमार डा०दिविक रमेश डा0दिविक रमेश। डा0रघुवंश डा०रूप चन्द्र शास्त्री डा0सुरेन्द्र विक्रम के बहाने डा0हेमन्त कुमार डा0हेमन्त कुमार। डा0हेमन्त कुमार्। डॉ.ममता धवन डोमनिक लापियर तकनीकी विकास और बच्चे। तपस्या तलाश एक द्रोण की तितलियां तीसरी ताली तुम आए तो थियेटर दरख्त दरवाजा दशरथ प्रकरण दस्तक दिशा ग्रोवर दुनिया का मेला दुनियादार दूरदर्शी देश दोहे द्वीप लहरी नई किताब नई पत्रिका नदी किनारे नया अंक नया तमाशा नयी कहानी नववर्ष नवोदित रचनाकार। नागफ़नियों के बीच नारी अधिकार नारी विमर्श निकट नित्या नित्या शेफाली नित्या शेफाली की कविताएं नियति निवेदिता मिश्र झा निषाद प्रकरण। नेता जी नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2) नेहा शेफाली नेहा शेफ़ाली। पढ़ना पतवार पत्रकारिता-प्रदीप प्रताप पत्रिका पत्रिका समीक्षा परम्परा परिवार पर्यावरण पहली बारिश में पहले कभी पहले खुद करें–फ़िर कहें बच्चों से पहाड़ पाठ्यक्रम में रंगमंच पार रूप के पिघला हुआ विद्रोह पिता पिता हो गये मां पिताजी. पितृ दिवस पुण्य तिथि पुण्यतिथि पुनर्पाठ पुरस्कार पुस्तक चर्चा पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा। पुस्तकसमीक्षा पूनम श्रीवास्तव पेंटिंग्स पेड़ पेड़ बनाम आदमी पेड़ों में आकृतियां पेण्टिंग प्यारा कुनबा प्यारी टिप्पणियां प्यारी लड़की प्यारे कुनबे की प्यारी कहानी प्रकृति प्रताप सहगल प्रतिनिधि बाल कविता -संचयन प्रथामिका शिक्षा प्रदीप सौरभ प्रदीप सौरभ। प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा। प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव। प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव. प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव। प्रेरक कहानी प्रो0 सुरेन्द्र विक्रम फ़ादर्स डे।बदलते चेहरे के समय आज का पिता। फिल्म फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति फ़ेसबुक बंकू बंधु कुशावर्ती बखेड़ापुर बचपन बचपन के दिन बच्चे बच्चे और कला बच्चे का नाम बच्चे का स्वास्थ्य। बच्चे पढ़ें-मम्मी पापा को भी पढ़ाएं बच्चे। बच्चों का विकास और बड़ों की जिम्मेदारियां बच्चों का आहार बच्चों का विकास बच्चों को गुदगुदाने वाले नाटक बच्चों को जरूर पढाएं ये किताब बदलाव बया बहनें बाघू के किस्से बाजू वाले प्लाट पर बादल बारिश बारिश का मतलब बारिश। बाल अधिकार बाल अपराधी बाल दिवस बाल नाटक बाल पत्रिका बाल मजदूरी बाल मन बाल रंगमंच बाल विकास बाल साहित्य बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक बाल साहित्य समीक्षा। बाल साहित्यकार बालवाटिका बालवाणी बालश्रम बालिका दिवस बालिका दिवस-24 सितम्बर। बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत बूढ़ी नानी बेंगाली गर्ल्स डोण्ट बेटियां बैग में क्या है ब्लाइंड स्ट्रीट ब्लाग चर्चा भजन भजन-(7) भजन-(8) भजन(4) भजन(5) भजनः (2) भद्र पुरुष भयाक्रांत भारतीय रेल मंथन मजदूर दिवस्। मदर्स डे मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला कौशल पाण्डेय मनोविज्ञान महुअरिया की गंध मां माँ मां का दूध मां का दूध अमृत समान माझी माझी गीत मातृ दिवस मानस मानस रंजन महापात्र की कविताएँ मानस रंजन महापात्र की कवितायेँ मानसी। मानोशी मासूम पेंडुकी मासूम लड़की मिशन ग्रीन वार मुंशी जी मुद्दा मुन्नी मोबाइल मूल्यांकन मेरा दोस्त मेरा नाम है मेराज आलम मेरी अम्मा। मेरी कविता मेरी रचनाएँ मेरे मन में मोइन और राक्षस मोनिका अग्रवाल मौत के चंगुल में मौत। मौसम यात्रा यादें झीनी झीनी रे युवा युवा स्वर रंग बिरंगी दुनिया रंगबाज रंगबाजी करते राजीव जी रस्म मे दफन इंसानियत राजीव मिश्र राजेश्वर मधुकर राजेश्वर मधुकर। राधू मिश्र रामकली रामकिशोर रिपोर्ट रिमझिम पड़ी फ़ुहार रूचि रोचिका शर्मा लखनऊ लगन लघुकथा लघुकथा। लड़कियां लड़कियां। लड़की लालटेन चौका। लिट्रेसी हाउस लू लू की सनक लेख लेख। लेखसमय की आवश्यकता लोक चेतना और टूटते सपनों की कवितायें लोक संस्कृति लोकार्पण लौटना वनभोज वनवास या़त्रा प्रकरण वरदान वर्कशाप वर्ष २००९ वह दालमोट की चोरी और बेंत की पिटाई वह सांवली लड़की वाल्मीकि आश्रम प्रकरण विकास विचार विमर्श। विज्ञानं बाल कविताएँ विश्व पुतुल दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस. विश्व रंगमंच दिवस व्यंग्य व्यक्तित्व व्यन्ग्य शक्ति बाण प्रकरण शब्दों की शरारत शाम शायद चाँद से मिली है शिक्षक शिक्षक दिवस शिक्षक। शिक्षा शिक्षालय शैलजा पाठक। शैलेन्द्र श्र प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव स्मृति साहित्य प्रतियोगिता श्रद्धांजलि श्रीमती सरोजनी देवी संजा पर्व–मालवा संस्कृति का अनोखा त्योहार संदेश संध्या आर्या। संवाद जारी है संसद संस्मरण संस्मरण। सड़क दुर्घटनाएं सन्ध्या आर्य सन्नाटा सपने दर सपने सफ़लता का रहस्य सबरी प्रसंग सभ्यता समय समर कैम्प समाज समीक्षा समीक्षा। समीर गांगुली समीर लाल। सर्दियाँ सांता क्लाज़ साक्षरता निकेतन साधना। सामायिक सारी रात साहित्य अमृत सीता का त्याग.राजेश्वर मधुकर। सुनीता कोमल सुरक्षा सूनापन सूरज सी हैं तेज बेटियां सोन मछरिया गहरा पानी सोशल साइट्स स्तनपान स्त्री विमर्श। स्मरण स्मृति स्वतन्त्रता। हंस रे निर्मोही हक़ हादसा हादसा-2 हादसा। हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य हिंदी कविता हिंदी बाल साहित्य हिन्दी ब्लाग हिन्दी ब्लाग के स्तंभ हिम्मत हिरिया हेमन्त कुमार होलीनामा हौसला accidents. 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