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डा0सुरेन्द्र विक्रम के बहाने----

गुरुवार, 3 मई 2012

पुस्तक चर्चा
                                                        
पुस्तक--

हिन्दी बालसाहित्य
डा0सुरेन्द्र विक्रम का योगदान
लेखिकाडा0स्वाति शर्मा
प्रकाशकहिन्दी साहित्य निकेतन
16,साहित्य विहार,बिजनौर(उ0प्र0)
फ़ोन01342263232
               
              हिन्दी में बाल साहित्य तो आज बहुत प्रचुर मात्रा में लिखा जा रहा है।प्रकाशित भी हो रहा है। अब ये बात अलग है कि इनमें से कितनी किताबें बाल पाठकों तक पहुंच रही है और कितनी सिर्फ़ पुस्तकालयों की शोभा बढ़ा रही हैं।यदि प्रकाशित बाल साहित्य बच्चों तक पहुंच रहा है तो उनकी उस पर प्रतिक्रिया क्या है?उन्हें आज का बाल साहित्य स्वीकार्य है या नहीं?ऐसे ढेरों प्रश्न उठते हैं जब हम बाल साहित्य पर बात उठाते हैं।
          पर इतना तो निश्चित है कि बाल साहित्य पर आलोचनात्मक और समीक्षात्मक किताबें कम लिखी गई हैं।बाल साहित्य पर शोध कार्य भी कम हुये हैं।इतना ही नहीं बाल साहित्य पर सोच विचार करने वाले चिन्तक और लेखक भी कम ही हैं।ऐसी स्थिति में किसी बाल साहित्यकार के पूरे कृतित्व पर केन्द्रित किसी नयी पुस्तक को पढ़ना अपने आप में एक अलग तरह के पाठकीय आनन्द से गुजरना कहा जायेगा। मुझे अभी हाल ही में प्रकाशित डा0स्वाति शर्मा की पुस्तक हिन्दी बाल साहित् सुरेन्द्र विक्रम का योगदान पढ़ने का अवसर मिला।
                 उपरी तौर पर पुस्तक के शीर्षक से तो यह भ्रम होता है कि यह किताब सिर्फ़ सुरेन्द्र विक्रम के ही ऊपर लिखी गई है।लेकिन वास्तविकता यह नहीं है।इस पुस्तक में सुरेन्द्र विक्रम और उनके द्वारा लिखे गये अब तक के बाल साहित्य के बहाने हिन्दी के सम्पूर्ण बाल साहित्य की पड़ताल भी की गई है।
             पुस्तक कुल आठ अध्यायों में विभाजित की गई है।पहले अध्याय बालसाहित्य की अवधारणा में बालक,बाल साहित्य,स्वतन्त्रता के पूर्व हिन्दी बाल साहित्य,स्वातन्त्र्योत्तर हिन्दी बाल साहित्य की चर्चा के साथ ही बाल साहित्य की विभिन्न विधाओं,तथा आज लिखे जा रहे बाल साहित्य  का भी विश्लेषण किया गया है।
              बाद के सात अध्यायों में क्रमशः डा0सुरेन्द्र विक्रम के व्यक्तित्व और कृतित्व,सुरेन्द्र विक्रम के बाल काव्य का वर्गीकरण,सुरेन्द्र विक्रम के बाल गीतों का शिल्प सौन्दर्य,सुरेन्द्र विक्रम का बाल कथा साहित्य,डा0सुरेन्द्र विक्रम द्वारा लिखे गये बाल साहित्य के आलोचनात्मक ग्रन्थ,बाल साहित्य के विकास में सुरेन्द्र विक्रम के योगदान,और सुरेन्द्र विक्रम के बाल साहित्य के वैशीष्ट्य पर विचार किया गया है।
          मूलतः तो यह किताब एक शोध प्रबन्ध ही है। इसी विषय पर लेखिका डा0स्वाति शर्मा ने रुहेलखण्ड विश्वविद्यालय से पी एच डी की उपाधि प्राप्त की है। लेकिन इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसको लिखने में स्वाति शर्मा ने आम आलोचनात्मक ग्रन्थों से अलग हट कर एक नई तकनीक का प्रयोग किया है।वो यह कि इसके हर अध्याय में सुरेन्द्र विक्रम के बहाने बाल साहित्य की उस पूरी विधा पर पाठकों का ध्यान केन्द्रित किया गया है। य्दि सुरेन्द्र विक्रम के बाल गीतों की बात की जा रही है तो साथ ही बाल गीतों से जुड़े सभी कवियों की चर्चा और उनके बालगीतों के बाकायदा उद्धरण देकर उनका विश्लेषण किया गया है। दूसरी बात पुस्तक में कहीं बहुत ज्यादा अतिवाद का प्रयोग नहीं किया गया जैसा कि सामन्यतः किसी रचनाकार के ऊपर केन्द्रित पुस्तकों में होता है।इस दृष्टि से यह पुस्तक हिन्दी बाल साहित्य की एक उपलब्धि कही जायेगी।ड़ा0स्वाति शर्मा का यह कार्य निश्चय ही प्रशंसनीय है।
            इन समस्त विशेषताओं के साथ ही इस ग्रन्थ में एकाध कमियां भी रह गयी हैं।पुस्तक के पहले अध्याय में जहां लेखिका ने बाल साहित्य की विधागत चर्चा की है। जिसमें---बाल-काव्य,बाल-कहानी,बाल-उपन्यास,बाल नाटक,बाल जीवनी साहित्य की विस्तृत चर्चा है।लेकिन वर्तमान समय में बाल साहित्य की एक लोकप्रिय विधा चित्रात्मक कहानी(इस विधा के लिये लिखना सम्भवतः अन्य विधाओं से ज्यादा कठिन है।) की चर्चा नहीं है।जबकि इस विधा में इधर छोटे बच्चों के लिये बहुत सी किताबें लिखी और प्रकाशित हो रही हैं। कई प्रकाशक और एन जी ओ इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं।
         दूसरे प्रिण्ट के साथ ही इस समय इलेक्ट्रानिक माध्यमों द्वारा भी बच्चों के लिये बहुत कुछ किया जा रहा है। अगर हम टी वी और रेडियो को छोड़ भी दें तो भी इण्टरनेट पर लिखे जा रहे बच्चों के ब्लाग्स,ई0बुक्स या डिजिटल पुस्तकों का भी उल्लेख यहां होना जरूरी है।क्योंकि बच्चों का बहुत अच्छा साहित्य आज ब्लाग्स,सी डी,डिजिटल पुस्तकों के माध्यम से भी लिखा जा रहा है। और आने वाले कल में ये माध्यम भी प्रिन्ट के समकक्ष ही महत्वपूर्ण बन जायेंगे। उम्मीद है कि पुस्तक के अगले संस्करण में डा0स्वाति जी बाल साहित्य की इन विधाओं को भी शामिल करेंगी।
                कुल मिलाकर हिन्दी बाल साहित्य में डा0सुरेन्द्र विक्रम का योगदान एक प्रशंसनीय कार्य कहा जायेगा। और डा0स्वाति शर्मा  भविष्य में बाल साहित्य के लिये और बेहतरीन कार्य करेंगी।
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लेखिका-डा0स्वाति शर्मा

23 जून 1980 को जन्मी स्वाति शर्मा ने हिन्दी, संस्कृत में एम0ए0करने के पश्चात रुहेलखण्ड विश्वविद्यालय से "हिन्दी साहित्य में डा0सुरेन्द्र विक्रम का योगदान"विषय पर पी0एच0डी0 किया है।"शोध दिशा"सहित कसम्प्रति अध्यापन कर्य में संलग्न।ई पत्र पत्रिकाओं में आलेखों का प्रकाशन।इसके साथ ही कला,साहित्य और संस्कृति से सम्बन्धित विभिन्न कार्यक्रमों के आयोजन और संचालन में सहभागिता।
पुस्तक समीक्षा--डा0हेमन्त कुमार 
                 

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कहां पर बिखरे सपने---कैसे पूरे होंगे सपने--------।

सोमवार, 30 अप्रैल 2012

               बालश्रम सिर्फ़ हमारे देश की ही नहीं बल्कि पूरे विश्व की एक बड़ी समस्या है।और पिछले दो दशकों में इसे रोकने की दिशा में पूरे संसार के कई देशों ने अच्छी पहल भी की है।दुनिया भर में विभिन्न सरकारी और गैर सरकारी संस्थाएं इस अभिशाप को खतम करने की दिशा में काम कर रही हैं। हमारे अपने देश भारत में भी 1974 में ही बच्चों की बेहतरी के लिये बाकायदा एक नीति भी बनाई गई। इस नीति में अन्य बातों के अलावा बच्चों को मजदूरी से हटाने के साथ ही खतरनाक या भारी कामों में लगाने से रोकने की बात भी कही गई है। इसके बाद 1986 में बालश्रम अधिनियम(निषेध एवं नियंत्रण) का निर्माण हुआ। 1987 में इस अधिनियम में कुछ बदलाव किये। अभी हाल में ही मार्च 2010 में भी इस  अधिनियम में बच्चों के हित के लिये कुछ बदलाव हुये। इतना ही नहीं 1992 में ही दुनिया के 159 देशों के साथ ही भारतवर्ष  ने भी बाल अधिकारों के अन्तर्राष्ट्रीय घोषणा पत्र पर भी दस्तखत किये।इन बाल अधिकारों में भी भीतर वर्ष से कम उम्र के बच्चों से मजदूरी कराए जाने पर प्रतिबन्ध के साथ ही उन्हें ऐसे कामों से दूर रखने की बात कही गई है जो उनके स्वास्थ्य,शिक्षा और जीवन को हानि पहुंचाएं।
             इतने नियमों,कानूनों के बनने,सरकारी ,गैर सरकारी संगठनों द्वारा प्रयास किये जाने के बावजूद भी हमारे अपने देश भारत में बाल मजदूरों की संख्या में बहुत कमी नहीं आई है। आपको घरों से लेकर पटाखा,माचिस फ़ैक्ट्रियों जैसे खतरनाक उद्योगों में भी बाल मजदूरों की बड़ी संख्या मिलेगी।1971 की जनगणना के अनुसार पूरे भारत में बाल मजदूरों की कुल संख्या लगभग 1,0,753985 थी।जिसमें सबसे कम(97) बाल श्रमिक लक्षद्वीप और सबसे ज्यादा(16,27492) आंध्र प्रदेश में थे।सन 2001 यानि तीस वर्षों के बाद भी जनगणना के आंकड़ों पर ध्यान दें तो यह संख्या बढ़ कर 1,26,66,377 यानि सवा करोड़ से ऊपर पहुंच गई है।मतलब यह कि इन तीस वर्षों में सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर होने वाले तमाम प्रयासों,और धन के व्यय के बाद भी बाल मजदूरों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है कमी नहीं हुई।
                         दुख की बात तो यह है कि जितना ही इस दिशा में प्रयास किये जा रहे हैं,लोगों को जागरूक किया जा रहा है उतना ही बच्चों को मजदूरी के काम में और ज्यादा लगाया जा रहा है।उनके बचपन को खतम किया जा रहा है। उनके सपनों को कुचला और बिखेरा जा रहा है। हम सभी आज बाल मजदूरी खतम करने,इन बच्चों के लिये कल्याणकारी योजनाएं बनाने,उन्हें भी एक सामान्य जीवन जीने का अवसर प्रदान करने की बातें तो बहुत करते हैं लेकिन शायद बहुत कम लोग ही ये जानते होंगे कि इन बच्चों के सपने कहां टूट और बिखर रहे हैं?वो कौन से काम हैं जिनमें लग जाने पर उनका जीवन नष्ट हो रहा है।इनमें भी कुछ काम ऐसे हैं जहां इन बच्चों का सिर्फ़ शारीरिक,मानसिक और भावनात्मक शोषण होता है।लेकिन कुछ कार्यस्थल ऐसे हैं जिन्हें खतरनाक श्रेणी में रखा गया है।वहां का वातावरण ही इस ढंग का रहता है जिसमें काम करना बच्चों के स्वास्थ्य और जीवन दोनों के लिये खतरनाक है। आइये पहले हम देखते हैं किन सामान्य कामों में बालश्रमिक लगे हैं।
v      कृषि या खेती मेंहमारे देश के कुल बाल मजदूरों में से 70प्रतिशत से अधिक खेती के काम में लगे हैं।पूरे देश में इनकी संख्या 80-90 लाख होगी।इस काम में कुछ बच्चे तो मजबूरी में अपने मां-बाप की जगह(उनके बीमार हो जाने पर)काम करने जातेशैं। इनसे 10से12घण्टे काम करवा कर भी मजदूरी के रूप में बहुत कम पैसे या अनाज दिया जाता  है।
v      घरेलू नौकरअगर आप अपने अगल-बगल,मुहल्ले में देखें तो बहुत से परिवारों में काम करने वाले बच्चों की उम्र 14 साल से कम है।घरेलू काम करने वाले बच्चों के साथ मार पीट,उनका भावनात्मक यहां तक कि यौन शोषण भी होता है।उन्हीं की उम्र के अपने बच्चों के सामने उनसे काम करवाकर,डांट कर हम उन्हें एक भयंकर मानसिक प्रताड़ना से गुजारते हैं।
v      कूड़ा बीनने का कामआपको रोज सुबह से शाम तक तपती सड़कों पर,चिलचिलाती धूप में कन्धे पर एक बोरा और हाथ में एक छ्ड़ी लिये हुये बहुत से बच्चे दिखते होंगे।इनका काम है पूरे दिन घूम घूम कर कूड़े के ढेर से प्लास्टिक,बोतलें,पालिथिन, और अन्य घरेलू कचरा बीनना।यही इनकी रोजी रोटी है।कचरा बीनने वाले कुल मजदूरों में से 60प्रतिशत से ज्यादा बच्चे हैं।सुबह से शाम तक सड़कों पर कूड़ा बीनने और उसे ठेकेदार तक पहुंचाने के एवज में इन्हें मात्र 10-15 या कहीं कहीं 5 रूपये तक मेहनताना मिलता है। इन्हें औसतन 10-15 किलोमीटर प्रतिदिन पैदल चलना पड़ता है। हमारे देश के महानगरों में ऐसे बच्चों की संख्या हजारों में है।
v      स्कूटर,मोटर वर्कशापहमारे मुहल्लों की  साइकिल रिपेयरिंग की दूकानों,स्कूटर-मोटर की वर्कशाप्स में बड़ी संख्या ऐसे बच्चों की है जिनकी उम्र अभी खेलने और स्कूल जाने की है।यहां इनका दोहरा शोषण होता है।एक तो काम सिखाने के नाम पर कम पैसा देना और साथ ही काम करते समय आम आदमी के साथ ही मलिक की गालियां भी सुननी पड़ती है।जरा सी गलती होने पर मालिक या बड़ा मिस्त्री इन्हें मारने से भी नहीं चूकता।
v      ढाबे,चाय की दूकानें---आप बाजार में कभी चाय,काफ़ी पीने या खाना खाने तो जाते होंगे।
वहां निश्चित रूप से आपका साबका ऐसे बच्चों से जरूर पड़ता होगाजो आपकी,आपके बच्चों की जूठी प्लेटें,गिलास,बर्तन धोते हैं। आपको खाना सर्व करते हैं और बदले में दो जून का खाना और दस बीस रूपए के साथ ही ढाबा मालिक की गालियां,थप्पड़ भी पाते हैं।इनके चेहरों से गायब हो चुकी मासूमियत की जगह जगह बना चुकी उदासी,सूनापन या फ़िर विद्रोह का
        भाव भी शायद आपने देखा होगा। महानगरों में ऐसे बालश्रमिकों की भी बड़ी संख्या है।
v      जूता एवं चमड़ा उद्योगउत्तर प्रदेश के आगरा और कानपुर शहरों में ये उद्योग बड़ी संख्या में हैं।यहां पर भी आपको हाथों में काला,भूरा रंग पोते हुये,हाथों में हथौड़ी कील लिये पसीने से लथपथ सूनी आंखों वाले सैकड़ों अबोध बच्चे काम करते दिखाई पड़ जाएंगे।
v      चाय बागान(पश्चिम बंगाल और असम में)केवल पश्चिम बंगाल के डोआर क्षेत्र में ही लगभग सवा लाख से ज्यादा बाल मजदूर काम करते हैं।इन बागानों में काम करने वाले बच्चों में से 70 प्रतिशत से ज्यादा अनियमित रूप से(बिना रजिस्टर में नाम लिखे)काम करते हैं। कितना दुखद है कि 1947 में इन बागानों में बाल मजदूरों की संख्या कुल मजदूरों की मात्र 17प्रतिशत थी वहीं आज इनकी संख्या लाखों में पहुंच चुकी है।इनमें भी बड़ी संख्या में बच्चे कुपोषित और एनिमिक (खून की कमी) हैं।
v      मिट्टी के बर्तन बनाने का कामइस उद्योग का प्रमिख केन्द्र उत्तर प्रदेश के खुर्जा शहर में है जहां हजारों बच्चे बहुत कम दर पर मजदूरी कर रहे हैं।
v      रेल्वे स्टेशनों,बस अड्डों पर पान मसाला बेचनायह दूकानदारों,अभिभावकों ने बच्चों के माध्यम से काम करवाने का एक नया जरिया निकाला हैऽअपको देश के हर शहर में चौराहों,रेल्वे स्टेशनों और बस अड्डों पर हाथों में पान मसालों की लड़ियां लटकाए ढेरों बच्चे मिल जाएंगे।जो हमारे आपके नशे का सामान बेचते हैं। वो भी तेज ट्रैफ़िक में रोड क्रास करके,चलती ट्रेनों,बसों में चढ़ उतर कर अपनी जान जोखिम में डालते हुये। इतना ही नहीं पान मसाला बेचते बेचते इनमें से बहुत से बच्चे खुद भी ये जहरीला मसाला खाने के आदी हो जाते हैं।
v      भीख मांगनाआज महानगरों में भिक्षावृत्ति भी आमदनी का एक जरिया बन चुकी है। और इसके लिये भी बाकायदा गैंग बनने लगे हैं,ठेकेदारी होने लगी है। आप जिन ब्च्चों को सड़कों पर विकलांग बनकर,सूरदास बनकर भीख मांगते देखते हैं उनमें सभी जन्मजात विकलांग या अंधे नहीं हैं। बल्कि उन्हें भीख मंगवाकर कमाई करने वाले ठेकेदारों ने इस रूप में पहुंचाया है ताकि वो जनता की सहानुभूति पाकर ज्यादा कमाई कर सकें। और इन बच्चों की कमाई का पूरा फ़ायदा तो गैंग वाला या ठेकेदार उठाता है---इन बच्चों को तो बस दो जून का आधा पेट खाना और गालियां नसीब होती हैं।
        ये तो कुछ ऐसे धन्धे या काम थे जिनमें बच्चों के स्वास्थ्य या जीवन का खतरा कम
    है।आइये अब उन कामों पर दृष्टि डालते हैं जिनमें इन मासूमों के जीवन को सीधेसीधे
    खतरा बना रहता है---वो भी चौबीसों घण्टे।
v      रेशम उद्योगइस व्यवसाय में लगभग साढ़े तीन से चार लाख तक बाल श्रमिक कार्यरत हैं।इन्हें बहुत ही कम मजदूरी पर ज्यादा समय तक काम करना पड़ता है।
v      हथकरघा एवं बिजली करघा उद्योग---यह उद्योग पूरे देश में कई स्थानों पर हो रहा है।इसमें जरी का काम,कढ़ाई और साड़ी बुनने का काम बच्चों से भी लिया जाता है।इस काम की मजदूरी इन्हें इतनी कम दी जाती है जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। आज से लगभग 15 साल पहले लखनऊ में कुर्तों पर कढ़ाई का काम करने वाले एक व्यवसाई ने बताया था कि बच्चों को प्रति फ़ूल की कढ़ाई का 5पैसा दिया जाता है।मतलब यह कि दिन भर में यदि बच्चे ने 100फ़ूलों वाली एक साड़ी की कढ़ाई की तो उसे मजदूरी के सिर्फ़ 5रूपये मिलेंगे।इस उद्योग में लगे बच्चों की आंखों की रोशनी भी समय से पहले कम होने लगती है।
v      पटाखा एवं माचिस उद्योग-इनके कारखाने ज्यादातर तमिलनाड़ु के शिवाकाशी में हैं। इसके अलावा भी देश के कई स्थानों पर यह काम होता है। शिवाकाशी क्षेत्र में पटाखों के लगभग 1050कारखाने और उनकी हजारों इकाइयां हैं। यहां काम करने वाले मजदूरों में से  लगभग 50प्रतिशत से ज्यादा(लगभग चालीस हजार) बच्चे बाल श्रमिक के रूप में कार्यरत हैं।इन कारखानों में से कम से कम 500बिना लाइसेंस के गैरकानूनी ढंग से चलाए जाते हैं। इन्हीं क्षेत्रों में लगभग 3989माचिस बनाने के कारखाने हैं।यहां पर काम करने वाले बच्चों को सांस रोग के साथ ही विस्फ़ोट होने पर मृत्यु का भी खतरा हमेशा बना रहता हैऽइसी खतरनाक जगहों पर काम करके ये मासूम हमारे आपके घरों की दीपावली को शुभ करते हैं।
v      कालीन उद्योग---इसके प्रमुख केन्द्र उत्तर प्रदेश के वाराणसी,मिर्जापुर,भदोही और जम्मू-काशमीर में हैं।इस उद्योग से जुड़े कुल मजदूरों में से 40प्रतिशत से अधिक संख्या बाल श्रमिकों की है।उत्तर प्रदेश में इन बाल मजदूरों की संख्या एक लाख से अधिक होगी।जबकि जम्मू काशमीर में लगभग 80हजार बच्चे इस काम  से जुड़े हैं। यहां पर भी बच्चों का अच्छा खासा शोषण होता है।बहुत सारे बच्चों को काम सिखाने के नाम पर साल साल भर तक बिना कोई मजदूरी दिये ही उनसे काम लिया जाता है। यहां उड़ने वाली धूल और गर्द से बहुत जल्द ही ये ब्च्चे फ़ेफ़ड़ों के रोगों से ग्रस्त हो जाते हैं।12से16घण्टे रोज काम करके भी इन्हें बहुत कम पारिश्रमिक मिलता है।
v      पीतल उद्योगपीतल का काम मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद शहर में होता है। इसमें काम करने वाले कुल मजदूरों में से लगभग 40से50प्रतिशत बच्चे हैं।
v      बीड़ी उद्योगबीड़ी बनाने का अधिकतर काम उत्तर प्रदेश,कर्नाटक और तमिलनाडु में फ़ैला है।यहां भी  भारी संख्या में बच्चे काम कर रहे हैं।इन्हें एक दिन में लगभग 1500बीड़ियां बनाने पर मात्र 9 रूपये का मेहनताना दिया जाता है।जबकि यहां करने पर इनमें तंबाकू सेवन की गन्दी लत लगने के साथ ही इनके फ़ेफ़ड़ों को भी बहुत नुक्सान पहुंचता है।
v      भवन निर्माण---जिन मकानों या अपार्टमेण्ट्स में हम ए0सी0की हवा खाते हुये खुद को काफ़ी महफ़ूज महसूस करते हैं क्या उन्हें बनाने वाले हाथों के बारे में कभी आपने विचार किया है?इन भवनों के निर्माण में भी कितने छोटे,सुकोमल हाथों ने अपने सर पर ईंटें,मसाले का तसला लाद कर ऊपर तक पहुंचाया है। यहां तक कि सीढ़ियों,छतों से गिर कर अपंग हो चुके या फ़िर मौत को गले लगा चुके हैं?शायद नहीं सोचा होगा।लेकिन यह भी हमारे जीवन की एक कठोर सच्चाई है।पूरे देश में ऐसे दैनिक मजदूरी करने वाले बच्चों की संख्या भी लाखों में है।
v       शीशा उद्योगशीशे का काम मुख्य रूप से फ़िरोज़ाबाद में होता है।शायद कभी कोई महिला सोचती भी नहीं होगी किजो रंग बिरंगी चूड़ियां पहन कर वह अपने हाथों में चार चांद लगाती है उन्हें बनाने में कितने मासूमों ने अपने हाथ जलाए हैं। यहां काम करने वाले बच्चों को 1400से1800सेल्शियस तापमान वाली भट्ठियों के पास नंगे पैर खड़े होकर 10-12घण्टे तक काम करना पड़ता है।कितनों के हाथ पैर झुलस जाते हैं।
v      खान और पत्थर तोड़ने का काम----इस समय इस उद्योग में काम करने वाले बच्चों के नवीनतम आंकड़े तो नहीं उपलब्ध हैं।लेकिन 1981के आंकड़ों में इनकी संख्या 27हजार दर्ज़ है।मध्य प्रदेश और आंध्र परदेश में फ़ैले इस व्यवसाय में बच्चों को खतरनाक ढंग से काम करना पड़ता है।इनके ऊपर पत्थर गिरने से अंग भंग होने और मौत तक का खतरा रहता है।साथ ही कार्यस्थल पर उड़ने वाले पत्थर के बारीक कणों और धूल से बहुत जल्द ही ये सांस सम्बन्धी बीमारियों की गिरफ़्त में आ जाते हैं।
v      हीरा चमकाने के काम में---गुजरात में हीरा चमकाने का काम करने वाले कुल मजदूरों में से 25प्रतिशत से जयादा बाल श्रमिक काम करते हैं। इनके काम करने का समय भी काफ़ी ज्यादा होता है।
v      सर्कस में----सर्कस किसी समय हमारे मनोरंजन का एक मुख्य साधन के साथ ही एक बड़ा उद्योग भी था। आज इनकी संख्या कम तो हो गई है लेकिन इनका वजूद तो है ही।सर्कस में बच्चों को बहुत ही छोटी उम्र से भर्ती करके उनसे तमाम तरह के खतरनाक करतब और खेल करवाए जाते हैं।जिसमें उनके गिरने,चोट खाने,गम्भीर रूप से घायल होने के साथ ही मौत का खतरा भी बराबर बना रहता है।इस क्षेत्र में भी बच्चे बहुत बड़ी संख्या में काम कर रहे हैं।जिनको सर्कस के तीन से चार शो दिखाने के बाद भी खाना कपड़ा और घर भेजने के लिये मात्र एक या दो हजार रूपये महीना मिल पाता है।कभी कभी सर्कस की माली हालत बिगड़ने पर इन्हें दो जून का खाना भी ठीक से नहीं मिलता।
                            इन सभी सामान्य और खतरनाक कामों के अलावा भी बच्चों से गैरकानूनी तरीके से पेट्रोल पंपों,ताला बनाने,पत्थर रंगने जैसे बहुत से काम करवाए जाते हैं। और यह हालत तब है जब कि चौदह साल से कम उम्र वाले बच्चों से काम करवाना कानूनन अपराध घोषित किया जा चुका है। साथ ही तमाम सरकारी,गैर सरकारी संगठनों द्वार बाल श्रम को रोकने और उन्हें भी स्कूल जाने वाले बच्चों की मुख्य धारा से जोड़ने की कोशिशें की जा रही हैं।
                इसके बावजूद आज करोड़ों बच्चों से काम करवाकर हम उनका शारीरिक और भावनात्मक शोषण तो कर ही रहे हैं।साथ ही इनके मासूम चेहरों का भोलापन,उनकी मुस्कान,उनके सपनों को भी छीन रहे हैं।यदि आज भी हमने इस अपराध को रोकने के लिये अपना पूरा जोर नहीं लगाया तो शायद आने वाले कल में हमें इन बाल श्रमिकों के चेहरों पर मुस्कान और भोलेपन की जगहा एक भयंकर विद्रोह और खुरदुरेपन की छाया साफ़ साफ़ देखनी पड़ेगी।
                                000
डा0हेमन्त कुमार

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“देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल।

शनिवार, 21 अप्रैल 2012

देश भीतर देश
(उपन्यास)
लेखक-प्रदीप सौरभ
वाणी प्रकाशन
4695,21-ए,दरियागंज,
नई दिल्ली--110002    
                                        हमारा देश एक तरफ़ तो बाहरी शक्तियों से जूझ रहा है दूसरी ओर आतंकवाद,जातिवाद,धार्मिक विवादों,जातीय और साम्प्रदायिक दंगों जैसी आन्तरिक समस्याएं भी हमारे देश की जनता का दुर्भाग्य बन चुकी हैं।इन सभी का दुष्परिणा अन्ततः यहां की जनता ही भुगतती है।
    इन सबके साथ ही आज एक और समस्या भी हमारे देश में धीरे-धीरे सर उठाती जा रही है वह है क्षेत्रीयता या प्रादेशिकता की।अगर व्यक्ति तमिलनाडु का है तो उसे दूसरे लोग मद्रासी कहते हैं,आसाम का है तो असमी।इतना ही नहीं वह भी खुद को मद्रासी या असमी ही मानता है भारतीय या हिन्दुस्तानी नहीं।गोया तमिलनाडु या आसाम भारत का एक प्रदेश ना होकर कोई अलग देश हो। आज हर प्रदेश का आदमी खुद को भारतवर्ष से अलग करके देखने की कोशिश कर रहा है। उत्तराखण्ड,झारखण्ड,छत्तीसगढ़ राज्यों का बनना और तेलंगाना,बुन्देलखण्ड,अवध प्रदेश,पश्चिम प्रदेश,पूर्वांचल आदि राज्यों की मांगें इसी अलगाववाद और बढ़ती जा रही क्षेत्रीयता का नतीजा हैं।
                   आम जन के भीतर बढ़ रहे इसी प्रदेशवाद,क्षेत्रीयतावाद और अलगाववाद की भावनाओं का लेखा जोखा है प्रदीप सौरभ का नवीनतम उपन्यासदेश भीतर देश। ऊपरी तौर पर तो यह उपन्यास एक विशिष्ट प्रेम कथा लग सकता है। जिसमें दिल्ली से आसाम ट्रेनिंग पर गये युवा पात्र विनय और एक विशुद्ध असमी युवती मिल्की डेका का प्रेम है,भावनायें हैं,उनका एक दूसरे के प्रति समर्पण का भाव है,संवेदनाएं हैं,साथ ही मिल्की डेका के अंदर की मूल भावनादिल्ली को इंडिया की राजधानी मानने की भावना दिखाई पड़ती है। मिल्की डेका दिल्ली और इंडिया को अपने असम से अलग हट कर एक कोई दूसरा देश मानती है।दरअस्ल यह भावना सिर्फ़ मिल्की की ही नहीं असम के आम आदमी की भावना है।लेकिन हम जितना ही इस उपन्यास की गहराई में उतरते जाते हैं उतना ही यह उपन्यास हमारे सामने अलगाववाद की भावना और उसके पीछे के कारणों की परतें एक एक कर खोलता जाता है।
                  इस उपन्यास के केन्द्रीय पात्र तो विनय और मिल्की डेका ही हैं।लेकिन उपन्यास की कहानी आगे बढ़ने के साथ ही आशीष विश्वास,बुलबुल हजारिका,संगानेरिया परिवार,विनय की फ़ेसबुकिया मित्रबबिता मालवीय,मिलि गुप्ता,मिष्ठी बैनर्जी,कोकोला पात्रा,पूजा कौरआदि अन्य पात्र हमारे सामने एक-एक कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते चलते हैं।
               विनय का गुवाहाटी आफ़िस में ट्रेनिंग पर जाना,बुलबुल हजारिका,मिल्की डेका से उसका परिचय,मिल्की से विनय की निकटता,प्रेम और विवाह ये सब कुछ तो एक बहाना मात्र है।उपन्यास के मुख्य कथानक में तो असम के लोगों की यह पीड़ा कि भारत सरकार उन्हें छल रही है,वहां के लोगों का ये मानना कि यहां आने वाला हर विदेशी मानू सिर्फ़ उन्हें लूटने ही यहां आया है,वहां उत्पन्न हुये तमाम विद्रोही संगठनोंउल्फ़ा,सुल्फ़ा,बोडो भूमिगत संगठन,बोडो स्टुडेणट यूनियन, उनकी मांगें,आन्दोलन,सरकार का उनके प्रति दमनकारी रवैया----सब कुछ हमारे सामने एक-एक कर फ़िल्म के अलग-अलग दृश्यों की तरह उपस्थित होता जाता है। और तब पाठक को यह महसूस होता है कि अरे यह तो सिर्फ़ प्रेम कथा मात्र नहीं है।
           गुवाहाटी में तीन साल का समय बिताने के बाद दिल्ली लौटने पर विनय खुद को एक अजीब बीमारी से ग्रसित पाता है।वह बीमारी है देश भीतर देश देखने की। दरअस्ल यह कोइ बीमारी नहीं बल्कि एक आम व्यक्ति की पीड़ा और मनःस्थिति है जो तीन साल किसी एकदम अनजान  और नये प्रदेश(आसाम) में रहकर,वहां की पूरी सांस्कृतिक,राजनैतिक,आर्थिक और सामजिक परिस्थितियों को अपने अंदर समाहित करके फ़िर से अपनी पुरानी जगह(दिल्ली)वापस लौटा है।प्रवास के इन तीन सालों में उस पात्र (विनय)ने उस पूरे शहर,प्रदेश को भरपूर ढंग से जिया है। अपनी रग रग में वहां की माटी की सोंधी खुशबू,चाय बागानों की हरियाली,जंगलों का प्राकृतिक सौन्दर्य,वहां के आम जन की पीड़ा,उग्रवादी संगठनों की मांगें,उनके ऊपर होने वाले दमन चक्र का दर्द----सभी कुछ अपनी स्मृतियों में साथ लाया है।उसी प्रदेश में उसने अपने प्रेम(मिल्की डेका)के माध्यम से अपने सपनों का महल बनाया और उसे नेस्तनाबूद होते (मिल्की की मृत्यु) हुए भी देखा है।
            उसके प्रेम का इस तरह नेस्तनाबूद हो जाना भी यूं ही एक आम घटना नहीं है।मिल्की डेका का विनय के साथ दिल्ली न आना,उसे वहीं बस जाने का अनुरोध,खुद अपने में ही घुट-घुट कर मर जाना हमारे देश में बढ़ते जा रहे अलगाववाद की भावना का ही नतीजा है।यह एक भोली भाली असमी लड़की का आत्म बलिदान भी है।जो हमारे उस पूरे राजनैतिक हालातों और दमनचक्र पर प्रश्न चिह्न लगाता है जो वहां के उल्फ़ा,सुल्फ़ा,बोडो उग्रवादियों के साथ किया गया।पंजाब कमाण्डो के जवानों के अत्याचार की एक झलक हमें उस समय देखने को मिलती है जब एक जवान तलाशी के दौरान मिल्की डेका के स्तन दबाता है और उसे घसीटकर बाहर तक ले जाता है।मिल्की डेका का विनय के साथ दिल्ली ना जाना एक विरोध भी है उस व्यवस्था के लिये जिसके तहत आम आदमी को यह धारणा बनाने पर मजबूर होना पड़ा कि दिल्ली इंडिया की राजधानी है और इंडिया एक अलग देश है। उस व्यवस्था के प्रति जिसके तहत वहां लोगों की धारणा बन चुकी है कि वहां आने और बसने वाला हर व्यक्ति हमारी हरियाली,हमारी जमीन और हमारे बागानों को लूटने और बटोर कर ले जाने के लिये ही यहां आया  है।
           उपन्यास के बीच में मुख्य पात्र विनय जब भी अपनी विषम मानसिक स्थितियों से त्रस्त हो जाता है तो उसे फ़ेसबुक पर जाकर कुछ समय के लिये ही सही थोड़ा राहत मिलती है।वह अपनी विषम परिस्थितियों से यहां अपने फ़ेस बुक मित्रों से चैटिंग करके थोड़ा निजात पाने की कोशिश करता है। उसकी फ़ेसबुक चैटिंग के माध्यम से भी हमारे समाज के विभिन्न किरदारों बबिता,मिली गुप्ता,मिष्ठी,कोकिला,गार्गी बधवार आदि के दर्शन होते हैं। सभी पात्रों की अपनी अपनी समस्याएं हैं।किसी की पति से अलगाव की तो किसी की चीन के माफ़ियाओं के भय की तो किसी की जायदाद के बंटवारे की। कहने को तो ये पात्र केवल मुख्य पात्र के फ़ेसबुक मित्र हैं लेकिन यदि आप गहराई से पड़ताल करें तो इनमें से हर पात्र अपने में अलग और अनूठा है।आपको अपने चारों ओर ध्यान से देखने पर कई-कई बबिताएं,मिली,मिष्ठी और कोकिला मिल जाएंगी।
                  यदि इस उपन्यास की चर्चा के दौरान प्रदीप सौरभ के पूर्व में प्रकाशित उपन्यासों पर बात नहीं की जायेगी तो शायद इस उपन्यास और लेखक की रचना प्रक्रिया को हम ठीक से समझ नहीं सकेंगे। पिछले तीन वर्षों में प्रदीप सौरभ के लगातार तीन उपन्यास पाठकों के बीच आये हैं।मुन्नी मोबाइल, तीसरी ताली और अब देश भीतर देश।मजेदार बात यह है कितीनों ही उपन्यासों की विषयवस्तु और क्षेत्र एकदम अलग-अलग हैं।मुन्नी मोबाइलदिल्ली महानगर में घरों में काम करने वाली नौकरानी की कहानी है।जो बहुत अधिक महत्वाकांक्षी थी। अपनी इसी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिये मुन्नी मोबाइल ने जो सफ़र पत्रकार आनन्द भारती के घर से शुरू किया वो काम वालियों की यूनियन,साहिबाबाद के चौधरियों से पंगा,डाक्टरनी के साथ नर्सिंग के अवैध धंधों,गाज़ियाबाद और पहाड़गंज रूट की बसों के फ़र्राटा भरते पहियों के साथ चलता हुआ अंत में कालगर्ल्स के रैकेट और मुन्नी मोबाइल के मर्डर के साथ पूरा होता है।जबकि तीसरी ताली का विषय एकदम अलग हटकर है।यह हमारे समाज के अभिन्न अंग होते हुये भी इसी समाज से परित्यक्त किये गये उन जीवधारियों की गाथा है जिन्हें हमारा समाज बहुत हिकारत और उपेक्षा से देखता है और हिंजड़ा कहकर बुलाता है।इस उपन्यास के कथानक की शुरुआत भी दिल्ली के सिद्धार्थ इन्क्लेव कालोनी से होकर हिंजड़ों की बस्तियों,उनके रीति रिवाजों,समाज में व्याप्त समलैंगिकों,उभयलिंगियों,लेस्बियन्स,गे कल्चर,हिंजड़ों की संस्कृति,उनके बीच गद्दी को लेकर छिड़ने वाले घमासानों का सफ़र तय करता हुआ हिंजड़ों के पवित्र तीर्थ स्थल कुवागम में पूर्णता को पहुंचता  है।और तीसरा ताजा उपन्यास देश भीतर देश की कहानी भी दिल्ली से गुवाहाटी और गुवाहाटी से दिल्ली की यात्राओं के दौरान चलती है।इसका विषय असम,वहां की संस्कृति,आंदोलन,समस्याएं और वहां के आम नागरिक की पीड़ा है।
         इतने कम समय में तीन अलग-अलग विषयों---ऐसे विषयों जिन पर पूरा शोध किये बिना एक कहानी भी न लिखी जा सके---पर उपन्यास लिखना भी एक दुरूह कार्य है। इस दुरूह कार्य को पूरा किया है प्रदीप सौरभ ने।इस मायने में भी लेखक की रचनात्मकता,उसकी सोच,वैचारिक विस्तार,शोध सभी कुछ हमें इन उपन्यासों के हर पृष्ठ पर साफ़-साफ़ दिखाई देता है।
            तीन अलग-अलग विषयों वाले उपन्यास होते हुये भी तीनों के कथानक में हमें कुछ समानताएं भी परिलक्षित होती हैं।सबसे पहली समानता तो है तीनों में ही भारतवर्ष के अंदर अलग-अलग क्षेत्रों में चल रहे राजनैतिक घटनाक्रमों को लेखक ने बहुत यथार्थपरक शैली में पाठकों के सामने प्रस्तुत किया है।मुन्नी मोबाइल में जहां हम गुजरात दंगों,वहां पर घटित होने वाले भगवा ब्रिगेड के तांडव,मोदी सरकार के अत्याचारों की नंगी सच्चाई से हतप्रभ होते हैं।वहीं तीसरी तालीकिन्नरों के ऊपर केन्द्रित होते हुए भी उनके बीच गद्दी को लेकर होने वाले खूनी संघर्षों,उनके अंदर आ रही राजनैतिक चेतना,उनके सम्मेलनों,राजनैतिक पार्टियों को उनके समर्थन देने के फ़ैसलों के साथ ही पूर्वी उत्तर प्रदेश के खद्दरधारियों तक की कहानियां हमारे समक्ष प्रस्तुत करता है।ठीक इसी तरहदेश भीतर देशभी हमारे देश के पूर्वोत्तर प्रांतों में होने वाली राजनैतिक हलचलों,उनसे उभरने वाले विद्रोहों,उनके दमन चक्र की कहानियों को प्रस्तुत करता है।यहां भी हमें लेखक के छात्र जीवन से ही राजनीति,विभिन्न संगठनों के आन्दोलनों से जुड़े होने, समय समय पर की गई जेल यात्राओं और साथ ही राजनीति के प्रति उनकी वैचारिक सोच का प्रमाण मिलता है।
               इन तीनों उपन्यासों की दूसरी समानता पत्रकार पात्रों की प्रमुख भूमिका के रूप में हमारे सामने मौजूद है।मुन्नी मोबाइलमें आनन्द भारती, तीसरी ताली में विजय और देश भीतर देशमें बुलबुल हजारिका। यानि लेखक ने तीनों ही उपन्यासों में कहीं न कहीं अपने अंदर के खोजी, बेहद सन्वेदनशील  और सक्रिय पत्रकार की उपस्थिति दर्ज की है।मुन्नी मोबाइल का तो केन्द्रीय पात्र ही आनन्द भारती ही है। ऐसा शायद प्रदीप सौरभ के लंबे पत्रकारिता के जीवन के कारण ही संभव हो सका।
          देश भीतर देश के शिल्प की बात करें तो यह लीक से एकदम हटकर एक नये शिल्प और शैली का उपन्यास है।इस पूरे उपन्यास का ताना बाना लेखक ने दो रेल यात्राओं के माध्यम से बुना है। पहली यात्रा दिल्ली से असम जाने वाली ब्रह्मपुत्र मेल,दूसरी आसाम से दिल्ली आने वाली राजधानी एक्सप्रेस।पहली यात्रा उपन्यास का मुख्य पात्र विनय तब कर रहा है जब उसे ट्रेनिंग के लिये गुवाहाटी जाना पड़ता है।दूसरी जब वह ट्रेनिंग पूरी करके दिल्ली वापस लौट रहा है।पूरे उपन्यास की सभी घटनाएं विनय की इन्हीं दो यात्राओं के साथ साथ आगे बढ़ती जाती हैं।बीच-बीच में दृश्यों का बदलाव हमें परदे पर चल रही किसी रोचक फ़िल्म देखने का आभास देता है। ऐसा लगता ही नहीं कि हम कोई उपन्यास पढ़ रहे हैं।पाठक को कभी लगता है कि वह कोई फ़िल्म देख रहा है,कभी लगेगा कि
किसी यायावर या घुमक्कड़ व्यक्ति की डायरी के पन्ने पढ़ रहा है।यानि कि इस उपन्यास में पाठक को एक फ़िल्म देखने,डायरी पढ़ने,एक पत्रकार के यात्रा वृत्तान्त सभी का आनन्द के साथ मिलेगा।कथानक के बीच-बीच में विनय का फ़ेसबुकिया सहेलियों से चैट करना उपन्यास को रोचक बनाता है।
          उपन्यास की भाषा में एक कुशल पत्रकार की बेबाक विश्लेष्णात्मक शैली का प्रभाव हमें हर जगह दिखता है।इनके अंदर बैठा कवि और फ़ोटोग्रैफ़र इनके लेखन में शब्दों और घटनाओं का अद्भुत कोलाज बनाता है।प्रदीप सौरभ के पूर्व में प्रकाशित दोनों उपन्यासों की ही तरह देश भीतर देशका विषय भी लीक से एकदम अलग हटकर है।पूर्वोत्तर राज्यों,क्षेत्रों और वहां के आम जन मानस में झांकने की कोशिश अभी तक किसी भी हिन्दी उपन्यास में नहीं की गई है। इस दृष्टि से भी यह उपन्यास पठनीय है और हिंदी साहित्य की निधि तो बनेगा ही।
                            0000000  
        प्रदीप सौरभ: पेशे से पत्रकार।हिन्दुस्तान दैनिक के दिल्ली संस्करण में विशेष संवाददाता के रूप में लम्बे समय तक काम किया।हिन्दी के चर्चित कवि,पत्रकार और लेखक।मुन्नी मोबाइल, तीसरी ताली उपन्यास काफ़ी चर्चित। कानपुर में  जन्म। परन्तु साहित्यिक यात्रा की शुरुआत इलाहाबाद से। कलम के साथ ही कैमरे की नजर से भी देश दुनिया को अक्सर देखते हैं।पिछले तीस सालों में कलम और कैमरे की यही जुगलबन्दी उन्हें खास बनाती है।गुजरात दंगों की बेबाक रिपोर्टिंग के लिये पुरस्कृत। लेखन के साथ ही कई धारावाहिकों के मीडिया सलाहकार।फ़िलहाल स्वतन्त्र लेखन।
समीक्षा--हेमन्त कुमार
     


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पर्यावरण और बच्चों के प्रति समर्पित ---- श्री चिक्कामुनियप्पा

मंगलवार, 20 मार्च 2012

चिक्कामुनियप्पा
           आज हमारे देश के सामने ही नहीं पूरी दुनिया के सामने अपनी इस धरती और अपने पर्यावरण को बचाने की समस्या है। इसे बचाने के लिये हमें तो काम करना ही है। साथ ही हमें आने वाली पीढ़ी यानि अपने बच्चों को भी इस मुहिम से जोड़ना होगा। तभी शयद हम उन्हें खुली हवा,धूप,हरियाली,रंग बिरंगे पक्षियों का प्यारा संसार यानि वो सभी कुछ दे सकेंगे जो हमारे जीवन के लिये जरूरी है।
     आज हमारे समाज में बहुत कम ऐसे लोग हैं जो बच्चों के साथ जुड़ कर उन्हें अपनी प्राकृतिक सम्पदा,अपने पर्यावरण को बचाने के लिये प्रेरित करने का काम कर सकें। आज मैं आपका परिचय एक ऐसी ही शख्सियत से कराने जा रहा हूं जो खुद तो प्रकृति को बचाने के मुहिम में वर्षों से लगे हैं। अपने साथ ही उन्होंने बहुत से बच्चों को भी इस मुहिम का हिस्सा बना रखा है।और पूरी निष्ठा और जुनून की हद तक पर्यावरण को बचाने का कार्य करने वाले व्यक्ति हैं--श्री चिक्का मुनियप्पा।
                    राज्य शैक्षिक तकनीकी संस्थान,लखनऊ में कैमरामैन के पद पर कार्यरत श्री चिक्का मुनियप्पा की फ़िल्म मेरे आंगन में आओ को इसी साल सी0 आई0ई0टी0,नई दिल्ली द्वारा आयोजित 17वें शैक्षिक वीडियो फ़िल्म समारोह में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म के साथ ही सर्वश्रेष्ठ निर्देशन,सम्पादन और ध्वन्यांकन का पुरस्कार भी मिला है।
     स्वभाव से बहुत सरल और हंसमुख स्वभाव वाले चिक्का जी से बात करने पर उन्होंने बताया कि लगभग 16 साल पहले जब वो अपने आवास विकास के मकान में गये तो वहां सामने बना पार्क पूरी तरह सूखा था।वहां गाय,भैंसों के साथ ही सूअर तक पड़े रहते थे। इस माहौल को देखकर उनके मन में यही प्रश्न आया कि क्या बच्चों को इसी वातावरण में ही रखना है?इसमें बच्चों का कैसा विकास हो सकेगा?
पार्क की हरियाली
        और बस उसी दिन से उन्होंने सबसे पहले पार्क को हरा भरा बनाने का काम शुरू किया।पहले अपने गमलों के कुछ पेड़ वहां लगाये।फ़िर वहां सफ़ाई करवाकर घास लगवायी। ---धीरे धीरे आस-पास के सभी लोग अपने घरों के सामने घास लगाने लगे।फ़िर सभी ने चिक्का जी से प्रेरित होकर पेड़ लगवाने शुरू किये। सामूहिक चन्दे से पार्क की सुरक्षा के लिये बाउण्ड्री बनी। ---फ़िर पेड़ों की संख्या बढ़ती गयी।
पार्क में समारोह
   एक और अच्छी बात चिक्का जी बताते हैं कि बच्चों को इस मुहिम से जोड़ने के लिये वो लोग पेड़ लगाने की पूरी तैयारी करने के बाद ---किसी बच्चे से ही पौधारोपण करवाते थे।जिससे कि बच्चा भी उस पेड़ से,पार्क से आत्मीयता महसूस करे।
 चिक्का के प्रयासों से ही सभी ने चन्दा करके उसी पार्क में एक मंदिर भी स्थापित करवाया है। जहां प्रतिदिन बच्चे,बड़े सभी इकट्ठे होकर कुछ समय पूजा और आरती में भी देते हैं।इसका भी मकसद सभी बच्चों बड़ों को एक जगह इकट्ठा करना और एकता के सूत्र में बांधना ही था।
क्रिस्मस
         अब तो चिक्का जी के प्रयासों से वही पार्क इतना हरा भरा हो चुका है जिसे देखकर हर किसी का मन वहां कुछ देर विश्राम करने का होगा। इसके साथ ही अब उस पार्क में चिक्का जी और अन्य बड़ों के निर्देशन में बच्चे हर त्योहार,(जन्माष्टमी, दशहरा,क्रिसमस,होली) बहुत बेहतरीन ढंग से मनाते हैं। उस पार्क में सुबह शाम रंग-बिरंगे तरह तरह के पक्षियों का कलरव गूंजता है।
बच्चों के साथ व्यस्त चिक्का
            इन्हीं पक्षियों के कलरव से ही प्रेरित होकर चिक्का ने यह फ़िल्म मेरे आंगन में आओ बहुत ही सीमित साधनों में बनायी। इस फ़िल्म में भी बच्चों का इन्वाल्वमेण्ट बताता है कि चिक्का जी बच्चों के भविष्य,उन्हें दिये जाने वाले संस्कारों,उन्हें दिये जाने वाले प्रकृति और पर्यावरण को लेकर कितने अधिक संवेदनशील हैं।काश कि बच्चों और पर्यावरण के प्रति यही संवेदनशीलता दुनिया के हर व्यक्ति में आ सके-------।
                          --------
हेमन्त कुमार

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कुछ लघु कविताएं

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

औरत 
हाथ  के  फफोले 
सूख  गए  सब 
आंसुओं  के  तेजाब  में 
अब   तो  ऑंखें 
उगलती  हैं  आग 
और  हाथ  सहलाते  हैं
दरांती  की   पैनी  धा  को 
किसी  बलात्कारी  को  देख  कर 
0000
 सन्नाटा
कमरे का सन्नाटा
टूटता है कबूतरों की गुटरगूं
और चमगादड़ों की
फ़ड़फ़ड़ाहट से
कमरे में तरतीब से
रखा हर सामान
बयां करता है
कमरे के कभी आबाद
रहने की कहानियां।
000
समय
रेत बन कर के समय
मुट्ठियों से गिर रहा
हम घड़ी की सूइयों की
नोक में उलझे रहे।
000
स्वतंत्रता
कुछ शब्द
नहीं बंधना चाहते
पंक्तियों में
क्योंकि
वे स्वयं में
एक ग्रन्थ हैं।
0000
हेमन्त कुमार

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सूरज सी हैं तेज बेटियां -------

शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

          31 अक्टूबर का दिन भारत ही नहीं पूरी दुनिया के लिये बहुत खास था। खास इस लिये कि इसी दिन दुनिया के सात अरबवें शिशु का जन्म हुआ। और वह भी एक लड़की के रूप में। हमारे अपने प्रदेश लखनऊ के माल कस्बे में पैदा हुयी नरगिस को दुनिया की सात अरबवां  शिशु बनने का गौरव मिला। पूरी दुनिया से उसे बधाइयां मिली। वह अखबारों,न्यूज चैनल की सुर्खियों में आई। धरती पर नरगिस का खूब जोरदार स्वागत हुआ।संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून से लेकर मल्लिका सारभाई,सुनीता नारायण जैसी हस्तियों और तमाम स्वयंसेवी संस्थाओं ने नरगिस के उज्ज्वल भविष्य की कामना की।कुल मिलाकर पूरी दुनिया में उसके पैदा होने की चर्चा से एक जश्न का माहौल बन गया।एक तरह से देखा जाय तो दुनिया भर की बेटियों के लिये यह बहुत ही शुभ अवसर था।
        लेकिन अगर हम सच्चाई की बात करें तो हमारे देश में परिदृश्य काफ़ी भयावह है। हमारे देश और समाज में आज भी लड़कियों को वह दर्जा नहीं मिल सका जो उसे मिलना चाहिये।आज भी हमारे देश में कन्या का जन्म एक अभिशाप माना जा रहा है। तमाम सरकारी कानून और बन्दिशों के बावजूद आज भी लोग पैथालाजी सेन्टर्स पर जाकर भ्रूण लिंग परीक्षण करवा रहे हैं।आज भी ऐसी बर्बर मानसिकता के लोग हैं जो आनर किलिंग जैसे पाशविक कारनामे करते हैं। आज भी सड़क पर चलने वाली लड़कियां सुरक्षित नहीं। और इसी का नतीजा है कि 2011 की जनगणना के अनुसार हमारे देश में शून्य से छह साल की उम्र में एक हजार लड़कों के पीछे लड़कियों की संख्या महज 914हो गयी है।यानि कि लड़के लड़कियों की संख्या में भी अन्तर बढ़ रहा है।
           यहां सवाल यह उठता है कि यह अन्तर कम कैसे किया जाय?लोगों की मानसिकता कैसे बदली जाय?लड़कियों को उनका हक कैसे दिलवाया जाय?समाज की सोच कैसे बदली जाय?
     हमें इन प्रश्नों का उत्तर सीधे अपने परिवार से ही ढूंढ़ना पड़ेगा।क्योंकि परिवार हमारे समाज की इकाई है।परिवार से ही लड़की और लड़के के बीच अन्तर की शुरुआत होती है। और  इस अन्तर को खतम करने की शुरुआत और रास्ते भी हमें अपने परिवार में ही बनाने होंगे। सबसे पहले हमें यह देखना होगा कि परिवार में हम किस तरह से अपने ही बच्चों में यह भेद पैदा कर रहे हैं।
  • शिशु के जन्म का उत्सव:आज इतने शिक्षित, सभ्य और सुसंस्कृत हो जाने के बावजूद बहुत से परिवार आपको ऐसे मिलेंगे जहां बेटे के पैदा होने पर तो अच्छा खासा जश्न मनाया जाता है। लेकिन अगर कहीं गलती से पैदा होने वाला शिशु बेटी है तो उसके पैदा होने पर जश्न की मात्र औपचारिकता निभा दी जाती है। घर वालों में वह उत्साह नहीं दिखता जो एक नवागत के आने पर होना चाहिये।
  • खानपान में अन्तर:मेरे समझ में यह बात आज तक नहीं आई कि परिवार में खाना खाते समय घर के पुरुषों,लड़कों को खाना पहले क्यों परोसा जाता है और महिलाओं और लड़कियों को बाद में? अगर लड़कियों को पहले खाना खिला दिया जायेगा तो क्या खाना खतम हो जायेगा या उसकी महत्ता कम हो जायेगी? घरों की बात छोड़िये अगर आप शादी विवाह या किसी अन्य समारोह में जायेंगे तो वहां भी यही रीति अपनायी जाती है। जबकि हम हमेशा नारा देते हैं लेडीज फ़र्स्ट का।इतना ही नहीं अक्सर हम यह मानकर कि लड़कों को ज्यादा मेहनत करनी हैउन्हें अधिक पोषक खाना देते हैं और लड़कियों को कम। क्या लड़कियों को पोषण की जरूरत नहीं है?(जबकि सच्चाई यह है कि लड़कियां ज्यादा शारीरिक श्रम करती हैं,उन्हें भविष्य में मां भी बनना है इस दृष्टि से भी उन्हें ज्यादा पोषक खाने की जरूरत रहती है।
  • घरेलू काम काज:आज भी हमरे परिवारों की मनसिकता यही बनी है कि घरेलू कामकाज लड़कियों की जिम्मेदारी है। अगर आपका बेटा बेटी दोनों सामने हैं तो हमेशा आप कहते हैं कि बिटिया जरा एक गिलास पानी पिलानान कि बेटा जरा एक गिलास पानी लाओ। ऐसा हम क्यों करते हैं? यदि पति पत्नी दोनों ही सर्विस करने वाले हैं तो घर लौटने पर पति पत्नी से उम्मीद करता है कि वो एक प्याली चाय बना कर उसे दे। कभी खुद इस दिशा में पहल नहीं करता।घर की सब्जी काटना,बर्तन,चूल्हा चौका,कपड़े धोना इन सबके लिये हम परिवार की लड़कियों को ही क्यों आदेश देते हैं। लड़कों को क्यों नहीं? हमे अपनी इस सोच और मानसिकता को बदलना ही होगा।
  • शिक्षा दीक्षा:अपने ही बच्चों को शिक्षा देने के मामले में भी हम हमेशा लड़कों को ही स्कूल भेजने की दिशा में पहल करते हैं। लड़कियों को बाद में यह अवसर देते हैं।जबकि लड़कियों को शिक्षित करना ज्यादा जरूरी है। इस दृष्टि से कि उसे तो दो घरों की(आपके और ससुराल के) की जिम्मेदारियां सम्हालनी हैं। लड़का तो बस आपके ही परिवार को चलायेगा। यद्यपि इस दिशा में हमारे समाज की सोच थोड़ा तो बदली है लेकिन उतनी नहीं जितनी बदलनी चाहिये। हमें इस बिन्दु पर खास तौर से अधिक ध्यान देने की जरूरत है। कहीं कहा भी गया है कि मां ही पहली शिक्षक होती है। यानि कि आपकी लड़की का पढ़ना लिखना इस लिये भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि वह भविष्य में मां बनेगी। अगर वह पढ़ी लिखी रहेगी तो आपके ,ससुराल के घर को स्सुव्यव्स्थित रूप से संचालित करने के साथ ही अपने शिशु को शिक्षित,संस्कारित करके देश को एक अच्छा जिम्मेदार नागरिक भी प्रदान करेगी।
  • खेलकूद एवम अन्य गतिविधियों के अवसर:आम भारतीय परिवारों में अक्सर यह दृश्य देखने को मिलता है कि लड़के लड़की दोनों स्कूल से आये।और लड़का तो आते ही बस्ता एक तरफ़ फ़ेंक कर भागा सीधे मैदान की ओर। दोस्तों के साथ खेलने के लिये। और लड़की बेचारी बस्ता रखते ही जुट गई मां के साथ घरेलू कामों में हाथ बटाने के लिये। और परिवार का मुखिया यानि पिता बड़े गर्व से अपने दोस्तों,रिश्तेदारों से यह कहता है कि देखो मेरी बिटिया कितनी समझदार है जो स्कूल से आते ही घर के काम में जुट गई। बात उनकी सही है---लड़की तो समझदार है ही। लेकिन क्या उसको खेलने कूदने मनोरंजन का अवसर नहीं मिलने चाहिये?वो खुद कभी अपनी बिटिया से यह कहते कि बिटिया जाओ तुम भी थोड़ी देर अपनी सहेलियों के साथ खेल कूद आओ। लाओ घर के काम मैं करवा देता हूं। हमें अपने परिवारों की यह मानसिकता भी बदलने की जरूरत है।
  • कपड़े पहनावे के स्तर पर अन्तर:कभी भी कोई त्योहार या उत्सव होगा नये कपड़े बनवाने का अवसर हम परिवार में सबसे पहले लड़के को देते हैं। लड़कियों का नम्बर बाद में आता है?क्यों भाई?क्या लड़की को नये कपड़े पहनने का हक नहीं?या उसके कपड़े बनवाने पर आपका खजाना खतम हो जायेगा। आप पहले लड़कियों के कपड़े बनवाने की बात क्यों नहीं करते?हमें इस सोच को भी बदलने की आवश्यकता है।
  • शादी विवाह का निर्णय:लड़के लड़की के अन्तर का सबसे अहम प्रश्न और महत्वपूर्ण बिन्दु है यह हमारे भारतीय समाज का। हम अपने बेटे की शादी तय करते समय तो लड़की देखने,पसन्द नापसन्द,पढ़ाई लिखाई हर मुद्दे पर अपने बेटे को अपने साथ रखते हैं।उसकी सलाह लेते हैं।उसके कहने पर कई कई लड़कियों को देख कर रिजेक्ट कर देते हैं।लेकिन लड़की के लिये?क्या कभी हम शादी विवाह के समय उसकी पसन्द नापसन्द के बारे में सोचते हैं।या उससे पूछते हैं कि बेटी तुम्हें किस नौकरी वाले लड़के को अपना जीवन साथी बनाना है? या कि अभी तुम विवाह करने के लिये मानसिक रूप से तैयार हो? क्या लड़कियों को अपने जीवन साथी के बारे में निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं है? क्या वह मात्र एक हाड़ मास की पुतली है जिसे हम किसी भी व्यक्ति के साथ बांध कर अपने उत्तरदायित्व से छुटकारा पा जाना चाहते हैं?भारतीय समाज और परिवार की इस सोच को भी बदलना ही होगा। तभी हम लड़कियों की बराबरी का दर्जा देने के स्वप्न को पूरा कर सकेंगे।
  • ये कुछ ऐसे महत्वपूर्ण बिन्दु हैं हमारे समाज और परिवार के जिन पर चिन्तन करके,जिनमें बदलाव लाकर ही हम दुनिया की सात अरबवीं शिशु बनने का गौरव पाने वाली प्यारी बिटिया नरगिस और उसके जैसी दुनिया भर की सभी बेटियों को उनका हक़,सम्मान,और समाज में उनकी प्रतिष्ठा को बढ़ा सकेंगे।और कवियत्री पूनम श्रीवास्तव के गीत बेटियां की इन पंक्तियों को साकार कर सकेंगे।
  • सूरज से हैं तेज बेटियाँ/चाँद की शीतल छाँव बेटियाँ/झिलमिल तारों सी होती हैं/दुनिया को सौगात बेटियाँ/कोयल की संगीत बेटियाँ/पायल की झंकार बेटियाँ/सात सुरों की सरगम जैसी/वीणा की वरदान बेटियाँ/घर की हैं मुस्कान बेटियाँ/लक्ष्मी का हैं मान बेटियाँ/माँ बापू और कुनबे भर की/सचमुच होती जान बेटियाँ
                  00000000000
डा0हेमन्त कुमार

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बाजू वाले प्लाट पर

रविवार, 11 दिसंबर 2011

कुछ बच्चे रहते हैं
मेरी बिल्डिंग के
बाजू वाले प्लाट पर
प्लाट पर बनी झोपड़ियों में
बन्द है उनका
अनोखा अद्भुत संसार।

झोपड़ी के एक कोने में है
उनका किचेन
दूसरा कोना बेडरूम
तीसरा ड्राइंग रूम
बाहर का मैदान है उनका
ओपेन टायलेट
जहां वे हगते मूतते
और नाक छिनकते हैं।

इसी झोपड़ी में खोलते हैं
वे आंखें
इसी में खेलते हैं
लड़ते हैं झगड़ते हैं
करते हैं धमाचौकड़ी
उठा पटक और लत्तम पैजार।

फ़िर निकल पड़ते हैं
कन्धे पर एक फ़टा बोरा
और हाथ में एक छड़ी लेकर
पूरे दिन भर के सफ़र पर
शहर की सड़कों की लम्बाई नापने
कूड़े के ढेर से पालीथिन बीनने
और जिन्दगी का गणित
समझने कए लिये।

लम्बी लम्बी सड़कों पर भागता ट्रैफ़िक
गली के नुक्कड़ पर कूड़े का ढेर
शहर की ऊंची बिल्डिंगों का हुजूम
सिनेमा के बड़े बड़े पोस्टर
मल्लिका की देह,ऐश्वर्या के उभार
चाय की चुस्की,बीड़ी का सुट्टा
यही सब है
इन बच्चों का ओपेन स्कूल।

ये बच्चे
देखते हैं बड़ी हसरत भरी निगाहों से
रोज सबेरे हमारे बच्चों को
स्कूल जाते हुये
शाम को घूमने जाते हुये
रात में बर्थ डे पार्टियों में
ठुमके लगाते हुये।

ये बच्चे झांकते हैं
कभी कभी
हमारी बिल्डिंग के भीतर भी
पर नहीं आते अंदर कभी
शायद नहीं पसन्द है उन्हें
अपनी झोपड़ी के
अनोखे अद्भुत संसार को
छोड़ना या उससे बिछुड़ना।
0000
हेमन्त कुमार

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