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बूढ़ी नानी

रविवार, 12 जून 2016

बूढ़ी नानी
जैसे बारिश की घास
या फ़िर वो खूबसूरत मशरूम
जो बस यूं ही
चुपके से प्रकट हो जाते हैं
पता नहीं कहां से आते हैं
या कहां जाते हैं।
तंग गलियों में
गांव के चबूतरों पर
बाबा आदम की हवेली में
अब तो पान पट्टियों पर भी
दिख जाती हैं ये बूढ़ी नानियां।
ममता वाली मुस्कान के जाल में
टाफ़ी की पुचकार से
बच्चों को अपने पास बुलाती हैं
खुद जैसे फ़टेहाल में हों
पर दूसरों पर लुटाने को खजाना
न जाने कहां से बस
आता ही जाता है।
दिन ढलते, सुपारी काटते
कहानियों का सिलसिला
जैसे जादूगरनी का खेल।
अपने बच्चे हों या पड़ोसी के
इन्हें बस चाहिये होते हैं
नन्हें मुन्ने, भोले भाले
गोल मटोल बच्चे
प्यार से वो इनका नामकरण
तक कर देती हैं
धीरे धीरे हाथ सहलाते
बालों में उंगलियां फ़िराने लगती हैं
और बात चल रही होती है
शेर का शिकार करते एक राजा की
रात बढ़ती जाती है
इनकी कहानी भी।
तभी मुन्ने की मां आती है
उसे ढूंढ़ते हुये
नानी की बाहों में झूलते
नन्हें को मां ले जाती है।
और नानी मसलती हैं
बिन दांतों वाला पोपला मुंह
मुंह ढकती ऐनक को सम्हालती
सर पर आंचल रखती नानी
गायब हो जाती हैं
किसी अंधेरी कोठरी में
अपनी काल्पनिक कहानियों की तरह।
बदस्तूर
रोज की तरह
सुबह फ़िर होती है
मासूम हंसी का पिटारा लिये
झुर्रियों वाला चेहरा
फ़िर दिख पड़ता है
नुक्कड़ पर
धूप सेंकती
बिस्कुट का पैकेट दिखाती नानी।
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कवयित्री:नेहा शेफ़ाली।
      

युवा कवयित्री नेहा शेफ़ाली अभी जिन्दगी का गणित सीखने की कोशिश कर रही हैं।महानगर मुम्बई में रिहाइश दौड़ते हांफ़ते आदमियों और कंक्रीट के हुजूम में इनका जेहन चेहरों को पढ़ने की कोशिश करता है।और तभी उपजती है कोई कविता या कहानी।अंग्रेजी,हिन्दी की कुछ प्रतिष्ठित पत्रिकाओं,अखबारों में फ़ुटकर रचनाएं प्रकाशित।



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दुनियादार

रविवार, 15 मई 2016

(फ़ोटो:गूगल से साभार)
        उसका रंग एकदम काला था।एकदम चेरी बूट पालिश की तरह।लम्बाई कुल जमा साढ़े चार फ़ीट।उमर ग्यारह साल।नाम कलुआ। वैसे तो उसका नाम था राजकुमार लेकिन उसके घर वाले उसे रजुआ कह कर बुलाते थे और जब से वह नईम मियां की साइकिल रिपेयरिंग की दूकान पर काम करने आया था उसका काला रंग देख कर ही शायद नईम मियां ने उसको कलुआ बुलाना शुरू कर दिया था।उनकी देखा देखी सारे ग्राहक भी उसे कलुआ ही बुलाने लगे थे।और पिछले दो सालों में तो वह शायद अपना नाम राजकुमार भूल भी चुका था।लेकिन कलुआ की दो खास बातें भी थीं जो मुझे बेहद पसंद थीं।पहली ये कि वो हमेशा मुस्कराता रहता था। और जब वो मुस्कुराता था तो उसके काले चेहरे पर सफ़ेद दांत एकदम अलग ही दिखते थे।कलुआ की दूसरी खास बात थी उसकी गाने की आदत।वह हर समय कोई न कोई फ़िल्मी गीत अपनी बेसुरी आवाज में गाने की कोशिश करता था।खासकरमेरा नाम राजू घराना अनाम—”।वह थोड़ा तुतलाता भी था।और जब इस गाने को वह अपनी तोतली आवाज में गाता--“मेला नाम लाजू घलाना अनाम---बहती है गंगा वहां मेला घाम---”तो हर ग्राहक उसको शाबाशी देता।इसी लिये मैं हमेशा अपनी साइकिल रिपेयर कराने उसी के पास जाता था।
    आज भी जब मैं अपनी साइकिल का पंचर बनवाने पहुंचा तो कलुआ पहले से ही एक साइकिल का नट खोलने के लिये रिंच से जूझ रहा था।मेला नाम लाजू घलाना अनाम----बहती है गंगा वहां मेला घाम---” वह अपनी बेसुरी आवाज में गा रहा था और अपनी पूरी ताकत लगाकर साइकिल के पहिये का जाम हो चुका नट खोलने की कोशिश कर रहा था।पर नट जंग लगने से जाम हो चुका था और उस पर से रिंच बार-बार फ़िसल जा रही थी।मैं बहुत देर से नट खोलने की उसकी यह कोशिश देख रहा था।उसके चेहरे पर पसीने की बूंदें चुहचुहा आई थीं।उसने एक बार फ़िर रिंच को नट में फ़ंसाया और पूरा जोर लगाने के चक्कर में सायकिल के पहियों पर लगभग लटक गया।रिंच फ़िर फ़िसल गयी और उसी के साथ वह भी साईकिल के पहिये पर गिर पड़ा।इसी के साथ साइकिल नईम मियां का एक झन्नाटेदार झापड़ उसके गालों पर पड़ा।
        हट बेएक घण्टे से जूझ रहा है -- साले एक ठो नट नहीं खोल पा रहा।नईम चिल्लाया और उसने रिंच उसके हाथ से छीन कर खुद ही साइकिल का जाम पड़ा नट खोलने की कोशिश की।और कलुआ किनारे खड़ा होकर अपने ग्रीस लगे हाथों से गाल सहलाता हुआ डबडबाई आंखों से नईम द्वारा की जा रही कोशिश देखने लगा।पर साइकिल का जंग लगा नट नईम से भी नहीं खुला। अंत में झुंझला कर नईम ने रिंच एक तरफ़ फ़ेंक दी और कलुआ की तरफ़ देखा।वो अभी भी गाल सहला रहा था।
   “हे ल्लोअभी तू टेसुए बहा रहा है।चल जरा इस नट पे केरोसीन डाल दे।जब तक वो फ़ूलेगा तब तक तू बाबू जी की साइकिल का पंचर देख ले---नईम कलुआ को पुचकारता हुआ बोला।लेकिन उसके स्वर में पुचकारने का भाव कम उसका मजाक उड़ाने का भाव अधिक था।
    कलुआ ने अपने ग्रीस और तेल से चीकट हो चुकी कमीज की बांह से ही अपनी आंखें पोछीं और मेरी साइकिल लिटाकर  पाने से उसका टायर और ट्यूब खोलने लगा।मुझे इस वक्त सच में बहुत ही दया आ रही थी।इस तकलीफ़देह स्थिति में मैं उससे अपनी साइकिल का पंचर नहीं बनवाना चाहता था।लेकिन मेरी मजबूरी ये थी कि बिना साइकिल बनवाए मैं आफ़िस समय पर नहीं पहुंच सकता था।और न ही नईम से ये कह सकता था कि वो कलुआ को कुछ देर के लिये आराम करने के लिये छोड़ दे।क्योंकि एक बार मैं खुद देख चुका था कि एक ग्राहक द्वारा कलुआ को मारने से रोकने पर नईम ने कलुआ को उस ग्राहक के सामने ही दो हाथ और लगा दिया था।साथ ही उस गाहक की साइकिल भी नहीं बनायी थी।उल्टा उस गाहक को जरूर नसीहत दे दिया था कि वो उसकी दूकान पर आकर कलुआ की तरफ़दारी न किया करे।
     मैं अक्सर आफ़िस आते जाते कलुआ को मार खाते देखता।कई बार मैंने यह भी सोचा कि कलुआ को वहां से हटा कर काम करने के लिये अपने ही घर पर लगा लूं।और साथ ही उसका नाम किसी स्कूल में लिखा दूं।पर नईम के बिगड़ैल स्वभाव के कारण न ही मैं नईम से कुछ कह पा रहा था न ही कलुआ से कुछ बात कर पा रहा था।
       लेकिन आज पता नहीं क्यूं मुझे लग रहा था कि कलुआ से और नईम से मुझे इस संबंध में बात करनी चाहिये।लेकिन नईम से पहले मैं कलुआ से बात करना चाहता था कि वो यहां का काम छोड़ कर मेरे घर काम करेगा?स्कूल जायेगा?
    इसी उधेड़बुन में कलुआ के पास ही बैठा अपनी साइकिल का टायर खुलते देख रहा था उसी समय मुहल्ले के शर्मा जी अपनी बाइक से आये और नईम को अपनी कार का पहिया खोलने के लिये बुला ले गये।शायद उनकी कार पंचर हो गयी थी।नईम जाते जाते कलुआ को हिदायत भी देता गया,“अबे कलुआ बाबू जी की साइकिल जल्दी सही कर बे--–और हां जरा दुकान के ध्यान रख्योहम जरा शर्मा जी की कार का पहिया लै के आय रहे हैं।आधा घण्टा लग जाई।कौनौ बदमाशी नहींनहीं तो फ़िर कुटाई होइ जाई जान ल्यो।और नईम शर्मा जी की बाइक पर बैठ कर निकल गया।
  मेरी तो लाटरी निकल गयी।मैं तो खुद ऐसे मौके की तलाश में था कि जब दूकान पर नईम न रहे और मैं कलुआ से उसके मन की बात जान सकूं।जैसे ही नईम बाइक पर गया मैं कलुआ के और पास खिसक गया।बिना कोई भूमिका बनाए मैं सीधे सीधे मुद्दे पर आ गया।
       
कल्लू ई बताओ तुम्हारा मन पढ़ने लिखने का नहीं होता?”मैंने बात की शुरुआत की।पर कलुआ शायद मेरी बात को ठीक से समझ नहीं पाया और बस टुकुर टुकुर मेरा मुंह निहारने लगा।
देखो तुम चाहो तो पढ़ाई लिखायी भी कर सकते हो और पढ़ाई के बाद अपना कोई काम धन्धा कर सकते हो।मैंने कलुआ को फ़िर समाझाने की कोशिश की।
लेकिन बाबू जी हमरी पढ़ाई का खर्चा कौन देगा।बापू अम्मा के पास तो पैसा है नाहीं।कलुआ बहुत मासूमियत से बोला।
देखो उसकी चिन्ता तुम न करोबस तुम तैयार हो जाओ।मैंने उसे आश्वासन दिया।
लेकिन बाबू जी हमारा हियां का काम और हम अपने अम्मा से तो पूछि लें ?”उसने फ़िर सवाल किया।
यहां का काम तो तुम्हें छोड़ना होगा।मैंने उसे समझाने की कोशिश की।उसी समय दूर से नईम आता दिखा और हम दोनों ने अपनी बात बंद कर दी।इस बीच मेरी साइकिल बन चुकी थी।मैंने नईम को पैसा पकड़ाया और अपनी साइकिल लेकर वहां से आफ़िस की ओर चल पड़ा।उस दिन मेरी कलुआ से बात अधूरी रह गयी।
     अगले दिन मेरी छुट्टी थी।मैं आराम से बाहर के बराम्दे में बैठा अखबार पढ़ रहा था कि कलुआ को फ़ाटक के पास खड़े देख कर चौंक पड़ा।अरे आओ कल्लू --–अंदर आ जाओबाहर क्यों खड़े हो?”और मेरे कहते ही कलुआ आ कर मेरे सामने फ़र्श पर बैठ गया।मेरे लाख कहने के बाद भी वो कुर्सी पर बैठने को नहीं तैयार हुआ।इस बीच मेरी श्रीमती जी भी वहां आकर खड़ी हो गयी थीं।
     “देखो भाई,कल्लू आया है इसे कुछ पानी वानी पिलाओ—” मैने श्रीमती जी से आग्रह किया।श्रीमती जी अक्सर मेरे मुंह से कलुआ के बारे में सुनती रहती थीं इसीलिये उनके भीतर भी कलुआ के लिये साफ़्ट कार्नर  था।उन्होंने तुरंत तश्तरी में दो लड्डू और एक गिलास पानी लाकर कलुआ के सामने रख दिया।
   कलुआ ने लड्डू की तरफ़ हाथ नहीं बढ़ाया।बस एकटक कभी मेरी ओर कभी श्रीमती जी की तरफ़ देखता रहा। अंत में श्रीमती जी ने ही उससे कहा,“लो बेटा लड्डू खाकर पानी तो पी लो।”कलुआ ने फ़िर मेरी ओर देखा तो मैंने उसे लड्डू खाने का इशारा किया।कलुआ ने बड़े संकोच से एक लड्डू उठा कर जल्दी जल्दी खाया और गिलास का पानी एक ही सांस में पी गया।अब उसने फ़िर मेरी और श्रीमती जी की ओर बारी बारी से देखना शुरू कर दिया था।बीच बीच में वह कभी अपने हाथ की उंगलियों के नाखून कुतरने लगता। कभी नीचे देखते हुये अपने पैरों के पंजों को एक दूसरे के ऊपर चढ़ाने की कोशिश करता। मैं समझ गया कि वह इस माहौल में खुद को थोड़ा असहज महसूस कर रहा है।
  मैंने उसे इस असहजता से उबारने के लिये बात शुरू कर दी।
“हां तो बताओ कल्लू -–तुमने कुछ सोचा अपने काम छोड़ने के बारे में?”मैंने उससे सीधे सीधे प्रश्न कर लिया।
    “हां बाबू जी –मैंने खुद भी बहुत सोचा और अम्मा से भी पूछा था।उन्होंने मना कर दिया।”कलुआ ने बिना किसी भूमिका के जवाब भी दे दिया।उसका सपाट जवाब सुन कर हम दोनों ही चौंक पड़े। चौंके इसलिये कि हम उम्मीद कर रहे थे कि कलुआ खुद और उसके मां बाप भी उसकी बेहतरी के लिये उसे हमारे यहां भेज देंगे।पर उसने तो सीधे सीधे जवाब दे दिया।
“लेकिन क्यों बेटा?”श्रीमती जी भी उसके जवाब को सुन कर आश्चर्य से बोलीं।
“आण्टी अम्मा कह रही थीं कि –आप लोग तो दुई चार साल में चले जायेंगे फ़िर हमें कहां काम मिलेगा---फ़िर लौट के हमें ओही नईम की दूकान पर काम मांगने जाना होगा।”कलुआ बड़ी मासूमियत से बोला।
“लेकिन कल्लू बेटा हम तो तुम्हें स्कूल भी भेजेंगे।तुम्हें पढ़ाएंगे---।”
“बाबू जी हम का करेंगे पढ़ि लिख के---आखिर काम तो उसी नईम के यहां ही करना पड़ेगा।नईम की नहीं तो कौनो और दूकान पे।”
“लेकिन बेटा --–वो तुम्हें इतना मारता भी तो है—यहां कोई तुम्हें मार थोड़े ही रहा।”मैंने उसे एक बार और समझाने की कोशिश की।
“अरे बाबू जी—कोई गलती होई जाती है हमसे तबै तो मारते हैं नईम अंकल।अउर ई बात की का गारण्टी कि हमें इहां मार नहीं पड़ैगी।बाबू जी ई छोटी सी उमर में हम बहुत दुनिया देखे हैं और दुनियादारी समझते भी हैं---पहिले सब लोग बहुत बात करत हैं।बाद में सारी बातें धरी रहि जाती हैं--- कभी चोरी का इल्जाम लगाय दिया जाता है तो कभी चकारी का।”कलुआ बड़े बुजुर्गों की तरह बोल रहा था और मैं श्रीमती जी के साथ उसकी बड़ी बड़ी बातें सुन रहा था।
“तो यही लिये हम ई फ़ैसला किये हैं कि हम वहीं ठीक हैं।अच्छा अब हम जाय रहे हैं दुकान खोलने का टैम होइ गवा हैं।नमस्ते बाबू जी----।”कलुआ जल्दी से बोला और हमे नमस्ते करके जल्दी से फ़ाटक खोल कर निकल गया।हम लोग अवाक से उसे जाता देखते रहे।
    अगले दिन मैं फ़िर साइकिल में हवा भरवाने नईम की दूकान पर पहुंचा।कलुआ पसीने में तर बतर एक साइकिल के पहिये से जूझ रहा था और साथ ही अपने उसी मस्ती भरे अंदाज में गा रहा था---मेला नाम लाजू घलाना-----।”मैंने अपनी साइकिल में हवा ली और आफ़िस की ओर चल पड़ा।
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डा0हेमन्त कुमार

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बच्चों को जरूर पढ़ाएं ये किताबें---।

शुक्रवार, 25 मार्च 2016

1— मोइन और राक्षस
लेखिका:अनुष्का रविशंकर
अंग्रेजी से अनुवाद:पूर्वा याज्ञिक कुशवाहा
चित्रांकन:अनीता बालचन्द्रन
मूल्य-रू085/
2—अण्डमान का लड़का
लेखिका:जाई व्हिटेकर
अंग्रेजी से अनुवाद: पूर्वा याज्ञिक कुशवाहार
मूल्य- रू090/
दोनों पुस्तकों के प्रकाशक:
एकलव्य
ई-10,शंकर नगर बी डी ए कालोनी
शिवाजी नगर,भोपाल-462016

        बच्चों की कल्पनाशीलता को बढ़ाने में निश्चित रूप से परीकथाओं और काल्पनिक कथाओं का बहुत बड़ा हाथ होता है।काल्पनिक कथाएं और परियों की कहानियां बच्चों को वास्तविक दुनिया से दूर ऐसे लोक में पहुंचा देती हैं जहां पहुंच कर वह उसे इतनी अधिक खुशी मिलती है जो उसे इस वास्तविक दुनिया में जल्दी नहीं मिल पाती।वह ऐसी काल्पनिक कहानियों के पात्रों के साथ इस कदर घुल मिल जाता है जैसे वह वास्तविक जीवन के अंग हों।बच्चा उनके साथ खेलता है,घूमता है,सैर करता है,सपने देखता है और अपने अंदर एक ऐसे आनंद की अनुभूति करता है जिसके बारे में उसने कभी सोचा भी नहीं होगा।
                 बच्चों को ऐसी ही काल्पनिक दुनिया में पहुंचा देने वाली किताब है “मोइन और राक्षस”।“मोइन और राक्षस” एक छोटा सा मजेदार और रोचक उपन्यास या लम्बी कथा है।इसकी लेखिका अनुष्का रविशंकर हैं।हिन्दी में  अनुवाद पूर्वा याज्ञिक कुशवाहा ने किया है और खूबसूरत चित्रों से सजाया है अनीता बालचन्द्रन ने।कहानी ऐसी है जिसकी हम आप या बच्चे कल्पना भी नहीं कर सकते।मोइन नाम के एक लड़के के साथ एक राक्षस की दोस्ती की कहानी।
    कहानी वैसे तो बहुत साधारण सी लगती है।लेकिन इसमें घटित घटनाएं ऐसी हैं जो बच्चों,बड़ों सभी को हंसने और किताब को जल्दी से जल्दी खतम करने पर मजबूर कर देंगी।मोइन नाम का 10-12 साल का एक लड़का।रात में अपने कमरे में अकेला सो रहा था।रात के बजे उसे अपने बिस्तर के नीचे अजीब सी आवाज सुनायी देती है।मोइन के पूछने पर आवाज खुद को राक्षस बताती है।और मोइन से एक कागज पर अपनी तस्वीर बनवाकर उस कमरे में वह रक्षस साकार हो जाता है।और यहीं से मजेदार घटनाओं का सिलसिला शुरू हो जाता है।कागज से निकला वह पतला दुबला अजीब सिर वाला राक्षस(क्योंकि मोइन ने जैसा कागज पर बनाया वह वैसे ही आकाए में बन गया)मोइन के कमरे में ही रहने लगा।
   अब राक्षस को घर में छिपाने,उसकी भूख मिटाने की जिम्मेदारी मोइन की।मोइन की मूसीबत ये कि वह उसे रखे कहां?कभी आल्मारी में,कभी पलंग के नीचे कभी स्कूल बैग में।आखिर उसे अपनी अम्मी और अब्बू से बचाना भी तो था।राक्षस मोइन के साथ स्कूल भी जाता है,उसके स्कूल के फ़ंक्शन में गाता भी है,उस राक्षस के चक्कर में उसे अम्मी अब्बू के साथ डाक्टर के पास भी जाना पड़ता है,उसके दोस्त भी राक्षस के दोस्त हो जाते हैं,मोइन के चाचा हरि मामा के कुत्ते पर राक्षस की सवारी,उसके स्कूल के अध्यापकों का राक्शस को लेकर कन्फ़्युजन---ऐसी ढेरों घटनाएं हैं जो कि किसी भी पाठक को पूरी किताब एक बार में पढ़ने को मजबूर कर देती हैं।और हर घटना के दौरान राक्षस की मजेदार बातें,उसकी हरकतें ऐसी की पढ़कर हंसते हंसते पेट में दर्द होने लगेगा।जितना ही मोइन और उसके साथी उस राक्षस को दुनिया के सामने लाने से रोकना चाहते हैं वह उतना ही सामने आने की कोशिश करता है।और उसकी उल्टी सीधी हरकतों से ऊबने के बावजूद अन्ततःमोइन उसे अपने घर पर ही अपने कमरे में रख लेता है।
       इस किताब की भाषा इतनी रोचक और मजेदार है कि बच्चे निश्चित ही इसे पढ़ते समय एक अच्छी किताब पढ़ने का पूरा अनन्द उठाएंगे।और इसके बीच बीच में अनीता बालचन्द्रन द्वारा बनाए गये चित्र इस काल्पनिक कथा को बच्चों के लिये सजीव बनाने का काम करते हैं।
     दूसरी किताब “अण्डमान का लड़का”---इसकी लेखिका हैं—जाई व्हिटेकर।यह एक छोटे बच्चे की ऐसी रोमांचक कहानी है जिसे हर अभिभावक,शिक्षक और बच्चे को जरूर पढ़ना चाहिये।
  इसकी भी कहानी है तो बहुत साधारण सामान्य सी—अपने अभिभावकों(चाचा-चाची) द्वारा प्रताड़ित बच्चे के घर से पलायन की।पर उसकी घर से पलायन की यह यात्रा इतनी रोचक और रोमांचक है जो पाठक को अन्त तक बांधे रहती है।
    “अण्डमान का लड़का” कहानी है एक दस सा;अ के लड़के आरिफ़ की—जो अपने बहुत धनाढ्य माता पिता के एक दुर्घटना में मृत्यु हो जाने के कारण अपने चाचा-चाची के साथ मुम्बई में रहता है।पर चाचा चाची का उसको पालने के पीछे सिर्फ़ एक मकसद था कि कब वह बालिग हो और वो लोग उसकी पूरी सम्पत्ति पर कब्जा करें। चाचा-चाची के बुरे व्यवहार से दुखी होकर ही एक दिन आरिफ़ उनका घर छोड़ कर भागने का निर्णय करता है। और एक अंधेरी रात में एकदम खाली हाथ घर से भाग जाता है।वह भाग कर चेन्नई जाने वाली ट्रेन में सवार हो जाता है और खुद को छिपाने के लिये अपना वेश बदल कर किसी तरह चेन्नई पहुंचता है। पुलिस और दुनिया से बचने के लिये अन्ततः वह एक तस्कर के साथ उसकी नाव पर सवार होकर अण्डमान के घने जंगलों में रहने वाले जारवा जाति के लोगों के बीच पहुंच जाता है।
      आरिफ़ की घर से पलायन की यह कहानी हमें एक बेहद रोमांचक यात्रा का अनुभव तो कराती ही है साथ ही प्रकृति के बहुत खूबसूरत दृश्यों से रूबरू भी कराती हैअमें उस जारवा जाति के रहन सहन और संस्कृति से परिचित कराती है जिनके पास आज भी सभ्य मानव जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।इतना ही नहीं हमें यह संदेश भी देती है कि हम किसी अनाथ हो चुके बच्चे के साथ कैसा बर्ताव करेंअमें सोचने को विवश कर देती है कि आखिर आरिफ़ जैसा होनहार और धनाढ्य बच्चे ने क्यों आमजन से दूर प्रकृति की गोद में रहने वाली जारवा प्रजाति के साथ रहने का निर्णय लिया।
       किताब की भाषा इतनी सरल और शैली इतनी रोचक है कि निश्चित ही कोई बच्चा इसे बिना पूरा पढ़े दूसरे कोई काम नहीं करेगा।मैं तो हर अभिभावक से,और प्राथमिक स्कूलों के शिक्षकों से अनुरोध करूंगा कि अपने बच्चों,छात्रों को दोनों किताबें—“मोइन और राक्षस” तथा “अण्डमान का लड़का” जरूर और जरूर पढ़ने को दें।
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डा0हेमन्त कुमार

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बाल नाटकों क एक अच्छा संकलन: “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक

रविवार, 13 दिसंबर 2015

   

हिन्दी में बाल नाटकों की कमी हमेशा महसूस की जाती रही है।खासकर इधर के कुछ वर्षों में तो बाल नाटक कम लिखे गये या जो लिखे गये वो बाल रंगमंच से जुड़े लोगों तक पहुंचे नहीं।यह कमी उस समय और महसूस होती है जब गर्मियों में पूरे देश में बच्चों के लिये तमाम रंग संस्थाएं,रंगकर्मी और स्कूल्स के अध्यापक बच्चों के नाटकों की स्क्रिप्ट्स खोजने लगते हैं।
        ऐसे में या तो उन्हें बहुत बड़े और मोटे साथ ही महंगे बाल नाटकों के संग्रह खरीदने पड़ते हैं या कोई सामान्य नाटक लेकर ही काम करना पड़ता है।।ऐसी स्थिति में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान(लखनऊ) द्वारा संस्थान द्वारा प्रकाशित की जा रही बाल पत्रिका बालवाणी का बाल नाटक विशेषांक निकालना एक बहुत महत्वपूर्ण कार्य है।
   बालवाणी-नवम्बर-दिसम्बर-2015 के इस बाल नाटक विशेषांक में पुराने और नये मिलाकर कुल बारह रचनाकारों के बाल नाटक शामिल किये गये हैं।पानी आ गया(विष्णु प्रभाकर),भों भों-खों खों(सर्वेश्वर दयाल सक्सेना),बाल दिवस की रेल(अमृत लाल नागर),अपने अपने छक्के(के0पी0 सक्सेना),नन्हा सिपाही(मनोहर वर्मा),परिवर्तन(डा0श्री प्रसाद),ताबीज(देवेन्द्र मेवाड़ी),देश की खातिर(भगवती प्रसाद द्विवेदी),वीर बालक भीमा(प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव),चिड़ियों का अनशन(डा0हेमन्त कुमार),प्रकृति का बदला(रमाशंकर),कहां गये रूपये(ज़ाकिर अली रजनीश
        बालवाणी का यह विशेषांक कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।पहली बात तो आज की महंगाई के जमाने में बाल पाठकों,बाल रंगकर्मियों,नाट्य निर्देशकों को मात्र 15रूपयों(पत्रिका का मूल्य) में एक साथ 12 अच्छे बाल नाटकों का आलेख प्रदान करना।जिसका आनन्द पढ़ने और मंचन दोनों में ही मिलेगा। दूसरी बात इन नाटकों में विषय की विविधता है।पाठकों रंगकर्मियों को हर तरह के नाटक मिलेंगे-- मनोरंजक,ऐतिहासिक,वैज्ञानिक सोच पैदा करने वाले,पर्यावरण की चेतना जगाने वाले आदि।इन नाटकों के चयन में इस बात का पूरी तरह ध्यान रखा गया है कि नाटक आसानी से मंचित किये जा सकें।उनके मंचन में कोई बहुत बड़ा सेट न लगाना पड़े,बहुत ज्यादा प्रापर्टीज न इकट्ठी करनी हो।यह इन नाटकों की सबसे बड़ी विशेषता कही जा सकती है।नाटकों में छोटे छोटे संवाद और दृश्य हैं जो कि बच्चों को आसनी से याद हो सकेंगे।ज्यादातर नाटकों की भाषा सरल और सहज है जिसे समझने में बच्चों को दिक्कत नहीं आयेगी।
    दूसरी बात यह कि इस विशेषांक में ही आदरणीय अमृत लाल नागर जी का एक बहुत महत्वपूर्ण लेख है—“आओ बच्चो नाटक लिखें।नागर जी का यह लेख बच्चों को तो नाटक लिखने की जानकारी देगा ही साथ ही नये बाल नाटक लेखकों का भी मार्ग दर्शन करेगा।इस लेख में बच्चों के नाटक लिखते समय किन किन बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिये इसका बहुत अच्छा और सम्यक विश्लेषण किया गया है।
     बालवाणी के इस विशेषांक में एक और भी महत्वपूर्ण और उपयोगी लेख है—“लोरियों की विशिष्ट रचनाकार शकुन्तला सिरोठिया”—जिसे बन्धु कुशावर्ती ने लिखा है।यह लेख भी इसलिये महत्वपूर्ण है क्योंकि बच्चों को बाल साहित्य तो हम पठन सामग्री के रूप में देते हैं।लेकिन बाल पाठक प्रायः उन रचनाकारों से अन्जान रहता है जो उसके मनोरंजन,शिक्षा और मार्गदर्शन के लिये दिन रात मेहनत करते रहते हैं। अगर बाल साहित्यकारों का सम्यक परिचय देने वाली एक शृंखला पत्रिका द्वारा शुरू की जाय तो यह एक और सार्थक प्रयास होगा बाल साहित्य को आगे बढ़ाने की दिशा में।
      बालवाणी के इस अंक में इन नाटकों लेखों के साथ ही बाल पाठकों के लिये दिविक रमेश जी और राजेन्द्र निशेश जी के मनोरंजक और प्यारे बालगीत भी हैं।जिन्हें पढ़ कर हर बच्चे का मन इन्हें एक बार जरूर गुनगुनाएगा।उषा यादव के बाल नाटक संग्रह ममता का मोल की योगीन्द्र द्विवेदी द्वारा की गयी समीक्षा बच्चों को कुछ और नाटकों से परिचित कराएगी और उन्हें पढ़ने के लिये प्रेरित भी करेगी।
   एक बात मैं यह भी कहना चाहूंगा कि यदि बालवाणी का यह बाल नाटक विशेषांक किसी तरह से हमारे प्रदेश के समस्त सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में पहुंच सके तो इस विशेषांक की सार्थकता और बढ़ जाएगी।
        कुल मिलाकर बालवाणी का यह बाल नाटक विशेषांक बाल पाठकों के साथ ही बाल रंग कर्म से जुड़े हर व्यक्ति के लिये काफ़ी उपयोगी साबित होगा।इस अच्छे और सराहनीय कार्य के लिये उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान को ढेरों बधाई।
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डा0हेमन्त कुमार

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आभासी दुनिया ने खत्म की रचनाकारों और पाठकों के बीच की दूरियां---।

बुधवार, 28 अक्टूबर 2015

    
साहित्य हमेशा तमाम तरह के खतरों और विरोधाभासों के बीच लिखा जाता रहा है,और लिखा जाता रहेगा। लेकिन साहित्य तो अन्ततः साहित्य ही कहा जायेगा,उसे अभिव्यक्त करने का माध्यम भले ही बदलता जाय।इधर काफ़ी समय से साहित्य जगत में इस बात से खलबली भी मची है और लोग चिन्तित भी हैं कि अन्तर्जाल का फ़ैलाव साहित्य को नुक्सान पहुंचायेगा। लोगों का चिन्तित होना स्वाभाविक है।लेकिन क्या किसी नये माध्यम के चैलेंज का साहित्य का यह पहला सामना है?इसके पहले भी तो जब टेलीविजन पर सीरियलों का आगमन हुआ था,नये चैनलों की भरमार हुयी थीक्या तब भी साहित्य के सामने यही प्रश्न नहीं उठे थे? तो क्या चैनलों के आने से साहित्य के लेखन या पठनीयता में कमी आ गयी थी?अगर आप पिछले दिनों को याद करें तोचन्द्रकान्ता धारावाहिक के प्रसारण के बाद चन्द्रकान्ता सन्तति उपन्यास तमाम ऐसे लोगों ने पढ़ा जिनसे कभी भी साहित्य का नाता नहीं रहा था।भीष्म साहनी का उपन्यास तमस,मनोहर श्याम जोशी का कुरु कुरु स्वाहा, तमस और कक्का जी कहिन धारावाहिकों के प्रसारण के बाद तमाम पाठकों ने उत्सुकतावश पढ़ा।तो टेलीविजन ने साहित्य के पाठक कम किये या बढ़ाये?ठीक यही बात मैं अन्तर्जाल या आभासी दुनिया के लिये भी कहूंगा।अन्तर्जाल के प्रसारऔर ब्लाग जैसे अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम की बढ़ती संख्या के साथ ही एक बार फ़िर साहित्य से जुड़े लोगों को तमाम तरह के खतरे नजर आने लगे हैं।उनके मन में तरह तरह की शंकाएं जन्म लेने लगी हैं।जबकि मुझे नहीं लगता कि साहित्य को ब्लाग या अन्तर्जाल से किसी प्रकार का कोई खतरा हो सकता है। क्योंकि किसी भी नये माध्यम के नफ़े नुक्सान दोनों ही होते हैं।अब यह तो साहित्यकारों के समूह पर है कि वह इस विशाल,वृहद आभासी दुनिया से क्या लेता है क्या छोड़ता है।
साहित्य के ऊपर इस आभासी दुनिया का सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही
तरह का प्रभाव पड़ रहा है।सकारात्मक इस तरह कि
v     इस आभासी दुनिया की वजह से दिग्गजों और मठाधीशों(साहित्य के अखाड़े के) की मठाधीशी अब खतम हो रही है।पहले जहां साहित्य कुछ गिने चुने नामों की धरोहर बन कर रह गया था वो अब सर्व सुलभ हो रहा है।आप देखिये कि जहां बहुत सारे नये लेखक,कविकिसी पत्र पत्रिका में छपने को तरस जाते थे(मठाधीशी के कारण)वो आज इसी आभासी दुनिया के कारण ही प्रकाशित भी हो रहे हैं,पढ़े भी जा रहे हैं और अच्छा लिख भी रहे हैं।
v     आभासी दुनिया में हर रचना का तुरन्त क्विक रिस्पान्स मिलता है।अच्छा हो या बुरा तुरन्त आपको पता लगता है,आप उसमें परिवर्तन परिमार्जन भी कर सकते हैं।जब कि प्रिण्ट में ऐसा नहीं है।आपको लिखने के कई-कई महीने बाद अपनी रचना पर प्रतिक्रियायें मिलती हैं।आप आज लिखते हैं, हफ़्ते भर बाद किसी पत्र-पत्रिका में भेजते हैं।वह स्वीकृत होकर महीनों बाद छपती है।तब कहीं जाकर उस पर आपको पाठकीय प्रतिक्रिया मिलती है।जबकि आप ब्लाग पर या किसी सोशल नेटवर्किंग साइट पर लिखते हैं तो वहां आपने रात में लिखा और और सुबह तक आपके पास प्रतिक्रियायें हाजिर।कुछ तारीफ़ कीकुछ सुझावों या वैचारिक मतभेद के साथ।
v     लेखक और प्रकाशक(प्रिण्ट माध्यम)दोनों अब आमने सामने हैं।आभासी दुनिया में जहां लेखक को पाठक उपलब्ध हैं वहीं आज आप देखिये कि प्रकाशक भी आसानी से अच्छे और नये लेखकों को अन्तर्जाल से लेकर छाप रहा है।ये हमारे साहित्य,साहित्यकारों,पाठकों सभी के लिये एक शुभ संकेत है।
जहां तक नकारात्मक प्रभाव की बात है---उसके खतरों से भी आप इन्कार नहीं कर सकते।
v     बहुत से रचनाकारों की रचनायें अच्छी और स्तरीय न रहने पर भी वाह-वाह, सुन्दर,प्रभावशाली जैसी टिप्पणियां रचनाकार को नष्ट करने का काम कर रही हैं।और इस बेवजह तारीफ़ का शिकार होकर कुछ रचनाकार अपने शुरुआती मेहनत और लगन के दौर में ही शायद खतम हो सकते हैं।
v     ऐसे भी रचनाकार यहां आपको मिलेंगे जो सिर्फ़ यही तारीफ़ सुनने या अपना मनोरंजन करने के लिये कुछ भी लिख रहे हैं,जिसका साहित्य,समाज,देश के लिये या पाठकों के लिये भी कोई उपयोग नहीं।ऐसे साहित्य की भरमार होने पर इस आभासी दुनिया में से अच्छे रचनाकारों को खोजना अपेक्षाकृत कठिन हो जायेगा।
इसके बावजूद मेरा मानना यही है कि अन्तर्जाल ने आज साहित्यकारों,पाठकों और
प्रकाशकों को आपस में इतना करीब ला दिया है कि अब प्रकाशित होना,पढ़े जाना कोई समस्या नहीं।और मुझे लगता है कि यदि इसे थोड़ा सा नियन्त्रण में रखा जाये तो यह आभासी दुनिया रचनाकारों,पाठकों,प्रकाशकों के बीच एक अच्छे और मजबूत सेतु का काम करेगी।
       जहां तक मंचों या समूहों की बात है इस समय फ़ेसबुक पर ही साहित्यकार सन्सद,रचनाकार,वर्ल्ड आफ़ चिल्ड्रेन्स लिट्रेचर आर्ट ऐण्ड कल्चर,दैट्स मी,गीत गज़ल और मुक्तक,हिन्दी साहित्य,ब्लागर्स रिफ़्लेक्शन,ब्लागर बाइ पैशन,समीक्षा ब्लाग,पुनर्नवा---जैसे सैकड़ों समूह ऐसे हैं जो सिर्फ़ साहित्य रचना के उद्देश्य से बनाये गये हैं।अब ये समूह कितना काम करेंगे यह तो भविष्य बतायेगा।लेकिन इतना तो तय है कि ये समूह भी आपसी विचार विमर्श,साहित्य चर्चा के अच्छे मंच साबित हो रहे हैं।मैं खुद इण्डियन चिल्ड्रेन्स लिट्रेचर समूह से जुड़ा हूं---और देख रहा हूं कि इस समूह में बाल साहित्य को लेकर सार्थक चर्चायें हो रही हैं।इसी ढंग से साहित्यकार संसद में भी लोग साहित्य पर अपने विचार देते हैं।पर बहुत से समूह ऐसे भी हैं जिन्हें सिर्फ़ सेल्फ़ प्रमोशन के लिये ही बनाया गया है।अभी मैं एक नये समूह से जुड़ा---डायट,लखनऊ----।इस समूह में मुझे लग रहा है कि ज्यादातर सदस्य(छत्र-छात्रायें)काफ़ी सृजनशील और जिज्ञासु हैं जो कि एक अच्छी बात है समूह के सदस्यों,समाज, और प्राथमिक शिक्षा के साथ ही किसी समूह के लिये भी।फ़ेसबुक के अलावा गूगलप्लस या और भी वेबसाइट्स पर ऐसे ढेरों समूह हैं जहां सार्थक विचार विमर्श चल रहे हैं।
    आज आप देख सकते हैं कि पूरे साहित्य जगत में ब्लाग,फ़ेसबुक,ट्विटर,गूगल प्लस की चर्चा हो रही है। हर महीने अगर आप नेट पर या अखबारों में देखें तो किसी न किसी शहर में आपको ब्लागर्स मीट सम्पन्न होने,किसी ब्लागर के सम्मानित होने,ब्लाग माध्यम  पर आधारित किसी पुस्तक का विमोचन होने,ब्लाग्स पर किसी सेमिनार,संगोष्ठी की खबर जरूर पढ़ने को मिल जायेगी। मेरी जानकारी में कई विश्वविद्यालयों में भी इस नये माध्यम पर सेमिनार,संगोष्ठियों का आयोजन हुआ है। इसके अलावा भी विशुद्ध साहित्यिक संगोष्ठियों में भी अब इस माध्यम के बारे में थोड़ी बहुत चर्चायें तो हो ही रही हैं।
       मुझे खुद नेट से जुड़े हुये लगभग तीन साल हुये हैं।मैं ब्लाग से तब परिचित हुआ जब अमिताभ बच्चन और शाहरुख का वाक युद्ध ब्लाग पर आया था।मैंने मित्र लोगों से पूछ पूछ कर ब्लाग के बारे में जानकारी इकट्ठी की और इसकी मारक क्षमता को समझकर इससे जुड़ गया।आप आश्चर्य करेंगे जहां मेरे पाठक 2008 में सिर्फ़ भारत में थे वहीं आज की तारीख में दुनिया के हर देश में मेरे दो चार पाठक मौजूद हैं।यह सब इसी आभासी दुनिया का ही तो कमाल है।
            और मुझे लगता है कि जिस रफ़्तार से हमारे देश में(पूरे विश्व की बात नहीं करूंगा)में अन्तर्जाल पर ब्लाग्स,सोशल नेट्वर्किंग साइट्स,समूह,फ़ोरम बनते जा रहे हैं उससे यही प्रतीत होता है कि पूरे देश में एक तकनीकी क्रान्ति आ चुकी है जिससे जुड़ कर लोग एक दूसरे के काफ़ी करीब हो रहे हैं।एक दूसरे को सुन रहे हैं।समझ रहे हैं और सबसे बड़ी बात इस आभासी दुनिया ने दूरियों को समाप्त कर दिया है।और यह सही वक्त है देश को,समाज को,राष्ट्र को एक सही दिशा देने में इस आभासी दुनिया के सदुपयोग का।तभी हम सही मायनों में सूचना तकनीकी के सही लाभार्थी कहे जायेंगे।
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ड़ा0हेमन्त कुमार

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