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“शब्दों,भावनाओं और प्रकृति का अनूठा कोलाज—“उन्मेष”

शुक्रवार, 21 मार्च 2014

पुस्तक समीक्षा
                                                   
                                     पुस्तक :उन्मेष
कवियत्री:मानोशी


प्रकाशक: अंजुमन प्रकाशन
इलाहाबाद।
मूल्य: रू0200/- मात्र।
प्रथम संस्करण:2013

       आज की हिन्दी कविता सामाजिक सरोकारों से ज्यादा जुड़ी है। इसमें व्यवस्था का विरोध है।आम आदमी की चिन्ताएं हैं।देश,समाज,प्रकृति,पर्यावरण,राजनीति जैसे सरोकारों को लेकर वैश्विक स्तर की सोच है।और इन्हीं सरोकारों,संदर्भों और चिन्ताओं के अनुरूप ही आज की हिन्दी कविता का शिल्प,भाषा और बुनावट भी है। नई कविता की शुरुआत के साथ ही उसके शिल्प,रचनात्मकता,भाषा और बुनावट में भी तरह-तरह के प्रयोग और बदलाव होते रहे हैं। इन प्रयोगों और बदलावों का हिन्दी काव्य पर सकारात्मक और नकारात्मक दोनो तरह का प्रभाव पड़ा। सकारात्मक यह कि कविता के पाठको को नये बिम्ब,नये गठन और शिल्प की प्रयोगधर्मी रचनाए पढ़ने को लगातार मिल रही हैं। नकारात्मक यह कि काव्य से गेय तत्व क्रमशः कम होने लगा। छंदात्मक रचनाए कम लिखी जाने लगी।सपाट बयानी का पैटर्न धीरे-धीरे हिन्दी काव्य पर हावी होने लगा। लोगो में कविता पढ़ने के प्रति रुझान कम होने लगी।
                और आज हिन्दी कविता का जो परिदृश्य है उसमे उन्मेष जैसे काव्य संकलन को पढ़ना अपने आप मे एक बहुत ही कोमल और सुखद अनुभूतियों से रूबरू होना है। कनाडा में  रह रहीं युवा कवियत्री मानोशी के प्रथम काव्य संकलन उन्मेष को पढ़ना हिन्दी कविता की एक अद्भुत यात्रा से गुजरने जैसा है। एक ऐसी यात्रा जिसमें मानवीय संवेदनाएं हैं,प्रेम है,प्रकृति के विभिन्न रंग हैं,नई और ताजी अनुभूतियां हैं तो साथ ही सामाजिक सरोकार और मार्मिकता भी है।
               उन्मेष संकलन में मानोशी ने काव्य के तीन रूपों को संकलित किया है।गीत,गज़ल और छंदमुक्त कविता। इनमें भी गीत और गज़ल अधिक हैं कविताएं कम। संकलन के अंत में कुछ हाइकु,क्षणिकाएं और दोहे भी हैं।
   मानोशी  के गीतों की बात शुरू करने से पहले मैं इस बात का उल्लेख जरूर करना चहूंगा कि लगभग 2008में इंटरनेट से जुड़ने और अपना ब्लाग शुरू करने के दौरान ही मैं उनके ब्लाग मानसी तक पहुंचा था।उस समय इनकी रचनाएं भी ब्लाग पर अधिक नहीं थीं। पर इनके कुछ गीतों को पढ़ कर ही मैंने उसी समय मानोशी से कहा था कि आप की रचनाओं पर छायावाद का काफ़ी प्रभाव है। और आपकी रचनाएं पढ़ते वक्त बार-बार महादेवी जी की याद आती है।
                मानोशी के गीतों में जो नयापन,ताज़गी,प्रकृति के प्रति सम्मोहन है वह आज की युवा कवियत्रियों में कम ही दिखाई पड़ती है। उनका प्रकृति से लगाव और प्रकृति के निरीक्षण की सूक्ष्मता हमें संकलन के पहले ही गीत पतझड़ सी पगलाई धूप में देखने को मिलता है।

पतझड़ सी पगलाई धूप।
भोर भैइ जो आंखें मींचे
तकिये को सिरहाने खींचे
लोट गई इक बार पीठ पर
ले लम्बी जम्हाई धूप।
अनमन सी अलसाई धूप।
 अब धूप का पीठ पर लोटना,लम्बी जम्हाई लेना,अलसाना जैसे खूबसूरत बिंब हमारे सामने शब्दों के द्वारा सुबह के समय की धूप,सूरज---का अद्भुत कोलाज बनाते हैं। ऐसा लगता है धूप ने एक मानवीय आकार ग्रहण कर लिया हो और वह कवियत्री के समक्ष अपनी विभिन्न क्रीड़ाओं का प्रदर्शन कर रही हो।
          इसी गीत के अंतिम छंद में फ़ुदक  फ़ुदक खेले आंगन भर---खाने खाने एक पांव पर। पंक्तियों को आप देखिये आप कल्पना करिये कि धूप आंगन में एक-एक खाने पर पांव रख कर फ़ुदक रही है। जैसे बच्चे चिबड्डक या सिकड़ी के खेल में करते हैं। प्रकृति के विभिन्न रूपों,खेलों और छवियों का ऐसा अद्भुत वर्णन ही मानोशी के गीतों को अन्य युवा कवियत्रियों से अलग स्थान प्रदान करता है।
सखि वसंत आया”—गीत को अगर किसी पाठक के सामने एक अलग पन्ने पर लिखकर दिया जाय तो शायद उसे विश्वास ही नहीं होगा कि यह गीत आज की किसी युवा कवियत्री की रचना है। वह इसे निश्चित रूप से छायावादी काल की ही रचना मान बैठेगा।
   मानोशी ने अपने कुछ गीतों गर्मी के दिन फ़िर से आए,पुनः गीत का आंचल फ़हरा,संध्या आदि में जहां प्रकृति को बहुत गहराई तक महसूस करके उनका बहुत सूक्ष्म चित्रण किया है वहीं लौट चल मन,क्या यही कम है,कौन किसे कब रोक सका है,कोई साथ नहीं देता,प्रिय करो तुम याद आदि  गीतों में उन्होंने मानवीय संवेदनाओं और प्रेम की घनीभूत अनुभूतियों को अपना विषय बनाया है।मानोशी का प्रेम भी साधारण प्रेम नहीं है। वह पाठकों को हृदय के भीतर गहराई तक आन्दोलित कर जाने वाला प्रेम है।
हूक प्रेम की शूल वेदना
अंतर बेधी मौन चेतना
रोम रोम में रमी बसी छवि
हर कण अश्रु सिक्त हो निखरा
धूमिल धुंधला अंग न बदला।
उनके प्रेम में हमें विरह की वेदना सुनाई पड़ती हैहाय मैं वन वन भटकी जाऊं, तो दूसरी ओर समर्पण और पूर्णता का एक अनोखा रूप भी दिखाई पड़ता है--दीप बन कर याद तुम्हारी—”
       उन्मेष में संकलित मानोशी के तीस गीतों में हमें प्रकृति,मानवीय संवेदनाओं,अनुभूतियों और प्रेम के अनेकों इन्द्रधनुष खिलते बिखरते दिखाई देते हैं।अगर हम गज़लों की बात करें तो इसमें संकलित 21 गज़लों में हमें मानव जीवन के तमाम रंग और रूप दिखाई देते हैं।मानोशी की गज़लों की खास बात इसकी सहजता,सरलता और बोधगम्यता है।गज़लें पढ़ते समय हमें कहीं पर भी उसे समझने या उसका सार ग्रहण करने में कठिनाई नहीं महसूस होती है।
 इस संकलन में 10 मुक्त छंद,कुछ हाइकु,क्षणिकाएं और दोहे भी हैं। मानोशी की इन रचनाओं का भी सरोकार प्रकृति के निरीक्षण,प्रेम और मानवीय संवेदनाओं से ही जुड़ा है। अपनी कविता बेघर में जब मानोशी कहती हैं घुटनों से भर पेट/फ़टे आसमां से ढक बदन/पैबंद लगी जमीन पर/सोता हूं आराम से। तो अचानक ही हमें निराला की भिक्षुक कविता की याद आती है---पेट पीठ दोनों मिल कर हैं एक/चल रहा लकुटिया टेक---।
         कुल मिलाकर उन्मेष में मानोशी ने मानवीय संवेदनाओं,प्रकृति से जुड़ी अनुभूतियों और प्रेम के विविध रंगों को शब्दों में पिरोकर काव्यचित्रों का जो अद्भुत अनोखा संसार सृजित किया है वह कवियत्री के रचनाकर्म की सबसे बड़ी सार्थकता है।
          यहां एक बात मैं और कहना चाहूंगा वह यह कि यद्यपि मानोशी की रचनाएं अभी तक सिर्फ़ अपने ब्लाग मानसी और अंतर्जाल की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में ही प्रकाशित होती रही हैं। लेकिन उन्मेष हमें इस बात के प्रति पूरी तरह आश्वस्त करता है कि मानोशी आने वाले समय में हिन्दी कविता में निश्चित रूप से अपनी एक अलग पहचान बना लेंगी।
                              0000
डा0हेमन्त कुमार


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एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम-----

रविवार, 9 मार्च 2014

आदरणीय नेता जी,
सादर चरणस्पर्श।
        आशा करता हूं अन्य सभी प्रत्याशियों की ही तरह आप भी अपने चुनाव की तैयारी में व्यस्त हो चुके होंगे।लोगों से चन्दा इकट्ठा करने से लेकर हर मुहल्ले,गांव,गलीसभी की यात्रायें आप भी शुरू कर चुके होंगे।घर घर जाकर लोगों से वोट देने की सिफ़ारिश कर रहे होंगे।आखिर पांच सालों के बाद ही लोगों से मुलाकात करने का जो मौका मिलता है।यही तो वो अवसर होता है जब आम जनता के साथ आप अपनी सारी नातेदारियां,सम्बन्ध जोड़ने की कोशिश करते हैं।बस इस अवसर के बाद तो हमारे मां-बाप,अध्यापक,बड़े बूढ़े,गांव के,शहर के सभी लोग, आपको ढूंढ़ते ही रह जायेंगे---सर्फ़ एक्सेल के दाग की तरह।और आप कहीं नजर ही नहीं आयेंगे।
             अगर आप चुनाव जीत गये तो देश के बहुत सारे महत्वपूर्ण कामों में संलग्न हो जायेंगे।मसलन तरह तरह के घोटाले करने,देश के विकास के लिये इकट्ठा जनता की खून पसीने की कमाई के धन को अपने बैंक एकाउण्ट्स में जमा करवाने,अपने विरोधियों को एक एक कर रास्ते से हटाने,समय समय पर देश के विकास के नाम पर विदेश यात्रायें करने,किसी अबला नारी का शोषण करने और बाद में उसकी हत्या करवाकर अपनी प्रतिष्ठा बचाने-----ऐसे ढेरों काम होंगे आपके पास। भला ऐसे में आपको देश की जनता से मिलने,उसकी खैरियत जानने की फ़ुर्सत कहां मिलेगी?
   खैर यह तो आपकी और देश की जनता की आपसी बात है मैं इस पचड़े में क्यों पड़ूं।मैं अब अपने मूल मुद्दे पर आ रहा हूं।
          मैं आप सभी को यह चिट्ठी खास तौर से यह जानने के लिये लिख रहा हूं कि इन चुनावों में कभी हमारे यानि कि बच्चों की बात को मुद्दा क्यों नहीं बनाया जाता।मुझे बहुत आश्चर्य इस बात पर होता है कि इस देश में चुनाव जीतने के लिये हर पार्टी अपना कोई न कोई  मुद्दा जरूर बनाती है।कोई देश से गरीबी खतम करने का तो कोई बेरोजगारी खतम करने का।कोई पूरे देश में हजारों उद्योग धंधे लगाने को तो कोई गांव गांव तक बिजली,पानी पहुंचाने को।कोई कहता है हम हरित क्रान्ति ला देंगे,तो कोई चिल्लाता है कि हम हर घर के एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी की गारण्टी लेते हैं।जितने नेता उतने ही मुद्दे।
  जब देश के विकास के सारे मुद्दे खतम तो मन्दिर मस्जिद का मुद्दा,धर्म सम्प्रदाय का मुद्दा,जाति बिरादरी का मुद्दा,आरक्षण देने का मुद्दा---कहां तक गिनाऊं नेता जी ---आप लोगों के पास तो मुद्दों का कोई खजाना गड़ा हुआ है।चुनाव आया नहीं कि मुद्दे निकलने शुरू।अब वो मुद्दे पूरे होंगे या नहीं इस बात की गारण्टी तो न आप लेते हैं न ही आपकी पार्टी।और फ़िर इनके पूरे होने की जरूरत भी क्या है।ये तो आप लोग सिर्फ़ जनता को रिझाने,उसे भरमाने के लिये ही अपने चुनावी एजेण्डे में डालते हैं। चुनाव खतम आप चुन लिये गये विधायक या मंत्री बन गये बस इन मुद्दों की बात भी खतम।अगले चुनाव में फ़िर नये मुद्दे निकाले जायेंगे।
        लेकिन मेरे सम्माननीय,आदरणीय नेता जी लोग आपसे मैं  इस भारत देश के सारे बच्चों की ओर से पूछना चाहता हूं कि किसी भी चुनाव में आप लोग हमें यानि बच्चों को मुद्दा क्यों नहीं बनाते?क्या हम लोग इस देश में नहीं रहते?या हमारा इस भारत देश से कोई नाता नहीं है?क्या हम यहां के नागरिक नहीं माने जाते?फ़िर क्यों हमारे साथ ऐसा व्यवहार किया जा रहा है कि देश का कोई भी नेता चुनाव के समय हमें,हमारी बिरादरी,हमारे विकास,हमारे बचपन को मुद्दा क्यों नहीं बनाता है?
     एक तरफ़ तो आप बड़े लोग यह भी कहते हैं कि बच्चे ही हमारे देश के भविष्य हैं,इन्हीं के कन्धों पर कल राष्ट्र का भार आना है,ये ही हमारे देश का नाम रौशन करेंगे---और दूसरी तरफ़----चुनाव के समय हम पूरी तरह से गायब।न ही आप हमारे किसी हित को मुद्दा बना रहे,न ही हमारे भविष्य की बात कर रहे,नही हमारी शिक्षा,हमारे स्वास्थ्य,हमारे अधिकारों,को चुनावी मुद्दा बना रहे।आखिर माजरा क्या है?कहीं यह हमारे खिलाफ़ कोई साजिश तो नहीं रच रहे आप लोग?इसलिये कि हम अबोध हैं,हम आपकी तरह खुद को स्थापित करने के लिये हर तरह के हथकण्डे नहीं अपना सकते,हम कमजोर हैं,हम सच्चे और पवित्र दिल,आत्मा वाले कहे जाते हैं?
       आदरणीय नेता जी,एक अनुरोध मैं सभी बच्चों की तरफ़ से आपसे और करना चाहूंगा किआप भले ही हम बच्चों को अपने चुनाव का मुद्दा न बनायें।यह हमें मंजूर है। लेकिन चुनाव जीत जाने,विधायक या मंत्री संत्री बन जाने के बाद कम से कम आप लोग इतना तो कर ही सकते हैं कि---
(1)      हमारी शिक्षा के लिये आवंटित धन का कुछ हिस्सा तो हमारी शिक्षा पर ही खर्च करवायें।बाकी को अपना बैंक बैलेंस बढ़ाने,विभाग के अधिकारियों से लेकर सभी हाकिम हुक्कामों की ऐयाशी पर खर्च करें।।
(2)      मुझे आशा है कि आप हमारे स्वास्थ्य की रक्षा के लिये आवंटित कुल धन का सिर्फ़ पचास प्रतिशत ही हमारे ऊपर खर्च करके लाखों की संख्या में मरने वाले हमारे भाई बहनों को जरूर बचा सकते हैं।बाकी का सारा धन आप कहीं भी खर्च करने के लिये स्वतन्त्र हैं।उससे चाहे अपनी कोठियां बनवाइये या फ़िर फ़ार्म हाउस खरीदिये।
(3)      सुना हैविश्व बैंक के अलावा भी युनिसेफ़,यु एन डी पी,डब्ल्यू एफ़ पी, जैसी विश्व स्तर की कई एजेंसियां भी हम बच्चों के विकास,शिक्षा,स्वास्थ्य आदि के लिये बहुत ढेर सारा रूपया देती हैं।आप चुनाव जीतने के बाद जरा पता करियेगा कि आखिर वो सारा रुपया जाता कहां है?कहीं ऐसा तो नहीं कि आपके ही हाकिम हुक्काम लोग सारा धन आपस में ही बांट लेते हों और आपको खबर भी न लग पाती हो?क्योंकि उस पैसे से जितना विकास हम बच्चों का होना चाहिये वो तो हो नहीं रहा। फ़िर जाता कहां है वो धन?
(4)      माननीय नेता जी,ये तो आप भी जानते होंगे कि शिक्षा ही किसी देश के विकास की असली सीढ़ी है।फ़िर देश की आजादी के इतने बरस बीत जाने के बाद भी आप भारत में पूर्ण साक्षरता क्यों नहीं लागू कर पाये?आज भी देश में इस शिक्षा के लिये तरह तरह के अभियान चलाने की जरूरत क्यों पड़ रही है?
(5)      या कहीं ऐसा तो नहीं कि आपके मन में यह डर कहीं छिपा बैठा हो कि अगर देश के सारे लोग पढ़ लिख लेंगे,अपना भला बुरा समझने लगेंगे,सफ़ेद स्याह का अन्तर जान जायेंगे तो इस देश की हुकूमत आप लोगों के हाथों से निकल जायेगी?यहां कि जनता आपसे आपके द्वारा किये गये एक एक कार्य का हिसाब मांगने लगेगी।
(6)      महोदय, मैं आपको आश्वस्त करना चाहता हूं कि अभी इस देश में ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला जो आपकी हुकूमत छीन सके।बस आप लोग किसी तरह ऐसा पुख्ता बन्दोबस्त कर दें कि इस देश का विकास अगले सौ सालों तक इसी गति से हो जिस गति से आप चाहें।बस आपका काम पूरा।न लोग जागृत होंगे न ही उनमें समझ पैदा होगी न ही आपका राज पाट छीनेगा।
     माननीय महोदय,आशा करता हूं कि आप मुझ अबोध की बातों पर अवश्य ध्यान देंगे।      और अगर इस अबोध ने आपके सम्मान में कुछ गलत कह दिया हो तो उसे भी आप एक        शिशु की नादानी समझ कर माफ़ कर देंगे।अपनी अगली चिट्ठी में मैं आपसे कुछ और भी        बातें करूंगा।सादर।
  आपके गांव का
  एक बच्चा
                               0000
     ड़ा0हेमन्त कुमार

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लघुकथा-- एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें

शनिवार, 18 जनवरी 2014

(फ़ोटो--गूगल से साभार)
शहर का एक प्रमुख पार्क।पार्क के बाहर गेट पर बैठा हुआ एक अत्यन्त बूढ़ा भिखारी।बूढ़े की हालत बहुत दयनीय थी।पतला दुबला, फ़टे चीथड़ों में लिपटा हुआ।पिछले चार दिनों से उसके पेट में सिर्फ़ दो सूखी ब्रेड का टुकड़ा और एक कप चाय जा पायी थी।बूढ़ा सड़क पर जाने वाले हर व्यक्ति का ध्यान आकर्षित करने के लिये हांक लगाता----खुदा के नाम परएक पैसा इस गरीब कोभगवान भला करेगा।सुबह से उसे अब तक मात्र दो रूपया मिल पाया था,जो कि शाम को पार्क का चौकीदार किराये के रूप में ले लेगा।
               अचानक पार्क के सामने एक रिक्शा रुका।उसमें से बाब कट बालों वाली जीन्स टाप से सजी एक युवती उतरी।युवती कन्धे पर कैमरा बैग भी लटकाये थी।यह शहर की एक उभरती हुयी चित्रकर्त्री थी ।इसे एक पेण्टिंग के लिये अच्छे सब्जेक्ट की तलाश थी।बूढ़े को कुछ आशा जगी और उसने आदतन हांक लगा दी----भगवान के नाम पर----
                युवती ने घूम कर देखा।बूढ़े पर नजर पड़ते ही उसकी आंखों में चमक सी आ गयी।वह कैमरा निकालती हुयी तेजी से बूढ़े की तरफ़ बढ़ी।बूढ़ा सतर्क होने की कोशिश में थोड़ा सा हिला।
        प्लीज बाबा उसी तरह बैठे रहो हिलो डुलो मत।और वहां कैमरे के शटर की आवाजें गूंज उठी।युवती ने बूढ़े की विभिन्न कोणों से तस्वीरें उतारीं।युवती ने कैमरा बैग में रखा और बूढ़े के कटोरे में एक रूपया फ़ेंक कर रिक्शे की ओर बढ़ गयी।
            उसी दिन दोपहर के वक्ततेज धूप में भी बूढ़ा अपनी जगह मुस्तैद था।उसे दूर से आता एक युवक दिख गया ।बूढ़ा एकदम टेपरिकार्डर की तरह चालू हो गया।अल्लाह के नाम पर-------
           पहनावे से कोई कवि लग रहा युवक बूढ़े के करीब आ गया था।युवक ने बूढ़े को देखा।उसका हृदय करुणा से भर गया।ओह कितनी खराब हालत है बेचारे की।सोचता हुआ युवक पार्क के अन्दर चला गया।पार्क के अन्दर वह एक घने पेड़ की छाया में बेंच पर बैठ गया।बूढ़े का चेहरा अभी भी उसकी आंखों के सामने घूम रहा था।उसने अपने थैले से एक पेन और डायरी निकाली और जुट गया एक कविता लिखने में।कविता का शीर्षक उसने भी भूख रखा।फ़िर चल पड़ा उसे किसी दैनिक पत्र में प्रकाशनार्थ देने।भिखारी की नजरें दूर तक युवक का पीछा करती रहीं।

         जगह वही पार्क का गेट।शाम का समय।पार्क में काफ़ी चहल पहल हो गयी थी ।भिखारी को अब तक मात्र तीन रूपये मिले थे।वह अब भी हर आने जाने वाले के सामने हांक लगा रहा था । अचानक भिखारी ने देखा एक खद्दरधारी अपने पूरे लाव लश्कर के साथ चले आ रहे थे।उसकी आंखो में चमक आ गयी।-----अब लगता है उसके दुख दूर होने वाले हैं।उसने जोर की हांक लगाई।----खुदा के नाम पर --------
                           हांक सुन कर नेता जी ठिठक गये।बूढ़े की हालत देख कर उनका दिल पसीज गया। ओह कितनी दयनीय दशा है देश की----।
         उन्होनें तुरन्त अपने सेक्रेट्री को आर्डर दिया----कल के अखबार में मेरा एक स्टेट्मेण्ट भेज दो हमने संकल्प लिया है देश से भूख और गरीबी दूर करने का। और हम इसे हर हाल में दूर करके रहेंगे।नेता जी भिखारी के पास गये और उसे अश्वासन दिया बाबा हम जल्द ही तुम्हारी समस्या दूर करने वाले हैं------उन्होंने बूढ़े भिखारी के साथ कई फ़ोटो भी खिंचवायी।लाव लश्कर के साथ कार में बैठे और चले गये।बूढ़े की निगाहें दूर तक धूल उड़ाती कार का पीछा करती रहीं।
                       अब तक काफ़ी अंधेरा हो चुका था।पार्क में सन्नाटा छा गया था।बूढ़े ने सुबह से अब तक मिले तीन रूपयों में से दो रूपया पार्क के चौकीदार को दिया।फ़िर नलके से पेट भर पानी पीकर बेन्च पर सो गया-----अगली सुबह के इन्तजार में ।
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डा0हेमन्त कुमार

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पुस्तक समीक्षा--बचकर निकलना–मौत के चंगुल से

शनिवार, 14 दिसंबर 2013

मौत के चंगुल में
लेखक:प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव
प्रकाशक:
नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया,नई दिल्ली
               
हिन्दी उपन्यासों की तरह हिन्दी बाल उपन्यास भी एक अत्यंत आधुनिक विधा है, हिन्दी बाल उपन्यासों की एक छोटी, पर समृद्धिशील परम्परा होते हुए भी अभी तक बाल उपन्यास न तो लोकप्रिय हो पाए हैं और न ही इनकी कोई विशेष पहचान बन पाई है। इसके पीछे जो कारण नज़र आता है, वह है अर्थशास्त्र की मांग और पूर्ति का सिद्धांत।बाल उपन्यासों की मांग का पक्ष कभी भी अनुकूल नहीं रहा है।बड़ों की तरह बच्चों को हमारे यहां यह अधिकार नहीं रहा कि वे पाठ्यक्रमों से हटकर पढ़ी जाने वाली सामग्री की खरीद स्वयं करें। लेकिन अब स्थितियाँ बदल रही हैं।महानगरों से लेकर छोटे-छोटे शहरों में लगने वाले पुस्तक मेलों में बच्चों की सहभागिता बढ़ी है।उनके लिये अलग से स्टाल होते हैं,जहां वे अपनी रुचि की पुस्तकें क्रय करते हैं।इस बदलाव में नेशनल बुक ट्रस्ट की एक महत्वपूर्ण भूमिका है।

          साहस और रोमांचपूर्ण कथायें बच्चों को सदैव आकर्षित करती रही हैं।ये कथायें बच्चों में एक जिज्ञासा पैदा कर, उनकी रुचि को लगातार बनाए रखकर, उन्हें पढ़ने को तो प्रेरित करती ही हैं, साथ ही उनमें साहस और वीरता का एक ऐसा भाव भी पैदा करती हैं, जिसकी आज इस कठिन समय में उन्हें बेहद ज़रूरत है। हाल ही में नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित वरिष्ठ बाल साहित्यकार प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव का बाल उपन्यास मौत के चंगुल में एक ऐसी ही कृति है। इस उपन्यास के माध्यम से लेखक बच्चों को विश्व की एक ऐसी रोमांचकारी यात्रा पर ले जाता है, जहां कदम कदम पर उनका सामना बड़े-बड़े खतरों से होता है और उन खतरों से बच निकलना भी कम रहस्यमय नहीं है।अध्यापक वाटसन एक असामान्य एवं ज़िद्दी व्यक्ति है तो भी परिस्थितियों से हार नहीं मानता है। यही कारण है कि वह बच्चों का एक ऐसा स्कूल चलाता है,जहां लंगड़े,दृष्टिहीन एवं अपंग बच्चों के साथ पशु-पक्षी भी पारिवारिक सदस्यों की तरह रहते हैं।
         अचानक एक दिन उसने एक ऐसा निर्णय लिया, जो सबको आश्चर्य में डाल देता है।लोगों को लगा कि उसकी सनक कहीं बच्चों को मौत के मुंह तक ना पहुंचा दे, पर वह अपने फ़ैसले पर अडिग रहा।लोग उसकी मदद को आगे आये।वह एटलस नाम के एक समुद्री जहाज से करीब सात सौ बच्चों के साथ एक खतरनाक विश्व यात्रा पर निकल पड़ा।
         अपनी इस यात्रा में उसे किन-किन संकटों से गुज़रना पड़ा,इसे पढ़ना अपने आप में एक रोमांचकारी अनुभव से गुजरना है।खराब मौसम, अपाहिज बच्चे और उनके जीवन की पल-पल चिंता में लगे वाटसन ने बड़ी से बड़ी प्रतिकूल स्थितियों में भी हार नहीं मानी।न्यूयार्क बंदरगाह से सैनफ़्रांसिस्को तक ही यह यात्रा भारत होकर भी गुज़री।मुंबई आने के बाद यह यात्रा भारत दर्शन पर भी निकली।भारत की समृद्ध सांस्कृतिक परम्पराओं का भी इस यात्रा में संक्षिप्त पर प्रभावी वर्णन मिलता है।बंगाल के जंगल में सांप से जुड़ी घटना रोंगटे खड़ी कर देती है।अंत में जहाज का समुद्र में डूबना और इस संकट से उबरना इस उपन्यास का सबसे खतरनाक और रोमांचकारी पक्ष है।सांसें ठहर सी जाती हैं कि अब आगे क्या होगा।

        सत्रह उपशीर्षकों में विभाजित यह रोचक कथा बच्चों को रोज़मर्रा के जीवन से अलग हटकर एक नई दुनिया से परिचय कराती है,जिसकी उन्हें पहले से कल्पना तक नहीं होती है।बच्चों ही नहीं बड़ों को भी इस उपन्यास का पढ़ना एक ज़िदभरी रोमांचक यात्रा के दुर्लभ अनुभव से होकर गुज़रना है।इस अनुभव का आनंद केवल इसे पढ़कर ही उठाया जा सकता है।पुस्तक के साथ दिये गये चित्रकार पार्थसेन गुप्ता के चित्र भी आलेख से कम जीवांत नहीं हैं।
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 समीक्षक--
कौशल पाण्डेय
1310ए,वसंत विहार,
कानपुर 208021
मोबाइल:09389462070
         श्री कौशल पाण्डेय जी एक प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार,कवि एवं लेखक तो हैं ही एक कुशल समीक्षक भी हैं।आप वर्तमान समय में आकाशवाणी के गोरखपुर केन्द्र पर सहायक निदेशक,राजभाषा पद पर कार्यरत हैं। 

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“द्वीप लहरी”(बालसाहित्य चिंतन) और “साहित्य अमृत”(बाल-साहित्य) विशेषांकों के बहाने------।

शनिवार, 9 नवंबर 2013

             हिन्दी भाषा में बाल साहित्य को लेकर प्रबुद्ध साहित्यकारों और पाठकों के दिल और दिमाग में जमी भ्रान्तियों की धुंध इधर के वर्षों में बहुत तेजी के साथ छंटती दिख रही है।भ्रांतियां इस ढंग की कि बाल साहित्य दोयम दर्जे का साहित्य है,जो लेखक बड़ों का साहित्य लिखने में असफ़ल रहे वो बाल साहित्य लिखने लगे, या फ़िर बालसाहित्य को लेकर बड़े साहित्यकारों के बीच पसरा सन्नाटा। यह सभी स्थितियां इधर काफ़ी कुछ बदलती नजर आ रही हैं।
             इस बात का प्रमाण है पिछले कुछ वर्षों में प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा बाल साहित्य पर आयोजित वैचारिक संगोष्ठियां,सेमिनार,बाल साहित्य पर चर्चा,बाल साहित्य के प्रोत्साहन के लिये पुरस्कारों की घोषणा।इसी क्रम में कुछ प्रतिष्ठित पत्रिकाओं द्वारा बाल साहित्य विशेषांकों का प्रकाशन,कई दैनिक समाचार पत्रों द्वारा सप्ताह में एक दिन या प्रतिदिन अखबार का एक पूरा पृष्ठ बाल साहित्य को देने जैसी सुखद स्थितियों का भी उल्लेख करना यहां समीचीन होगा।
             
हाल ही में हिन्दी साहित्य कला परिषद,पोर्टब्लेयर की अर्धवार्षिक पत्रिका द्वीप लहरी का बाल साहित्य चिन्तन अंक(अगस्त-दिसम्बर,2013) और दिल्ली से प्रकाशित प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका साहित्य अमृत का बाल साहित्य विशेषांक(नवंबर-2013),इस बात के प्रमाण हैं कि विचार विमर्श,बात-चीत और चिन्तन की दृष्टि से आज की तारीख में हिन्दी का बाल साहित्य में काफ़ी कुछ नया हो रहा है। और साथ ही हिन्दी का बाल साहित्य पर कार्य सिर्फ़ बड़े संस्थानों द्वारा ही नहीं किया जा रहा।
      यहां मैं पहले बाल साहित्य चिन्तन पर केन्द्रित द्वीप लहरी पत्रिका के अंक की चर्चा करना चाहूंगा। आकर्षक साज-सज्जा और गंभीर वैचारिक विषय वस्तु से परिपूर्ण इस अंक के अतिथि संपादक डा0बलराम अग्रवाल जी हैं।द्वीप लहरी के इस विशेषांक में हिन्दी बाल साहित्य के वर्तमान परिदृश्य पर तो चिंतन किया ही गया है।साथ ही इसकी ऐतिहासिक पृष्ठ भूमि पर भी विचार विमर्श से पूर्ण सामग्री दी गयी है। प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार श्री बंधु कुशवर्ती ने आजादी के पहले से अभी तक के बाल साहित्य के पूरे परिदृश्य पर एक अच्छा तथ्यपूर्ण और समीक्षात्मक लेख दिया है। इस लेख से निश्चित रूप से बाल साहित्य के शोधार्थियों और चिन्तकों ल्को लाभ मिलेगा। पत्रिका में डा0प्रकाश मनु,डा0हरिकृष्ण देवसरे,डा0ओम प्रकाश कश्यप जैसे प्रतिष्ठित बाल साहित्य चिन्तकों के लेखों में जहां बाल साहित्य,बाल उपन्यास,बाल कहानियों एवम बालगीतों पर समीक्षात्मक चर्चा है वहीं अनिल पतंग,राजकमल,देवेन्द्र मेवाड़ी,,डा0दिविक रमेश,डा0हेमन्त कुमार के लेखों में बाल रंग मंच,कार्टून चित्रों,परियों,फ़ैण्टेसी,विज्ञान कथाओं और इण्ट्रनेट के चैट बाक्स तक की सम्यक चर्चा है। महावीर प्रसाद जैन जी का संस्मरणात्मक लेखपराग के वे दिन हमें जहां बचपन के दिनों में वापस ले जात है वहीं राजेश उत्साही और रमेश तैलंग द्वारा की गयी पुस्तक समीक्षाएं हमारे अंदर समीक्षित पुस्तकों को पढ़ने की लालसा पैदा करती हैं।इस अंक के अन्य रचनाकारों में सुधा भार्गव,आशा शैली,जय प्रकाश कर्दम,रूप सिंघ चन्देल,श्याम जगोता,राजीव सक्सेना,डा0नागेश पाण्डेय,जे बी शर्मा,डा0व्यास मणि त्रिपाठी और जय प्रकाश शुक्ल हैं।
      कुल मिलाकर द्वीप लहरी का यह बाल साहित्य चिंतन अंक बाल साहित्य के पाठकों,शोधार्थियों एवं समीक्षकों के लिये एक संग्रहणीय और उपयोगी अंक है। इसकी विषय सामग्री चयन और कुशल सम्पादन के लिये डा बलराम अग्रवाल जी निश्चय ही बधाई के पात्र हैं।
                     
अगर हम हिन्दी बाल साहित्य की विविधता पर बात करें तो उसका सबसे बेहतरीन उदाहरणसाहित्य अमृत का सद्यःप्रकाशित बाल साहित्य विशेषांक(नवंबर 2013) है।इस विशेशांक में बाल साहित्य की कोई ऐसी विधा नहीं है जिसे शामिल नहीं किया गया है।(चित्रात्मक कहानी को छोड़ कर)इसका आकर्षक रंगीन कवर एवं भीतर के पन्नों पर बने चित्र निश्चित रूप से बच्चों को आकर्षित करेंगे।बाल साहित्य के इस महा विशेषांक के सम्पादन का दायित्व वरिष्ठ एवं प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार डा0प्रकाश मनु जी ने वहन किया है।
      साहित्य अमृत के इस विशेषांक की खास बात यह है कि इसमें बच्चों को पढ़ने के लिये जहां मुंशी प्रेमचंद,प्रसाद,निराला,अमृतलाल नागर जैसे प्रतिष्ठित साहित्यकारों की रचनाएं मिलेंगी वहीं डा0श्री प्रसाद,प्रकाश मनु,विनायक,शेरजंग गर्ग,ओम प्रकाश कश्यप,डा0दिविक रमेश,प्रताप सहगल,डा0भैंरू लाल गर्ग,रमेश तैलंग,मनोहर वर्मा,डा0सुनीता जैसे वरिष्ठ रचनाकारोंकी भी रचनाएं मौजूद हैं।साथ ही वर्तमान पीढ़ी के युवा रचनाकारों पंकज चतुर्वेदी,हेमन्त कुमार,जाकिर अली रजनीश,क्षमा शर्मा,नागेश पाण्डेय संजय,मनोहर चमोली जैसे स्थापित युवाओं का मनोरंजक और ज्ञानवर्धक बाल साहित्य है।विशेषांक में बच्चों के लिये उपन्यास अंश,रोचक,मनोरंजक कहानियां,नाटक,तरह तरह के मनोरंजक बालगीत,जानकारी बढ़ाने वाली विज्ञान कथा,यात्रा वृत्त----मतलब कि साहित्य की हर विधा की रचनाओं को शामिल किया गया है,जो कि बच्चों का मनोरंजन करने,उन्हें आनन्द देने के साथ ही उनके भीतर साहित्य को या अन्य ज्ञानवर्धक पुस्तकें पढ़ने की रुचि भी जागृत करेंगी। यद्यपि इस विशेषांक का मूल्य जरूर थोड़ा अधिक (रू050) है।परन्तु 130 पृष्ठों में समाहित इतना ढेर सारा और बहुत ही स्तरीय बाल साहित्य एक साथ पढ़ने के लिये बच्चों को  इतने मूल्य में कहीं नहीं मिल सकेगा।इस दृष्टि से भी साहित्य अमृत का यह बाल साहित्य विशेषांक एक संग्रहणीय अंक है।
              एक और बहुत खास बात इस पत्रिका के संदर्भ में---आज के काण्वेण्ट शिक्षित बच्चे हिन्दी भाषा की गिनती पूरी तरह से और सही सही  नहीं लिख/पढ़ और उच्चरित कर(बोल) पाते ऐसे बच्चों को यह अंक हिन्दी गिनती का उच्चारण भी सिखाएगा।
            और अन्तिम बात जिसका मैं यहां विशेष रूप से उल्लेख करना चाहूंगा कि नेशनल बुक ट्रस्ट की इकाई राष्ट्रीय बाल साहित्य केन्द्र,चिल्ड्रेन्स बुक ट्रस्ट,एन सी ई आर टी जैसी बाल साहित्य के लिये काम करने वाली देश की शीर्ष और अग्रणी  संस्थाओं को भी चाहिये कि वो भी साल में कम से कम एक बार द्वीप लहरी जैसे बाल साहित्य चिंतन/विमर्श अंक  और साहित्य अमृत जैसा बाल साहित्य महा विशेषंक अगर निकालना शुरू कर दें तो निश्चय ही बाल साहित्य को आगे बढ़ाने की दिशा में यह एक सराहनीय कदम होगा।
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डा हेमन्त कुमार

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बच्चा चाहे हो बीमार,मिले उसे नित्य आहार

शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2013

(बचायें शिशु को कुपोषण से)

अपने घर के बच्चों को,हम दें कैसा भोजन आहार
दूर कुपोषण भागे उनसे, ना ही पड़ें वो कभी बीमार।
            बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर हमारे समाज में कई भ्रान्तियां हैं। मसलन बच्चे को अगर सामान्य सर्दी,जुकाम या हल्का बुखार है तो उसे टीके नहीं लगवाने चाहिये---बच्चे को यदि पोलियो ड्राप्स पिला दिया गया तो उसके नपुंसक होने का खतरा है--आदि--आदि।ऐसी ही एक भ्रान्ति और है कि बीमारी में बच्चे का आहार यानि भोजन बंद कर देना चाहिये। मातायें भी ऐसा ही सोचती हैं कि छोटे बच्चे को बीमारी में कम खाना देना चाहिये। जबकि सच्चाई यह नहीं हैं।
                       बीमार बच्चे को तो स्वस्थ बच्चे से भी ज्यादा खाने की जरूरत होती है।क्योंकि भोजन ही बच्चे को बीमारियों से लड़ने की ताकत और ऊर्जा देता है।इसलिये बीमारी में उसे बराबर खाना दें। इतना ही नहीं बीमारी के बाद उसे थोड़ा ज्यादा खाना देने की जरूरत रहती है। इससे बीमारी के दौरान बच्चे के अन्दर आई कमजोरी जल्दी खत्म होगी और वह जल्दी स्वस्थ होगा।
  बच्चों की आम बीमारियां जैसे अतिसार,श्वसन तंत्र का तीव्र संक्रमण,बुखार आदि बच्चे के पोषण के स्तर पर असर डालती हैं। उसके * विकास में बाधा *भूख में कमी * पाचन शक्ति में कमी लाने के साथ *ऊर्जा की जरूरत बढ़ाती हैं।*दस्त व उल्टी उसके शरीर से पोषक तत्व निकाल देते हैं।
            बच्चा जब भी हो बीमार,कैसे बनें उसके तीमारदार ?
     संक्रमण से कुपोषण और फ़िर कुपोषण से संक्रमण का चक्र बच्चे के उचित इलाज के साथ-साथ निम्न तरीके से टूट सकता है-----
*4 से 6 माह के बच्चों की मातायें बीमारी में भी बच्चे को स्तनपान कराना जारी रखें। तथा थोड़ी-थोड़ी देर पर ज्यादा बार स्तनपान करायें।
* बीमारी में थोड़ा बड़े बच्चों की मातायें भी उन्हें स्तनपान कराना और खाना देना जारी रखें।
*भूख न लगने पर बच्चों को मातायें --- कम खाना थोड़ी-थोड़ी देर पर दें।---मुलायम ठोस खाना दें जो निगलने में आसान हो।---बच्चों को खाने के लिये उकसायें साथ ही उनकी पसन्द का खाना दें।
*6 माह से 2साल की उम्र वाले बच्चों की मातायें बीमारी के बाद उन्हें अतिरिक्त खाना व चिकनाई दें।
*विटामिन न मिलने पर बच्चों में गंभीर बीमारियां,अंधापन भी आ सकता है। अतः बीमारी के दौरान भी उसे विटामिन युक्त भोजन अवश्य दें।
*बच्चा जब स्वस्थ होने लगे तब भी उसे ये सभी भोजन खिलाते रहें।
श्वसन तंत्र के संक्रमण में क्या दें?
*बच्चे को बीमारी में भी सामान्य बच्चों की ही तरह स्तनपान/भोजन करायें।बीमारी के बाद उसे ज्यादा दूध पिलायें/खाना खिलायें।
*नाक बंद हो तो साफ़ कर दें। अधिक मात्रा में तरल पिलायें। स्तनपान थोड़ी-थोड़ी देर बाद व देर तक करायें।
*अगर बच्चे को खाने,पीने में दिक्कत हो तो उसे तुरन्त स्वास्थ्य कार्यकर्ता,चिकित्सक को दिखलायें।
                                        अतिसार के दौरान क्या करें?
                          

*स्तनपान जारी रखें*यदि बच्चा स्तनपान न करे सामान्य दूध दें।बच्चा 6 माह से कम का हो और ठोस आहार न लेता हो तो दूध में आधा पानी मिलाकर दें।(यह पानी भी स्वच्छ होना चाहिये)
*यदि बच्चा छः माह का या बड़ा हो तथा ठोस आहार लेता हो तो----
0अनाज य अन्य माड़युक्त भोजन,दाल,सब्जी,एक या दो चम्मच तेल मिलाकर दें0फ़लों का रस या केला मसल कर दें0ताजा बना,अच्छी तरह पका खाना मसलकर उसे खिलायें0खाने के लिये बच्चे को उत्साहित करें0दिन में कम से कम छः बार थोड़ा-थोड़ा खिलायें0दस्त ठीक होने के बाद भी बच्चे को वही भोजन अतिरिक्त मात्रा में रोज दो सप्ताह तक दें।
      *यदि दस्त  ज्यादा दिनों तक बना रहे तो ऊपर बताये गये भोजन के अलावा उसे
0ऊपरी दूध आधा पानी मिलाकर या मट्ठा,छाछ दें0अच्छीतरह पकाया अनाज,तेल,सब्जियों का सूप,दाल का पानी दिन में छः बार दें0दस्त बन्द होने के बाद भी बच्चे को वही भोजन बराबर देते रहें0एक माह तक बच्चे को सामान्य से एक बार अधिक खाना दें।
*और सबसे अन्तिम महत्वपूर्ण बात यह है कि पर्याप्त तरल देने के बाद भी यदि बच्चे का दस्त न बन्द हो या उसमें निर्जलीकरण(शरीर में पानी की कमी) के लक्षण दिखें तो बच्चे को फ़ौरन चिकित्सक को दिखलायें।
   इस तरह से बीमारी में और बीमारी के बाद मातायें बच्चों को पर्याप्त आहार दे कर उन्हें कुपोषण के गम्भीर खतरों से बचा सकती हैं।
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नेहा शेफ़ाली
ज़ेवियर्स इन्स्टीट्युट आफ़ कम्युनिकेशन्स
मुम्बई







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कुछ अलग करने की चाहत और जज्बे से भरपूर हैं--- रामकिशोर।

रविवार, 8 सितंबर 2013

किसी भी देश के बच्चे अगर वहां के भविष्य हैं तो युवा वहां की वर्तमान शक्ति। इतिहास गवाह है कि किसी भी देश का इतिहास बदलने और बनाने दोनों में ही युवा शक्ति का ही हाथ रहता है। मगर अफ़सोस की बात है कि आज हमारे देश में दिशाहीन,दिग्भ्रमित और निराश युवाओं की एक लंबी फ़ौज खड़ी है। जिनमें शक्ति है,जोश है और कुछ कर दिखाने कि तमन्ना भी। लेकिन उसके पास कोई
स्पष्ट रास्ता नहीं है जो उसे अपनी मंजिल तक पहुंचा सके।
                युवाओं की इसी फ़ौज में कुछ चेहरे ऐसे भी हैं जो तमाम परेशानियों,दुखों के पहाड़ों को तोड़ कर भी उसके बीच से अपने रास्ते खुद बना रहे हैं और लगातार सफ़लता की मंजिल की ओर बढ़ भी रहे हैं।
        आज ऐसे ही एक युवा से हम आपको मिलवा रहे हैं। इनका नाम है रामकिशोर कन्नौजिया उमर है 27 साल। हाई स्कूल फ़ेल मगर कुछ नया करने के जोश से भरपूर।पेशा हमारे आपके सौन्दर्य में अपने हाथ से प्रेस किये कपड़ों से चार चांद लगाना।
                     रामकिशोर रहते तो हैं जानकीपुरम में।पर सेक्टर-21 में इनकी कपड़े प्रेस करने की गुमटी है।और इसी गुमटी में संजो रखे हैं इस युवा ने हजारों सपने,जिन्हें पूरा करने के लिये ये दिन-रात मेहनत करते हैं।
         इनकी दिनचर्या से ही आपको इनकी मेहनत,जोश,लगन,और जज्बे का अंदाजा लग जायेगा।ये रोज सुबह 4 बजे उठ कर साइकिल से जानकीपुरम से इन्जीनियरिंग कालेज चौराहे जाकर वहां से अखबारों का बंडल उठाते हैं। 8 बजे तक सारे अखबार जानकीपुरम से लेकर इंदिरानगर तक में बांट फ़ुर्सत पाते हैं। फ़िर 8 बजे अपनी प्रेस की दूकान खोलते हैं।जब तक इनका प्रेस गरम होता है तब तक ये थोड़ा चाय नाश्ता कर लेते हैं।फ़िर आठ बजे से इनका कपड़ों पर प्रेस करने का काम शुरू होता है जो रात के 8 बजे तक चलता है।
                                   

                  अभी हाल में ही रामकिशोर ने अपना काम थोड़ा और बढ़ाने की कोशिश की है।इन्होंने अपनी गुमटी में ही मोबाइल रिपेयरिंग और मोबाइल टाप-अप,रीचार्ज आदि का नया काम भी शुरू किया है।जब प्रेस के काम से खाली रहते हैं तो मोबाइल का काम देख लेते हैं।
               और सबसे बड़ी बात यह है कि रामकिशोर ये सारी मेहनत,सारा काम अपने शौक(सिनेमा,होटल,बाइक,महंगे कपड़े खरीदना आदि)पूरे करने के लिये नहीं करते।जो कि आज के हर युवा कर रहा है।एक बार बातचीत के दौरान इन्होंने
मुझसे बताया कि, भाई साहब मैं चाहता हूं कि मेरे अम्मा बाबू अब ये काम(कपड़े प्रेस और धुलाई) न करें और आराम करें। उन्होंने बहुत दिन काम कर लिया। इसी लिये मैं इतनी हाड़ तोड़ मेहनत कर रहा।
             आप खुद ही सोचिये आज जब तमाम पढ़ा लिखा युवा महंगे मोबाइल,तेज चाल वाली बाइक,शापिंग माल,होटेलिंग,बीयर पीने जैसे शौक पूरे करने के लिये मेहनत कर रहा---या फ़िर असफ़ल होने पर सारी शिक्षा,ऊंची डिग्रियों के बावजूद चेन स्नैचिंग या दूसरे गलत काम की तरफ़ भाग रहा---ऐसे में रामकिशोर जैसे युवा क्या उनके प्रेरणास्रोत नहीं बन सकते?
               काश कि रामकिशोर जैसी ईमानदारी, सोच,जज्बा और लगन आज के हर युवा में पैदा हो सके तो शायद हमारे देश और समाज की तस्वीर निश्चित तौर
पर बदल सकती है।
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डा0हेमन्त कुमार

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बच्चों का हो पूर्ण विकास— अगर मिले किसी कला का साथ--।

शनिवार, 17 अगस्त 2013

 साहित्य संगीत कला विहीनः,साक्षत पशु पुच्छ विषाण हीनः”—मतलब यह कि साहित्य संगीत और कला से विहीन मनुष्य पूंछ और सींग रहित पशु के समान होता है। यह श्लोक बहुत पहले लिखा गया था।पर इसकी सार्थकता हमेशा रहेगी। वैसे तो इसमें कही गई बातें हर व्यक्ति के ऊपर लागू होती हैं लेकिन अगर हम इस श्लोक को बच्चों के विकास के संदर्भ में देखें तो इसकी प्रासंगिकता आज के समय के लिये और भी बढ़ जाती है।
   आज बच्चों के अंदर जो उच्छृंखलता,उद्दण्डता और विद्रोही होने के हालात पैदा हो रहे हैं उसके पीछे बहुत से कारण हैं।बच्चों के चारों ओर का वातावरण,उनका पारिवारिक माहौल,स्कूल की स्थितियां,दोस्तों की संगत,टी0वी0,इण्टरनेट इत्यादि। इन्हीं में से एक कारण है उनका कला जगत से दूर होना। आज आपको बहुत कम परिवार ऐसे मिलेंगे जहां बच्चों को किसी कला से जोड़ने की कोशिश होती दिखाई पड़े।ज्यादातर अभिभावक चाहते हैं कि उनका बच्चा पढ़ लिखकर इंजीनियर,डाक्टर,
आई0ए0एस0,पी0सी0एस0 या कोई बड़ा अफ़सर बन जाय। और इसके लिये वे बच्चों को अच्छे से अच्छे स्कूल में दाखिला दिलवायेंगे। कई-कई ट्यूशन और कोचिंग सेण्टर्स भेजेंगे हजारों रूपये खर्च करेंगे।मतलब सुबह से शाम तक सिर्फ़ और सिर्फ़ पढ़ाई।थोड़ा बहुत जो समय बचा वो टी0वी0,इण्टरनेट के हवालें। नतीजा सामने है।बच्चों के ऊपर बढ़ता मानसिक दबाव,तनाव,रिजल्ट खराब होने पर डिप्रेशन,हीन भावना जैसी मनोग्रन्थियां बच्चों को जकड़ने लगती हैं।कहीं बच्चा अधिक निराशा में पहुंचा तो वो आत्महत्या तक करने की कोशिश कर बैठता है।
    जबकि इन सारी दिक्कतों से अभिभावक अपने बच्चों को बचा सकते हैं। सिर्फ़ उसे किसी भी कला से जोड़ कर।चाहे वह गायन हो,नृत्य हो,स्केचिंग,पेण्टिंग म्युजिक,अभिनय या फ़िर कोई अन्य कला हो। इनसे जुड़ने से बच्चे के अंदर आत्मविश्वास पैदा होगा। उसे लगेगा कि वह किसी चीज में तो दक्ष है।
                         

            ऐसा नहीं है कि आज समाज से या परिवार से कलाओं का लोप हो गया है। कलाओं का स्थान आज भी परिवारों में है। परन्तु आज उसका स्वरूप,मकसद बदलता जा रहा है।बहुत से परिवारों में आज भी बच्चों को नृत्य,संगीत,अभिनय आदि कलाओं का प्रशिक्षण दिलवाया जा रहा है। लेकिन उसके पीछे उनका मकसद व्यावसायिक हो गया है न कि बच्चों का आत्मिक विकास। वे चाहते हैं कि उनका बच्चा आगे चलकर उस कला के माध्यम से  धन कमा सके। जब कि ऐसा नहीं होना चाहिये। किसी भी कला का सर्वप्रथम उद्देश्य बच्चों को या किसी भी व्यक्ति को एक अच्छा इन्सान बनाना होता है। उसे अनुशासन सिखाना होता है।व्यावसायिकता तो बहुत आगे की बात होती है। और फ़िर यह जरूरी नहीं है कि हर बच्चा गायन सीख कर सोनू निगम या अभिनय सीख कर शाहरुख खान बने ही। लेकिन इतना तय है कि वह बच्चा उस कला के माध्यम से अनुशासित जरूर हो जायेगा।समय की पाबन्दी जरूर सीखेगा।मेहनत करना जरूर सीखेगा। उसके अंदर आत्मविश्वास जरूर पैदा होगाकि वह भी कुछ करने लायक है।
        हमारे अभिभावकों को भी यह बात समझनी चाहिये कि यदि वे अपने बच्चों को पढ़ाई के,स्कूल के तमाम दबावों और तनावों से छुटकारा दिला सकते हैं तो इस काम में कोई भी कला निश्चित रूप से किसी दवा,चिकित्सक,मनोचिकित्सक से बढ़ कर कारगर सिद्ध हो सकती है। इतना ही नहीं कला भी उसके सम्पूर्ण विकास में उतनी ही सहायक होगी  जितना कि पढ़ाई-लिखाई या खेलकूद। मैं इस बात को पुष्ट करने के लिये यहां एक उदाहरण दूंगा। मैंने अपने एक मित्र से कहा कि आप अपने बेटे को शैक्षिक दूरदर्शन के कार्यक्रमों में क्यों नहीं भेजते?बस इतना कहना था कि वो उखड़ गये मेरे ऊपर। उन्होंने सीधे-सीधे मुझसे कह दिया कि मैं अपने बच्चों को बर्बाद नहीं करना चाहता। और अब दुबारा कभी मुझसे यह बात मत कहना। मैं उनका गुस्सा देख कर चुप हो गया। लगभग पांच छः साल के बाद मेरे वही मित्र अपने बच्चे को लेकर मेरे पास आये। उस समय उनका बच्चा कक्षा 8 में था। उन्होंने मुझसे कहा कि इसे कुछ याद ही नहीं होता।दिन रात पढ़ता रहता है। और भेजे में कुछ घुसता ही नहीं।खेलने कूदने में भी मन नहीं लगता।कुछ कह दो तो रोने लगता है। वो अपने बेटे के भविष्य को लेकर काफ़ी चिन्तित भी लग रहे थे।मैंने उन्हें शान्त कराया। और उनसे अनुरोध करके उनके बेटे को मैंने एक इन्स्ट्रुमेण्टल म्युजिक की क्लास ज्वाइन करवा दी। लड़के ने बांसुरी बजाना सीखना शुरू किया। और छःमहीने बितते बीतते उस बच्चे का पूरा स्वभाव ही बदल गया। उसका सारा गुस्सा,सारी उद्दण्डता गायब। वह अब पढ़ने में भी रुचि लेने लगा था। उनका वही जिद्दी,शैतान बच्चा हाई स्कूल,इण्टर प्रथम श्रेणी में पास हुआ। फ़िर इन्जीनियरिंग पास किया।आजकल वही बच्चा एक मल्टीनेशनल कम्पनी में है।
                     
यह सब बताने का मेरा यहां सिर्फ़ यही उद्देश्य था कि आप अपने बेटे को पढ़ाई,लिखाई के साथ ही किसी कला से भी जोड़िये।क्योंकि कला सिर्फ़ एक मनोरंजन या व्यवसाय का साधन ही नहीं है बल्कि यह ----
  • बच्चे को अनुशासित बनाती है।
  • बच्चे के अंदर आत्मविश्वास भरती है।
  • वह किसी भी काम को एक व्यवस्थित और साफ़ सुथरे ढंग से करना भी सीखता है।
  • उस कला के माध्यम से बच्चे का मानसिक तनाव भी खतम होता है।
  • उस कला में रोज नये प्रयोगों के करने से उसका बुद्धि कौशल भी बढ़ता है।
  • वह अपने भावी जीवन में भी हर काम को बहुत ही सलीके से और कलात्मक ढंग से पूरा करता है।
  • कला बच्चे के अन्दर कुछ नया करने ,सृजित करने का उत्साह भी पैदा करती है।
  • कला बच्चे के व्यक्तित्व को सौम्य,हंसमुख और मिलनसार बनाती है।
  • और सबसे बड़ी और अहम बात यह कि कोई भी कला आपके बच्चे के व्यक्तित्व को सम्पूर्ण बनाती है।
    इसलिये सभी अभिभावकों के साथ ही सभी शिक्षकों से भी यही कहूंगा कि बच्चों को किसी भी कला से जोड़कर देखिये आपको हर रोज उसके व्यक्तित्व,व्यवहार,कौशल और प्रदर्शन का एक नया और अनूठा आयाम दिखाई पड़ेगा।
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  ड़ा0हेमन्त कुमार

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सुरक्षित रखें किशोरों का जीवन

रविवार, 28 जुलाई 2013

               
देश की आबादी लगातार बढ़ती ही जा रही है।उसी अनुपात में शहरों के साथ ही हाइवे पर ट्रैफ़िक भी बढ़ता जा रहा है।और बढ़ते ट्रैफ़िक के ही अनुपात में सड़कों पर बढ़ती जा रही हैं दुर्घटनाएं।अगर आप रोज अखबार पढ़ते होंगे तो निश्चित ही खबरों में दो,चार या कभी कभी ज्यादा संख्या रहती है मार्ग दुर्घटनाओं की। और सबसे बड़ी चिन्ता और दुख का विषय यह है कि इन दुर्घटनाओं से होने वाली मौतों में बड़ी संख्या रहती है टीनेजर्स यानी किशोरों की।यानी वो बच्चे जिन्होंने अभी अपने जीवन की उड़ान भरने के लिये पंख खोले ही थे।वो बच्चे जिन्हें अभी बहुत लम्बी दूरी की उड़ान भरनी थी।वो बच्चे जिन्हें जीवन में बहुत कुछ करना था। जिनकी बहुत सारी हसरतें थीं।जिन्होंने अपने जीवन के लिये बड़े बड़े सपने देखे थे। और जिनको लेकर उनके अभिभावकों ने भी कितने ही सुनहरे सपने बुने होंगे।
                  
 इन दुर्घटनाओं के शिकार बच्चों में ज्यादातर दुपहिया वाहन यानी बाइक या स्कूटर सवार रहते हैं और बिना हैल्मेट वाले।यहां सवाल यह उठता है कि इन बच्चों की असमय मौत का जिम्मेदार कौन है।इस सवाल का सीधा सा जवाब कोई भी पढ़ा लिखा व्यक्ति दे सकता है कि सड़कों पर बढ़ती स्पीड या ट्रैफ़िक पर से हटता जा रहा नियंत्रण या फ़िर बहुत सारे लोग इसका दोष व्यवस्था और प्रशासन के मत्थे भी थोपने लगेंगे।उनकी यह सोच भी काफ़ी हद तक सही है।प्रशासन भी जिम्मेवार है इसका। परन्तु पूरी तरह से नहीं। यहां कुछ जिम्मेदारी हमारी भी है। आप पूछ सकते हैं कि कैसे भाई ?हम इसके लिये क्यों जिम्मेदार हैं?
         बहुत सीधा सा जवाब है इस प्रश्न का।क्या आप,हम अपने बेटे को उसके जन्मदिन या कालेज में अव्वल दर्जे में पास होने की खुशी में उसे बाइक या स्कूटर की चाभी पकड़ाते समय उसकी उम्र या शारीरिक क्षमता पर ध्यान देते हैं?क्या हम उससे कभी कहते हैं कि बिना हैल्मेट लगाए बाइक मत चलाना,दोस्तों के साथ रेस मत लगाना,या स्टंट मत दिखाना।शायद कभी नहीं। बस आपने उसे नई गाड़ी की चाभी दी और साहबजादे फ़ुर्र।बच्चा भी खुश और हम भी खुश।उस समय किसे ध्यान है हैल्मेट,स्टंट और रेस का। जी हां,यह एक कड़वी सच्चाई है। हमारी और सभी अभिभावकों की गलती की। और हमें सारी बातें,सारे कानून,ट्रैफ़िक रूल्स तब याद आते हैं जब कोई अनहोनी हो जाती है। पर तब तक बहुत देर हो चुकी रहती है।
      हम अगर ध्यान दें तो सड़कों पर फ़र्राटा भरने वाले बाइक सवारों में बड़ी संख्या ऐसे किशोरों की भी होती है जो अभी कानूनी तौर पर बाइक या तू व्हीलर चलाने के हकदार नहीं होते।जिनके पास ड्राइविंग लाइसेंस या तो होता ही नहीं या फ़िर फ़र्जी तरीके से गलत डेट आफ़ बर्थ डाल कर दलालों के माध्यम से बनवाया गया होता है। और इस फ़र्जीवाड़े में भी हम उस बच्चे का पूरा साथ देते हैं।भविष्य में आने वाली विपत्तियों को नजर अन्दाज करते हुये। और अपनी इस गलती को हम यह तर्क देकर ढंकने की कोशिश करते हैं कि भाई जमाना ही आज यह कर रहा है। तो हमने कौन सी गलती कर दी।
      हमारी इस सोच के पीछे है भेड़ चाल चलने की आदत। हर समाज में लोगों को भेड़ चाल चलने की आदत होती है। हमारे देश में यह कुछ अधिक ही है। हम सब भी इसी देश और समाज के अभिन्न अंग हैं।होता यह है कि बच्चे के हाई स्कूल या इण्टर का इम्तहान नजदीक आते ही हम उसे लालच देने लगते हैं कि बेटा इतने परसेंट नम्बर लाओ तो युम्हें बाइक दिलवा देंगे।बच्चा मेहनत करके आपके मन मुताबिक नम्बर ले आया। अब उसे बाइक देना तो हमारी मजबूरी बन गई। या फ़िर बच्चे के दोस्तों ने बाइक ले ली और वह भी जिद कर बैठा।अब घर में सुबह शाम,हफ़्तों की बहस,पत्नी की जिद,बहनों की मिन्नतें---और आप पिघल गये।किसी तरह कर्ज लेकर बाइक की चाभी पकड़ा ही दी बच्चे के हाथों में।
                और ऐसी ही घरेलू परिस्थितियों,लाड़ प्यार ने आज सड़कों पर फ़र्राटा भरने के लिये आज किशोरों को आजाद छोड़ दिया है।बिना उन्हें यह सिखाये कि गाड़ी धीरे चलायें,हैल्मेट लगाकर चलें और ट्रैफ़िक के नियमों का पालन करें। और नतीजा अखबारों में रोज ही दो चार दुर्घटनाओं की खबरें। इन दुर्घटनाओं में भी ज्यादा गलती इन्हीं किशोरों की।क्योंकि एक बार बाइक पर बैठने के बाद न उनका नियन्त्रण बाइक पर रहता है न ही मन पर ।वो बाइक चलाते समय खुद को जान अब्राहम य रित्विक रोशन समझते हैं और यहां की सड़कों को मुम्बई-पुने हाइवे। हैल्मेट तो वे फ़ैशन के तौर पर हाथ या बाइक में लगे हुक में लटका देते हैं इस पर भी सोने में सुहागा यह हो जाता है कि मोबाइल का इयर फ़ोन कान में लगा कर तेज म्युजिक का आनन्द लेना भी वो नहीं भूलते। भले ही पीछे आती कार या ट्रक के हार्न की आवाज उन्हें न सुनाई पड़े।
               जरा सोचिये हम सभी अपने परिवार और खासकर बच्चों से कितना प्यार करते हैं।यह मानव स्वभाव है।इसे हम बदल भी नहीं सकते।लेकिन उन परिस्थितियों को जिनसे मजबूर होकर हम अपने बच्चों को खतरनाक तेज गति वाले दुपहिया वाहन पकड़ा देते हैं,बदलना तो हमारे हाथ में है। क्या उसका यह शौक हम तब तक के लिये नहीं टाल सकते जब तक कि उसे वाहन के साथ ही उसकी गति पर नियंत्रण रखना सीख जाय।क्या हम उसे बर्थडे या अन्य किसी खुशी के मौके पर बाइक से नीचे का कोई छोटा उपहार देकर अपना प्यार नहीं जता सकते?या उसे यह नहीं समझा सकते कि बेटा कुछ और बड़े हो जाओ तब तुम्हारे लिये  बाइक खरीद देंगे।
   इन सबके बावजूद भी मान लीजिये आपको अपने बेटे की जिद,परिवार,समाज के दबावों के आगे झुक कर मजबूरी में भी अपने बच्चे के लिये दुपहिया वाहन खरीदना ही पड़ता है तो कुछ बातों पर ध्यान रखकर और उसे कुछ हिदायतें देकर आप और हम उसके जीवन को सुरक्षित रख सकते हैं।
                                  
  • सबसे पहले बच्चे को अच्छी तरह ट्रैफ़िक के नियम और चिह्नों,संकेतों से परिचित करा दें।
  • उसे यह बात समझाएं कि हैल्मेट उसकी जीवन की सुरक्षा के लिये है न कि फ़ैशन दिखलाने या हैण्डिल में लटकाने के लिये।
  • बच्चा जब तक 18वर्ष की उम्र का न हो जाय उसे अकेले बाइक/स्कूटर न चलाने दें। आप उसके पीछे बैठ कर साथ में जाएं। इससे गति को वह नियन्त्रित रखना सीखेगा। और कहीं गलती करने पर आप उसे समझा सकेंगे।
  • बच्चे को कभी बिना हैल्मेट पहने वाहन न चलाने दें।
  • उसे वाहन की पूरी मशीनरी और कल पुर्जों से परिचित कराएं ताकि वह उन्हें समझ कर उन पर नियन्त्रण रख सके।
  • बच्चे को यह तथ्य अच्छी तरह समझा दें कि शहर के भीड़ वाले ट्रैफ़िक में थोड़ी थोड़ी दूर पर आने वाले चौराहों और सिग्नल्स के कारण 80कि मी की रफ़्तार और 40किमी की रफ़्तार में चलने वाले दो व्यक्तियों के गन्तव्य पर पहुंचने में मुश्किल से दो चार मिनट का अन्तर आयेगा। इसलिये जान जोखिम में डालने की जगह धीमी गति से चलना ज्यादा फ़ायदेमन्द रहेगा।
  • बच्चे को समझाएं कि कान पर मोबाइल या म्युजिक का इयरफ़ोन लगाकर कभी वाहन न चलाये।
  • उसे बतायें कि मध्यम गति से चलने पर वह पेट्रोल की बचत भी करेगा।
  • उसे समझायें कि दोस्तों के उकसाने पर भी वह बाइक की रेस न लगाये,न ही स्टण्ट करने की कोशिश करे।  
  • और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि बच्चों को अच्छी तरह समझाएं कि मानव जीवन अनमोल है।यह हमें बस एक बार मिलता है।इसे बहुत सम्हाल कर रखना होगा।
                   ये कुछ ऐसे बिन्दु हैं जिन पर विचार कर इन पर अमल करके हम सभी अपने प्यारे और होनहार बच्चों का जीवन सुरक्षित करके उन्हें लम्बी उम्र प्रदान कर सकते हैं।
                          0000000

डा0हेमन्त कुमार

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