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सूनापन
शुक्रवार, 30 जनवरी 2009
नदियों के सूने तट गूँज उठें फ़िर से।
पनघट पर छाया ये सूनापन कैसा
विरहन की आँखों में सपनों के जैसा
खेतों खलिहानों में रीतापन कैसा
विघटित संबंधों के ठंढेपन जैसा।
चुप हुई आज क्यों पायल की रुनझुन
पत्तों के बीच छिपे सुग्गों की सुनगुन
चौरे के नीम तले कैसी ये सिहरन
चौपालों में आज नहीं कोई है धड़कन।
पसरे सन्नाटे में भवरों की गुनगुन
कोयल की कूक से तड़प उठा उपवन
विचलित मन भटके यूँ चिटका सा दर्पण
कब तक संजोयेगा यादों की कतरन।
माझी तू गीत छेड़ आज एक ऐसा
नदियों के सूने तट गूँज उठें फ़िर से।
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हेमंत कुमार
मासूम लड़की
शनिवार, 24 जनवरी 2009
जहाँ नारियों की पूजा होती है वहां देवताओं का निवास होता है।
ये बात हमारे पूर्वजों ने बहुत पहले कही थी। उस समय यहाँ वास्तव में नारियों की पूजा होती थी। लेकिन समय के साथ सब कुछ बदलता गया। और आज नारियों की पूजा की जगह ले ली है कन्या भ्रूण हत्या ने। आज भी हमारे देश में लड़कियों को दूसरे दर्जे पर माना जाता है।
यहाँ के लोगों की इसी सोच को बदलने के लिए,आज भारत सरकार को राष्ट्रीय बालिका दिवस मानना पड़ रहा है।
मासूम लड़की
वह मासूम
वह भोली सी लड़की।
मुहँ अंधेरे आकर
हमारी
पूरी कालोनी को
जगा देती है
वह मासूम
वह भोली सी लड़की।
बर्तनों की खड़ भड़
झन झन टनाक टन
नल की टोटी से
तेज धार बहता पानी
इसी में अपने
जीवन का संगीत
ढूँढती है
वह मासूम
वह भोली सी लड़की।
झाडू की खर्र खर्र
सर्र सर्र
पोंछे की
छपाक छप्प
फर्नीचरों की
उठापटक के बीच
बार बार
माथे के बालों को
पीछे करती
वह मासूम
वह भोली सी लड़की।
कमरे में बिख्ररे सामानों को
समेटने में ही
अपने भविष्य के
सपनों को
आकर देती
वह मासूम
वह भोली सी लड़की।
कमरे में मेज पर
बिखरी बच्चों की किताबों
पेंसिलों बस्तों
रैक पर सजे खिलौनों को
बड़ी हसरत से
निहारती
वह मासूम
वह भोली सी लड़की।
सुबह से शाम तक
आंटियों की डांट डपट
अंकलों की
अल्त्रावाइलेट
रेज वाली
शातिर निगाहों से
नहा कर
सराबोर हो जाती है
वह मासूम
वह भोली सी लड़की ।
जुम्मा जुम्मा
आठ नौ बरस की उमर में ही
पूरी कालोनी की खबरों को
मिर्च मसाला
लगाकर
आंटियों से बतियाती
पूरी दादी अम्मा बन गयी
वह मासूम
वह भोली सी लड़की।
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हेमंत कुमार
बच्चों को समझिये तो
सोमवार, 19 जनवरी 2009
हर बच्चा अपने आप में अनोखा होता है.उसके अन्दर सृजन की,कुछ बनाने,कुछ नया करने की असीम संभावनाएं छिपी होती हैं.किसी में गाने,किसी में अभिनाय तो किसी में लेखन या चित्र बनाने की.कोई खेलने में तो कोई पढ़ने में आगे .किसी बच्चे का मन चीजों को तोड़ फोड़ कर उन्हें नया आकार देने में लगता है.बस जरूरत होती है उनके अन्दर छिपी इस प्रतिभा को उभारने की.अक्सर हम यानी बड़े लोग यहीं पर गलती कर जाते हैं.हम उन्हें ठीक तरह से समझ नहीं पाते.और लादने लगते हैं उनके ऊपर अपने विचारों,अपनी सोचों,अपने अधूरे सपनों की पोटली.
भाई सीधी सी बात है जिस तरह हमारे हाथों की पांचों उंगलियाँ बराबर नहीं होती,उसी तरह हर बच्चे की सीखने,करने या पढने की क्षमता बराबर नहीं हो सकती.यदि किसी बच्चे को गणित का कोई सवाल देर से समझ में आता है तो कोई उसे चुटकी बजाते हल कर देता है.इसका ये मतलब नहीं होता की देर में समझने वाला बच्चा फिसड्डी हो गया.ऐसे स्लो लर्नर या धीमे सीखने वाले बच्चों पर थोड़ा अलग से ध्यान दे कर उन्हें दूसरे बच्चों के बराबर लाया जा सकता है.
अभी कुछ ही दिनों पहले की घटना है.मैं अपने एक मित्र के साथ उनके एक बड़े अधिकारी के घर गया.अधिकारी महोदय ये जान कर की मैं बच्चों के लिए टी वी कार्यक्रम बनाता हूँ.मुझसे कहने लगे की मैं उनकी छोटी बेटी का कार्यक्रम अपने यहाँ करवा दूँ.मैंने कहा ठीक है करवा दूँगा.उन्होंने तुंरत बच्ची को बुलाया.और उससे कहा की बेटा वो अंकल को कजरारे कजरारे…..वाला गाना गा कर सुनाओ.उनकी बेटी रही होगी ६-७ साल की.पहली बार मेरे सामने आई थी.शर्माने लगी.उसने कहा पापा अभी नहीं गाउगी…..और घर के भीतर भाग गयी.अधिकारी महोदय ने उसे फ़िर बुलाया.बच्ची शर्म के मारे नहीं आई.अधिकारी महोदय घर के भीतर गए और बच्ची को पकड़ कर ले आए.उससे डांट कर बोले सुनाओ गाना.बच्ची थोड़ा डर गयी.मैंने उनसे कहा..भाई रहने दीजिये..फ़िर कभी सुना देगी गाना.मै इसका कार्यक्रम अपने यहाँ करवा दूँगा.
लेकिन अधिकारी महोदय कहाँ मानने वाले थे.कहने लगे देखिये ये गाना कैसे सुनायेगी.इसी बीच उनका बेटा चाय रख गया.अधिकारी महोदय ने स्केल उठा ली और अपनी छोटी सी बच्ची का हाथ पकड़ कर अपनी तरफ़ खींचा….लड़की डर कर चीखने लगी.मैं अधिकारी की मंशा भांप चुका था.मैंने फ़ौरन उनका हाथ कस कर पकड़ लिया.(ये भूल कर की वो मेरे मित्र के बास हैं)मैंने उनसे बस इतना कहा की सर अब मुझसे ज्यादा बर्दाश्त नहीं हो रहा है…मैं घर जा रहा हूँ.और मैं तुंरत वहां से चला आया.
आप लोगों को यकीन नहीं होगा की मैं उस रात भर सो नहीं सका.और बराबर यही सोचता रहा की क्या किसी अभिभावक की जिम्मेदारी सिर्फ़ बच्चे पैदा कर देना और उन्हें किसी तरह मार पीट कर परीक्षाएं पास करवा देना ही है?क्या हम उस बच्चे से भी कभी ये जानने की कोशिश करते हैं की वह क्या चाहता है?उसकी अपनी इच्छा क्या है?जब वह खेलना चाहता है तो हम उसे डांट मार कर पढ़ने बैठा देते हैं.जब वह कहानी पढ़ना चाहता है तो हम उससे जबरन गणित के सवाल हल करवाते हैं.वह अगर जमीन पर बैठ कर पढ़ना चाहता है तो हम उसे डांट कर कहेंगे कुर्सी पर बैठो.जब उसका मन पढने का होगा तो हम उसे हुक्म देंगे की जाओ मैदान में और बच्चों के साथ खेलो.यहाँ सीधा सा प्रश्न ये उठता है की क्या बच्चे की अपनी कोई इच्छा,भावना,सोच नहीं है?
हम जब भी बच्चों को कोई आदेश या हुक्म देते हैं तो उससे पहले बस एक…सिर्फ़ एक क्षण के लिए हमें ऑंखें बंद करके अपना बचपन याद कर लेना चाहिए.क्या हम बचपन में वो हरकतें नहीं करते थे जो अज हमारा बेटा या कक्षा का छात्र कर रहा है.मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ की इस प्रश्न का जवाब हाँ में ही मिलेगा.यानी की हम भी बचपन में चाहते थे की हम अपने काम अपने मन से करें.उसमें बड़ों की ज्यादा दखलंदाजी न हो .फ़िर क्यों हम थोपते हैं अपने विचार बच्चों पर?
बच्चों की आजादी की वकालत करने का मेरा मतलब ये कदापि नहीं है की आप उन्हें स्वतंत्र ,उन्मुक्त छोड़ दें.मेरा कहना ये है की पहले आप उसकी इच्छा अनिच्छा को ,उसके मनोभावों को तो समझिये.जब तक हम बच्चों के मनोभावों को ,उसके विचारों को,नहीं समझेंगे,उसकी रूचि को नहीं जानेंगे.हम एक अच्छे अभिभावक,अच्छे शिक्षक नहीं बन पाएंगे.न ही हम बच्चे को आगे बढ़ा पाएंगे,न ही उसके विकास में योगदान कर सकेंगे.हाँ अपने आदेशों, अपने विचारों को लगातार उसके ऊपर थोप कर उसके कोमल,रचनात्मक,क्रियाशील,संवेदनशील मन और उसके अन्दर छिपी असीम ऊर्जा,शक्ति को कुंठित जरूर करते रहेंगे.
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हेमंत कुमार
जाडा पकने लगा
गुरुवार, 15 जनवरी 2009
फूल उठी सरसों
गेंदे की गंध से
महक उठा हर घर ।
नए नए पत्तों में
सुग्गों की सुन गुन
चिहीं चिहीं बोल उठी
छोटी सी मुनमुन ।
ढोलक की थाप पर
पायल की रुनझुन
बुलबुल भी गा उठी
गीतों की तान सुन ।
खपरैले पर लौकी के
बीच छिपी गौरैया
रेशमी मुलायम धूप
देख कर बोल उठी
जाडा अब पकने लगा
फूल उठी सरसों ।
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हेमंत कुमार
जाड़े के दोहे
रविवार, 11 जनवरी 2009

शरमाई सी चांदनी , नाचे अपने धाम॥
चौपालों में चल रही , चर्चा सुबहो शाम।
सूरज जम गया शीत से , कैसे निकले घाम॥
बुढऊ तापनी बारते , बुढिया जपती राम।
बूढा सुग्गा टेरता , बस अपना ही नाम॥
बिरहिन का दुःख देख के , रातें हुईं उदास।
चिठिया ढाढस दे रही , जिन छोड़ मिलन की आस॥
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