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बच्चों का हो पूर्ण विकास— अगर मिले किसी कला का साथ--।

शनिवार, 17 अगस्त 2013

 “साहित्य संगीत कला विहीनः,साक्षत पशु पुच्छ विषाण हीनः”—मतलब यह कि साहित्य संगीत और कला से विहीन मनुष्य पूंछ और सींग रहित पशु के समान होता है। यह श्लोक बहुत पहले लिखा गया था।पर इसकी सार्थकता हमेशा रहेगी। वैसे तो इसमें कही गई बातें हर व्यक्ति के ऊपर लागू होती हैं लेकिन अगर हम इस श्लोक को बच्चों के विकास के संदर्भ में देखें तो इसकी प्रासंगिकता आज के समय के लिये और भी बढ़ जाती है।
   आज बच्चों के अंदर जो उच्छृंखलता,उद्दण्डता और विद्रोही होने के हालात पैदा हो रहे हैं उसके पीछे बहुत से कारण हैं।बच्चों के चारों ओर का वातावरण,उनका पारिवारिक माहौल,स्कूल की स्थितियां,दोस्तों की संगत,टी0वी0,इण्टरनेट इत्यादि। इन्हीं में से एक कारण है उनका कला जगत से दूर होना। आज आपको बहुत कम परिवार ऐसे मिलेंगे जहां बच्चों को किसी कला से जोड़ने की कोशिश होती दिखाई पड़े।ज्यादातर अभिभावक चाहते हैं कि उनका बच्चा पढ़ लिखकर इंजीनियर,डाक्टर,
आई0ए0एस0,पी0सी0एस0 या कोई बड़ा अफ़सर बन जाय। और इसके लिये वे बच्चों को अच्छे से अच्छे स्कूल में दाखिला दिलवायेंगे। कई-कई ट्यूशन और कोचिंग सेण्टर्स भेजेंगे हजारों रूपये खर्च करेंगे।मतलब सुबह से शाम तक सिर्फ़ और सिर्फ़ पढ़ाई।थोड़ा बहुत जो समय बचा वो टी0वी0,इण्टरनेट के हवालें। नतीजा सामने है।बच्चों के ऊपर बढ़ता मानसिक दबाव,तनाव,रिजल्ट खराब होने पर डिप्रेशन,हीन भावना जैसी मनोग्रन्थियां बच्चों को जकड़ने लगती हैं।कहीं बच्चा अधिक निराशा में पहुंचा तो वो आत्महत्या तक करने की कोशिश कर बैठता है।
    जबकि इन सारी दिक्कतों से अभिभावक अपने बच्चों को बचा सकते हैं। सिर्फ़ उसे किसी भी कला से जोड़ कर।चाहे वह गायन हो,नृत्य हो,स्केचिंग,पेण्टिंग म्युजिक,अभिनय या फ़िर कोई अन्य कला हो। इनसे जुड़ने से बच्चे के अंदर आत्मविश्वास पैदा होगा। उसे लगेगा कि वह किसी चीज में तो दक्ष है।
                         

            ऐसा नहीं है कि आज समाज से या परिवार से कलाओं का लोप हो गया है। कलाओं का स्थान आज भी परिवारों में है। परन्तु आज उसका स्वरूप,मकसद बदलता जा रहा है।बहुत से परिवारों में आज भी बच्चों को नृत्य,संगीत,अभिनय आदि कलाओं का प्रशिक्षण दिलवाया जा रहा है। लेकिन उसके पीछे उनका मकसद व्यावसायिक हो गया है न कि बच्चों का आत्मिक विकास। वे चाहते हैं कि उनका बच्चा आगे चलकर उस कला के माध्यम से  धन कमा सके। जब कि ऐसा नहीं होना चाहिये। किसी भी कला का सर्वप्रथम उद्देश्य बच्चों को या किसी भी व्यक्ति को एक अच्छा इन्सान बनाना होता है। उसे अनुशासन सिखाना होता है।व्यावसायिकता तो बहुत आगे की बात होती है। और फ़िर यह जरूरी नहीं है कि हर बच्चा गायन सीख कर सोनू निगम या अभिनय सीख कर शाहरुख खान बने ही। लेकिन इतना तय है कि वह बच्चा उस कला के माध्यम से अनुशासित जरूर हो जायेगा।समय की पाबन्दी जरूर सीखेगा।मेहनत करना जरूर सीखेगा। उसके अंदर आत्मविश्वास जरूर पैदा होगा—कि वह भी कुछ करने लायक है।
        हमारे अभिभावकों को भी यह बात समझनी चाहिये कि यदि वे अपने बच्चों को पढ़ाई के,स्कूल के तमाम दबावों और तनावों से छुटकारा दिला सकते हैं तो इस काम में कोई भी कला निश्चित रूप से किसी दवा,चिकित्सक,मनोचिकित्सक से बढ़ कर कारगर सिद्ध हो सकती है। इतना ही नहीं कला भी उसके सम्पूर्ण विकास में उतनी ही सहायक होगी  जितना कि पढ़ाई-लिखाई या खेलकूद। मैं इस बात को पुष्ट करने के लिये यहां एक उदाहरण दूंगा। मैंने अपने एक मित्र से कहा कि आप अपने बेटे को शैक्षिक दूरदर्शन के कार्यक्रमों में क्यों नहीं भेजते?बस इतना कहना था कि वो उखड़ गये मेरे ऊपर। उन्होंने सीधे-सीधे मुझसे कह दिया कि “मैं अपने बच्चों को बर्बाद नहीं करना चाहता। और अब दुबारा कभी मुझसे यह बात मत कहना।” मैं उनका गुस्सा देख कर चुप हो गया। लगभग पांच छः साल के बाद मेरे वही मित्र अपने बच्चे को लेकर मेरे पास आये। उस समय उनका बच्चा कक्षा 8 में था। उन्होंने मुझसे कहा कि “इसे कुछ याद ही नहीं होता।दिन रात पढ़ता रहता है। और भेजे में कुछ घुसता ही नहीं।खेलने कूदने में भी मन नहीं लगता।कुछ कह दो तो रोने लगता है।” वो अपने बेटे के भविष्य को लेकर काफ़ी चिन्तित भी लग रहे थे।मैंने उन्हें शान्त कराया। और उनसे अनुरोध करके उनके बेटे को मैंने एक इन्स्ट्रुमेण्टल म्युजिक की क्लास ज्वाइन करवा दी। लड़के ने बांसुरी बजाना सीखना शुरू किया। और छःमहीने बितते बीतते उस बच्चे का पूरा स्वभाव ही बदल गया। उसका सारा गुस्सा,सारी उद्दण्डता गायब। वह अब पढ़ने में भी रुचि लेने लगा था। उनका वही जिद्दी,शैतान बच्चा हाई स्कूल,इण्टर प्रथम श्रेणी में पास हुआ। फ़िर इन्जीनियरिंग पास किया।आजकल वही बच्चा एक मल्टीनेशनल कम्पनी में है।
                     
यह सब बताने का मेरा यहां सिर्फ़ यही उद्देश्य था कि आप अपने बेटे को पढ़ाई,लिखाई के साथ ही किसी कला से भी जोड़िये।क्योंकि कला सिर्फ़ एक मनोरंजन या व्यवसाय का साधन ही नहीं है बल्कि यह ----
  • बच्चे को अनुशासित बनाती है।
  • बच्चे के अंदर आत्मविश्वास भरती है।
  • वह किसी भी काम को एक व्यवस्थित और साफ़ सुथरे ढंग से करना भी सीखता है।
  • उस कला के माध्यम से बच्चे का मानसिक तनाव भी खतम होता है।
  • उस कला में रोज नये प्रयोगों के करने से उसका बुद्धि कौशल भी बढ़ता है।
  • वह अपने भावी जीवन में भी हर काम को बहुत ही सलीके से और कलात्मक ढंग से पूरा करता है।
  • कला बच्चे के अन्दर कुछ नया करने ,सृजित करने का उत्साह भी पैदा करती है।
  • कला बच्चे के व्यक्तित्व को सौम्य,हंसमुख और मिलनसार बनाती है।
  • और सबसे बड़ी और अहम बात यह कि कोई भी कला आपके बच्चे के व्यक्तित्व को सम्पूर्ण बनाती है।
    इसलिये सभी अभिभावकों के साथ ही सभी शिक्षकों से भी यही कहूंगा कि बच्चों को किसी भी कला से जोड़कर देखिये आपको हर रोज उसके व्यक्तित्व,व्यवहार,कौशल और प्रदर्शन का एक नया और अनूठा आयाम दिखाई पड़ेगा।
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  ड़ा0हेमन्त कुमार

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सुरक्षित रखें किशोरों का जीवन

रविवार, 28 जुलाई 2013

               
देश की आबादी लगातार बढ़ती ही जा रही है।उसी अनुपात में शहरों के साथ ही हाइवे पर ट्रैफ़िक भी बढ़ता जा रहा है।और बढ़ते ट्रैफ़िक के ही अनुपात में सड़कों पर बढ़ती जा रही हैं दुर्घटनाएं।अगर आप रोज अखबार पढ़ते होंगे तो निश्चित ही खबरों में दो,चार या कभी कभी ज्यादा संख्या रहती है मार्ग दुर्घटनाओं की। और सबसे बड़ी चिन्ता और दुख का विषय यह है कि इन दुर्घटनाओं से होने वाली मौतों में बड़ी संख्या रहती है टीनेजर्स यानी किशोरों की।यानी वो बच्चे जिन्होंने अभी अपने जीवन की उड़ान भरने के लिये पंख खोले ही थे।वो बच्चे जिन्हें अभी बहुत लम्बी दूरी की उड़ान भरनी थी।वो बच्चे जिन्हें जीवन में बहुत कुछ करना था। जिनकी बहुत सारी हसरतें थीं।जिन्होंने अपने जीवन के लिये बड़े बड़े सपने देखे थे। और जिनको लेकर उनके अभिभावकों ने भी कितने ही सुनहरे सपने बुने होंगे।
                  
 इन दुर्घटनाओं के शिकार बच्चों में ज्यादातर दुपहिया वाहन यानी बाइक या स्कूटर सवार रहते हैं और बिना हैल्मेट वाले।यहां सवाल यह उठता है कि इन बच्चों की असमय मौत का जिम्मेदार कौन है।इस सवाल का सीधा सा जवाब कोई भी पढ़ा लिखा व्यक्ति दे सकता है कि सड़कों पर बढ़ती स्पीड या ट्रैफ़िक पर से हटता जा रहा नियंत्रण या फ़िर बहुत सारे लोग इसका दोष व्यवस्था और प्रशासन के मत्थे भी थोपने लगेंगे।उनकी यह सोच भी काफ़ी हद तक सही है।प्रशासन भी जिम्मेवार है इसका। परन्तु पूरी तरह से नहीं। यहां कुछ जिम्मेदारी हमारी भी है। आप पूछ सकते हैं कि कैसे भाई ?हम इसके लिये क्यों जिम्मेदार हैं?
         बहुत सीधा सा जवाब है इस प्रश्न का।क्या आप,हम अपने बेटे को उसके जन्मदिन या कालेज में अव्वल दर्जे में पास होने की खुशी में उसे बाइक या स्कूटर की चाभी पकड़ाते समय उसकी उम्र या शारीरिक क्षमता पर ध्यान देते हैं?क्या हम उससे कभी कहते हैं कि बिना हैल्मेट लगाए बाइक मत चलाना,दोस्तों के साथ रेस मत लगाना,या स्टंट मत दिखाना।शायद कभी नहीं। बस आपने उसे नई गाड़ी की चाभी दी और साहबजादे फ़ुर्र।बच्चा भी खुश और हम भी खुश।उस समय किसे ध्यान है हैल्मेट,स्टंट और रेस का। जी हां,यह एक कड़वी सच्चाई है। हमारी और सभी अभिभावकों की गलती की। और हमें सारी बातें,सारे कानून,ट्रैफ़िक रूल्स तब याद आते हैं जब कोई अनहोनी हो जाती है। पर तब तक बहुत देर हो चुकी रहती है।
      हम अगर ध्यान दें तो सड़कों पर फ़र्राटा भरने वाले बाइक सवारों में बड़ी संख्या ऐसे किशोरों की भी होती है जो अभी कानूनी तौर पर बाइक या तू व्हीलर चलाने के हकदार नहीं होते।जिनके पास ड्राइविंग लाइसेंस या तो होता ही नहीं या फ़िर फ़र्जी तरीके से गलत डेट आफ़ बर्थ डाल कर दलालों के माध्यम से बनवाया गया होता है। और इस फ़र्जीवाड़े में भी हम उस बच्चे का पूरा साथ देते हैं।भविष्य में आने वाली विपत्तियों को नजर अन्दाज करते हुये। और अपनी इस गलती को हम यह तर्क देकर ढंकने की कोशिश करते हैं कि भाई जमाना ही आज यह कर रहा है। तो हमने कौन सी गलती कर दी।
      हमारी इस सोच के पीछे है भेड़ चाल चलने की आदत। हर समाज में लोगों को भेड़ चाल चलने की आदत होती है। हमारे देश में यह कुछ अधिक ही है। हम सब भी इसी देश और समाज के अभिन्न अंग हैं।होता यह है कि बच्चे के हाई स्कूल या इण्टर का इम्तहान नजदीक आते ही हम उसे लालच देने लगते हैं कि बेटा इतने परसेंट नम्बर लाओ तो युम्हें बाइक दिलवा देंगे।बच्चा मेहनत करके आपके मन मुताबिक नम्बर ले आया। अब उसे बाइक देना तो हमारी मजबूरी बन गई। या फ़िर बच्चे के दोस्तों ने बाइक ले ली और वह भी जिद कर बैठा।अब घर में सुबह शाम,हफ़्तों की बहस,पत्नी की जिद,बहनों की मिन्नतें---और आप पिघल गये।किसी तरह कर्ज लेकर बाइक की चाभी पकड़ा ही दी बच्चे के हाथों में।
                और ऐसी ही घरेलू परिस्थितियों,लाड़ प्यार ने आज सड़कों पर फ़र्राटा भरने के लिये आज किशोरों को आजाद छोड़ दिया है।बिना उन्हें यह सिखाये कि गाड़ी धीरे चलायें,हैल्मेट लगाकर चलें और ट्रैफ़िक के नियमों का पालन करें। और नतीजा अखबारों में रोज ही दो चार दुर्घटनाओं की खबरें। इन दुर्घटनाओं में भी ज्यादा गलती इन्हीं किशोरों की।क्योंकि एक बार बाइक पर बैठने के बाद न उनका नियन्त्रण बाइक पर रहता है न ही मन पर ।वो बाइक चलाते समय खुद को जान अब्राहम य रित्विक रोशन समझते हैं और यहां की सड़कों को मुम्बई-पुने हाइवे। हैल्मेट तो वे फ़ैशन के तौर पर हाथ या बाइक में लगे हुक में लटका देते हैं इस पर भी सोने में सुहागा यह हो जाता है कि मोबाइल का इयर फ़ोन कान में लगा कर तेज म्युजिक का आनन्द लेना भी वो नहीं भूलते। भले ही पीछे आती कार या ट्रक के हार्न की आवाज उन्हें न सुनाई पड़े।
               जरा सोचिये हम सभी अपने परिवार और खासकर बच्चों से कितना प्यार करते हैं।यह मानव स्वभाव है।इसे हम बदल भी नहीं सकते।लेकिन उन परिस्थितियों को जिनसे मजबूर होकर हम अपने बच्चों को खतरनाक तेज गति वाले दुपहिया वाहन पकड़ा देते हैं,बदलना तो हमारे हाथ में है। क्या उसका यह शौक हम तब तक के लिये नहीं टाल सकते जब तक कि उसे वाहन के साथ ही उसकी गति पर नियंत्रण रखना सीख जाय।क्या हम उसे बर्थडे या अन्य किसी खुशी के मौके पर बाइक से नीचे का कोई छोटा उपहार देकर अपना प्यार नहीं जता सकते?या उसे यह नहीं समझा सकते कि बेटा कुछ और बड़े हो जाओ तब तुम्हारे लिये  बाइक खरीद देंगे।
   इन सबके बावजूद भी मान लीजिये आपको अपने बेटे की जिद,परिवार,समाज के दबावों के आगे झुक कर मजबूरी में भी अपने बच्चे के लिये दुपहिया वाहन खरीदना ही पड़ता है तो कुछ बातों पर ध्यान रखकर और उसे कुछ हिदायतें देकर आप और हम उसके जीवन को सुरक्षित रख सकते हैं।
                                  
  • सबसे पहले बच्चे को अच्छी तरह ट्रैफ़िक के नियम और चिह्नों,संकेतों से परिचित करा दें।
  • उसे यह बात समझाएं कि हैल्मेट उसकी जीवन की सुरक्षा के लिये है न कि फ़ैशन दिखलाने या हैण्डिल में लटकाने के लिये।
  • बच्चा जब तक 18वर्ष की उम्र का न हो जाय उसे अकेले बाइक/स्कूटर न चलाने दें। आप उसके पीछे बैठ कर साथ में जाएं। इससे गति को वह नियन्त्रित रखना सीखेगा। और कहीं गलती करने पर आप उसे समझा सकेंगे।
  • बच्चे को कभी बिना हैल्मेट पहने वाहन न चलाने दें।
  • उसे वाहन की पूरी मशीनरी और कल पुर्जों से परिचित कराएं ताकि वह उन्हें समझ कर उन पर नियन्त्रण रख सके।
  • बच्चे को यह तथ्य अच्छी तरह समझा दें कि शहर के भीड़ वाले ट्रैफ़िक में थोड़ी थोड़ी दूर पर आने वाले चौराहों और सिग्नल्स के कारण 80कि मी की रफ़्तार और 40किमी की रफ़्तार में चलने वाले दो व्यक्तियों के गन्तव्य पर पहुंचने में मुश्किल से दो चार मिनट का अन्तर आयेगा। इसलिये जान जोखिम में डालने की जगह धीमी गति से चलना ज्यादा फ़ायदेमन्द रहेगा।
  • बच्चे को समझाएं कि कान पर मोबाइल या म्युजिक का इयरफ़ोन लगाकर कभी वाहन न चलाये।
  • उसे बतायें कि मध्यम गति से चलने पर वह पेट्रोल की बचत भी करेगा।
  • उसे समझायें कि दोस्तों के उकसाने पर भी वह बाइक की रेस न लगाये,न ही स्टण्ट करने की कोशिश करे।  
  • और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि बच्चों को अच्छी तरह समझाएं कि मानव जीवन अनमोल है।यह हमें बस एक बार मिलता है।इसे बहुत सम्हाल कर रखना होगा।
                   ये कुछ ऐसे बिन्दु हैं जिन पर विचार कर इन पर अमल करके हम सभी अपने प्यारे और होनहार बच्चों का जीवन सुरक्षित करके उन्हें लम्बी उम्र प्रदान कर सकते हैं।
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डा0हेमन्त कुमार

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समय की आवश्यकता है----पाठ्यक्रम में रंगमंच

शनिवार, 11 मई 2013


               
 प्रसिद्ध नाटक "कहानी तोते राजा की"
का एक दृश्य
इसे सामाजिक विडम्बना ही कहा जाएगा कि आज भी हम बच्चों को शिक्षा के साथ-साथ उनके सर्वांगीण विकास के लिये पर्याप्त अवसर उपलब्ध नहीं करा पाते हैं।यह लोकतन्त्र की प्राथमिक आवश्यकता है और हमारा राष्ट्रीय धर्म भी। आज बच्चों को स्कूलों में हर विषय की शिक्षा देने का प्राविधान है।जिसमें संगीत, नृत्य, चित्रकला,खेल-कूद और कम्प्यूटर जैसे विषय सम्मिलित हैं।इन विषयों के लिये स्कूलों में अलग से शिक्षक भी हैं,और अध्ययन की सुविधा भी। परन्तु एक विषय की ओर अभी तक विद्यालयों में ध्यान नहीं दिया जा रहा है। वह है पंचम वेद के नाम से जाना जाने वाला नाट्यशास्त्र यानि रंगमंच और रंग कर्म। इसे आसान बोलचाल की भाषा में नाटक या थियेटर भी कह सकते हैं।
             मनोवैज्ञानिकों और समाजशास्त्रियों के अनुसार बच्चों के सर्वांगीण विकास में रंगमंच का एक बहुत बड़ा योगदान है।यही वह माध्यम है जिसके द्वारा बच्चा एक बड़े समुदाय के साथ जुड़ सकता है।जन सामान्य के सामने अपने को प्रस्तुत करने की उसकी झिझक दूर होती है और उसकी वाक शक्ति का विकास होता है। उसके अंदर समूह में कार्य करने के साथ ही नेतृत्व की क्षमता भी विकसित होती है।
            शिक्षा में रंगमंच की अवधारणा कोई नई बात नहीं है। इसकी आवश्यकता का अनुभव सर्व प्रथम यूरोप में किया गया। जहां सन 1776 में मैडम जेनेसिस ने “थिएटर आफ़ एजूकेशन” की स्थापना की और बच्चों को प्रशिक्षित करके नाटकों का मंचन किया। इस प्रकार रंगमंच को शिक्षा में लाने की शुरुआत हुई। हमारे देश में भी समय के साथ इसकी आवश्यकता महसूस की गयी। और सन 1965 में शैक्षिक रंगमंच की शुरुआत हुयी।किन्तु यह प्रयास मात्र चर्चाओं और गोष्ठियों का विषय बन कर रह गया। वर्ष 1980 के बाद संगीत नाटक अकादमी,राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और भारतेन्दु नाट्य एकेडमी की ओर से किये गये प्रयासों से कुछ चेतना तो आई पर वह अपना कोई स्वरूप नहीं बना पाया।
             बच्चे किसी भी देश के भविष्य होते हैं।बचपन से ही यदि उनमें रंग संस्कार पड़ जायें तो यह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उनके सर्वांगीण विकास में सहायक होगा।इस माध्यम से बच्चों में कल्पना शक्ति,वाक्शक्ति,अनुभूति प्रदर्शन,अभिव्यक्ति की क्षमता,चलने फ़िरने का ढंग,नेतृत्व क्षमता एवं व्यक्तिगत कौशल का विकास होता है।रंगमंच बच्चों को जिम्मेदार बनाता है।उनमें अनुशासन के साथ साथ समयबद्धता के गुण लाता है। यही वो तत्व हैं जो लोकतन्त्र की नींव हैं और बच्चों को एक जिम्मेदार नागरिक बनाते हैं।परन्तु यह देखकर दुख होता है कि इस विधा का जितना लाभ बच्चों को मिलना चाहिये उतना लाभ बच्चे उठा नहीं पा रहे हैं।मात्र गर्मी की छुट्टियों और विद्यालयों के वार्षिक उत्सवों तक बाल रंगमंच को सीमित करके कहीं हम उनके विकास में बाधक तो नहीं बन रहे हैं? यह एक चर्चा का विषय है।
          बाल रंगमंच प्रशिक्षक के नाते यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि जो नाटक बच्चों के लिये मंचित किये जाते हैं,उन्हें बच्चे बड़ी ही रुचि से देखते हैं।यदि नाटक बच्चों की मानसिकता को ध्यान में रखकर लिखा गया है तो बच्चों पर उसका प्रभाव पड़ेगा ही,क्योंकि बच्चों में अनुकरण की अपूर्व शक्ति होती है। दृश्य एवं श्रव्य –दोहरा माध्यम होने के कारण इसका प्रभाव भी दोहरा होता है। वर्तमान समय में व्यक्ति परिवार और समाज की व्यस्तताएं कुछ ज्यादा ही बढ़ गयी  हैं। जिसके कारण कदम-कदम पर भटकाव बढ़ रहा है। सामाजिक परिवेश प्रदूषित सा हो रहा है।टेलीविजन और इण्टरनेट संस्कृति का दुरुपयोग हमें अपसंस्कृति की ओर ले जा रहा है।इसका प्रभाव बच्चों पर कुछ ज्यादा ही पड़ रहा है। ऐसे में बाल रंगमंच जैसे सार्वजनिक और सशक्त माध्यम की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। बच्चों की इसमें सीधी सहभागिता होने के कारण बच्चों में आत्मविश्वास,सृजनात्मक क्षमता,संवेदनशीलता और टीम वर्क की भावनाएं स्वतः ही जागृत हो जाती हैं। अपनी वाक्शक्ति के प्रदर्शन से वे आत्मविश्वास से भर जाते हैं।कभी-कभी यह भी देखा गया है कि कुछ ऐसे बच्चे जिनमें हकलाहट की समस्या थी थियेटर ज्वाइन करने के बाद उनकी समस्या खतम हो गयी। उनमें खोया हुआ आत्म विश्वास वापस आ गया। ऐसे  बच्चों में एकाग्रता,स्मरण शक्ति भी बढ़ती है। उनमें एक आंतरिक अनुशासन आता है। यह जागरूकता उन्हें अपने समय और परिवेश के साथ सीधे जोड़ने का काम करती है।
       एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि बच्चा 6 वर्ष की आयु तक 40 प्रतिशत और 18 वर्ष की आयु तक 80 प्रतिशत संस्कार ग्रहण कर लेता है। और ये संस्कार उस बच्चे के साथ जीवन भर चलते हैं।केवल 20 प्रतिशत संस्कार ही आगे जुड़ते हैं या परिवर्तित होते हैं। बच्चों द्वारा खेले जाने वाले बाल मनोविज्ञान पर आधारित नाटक ही सही मायनों में बाल रंगमंच कहलाता है।जटिल से जटिल विषयों को भी रंगमंच के माध्यम से आसानी से समझाया जा सकता है। बाल रंगमंच के विकसित न हो पाने का एक कारण और भी है। अधिकांश माता पिता रंगकर्म को पढ़ाई से अलग मानकर उसे पढ़ाई में बाधा मानते हैं। सारा माहौल पढ़ाई और कैरियर पर ही केन्द्रित रहता है। ऐसे में रंगमंच जैसे माध्यम को समझने या अपनाने की न तो कोई इच्छा होती है और न ही इसके लिये अलग से कोई समय।
                बाल रंगमंच का व्यापक और प्रभावी विकास तभी हो सकता है जब इसे स्कूली पाठ्यक्रम और शिक्षा से अनिवार्य रूप से जोड़ा जाए। इसकी उपादेयता को स्वीकार तो सभी करते हैं पर शासन द्वारा इस दिशा में कोई प्रयत्न न किये जाने के कारण बात आई-गई रह जाती है।
          विगत दो दशकों से बाल रंगमंच के प्रति लोगों का रुझान बढ़ा है। जागरूकता भी आई है। पर यह केवल कुछ बड़े शहरों तक ही सीमित है। यदि बाल रंगमंच की संभावनाओं को कुछ अधिक व्यावहारिक आधार मिले तो इसका विकास निश्चित ही सम्भव है। इसके लिये शासन,विद्यालय,अभिभावक तथा रंगकर्मियों को मिलकर कुछ ठोस सामूहिक प्रयास कर अपने दायित्व निभाने होंगे।
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अभिनव पाण्डेय
मोबाइल-07275866955
युवा रंगकर्मी अभिनव पाण्डेय ने भारतेन्दु नाट्य एकेडमी,लखनऊ से रंगकर्म सीखा है।अभिनव पाण्डेय ने कई टी0वी0 सीरियल्स में सहायक निर्देशक का कार्य करने के साथ ही कुछ डाक्युमेण्ट्री फ़िल्मों का भी निर्माण किया है। टी वी से जुड़ने के बावजूद इनका मन और दिल रंगकर्म में अधिक बसता है,खासकर बच्चों के साथ काम करना इन्हें अधिक प्रिय है। दिल्ली,पुणे, लखनऊ,मुम्बई में काम करने के बाद फ़िलवक्त कानपुर में रहकर बच्चों के लिये रंगमंच  की पृष्ठभूमि बनाने का काम कर रहे हैं।
                

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उनकी दुनिया

बुधवार, 1 मई 2013


मैं बनाना चाहता हूं
एक बहुत बड़ी दुनिया
जिसका विस्तार हो
लाखों करोड़ों और अनन्त असीमित
आकाश के बराबर।

जहां हर बच्चे के हाथ में हों
रंग बिरंगे गुब्बारे
रूई और ऊन से बने
सुंदर खिलौने
हर बच्चे के कन्धों पर हो
एक बैग प्यारा सा
बैग में हों ढेरों
नई नई कहानियां
खूबसूरत दुनिया के हसीन गीत
हर बच्चे को मिल सके
पेट भर खाना।

जहां हर बच्चा
मुक्त रहे दुनिया के दुर्दान्त
बमों के धमाकों और संगीनों
भयावह सायों से
न पड़े उनके ऊपर
कोई मनहूस साया
खद्दरधारियों की लिजलिजी
और सड़ान्धयुक्त राजनीति का
और न सेंक सके
कोई भी बड़ा अपनी अपनी
रोटियां किसी मासूम की
असमय हुयी मौत पर।

जहां हर बच्चा खेल सके
सुन्दर हरे भरे मैदान में
फ़ूलों की रंग बिरंगी क्यारी के बीच
और हर बच्चे की आंखों में
तैर रहे हों
कुछ खूबसूरत
तितली के पंखों से कोमल सपने
जिनके सहारे वो बिता सके
अपना अनमोल जीवन
और महसूस कर सके
इस दुनिया में अपने वजूद को।

तो बताइये क्या आपने  भी
कोई ऐसी दुनिया बसाने
का ख्वाब अपने मन में संजोया है? 
      0000
हेमन्त कुमार

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पहली बारिश में

सोमवार, 22 अप्रैल 2013



मौसम की पहली बारिश में जब
जमीन की देह भाप बनकर
उड़ती है
खुशबू से तर हो जाती है हवा
धुआंसा आकाश
खिड़की पे बेचैन उतर आता है।

दस्तक देते हैं झकोरे
हल्की टकोर जिस्म को
नदी बना देती है
रसमसाती है इक आदिम चाहना
रगो-रेश में
बेहया इरादे जगते हैं
देर तक।

मेंहदियां गंध में
भींगता है आंगन
उतरकर लहू में
घुलती है शाम
शराब बन जाती है
महुआ सी फूलती है
वर्जित इच्छाएं।

अंखुआती है देह पर कोंपलें
अनवरत
पाप के
फरेब के इस मौसम में
मुझे तुम,
बस तुम याद आते हो !
0000
कवियत्री—जयश्री राय
        
जयश्री राय हिन्दी की चर्चित कहानीकार हैं।गोवा युनिवर्सिटी से हिन्दी साहित्य में पोस्ट ग्रेजुएशन।हिन्दी की लगभग सभी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में कहानियां,कविताएं प्रकाशित। “औरत जो नदी है”(उपन्यास), “तुम्हें छू लूं जरा”, “अनकही”(कहानी संग्रह), “तुम्हारे लिये”(कविता संग्रह), “साथ चलते हुए”  नवीनतम उपन्यास प्रकाशित। कुछ समय तक अध्यापन कार्य।सम्प्रति स्वतन्त्र लेखन।
ई-मेल—jaishreeroy@ymail.com



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घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का------

शनिवार, 9 मार्च 2013


      स्कूलों में जाकर अक्सर अभिभावक यह शिकायत करते हैं कि उनके “बच्चे का मन पढ़ाई में लगता ही नहीं है।” या कि “मास्साब आप कैसे पढ़ाते हैं कि इसे कुछ याद ही नहीं रहता।”कभी कभी यह भी शिकायत करते हैं कि “ आप इसे होमवर्क नहीं देते इसीलिये यह घर पर कुछ पढ़ता ही नहीं।” कुछ अभिभावकों को मैंने यह भी कहते हुये सुना है कि “अरे फ़लां स्कूल---अब तो बेकार हो चुका है—कभी होती थी वहां भी अच्छी पढ़ाई--- अब तो बस उस स्कूल का नाम भर रह गया है।”
       यानी कि बच्चा घर में पढ़े न,उसका मन पढ़ने में न लगे,वह हमेशा टी0वी0 से चिपका रहे,खेलता रहे -----इन सब की जिम्मेदारी स्कूल की और मास्साब की। अभिभावक ने ले जाकर स्कूल में नाम लिखा दिया और उनकी जिम्मेदारी खत्म।अब बच्चे के पढ़ने,विकसित होने,अच्छे नंबर लाने सबका दारोमदार मास्टर जी के ऊपर।
          यहां सवाल यह उठता है कि क्या बच्चों के पढ़ाने,लिखाने की अभिभावक या मां बाप की कोई जिम्मेदारी नहीं है?क्या उनकी जिम्मेदारी बस बच्चे को स्कूल तक पहुंचाने की है?जबकि बच्चा स्कूल में 24घण्टों में से सिर्फ़ 5-6 घण्टे रहता है। बाकी के 18घण्टे वो आपके साथ बिताता है। स्कूल तो एक जगह भर है जहां उसे शिक्षा का एक रास्ता बताया जाता है। सीखने सिखाने की एक प्रक्रिया से परिचित करा कर ज्ञान के एक अथाह समुद्र की तरफ़ बढ़ाया जाता है। ज्ञान के इस समुद्र में बच्चे को तैरना सिखाया जाता है। अब इस अथाह समुद्र के नये तैराक को एक कुशल,बेहतरीन तैराक बनाने में शिक्षकों के साथ अभिभावकों की भी बहुत बड़ी भूमिका होती है। जब तक वो अपनी भी जिम्मेदारियां नहीं निभायेंगे बच्चा ज्ञान के सागर का एक कुशल तैराक नहीं बन पायेगा।पढ़ने लिखने में आगे नहीं बढ़ सकेगा।
 क्या जिम्मेदारियां हैं एक अच्छे अभिभावक की----- ?
                                            बच्चे को पढ़ने लिखने के लिये सबसे जरूरी चीज है अच्छे और खुशनुमा माहौल की। स्कूल में भी और घर पर भी। खुशनुमा माहौल का मतलब है ऐसा माहौल जिसमें बच्चा सहज ढंग से शान्तिपूर्ण वातावरण में पढ़ लिख सके। उसके ऊपर किसी तरह का मानसिक दबाव न हो। वह संकुचित या भयभीत न रहे। वह अपने मन में उठने वाले प्रश्नों को आपसे बिना किसी संकोच के पूछ सके। माना कि ऐसा वातावरण उसे स्कूल में अध्यापकों की कृपा और सहयोग से मिल जाता है। लेकिन क्या हम उसे घर पर ऐसा माहौल दे पा रहे हैं? अगर दे रहे हैं तो बहुत अच्छा है। यदि नहीं तो क्यों? और साथ ही हमें यह भी विचार करना पड़ेगा कि हम अपने घर का कैसा माहौल बनायें जिसमें बच्चा अच्छे ढंग से पढ़ लिख सके। यहां मैं कुछ ऐसे ही महत्वपूर्ण बिन्दुओं की ओर इंगित करूंगा जिन पर ध्यान देकर आप घर का वातावरण बच्चों की पढ़ाई के अनुकूल बना सकते हैं।
*शान्तिपूर्ण माहौल—
 बच्चों को पढ़ने के लिये सबसे जरूरी शन्तिपूर्ण माहौल होता है। बच्चों की पढ़ाई के  समय उनके पढ़ने की जगह पर तेज आवाज में बातचीत न करें। टी0वी0,रेडियो धीमी आवाज में बजायें। यदि उनके पढ़ने के समय में घर में कोई मेहमान आ जाता है तो कोशिश करें कि बच्चे की पढ़ाई डिस्टर्ब न हो। मेहमानों को आप दूसरे कमरे में बैठा कर उनका स्वागत कर सकते हैं।
*समय का निर्धारण---
  स्कूल के अलावा बच्चे 18घण्टों का जो समय आपके साथ बिताते हैं उनका सही उपयोग करना बच्चों को आप ही सिखला सकते हैं। इसके लिये यह जरूरी है कि आप अपने बच्चे के लिये एक संक्षिप्त टाइम टेबिल बनायें। जिसमें उसके सुबह उठने,स्कूल जाने,खेलने कूदने,मनोरंजन ,पढ़ाई और सोने का समय निर्धारित हो। यह जरूरी नहीं कि आपका बच्चा एकदम उसी समय सारिणी पर चले। जरूरत पड़ने पर उसमें आप या बच्चा फ़ेर बदल भी कर सकते हैं। लेकिन इससे उसके अंदर काम को समय पर और सही ढंग से करने की आदत पड़ेगी।
*टी0वी0,कम्प्युटर का समय निश्चित करें---
 आजकल बच्चों का ध्यान सबसे ज्यादा टी0वी0,वीडियो गेम्स और कम्प्युटर में लगता है। आप इससे उन्हें पूरी तरह रोक नहीं सकते।क्योंकि आज तो इलेक्ट्रानिक माध्यमों का ही युग है। इनके बिना वह बहुत सारे ज्ञान और सूचनाओं से वंचित रह जाएगा। लेकिन इस पर बहुत ज्यादा समय देना भी स्वास्थ्य की दृष्टि से उचित नहीं है। इसलिये अपने बच्चों को इन माध्यमों के फ़ायदों और हानियों से परिचित करा दें।
तथा इनके उपयोग का समय भी तय कर दें। जिससे वह अपना समय अन्य गतिविधियों को भी दे सके।
*खुद भी पढ़ें---
   बच्चों को पढ़ाई के लिये उचित माहौल देने के लिये यह बहुत जरूरी बिन्दु है। क्योंकि बच्चे बहुत सी बातें अनुकरण से भी सीखते हैं। आप को कोशिश यह करनी चाहिये कि आप बच्चों के पढ़ने के समय में खुद भी अपनी रुचि की कोई पुस्तक,पत्रिका या अखबार पढ़ें। आपको पढ़ता देखकर बच्चे के अंदर भी पढ़ाई के प्रति रुचि जागृत होगी। उसे यह महसूस होगा कि मेरे पिता या मां भी मेरे साथ पढ़ रहे हैं।
*कुछ बाल पत्रिकाएं और रोचक बाल साहित्य बच्चों को दें----
       हर भाषा में आजकल हर उम्र के बच्चों के लिये बहुत सी पत्रिकाएं बाजार में उपलब्ध हैं। आप अपने बच्चे की आयु के अनुरूप कुछ बाल पत्रिकाएं घर में लायें। उनसे बच्चों का मनोरंजन तो होगा ही,उनके ज्ञान में बढ़ोत्तरी भी होगी। क्योंकि इन पत्रिकाओं में सिर्फ़ कहानी,कविता ही नहीं बल्कि बच्चों के लिये ढेरों सामग्री रहती है। जैसे चित्रों में रंग भरने,वर्ग पहेली,च्त्र देखकर कहानी लिखने,वाक्य पूरा करने,आदि के अभ्यास इनसे बच्चे की बुद्धि तीव्र होने के साथ उसका मनोरंजन भी होगा। और पत्रिकाओं में सामग्री की विविधता के कारण उसकी पढ़ने में रुचि भी  जागृत होगी।
          यहां कुछ अभिभावक यह प्रश्न उठा सकते हैं कि बच्चों के ऊपर वैसे ही बस्ते का इतना बड़ा बोझ है। उसमें ये पत्रिकायें या बाल साहित्य---?उनके प्रश्न का सीधा सा जवाब यह है कि जैसे आप आफ़िस में अपने काम से ऊबने लगते हैं तो क्या करते हैं?दोस्तों से गप शप,टहलना घूमना।फ़िर तरोताजा होकर अपना काम शुरू कर देते हैं। ठीक वैसे ही बच्चों की ये पत्रिकाएं या बाल साहित्य,बच्चों के लिये थोड़े समय का मनोरंजन का काम करेगा। यानि कि वो कुछ समय के लिये कोर्स की किताबों से हट कर ज्ञान के ऐसे संसार में जायेंगे जहां उन्हें ज्ञान और मनोरंजन दोनों मिलेगा।जहां उनकी कल्पनाओं के भी पंख लगेंगे। उन्हें आनन्द की अनुभूति होगी।
*बच्चों को घर पर ही कभी कभी रोचक शैक्षिक फ़िल्में दिखाएं---
   आज तो पढ़ाई में भी इलेक्ट्रानिक माध्यमों का वर्चस्व होता जा रहा है। पत्रिकाओं की ही तरह बाजर में हर कक्षा,हर विषय की पाठ्यक्रम आधारित या पूरक कार्यक्रमों की सी0डी0 उपलब्ध हैं। यद्यपि इनकी संख्या अभी उतनी नहीं है जितनी होनी चाहिये। आज हर घर में टी0वी0 और सी0डी0प्लेयर भी मौजूद हैं। आप बच्चों के लिये उनकी कक्षा के अनुरूप शैक्षिक फ़िल्मों या इण्टरैक्टिव(ऐसे कार्यक्रम जिसमें बच्चे के लिये भी काफ़ी कुछ करने की गुंजाइश रहती है।) कार्यक्रमों की सी0डी0लाकर बच्चों को दिखायें। इनसे भी बच्चों  के अंदर पढ़ने की रुचि पैदा होगी।
         ये कुछ ऐसी छोटी छोटी बातें हैं जिन पर ध्यान देकर इन्हें अपनाकर आप अपने घर का माहौल बच्चों की पढ़ाई लिखाई के अनुरूप बना सकते हैं बच्चों के अंदर पढ़ने लिखने की रुचि जगा सकते हैं। उन्हें यह महसूस करा सकते हैं कि उनके पढ़ने की जगह सिर्फ़ स्कूल में ही नहीं बल्कि घर पर भी है।
                                 

डा0हेमन्त कुमार

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मंगलवार, 20 नवंबर 2012


कीमत

पुरस्कार
सम्मान
मरणोपरान्त……परमवीर चक्र
और अब मुआवजा……शोक संवेदना पत्र,
ये पांच शब्द ईजाद किये हैं
हमारी संसद ने
पिछले पैंसठ सालों में
भूख से कुलबुलाती  अंतड़ियों का
पेट भरने के लिये।

फ़िक्स कर दिया है रेट
हमारी संसद ने
देश की जनता के
हर काम हर कुर्बानी
उनके साथ घटने वाली
घटनाओं,दुर्घटनाओं और
हादसों का।

लिखने पर किसी खद्दरधारी की
यशोगाथा
मिलेगा सम्मान या
पुरस्कार अंगवस्त्रम
पत्रं पुष्पं और रूपये इक्यावन हज़ार
कारगिल में शहादत पर
मिलेगा मरणोपरान्त चक्र
और छोड़ दिया जायेगा परिवार
राम भरोसे/सड़क पर भटकने को।

मरने पर किसी दुर्घटना/बिल्डिंग कोलैप्स
या किसी मेले की भगदड़ में
परिवार को मिलेंगे रुपये
दो,एक लाख या फ़िर पचास हजार।

अगर गलती से भी मौत
हो जाती है किसी युवक की
नौकरी खोजने के दौरान
किसी सेप्टिक टैंक में गिरने
या धूप में बेहोश होने से
(कहने को—असली वजह है भूख)
तो मृतक के परिवार को मिलेंगे
रूपये पच्चीस हजार
नगर प्रशासन से,
और पचास हजार
प्रधानमंत्री सहायता कोष से।

इन सब से भी अलग
अगर आप मर जाते हैं
किसी थू थू/धिक्कार
या शक्ति प्रदर्शन रैली के दौरान
प्लेटफ़ार्म पर मची भगदड़ में
ट्रक पलटने अथवा
मंच ढहने पर उसके नीचे दबकर
तो
इत्मिनान रखिये आप
आपके शवदाह का खर्च भी
परिवार वालों को नहीं उठाना होगा
आपका शव
बहा दिया जाएगा किसी नदी में
या दफ़ना दिया जाएगा कब्रिस्तान में
क्योंकि आपके शव की शिनाख्त ही
नहीं हो सकी थी
फ़िर कुछ दिनों के बाद
आपके परिवार को मिलेगा
रैली की आयोजक पार्टी
की ओर से
सिर्फ़ एक शोक संवेदना पत्र।

अब ये
तय करना है आपको
कि आपको कौन सी मौत चाहिये
हमारी संसद तो
हर तरह से तैयार है।
0000
हेमन्त कुमार


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बैग में क्या है---?

शुक्रवार, 10 अगस्त 2012

    (हिन्दी में बच्चों को लेकर कविताएं बहुत ज्यादा नहीं हैं।बहुत कम रचनाकार बच्चों को अपना विषय बनाते हैं या फ़िर उनके अन्तर्मन में झांकने की कोशिश करते हैं। जबकि आज बच्चों की हालातों के बारे में हम सभी को सोचना लिखना चाहिये। आज मैं शैलजा पाठक की एक ऐसी ही कविता प्रकाशित कर रहा हूं।       
      मुंबई---महानगर—कक्षा सात में पढ़ने वाली एक मासूम लड़की की आत्महत्या की खबर किसी भी संवेदनशील मन व्यक्ति को विचलित और उद्वेलित कर देगी।इस घटना ने शैलजा पाठक के अन्तर्मन को कितना अधिक व्यथित किया था ये बात हम उनकी इस कविता में देख सकते हैं--- )


बैग में क्या है?
बिस्कुट है पानी है
परियां हैं कहानी है
(बच्चे इतना ही जानते हैं चाहते हैं)
लेकिन बैग में इनके
बिखरा सा भारत है
नदियां हैं झरने हैं
नेता के धरने हैं
बैग में मेरे
मम्मी के सपने हैं
टीचर का गुस्सा है
नम्बर हैं अक्षर हैं
पीठ पर भार सा
बिजली के तार सा
सहमा हुआ चिपका हूं
बैग के अंदर तो
आगे की सोच है
छूने से डरता हूं
हमको भी कहने दो
अपनी सी करने दो
मैं तुम्हारी जिन्दगी हूं
पर मेरी भी जिन्दगी है
जी नहीं पाऊंगा जो तुम यूं करोगे
कब कहूं कि बोझ है ये
थक गया हूं
कब कहूं कि चाहता कुछ और हूं मैं
मैं बता सकता हूं अपने मन की तुमसे
तुम जरा सा वक्त दो मुझको सुनो तुम
रोपते क्यों हो
नहीं है जिंदगी जिसमें हमारी
थोपते क्यों हो ये मुझ पर
जो नहीं बनना है मुझको
चाहते हो क्यों वही
जो दे नहीं सकता हूं तुमको
नन्हीं सी आंखों में
भविष्य का बोझ मत थोपो
अंकुर हूं पनपने से पहले
मौत की गोद में मत सौंपो------।
0000

शैलजा पाठक

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48 घण्टों का सफ़र-----

शनिवार, 4 अगस्त 2012


(काफ़ी पहले लिखी गयी कविता,जब मैं किसी सरकारी यात्रा पर था और पहली बार अपनी एक साल की बेटी से दो दिन अलग रहा था।)
नहीं आ रही कोई दस्तक
बाथरूम के दरवाजे पर
न बर्तनों की उठा पटक का शोर
न नन्हें कदमों के भागने की ध्वनि
न भू-भू की आवाजें।
सब कुछ शान्त होकर
सिमट गया है
मेरे व्यवस्थित सुसज्जित
अभेद्य सन्नाटे का कवच पहने हुये
कमरे के कोने में
पड़ी हुई गेंद के भीतर
पिछले 48 घण्टों से।
गली में गुब्बारे वाला
आवाज लगा कर
वापस लौट गया
सामने बालकनी में
छोटा पामेरियन उदास बैठा है
थम गयी है चीं चीं की आवाजें
बाहर टेरेस पर।
नहीं हुआ कोई प्रयास
आल्मारी में करीने से सजी
किताबों को फ़ाड़ने का
पिछले 48 घण्टों से।
ऐसा महसूस हो रहा है
अचानक होगा अभी कोई धमाका
फ़ूट जाएगी गेंद
टूट जाएगा सन्नाटे का
अभेद्य कवच
कमरा हो जाएगा
फ़िर पहले की तरह गुंजायमान।
अचानक दो नन्हें कोमल हाथ
खींचेंगे मेरे बाल
और सुनाई पड़ेगी
एक मीठी कोमल आवाज
पापा सू सू आई----।
000
हेमन्त कुमार 

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मां का दूध अमृत समान

शुक्रवार, 3 अगस्त 2012


अपने बच्चे को स्तनपान कराने में मां एवं बच्चे दोनों को जिस सुख का अनुभव होता है उसे शब्दों में नहीं व्यक्त किया जा सकता है। उस अलौकिक सुख को या तो स्तनपान कराने वाली मां समझ सकती है या फ़िर वह अबोध शिशु। इस सुख से भी बढ़कर शिशु के विकास में भी स्तनपान की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है।उसके शरीर की वृद्धि,पोषण और मानसिक विकास भी इससे प्रभावित होता है। इसका कारण यह भी है कि दुनिया में आने के बाद शिशु को सबसे पहला आहार मां के दूध के रूप में मिलता है। यह आहार प्रकृति द्वारा शिशु को दिया गया एक ऐसा सम्पूर्ण आहार है जो कि उसे इस दुनिया में रहने,विकसित होने और बाहर के जीवाणुओं,बीमारियों से लड़ने की शक्ति भी प्रदान करता है।
             चूंकि पैदा होते ही शिशु को पहला चेहरा मां का ही दिखता है,सबसे पहले वह मां से ही परिचित होता है शायद इसी लिये प्रकृति ने स्वाभाविक रूप से मां के शरीर के माध्यम से ही उसे यह आहार देने की व्यवस्था भी कर दी है।
           लेकिन दुख की बात यह है कि स्तनपान के विषय में युवा माताओं एवम पिताओं को बहुत कम जानकारियां हैं। इसी लिये हम यहां स्तनपान से संबन्धित कुछ जरूरी बातें बता रहे हैं जिन्हें हर मां,पिता के साथ ही उन नव विवाहितों को भी जानना चाहिये जिन्हें भविष्य में मां,पिता बनना है।
(1)      जन्म के तुरंत बाद स्तनपान बहुत जरूरी:
                                            बच्चा पैदा होने के बाद शुरू के दो
 तीन दिनों में मां के स्तन से निकला हुआ दूध (खीस या कोलेस्ट्रम) बच्चों के लिये अमृत की तरह होता है। यही खीस ही बच्चों के शरीर को जीवन भर रोगों से लड़ने की ताकत देने के साथ उसके सम्पूर्ण विकास में भी सहायक बनता है। “खीस” दो तीन दिनों के बाद सामान्य दूध में बदल जाता है। यदि बच्चा शुरू में ही इसे नहीं पी पाता तो जीवन भर इस अमृत से वंचित रहेगा। इसी लिये बच्चे के पैदा होने के आधे घण्टे बाद से यह खीस पिलाना शुरू कर देना चाहिये। यदि बच्चा स्तन को मुंह में नहीं लगा रहा है(कुछ बच्चे शुरू में ऐसा करते हैं) तो किसी व्यक्ति  को चाहिये कि वह इस खीस को साफ़ चम्मच में निकाल कर बच्चे को पिलाये।इसी खीस को लेकर ही शायद छ्ठी का दूध याद दिलाने का मुहावरा भी बनाया गया है।बहुत से परिवारों में यह भी कहा जाता है कि खीस गन्दा दूध होता है इसे शिशु को नहीं पिलाना चाहिये। लेकिन यह बात तमाम शोधों से साबित हो चुकी है कि खीस पीने वाले बच्चों में आगे चलकर रोग रोधी शक्ति अधिक रहती है।
(2)      स्तनपान के फ़ायदे:
                 पैदाइश के बाद पहले चारसे छ महीनों तक बच्चे का पेट मां के दूध से ही भर जाता है।उसे इसके अलावा किसी दूसरे ऊपरी आहार की जरूरत नहीं रहती। स्तनपान के कुछ और भी फ़ायदे हैं जिन्हें हर मां को जानना चाहिये----0बच्चे को जरूरत के अनुसार शुद्ध और गरम दूध मिलता है। इस दूध से उसे दस्त नहीं आता।0मां का दूध आसानी से पच जाता है,इसीलिये इससे बच्चे के पेट में गैस नहीं बनती।0सबसे बड़ी बात यह है कि मां का दूध बच्चे की रोग रोधी ताकत (रेजिस्टेंस) को बढ़ाता है।0स्तनपान से मां और उसके शिशु को जो सुख मिलता है उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।इससे बच्चे के अन्दर सुरक्षा,प्यार और खुद को विशिष्ट मानने की भावना बढ़ती है।0स्तनपान से सबसे महत्वपूर्ण और अन्तिम फ़ायदा यह है कि बच्चे को स्तनपान कराने के दौरान मां को दुबारा गर्भ धारण करने की संभावना कम रहती है।(इसका यह मतलब कदापि नहीं कि आप परिवार नियोजन के उपायों को अपनाना छोड़ दें।)
   (3)स्तनपान कैसे करायें: आज भी बहुत सी माताओं को स्तनपान कराने का सही  तरीका नहीं मालूम है। हम स्तनपान कराने के  सही तरीके को यहां बता रहे हैं----
   0 शिशु को स्तनपान कराने के पहले हाथ एवं स्तन दोनों को अच्छी तरह धो लें।अन्यथा हाथ  या स्तनों पर मौजूद मैल दूध के साथ बच्चे के शरीर में भी जायेगी,जो उसके स्वास्थ्य के लिये हानिकारक होगी।
0 बच्चे को स्तनपान हमेशा बैठ कर करायें। नहीं तो दूध बच्चे के कान या श्वास नली में जाकर उसे नुक्सान पहुंचा सकता है। पहले आप खुद व्यवस्थित ढंग से बैठ जायें। फ़िर बच्चे का सर अपनी बांह पर इस तरह रखें कि उसका सर स्तन से ऊंचा रहे। इससे उसके कान में दूध नहीं जायेगा।यदि आप दूध लेटकर ही पिलाना चाहें तो ध्यान रखें बच्चे की नाक कहीं से न दबे।
0 बच्चे को भूख के हिसाब से ही दूध पिलायें। एक बार 10-15 मिनट दूध पीकर बच्चा दो-तीन घण्टे तक भूख नहीं महसूस करेगा। दुबारा जब बच्चा चाहे तभी उसे स्तनपान करायें।
0 दूध पिलाकर बच्चे को अपने कंधे पर लिटा कर उसकी पीठ पर दो-तीन हल्की थपकियां दें ताकि बच्चा डकार ले। इससे बच्चा दूध उल्टेगा नहीं। अक्सर दूध पीने के बाद डकार न कराने पर शिशु डकार आने पर उसके साथ दूध भी बाहर उलट देते हैं। डकार करा देने से ऐसा नहीं होगा।यदि वह स्तनपान करते करते सो जाय तो उसे सोने दें।
0 यदि आपके स्तन में बच्चे की जरुरत से ज्यादा दूध आये तो उसे निकाल दें। नहीं तो स्तनों में कड़ापन और सूजन आ जायेगी। इससे आपको बच्चे को दूध पिलाने में परेशानी होगी।
0पहले 2-3 महीनों में बच्चा रात में भी मां को स्तनपान के लिये जगायेगा। रात में भी बच्चे को स्तनपान कराना नुक्सान दायक नहीं होता। दूध पीकर वह फ़िर सो जायेगा। कुछ महीनों बाद बच्चा जब रात में ठीक से सोने लगेगा तो धीरे धीरे रात में उसकी स्तनपान करने की आदत  खुद ही बन्द हो जायेगी।
             स्तनपान से सम्बन्धित ये कुछ ऐसी बातें हैं जिन्हें समझ और अपनाकर
   आप शिशु और अपना दोनों का ही जीवन संवार सकेंगी।
                
                  जन्म से छः सालों तक दो,बच्चे को प्यार सुरक्षा।
           बिन बाधा बढ़ता जायेगा ,बनेगा वो फ़िर बच्चा अच्छा॥
                           0000000
डा0हेमन्त कुमार

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लेबल

. ‘देख लूं तो चलूं’ "आदिज्ञान" का जुलाई-सितम्बर “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” ११मर्च २०१९ ११मार्च 1mai 2011 2019 अंक 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अक्षत अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अपराध अपराध कथा अभिनव पाण्डेय अभिभावक अमित तिवारी अम्मा अरविन्द दुबे अरुणpriya अर्पण पाण्डेय अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आनन्द नगर” आने वाली किताब आबिद सुरती आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उम्मीद के रंग उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक टिपण्णी एक ठहरा दिन एक तमाशा ऐसा भी एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महत्वपूर्ण समीक्षा एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता ओड़िया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथाकार समीर गांगुली कथावाचन कर्मभूमि कला समीक्षा कलाकार कविता कविता। कविताएँ कवितायेँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काफिला नाट्य संस्थान काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किताबों में चित्रांकन किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैंसर-दर-कैंसर कैमरे. कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं क्षणिकाएँ खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीतांजलि गिरवाल गीतांजलि गिरवाल की कविताएं गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चिड़ियाँ पिकनिक करने आईं चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छिपकली छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जन्मदिन जन्मदिवस जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जात। जाने क्यों ? जेठ की दुपहरी टिक्कू का फैसला टोपी ठहराव ठेंगे से डा० शिवभूषण त्रिपाठी डा0 हेमन्त कुमार डा०दिविक रमेश डा0दिविक रमेश। डा0रघुवंश डा०रूप चन्द्र शास्त्री डा0सुरेन्द्र विक्रम के बहाने डा0हेमन्त कुमार डा0हेमन्त कुमार। डा0हेमन्त कुमार्। डॉ.ममता धवन डोमनिक लापियर तकनीकी विकास और बच्चे। तपस्या तलाश एक द्रोण की तितलियां तीसरी ताली तुम आए तो थियेटर दरख्त दरवाजा दशरथ प्रकरण दस्तक दिशा ग्रोवर दुनिया का मेला दुनियादार दूरदर्शी देश दोहे द्वीप लहरी नई किताब नई पत्रिका नदी किनारे नया अंक नया तमाशा नयी कहानी नववर्ष नवोदित रचनाकार। नागफ़नियों के बीच नारी अधिकार नारी विमर्श निकट नित्या नित्या शेफाली नित्या शेफाली की कविताएं नियति निवेदिता मिश्र झा निषाद प्रकरण। नेता जी नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2) नेहा शेफाली नेहा शेफ़ाली। पढ़ना पतवार पत्रकारिता-प्रदीप प्रताप पत्रिका पत्रिका समीक्षा परम्परा परिवार पर्यावरण पहली बारिश में पहले कभी पहले खुद करें–फ़िर कहें बच्चों से पहाड़ पाठ्यक्रम में रंगमंच पार रूप के पिघला हुआ विद्रोह पिता पिता हो गये मां पिताजी. पितृ दिवस पुण्य तिथि पुण्यतिथि पुनर्पाठ पुरस्कार पुस्तक चर्चा पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा। पुस्तकसमीक्षा पूनम श्रीवास्तव पेंटिंग्स पेड़ पेड़ बनाम आदमी पेड़ों में आकृतियां पेण्टिंग प्यारा कुनबा प्यारी टिप्पणियां प्यारी लड़की प्यारे कुनबे की प्यारी कहानी प्रकृति प्रताप सहगल प्रतिनिधि बाल कविता -संचयन प्रथामिका शिक्षा प्रदीप सौरभ प्रदीप सौरभ। प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा। प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव। प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव. प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव। प्रेरक कहानी प्रो0 सुरेन्द्र विक्रम फ़ादर्स डे।बदलते चेहरे के समय आज का पिता। फिल्म फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति फ़ेसबुक बंकू बंधु कुशावर्ती बखेड़ापुर बचपन बचपन के दिन बच्चे बच्चे और कला बच्चे का नाम बच्चे का स्वास्थ्य। बच्चे पढ़ें-मम्मी पापा को भी पढ़ाएं बच्चे। बच्चों का विकास और बड़ों की जिम्मेदारियां बच्चों का आहार बच्चों का विकास बच्चों को गुदगुदाने वाले नाटक बच्चों को जरूर पढाएं ये किताब बदलाव बया बहनें बाघू के किस्से बाजू वाले प्लाट पर बादल बारिश बारिश का मतलब बारिश। बाल अधिकार बाल अपराधी बाल दिवस बाल नाटक बाल पत्रिका बाल मजदूरी बाल मन बाल रंगमंच बाल विकास बाल साहित्य बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक बाल साहित्य समीक्षा। बाल साहित्यकार बालवाटिका बालवाणी बालश्रम बालिका दिवस बालिका दिवस-24 सितम्बर। बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत बूढ़ी नानी बेंगाली गर्ल्स डोण्ट बेटियां बैग में क्या है ब्लाइंड स्ट्रीट ब्लाग चर्चा भजन भजन-(7) भजन-(8) भजन(4) भजन(5) भजनः (2) भद्र पुरुष भयाक्रांत भारतीय रेल मंथन मजदूर दिवस्। मदर्स डे मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला कौशल पाण्डेय मनोविज्ञान महुअरिया की गंध मां माँ मां का दूध मां का दूध अमृत समान माझी माझी गीत मातृ दिवस मानस मानस रंजन महापात्र की कविताएँ मानस रंजन महापात्र की कवितायेँ मानसी। मानोशी मासूम पेंडुकी मासूम लड़की मिशन ग्रीन वार मुंशी जी मुद्दा मुन्नी मोबाइल मूल्यांकन मेरा दोस्त मेरा नाम है मेराज आलम मेरी अम्मा। मेरी कविता मेरी रचनाएँ मेरे मन में मोइन और राक्षस मोनिका अग्रवाल मौत के चंगुल में मौत। मौसम यात्रा यादें झीनी झीनी रे युवा युवा स्वर रंग बिरंगी दुनिया रंगबाज रंगबाजी करते राजीव जी रस्म मे दफन इंसानियत राजीव मिश्र राजेश्वर मधुकर राजेश्वर मधुकर। राधू मिश्र रामकली रामकिशोर रिपोर्ट रिमझिम पड़ी फ़ुहार रूचि रोचिका शर्मा लखनऊ लगन लघुकथा लघुकथा। लड़कियां लड़कियां। लड़की लालटेन चौका। लिट्रेसी हाउस लू लू की सनक लेख लेख। लेखसमय की आवश्यकता लोक चेतना और टूटते सपनों की कवितायें लोक संस्कृति लोकार्पण लौटना वनभोज वनवास या़त्रा प्रकरण वरदान वर्कशाप वर्ष २००९ वह दालमोट की चोरी और बेंत की पिटाई वह सांवली लड़की वाल्मीकि आश्रम प्रकरण विकास विचार विमर्श। विज्ञानं बाल कविताएँ विश्व पुतुल दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस. विश्व रंगमंच दिवस व्यंग्य व्यक्तित्व व्यन्ग्य शक्ति बाण प्रकरण शब्दों की शरारत शाम शायद चाँद से मिली है शिक्षक शिक्षक दिवस शिक्षक। शिक्षा शिक्षालय शैलजा पाठक। शैलेन्द्र श्र प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव स्मृति साहित्य प्रतियोगिता श्रद्धांजलि श्रीमती सरोजनी देवी संजा पर्व–मालवा संस्कृति का अनोखा त्योहार संदेश संध्या आर्या। संवाद जारी है संसद संस्मरण संस्मरण। सड़क दुर्घटनाएं सन्ध्या आर्य सन्नाटा सपने दर सपने सफ़लता का रहस्य सबरी प्रसंग सभ्यता समय समर कैम्प समाज समीक्षा समीक्षा। समीर गांगुली समीर लाल। सर्दियाँ सांता क्लाज़ साक्षरता निकेतन साधना। सामायिक सारी रात साहित्य अमृत सीता का त्याग.राजेश्वर मधुकर। सुनीता कोमल सुरक्षा सूनापन सूरज सी हैं तेज बेटियां सोन मछरिया गहरा पानी सोशल साइट्स स्तनपान स्त्री विमर्श। स्मरण स्मृति स्वतन्त्रता। हंस रे निर्मोही हक़ हादसा हादसा-2 हादसा। हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य हिंदी कविता हिंदी बाल साहित्य हिन्दी ब्लाग हिन्दी ब्लाग के स्तंभ हिम्मत हिरिया हेमन्त कुमार होलीनामा हौसला accidents. 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