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वह सांवली लड़की

गुरुवार, 30 जुलाई 2026

 

आज मेरे पिताजी आदरणीय श्री प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव जी की दसवीं पुण्य तिथि है । 2016 में आज ही के दिन वो हम सभी को छोड़ कर अपनी अनंत यात्रा पर निकल गए थे । अब उनके अप्रकाशित साहित्य को पाठकों के सामने लाना ही मेरा लक्ष्य है ।इसी लिए आज मैं उनकी एक अप्रकाशित कहानी “वह सांवली लड़की” अपने ब्लाग “क्रिएटिव कोना” पर प्रकाशित कर रहा हूं ।


 कहानी 

                                                     


                                                       वह सांवली लड़की                                              

                                                                                                  

प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव

           

            


रंग पक्का सांवला और नाम हो चांदनी । क्या सोचेंगे आप ? यही न कि नाम और रूप रंग में कोई तालमेल नहीं । जिस दिन चांदनी ने उस कालेज में  बी. ए. प्रथम वर्ष में प्रवेश लिया उसी दिन से छात्रों के जेहन में यही बात कौंधने लगी । किसी की आंखों में व्यंग होता, किसी की मुस्कराहट में । कोई ऐसे ढंग से हाय हैलो करता कि उसमें भी व्यंग जरूर झलक उठे । चांदनी सब समझती थी । मगर वह इन सब से बेखबर बन केवल एक हल्की सी मुस्कान बिखेरती सीधे अपनी क्लास में चली जाती ।

            

 केवल नाम और रंग ही होता तो कोई बात नहीं थी । वह तो साफ साफ एक कस्बाई लड़की नजर आती थी । किसी छोटे मोटे कस्बे से इण्टर पास कर आई हुई । बड़े शहर के उस कालेज के आधुनिक रूप रंग में ढले हुए छात्र छात्राओं को भला उसकी शालीनता क्या नजर आती । हां दस पांच दिनों में ही पूरी क्लास ने यह जरूर जान लिया कि वह मेधावी भी है । बोर्ड परीक्षा की मेरिट लिस्ट में एक स्थान बनाने वाली लड़की । इस बात की गवाही हर टीचर का चेहरा देने लगता जो उसका प्रोजेक्ट देखते । वे कभी प्रोजेक्ट की फाइल देखते कभी चांदनी का चेहरा ।

            

रंगनाथ क्लास का मुंहफट छात्र था । एक दिन वह  चांदनी से पूछ बैठा – “मैडम, क्या हमें बताएंगी कि आप कौन सी चक्की का पिसा हुआ आटा खाती हैं ?

            


चांदनी कुछ नहीं बोली । बस चुपचाप उसे देख भर लिया । तभी नीलम के मुंह से भी निकला - “हां हां, जरूर बताइए । हम भी तो उसे खा कर अपने दिमाग को तरो ताजा रख सकें ।

            


रंगनाथ और नीलम की ये फब्तियां सुन पूरी क्लास ठठा कर हंस पड़ी । मगर चांदनी के चेहरे का सौम्य भाव इससे जरा भी नहीं प्रभावित हुआ । वह मुस्करा कर केवल इतना बोली - “हां हां, क्यों नहीं बताऊंगी, जरूर बताऊंगी ।” फिर उसका ध्यान अपनी कापी पर चला गया ।

             


चांदनी गर्ल्स हास्टल में रहती थी । वह छुट्टी का दिन था । लड़कियां हास्टल के मैदान में बालीबाल खेल रही थीं । कुछ हरी घास पर बैठी गपशप कर रही थीं । कोई मिलने आए अपने परिजनों से बातचीत में व्यस्त थीं । साथ आए बच्चे हरी घास पर लोट पोट लगा रहे थे । वहीं कारीडोर में एक किनारे कुर्सी पर बैठी हास्टल वार्डन मिसेज भटनागर सारे दृश्य देख रही थीं । उनके चेहरे पर उदासी छाई हुई थी । इन सारे दृश्यों को देखते हुए भी उनकी आंखें जैसे कहीं और खोई हुई थीं । उनका हमेशा प्रसन्न रहने वाला चेहरा इस वक्त चिन्ता में डूबा हुआ था । कारीडोर में लड़कियां इधर से उधर भाग दौड़ मचाए हुई थीं । मगर शायद किसी का भी ध्यान मिसेज भटनागर पर नहीं गया । अगर गया भी हो तो किसी ने उनके चेहरे की उदासी के बारे में पूछने की जरूरत नहीं समझी ।

            


अचानक मिसेज भटनागर के कंधे पर किसी का हाथ पड़ा । उन्होंने  सिर उठा कर देखा - वह चांदनी थी । “कहां खोई हुई हैं मैडम ? आपकी तबियत तो ठीक है न ? चांदनी ने पूछा ।

           


नहीं, ऐसा कुछ नहीं है । मैं ठीक हूं चांदनी ।” मिसेज भटनागर बोलीं ।

           


नहीं मैडम । कुछ तो है । छिपाइए मत । आपका चेहरा बता रहा है कि आप किसी परेशानी में हैं ।

            


मिसेज भटनागर की आंखें नम हो आईं । चांदनी के शब्दों में न जाने कैसा अपनापन था कि उनसे बताए बिना नहीं रहा गया । वे अपनी आंखों में छलक आए आंसुओं को आंचल से पोंछती हुई भरे गले से बोलीं -  “ चांदनी, कुछ देर पहले ही मेरे घर से फोन आया है कि मेरे बेटे की तबियत ठीक नहीं है । वह मुझे बहुत याद कर रहा है । मैं कुछ समय के लिए उसे यहां ले आना चाहती हूं । मगर यहां मैं हर समय तो उसके पास रह नहीं सकती । घर से कोई और आ नहीं सकता । ऐसे में कौन रहेगा उसके पास ?

            


बस इतनी सी बात के लिए आप परेशान हैं । वाह मैडम, बस समझ लीजिए कि आपकी प्राब्लम दूर हो गई । उदासी और चिन्ता को दूर भगाइए । घर जाकर बच्चे को ले आएं ।”

          

 


मगर कैसे ?

           


मैं हूं न यहां ।” चांदनी बोली ।

            


मिसेज भटनागर ने उसका हाथ पकड़ लिया । वे चकित होकर उसे देखती भर रहीं । उन्हें अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ । क्या हास्टल की एक सामान्य छात्रा इतना आत्मीय भाव प्रकट कर सकती है । आज ऐसा पहली बार हुआ था । पर चांदनी की आंखों में से झांकती निश्छलता कह रही थी - हां मैडम, यह सच है । मुझे हर किसी के दर्द और चिन्ता की पहचान हो जाती है । मिसेज भटनागर की आंखों में फिर एक बार आंसू छलक आए ।

          

  


ना ना ना ----- मैडम, आपकी ये आंखें आंसू बहाने के लिए नहीं हैं । जो मैने कहा है उसे कीजिए ।” चांदनी इस बार स्वयं अपने रूमाल से उनके आंसू पोंछती हुई बोली ।

            



धीरे धीरे साल बीत गया । चांदनी बी. ए.द्वितीय वर्ष में पहुंच गई । वह टैलेन्टेड तो थी ही, उसके व्यवहार ने भी अब तक कालेज में उसकी अपनी एक पहचान बना दी थी । मगर रंगनाथ जैसे साहबजादों को अभी भी यह सब चांदनी का एक ढोंग मात्र लगता था । अब भी वे मौका पाने पर उस पर व्यंग कसने से नहीं चूकते थे ।

            


नया सत्र शुरू होते ही हमेशा की तरह इस बार भी अपनी अपनी कक्षाओं में प्रथम आए छात्रों का सम्मान समारोह आयोजित करने की घोषणा हुई । इसमें उन छात्र छात्राओं को अपने अभिभावकों को भी साथ ले आने के लिए कहा जाता था । चांदनी अपनी कक्षा में प्रथम आई थी ।

            


रंगनाथ के लिए चांदनी पर फब्ती कसने का यह अच्छा मौका था । उसने अपने दोस्तों से कहा -“चलो अच्छा है । इस बार हमें भी मैडम के मम्मी पापा के दर्शन हो जायेंगे ।”

            


मम्मी पापा --- अरे बेवकूफ राम, मैडम गांव से आई हैं । वहां मम्मी पापा कहां होते हैं ।” एक दोस्त बोला ।

           


फिर ? रंगनाथ ने पूछा ।

           


अपनी अम्मा और बापू को ले कर आएंगी मैडम ।” दोस्त के इस जुमले पर पूरी दोस्त मंडली खिलखिला पड़ी ।

            


चलो, तब तो यह भी देख लेंगे कि मखमल की चादर पर टाट का पैबन्द कैसा नजर आता है ?” रंगनाथ इस पर भी चुटकी लेने से नहीं चूका ।

           


समारोह का दिन आया । प्रिंसिपल और स्टाफ के साथ शहर के कुछ माननीय भी सामने स्टेज पर बैठे हुए थे । तभी प्रिंसिपल ने सब लोगों के स्वागत की औपचारिकता पूरी करने के बाद एक एक कर सभी कक्षाओं के सर्वश्रेष्ठ छात्रों को बुलाना शुरू किया । चांदनी का नाम लेते ही पूरे कालेज की नजर उधर उठ गई ।

            


चांदनी एक अधेड़ उम्र की औरत का हाथ पकड़ कर उसे सहारा देती हुई धीरे धीरे स्टेज की ओर बढ़ रही थी । वह एक सामान्य हिन्दुस्तानी औरत जैसी थी । वहां उपस्थित दर्जनों सजी संवरी शहरी औरतों से बिलकुल अलग । मगर सलीके से पहनी हुई सफेद साड़ी, खिचड़ी हुए बालों के बीच सिन्दूर विहीन मांग, थकी हुई दृष्टि के बावजूद सजग आंखें, चेहरे पर झलकता उसका आत्मविश्वास । सब मिला कर उसे मामूलीपन में भी एक खासियत प्रदान कर रहे थे । वह चांदनी की मां थी । वहां उपस्थित अभिभावकों में पहली ऐसी मां थी जिसे कोई छा़त्र अपने साथ ही स्टेज पर ले गया ।

           


उसके स्टेज पर पहुंचते ही प्रिंसपल ने खड़े होकर उसका स्वागत किया । फिर एक कुर्सी मंगा कर उसे बैठाया । अब आगे चांदनी को बोलना था । उसने थोड़े से नपे तुले शब्दों में बताया -“ये मेरी मां है । गांव में ही रहती है । पिता जी के जाने के बाद मुझे कभी उनकी कमी नहीं अनुभव होने दी इन्होंने । मां और पिता दोनों की जगह ले ली । मुझे पढ़ाने के इनके इरादों में जरा भी कमी नहीं आई । आज मैं जो आप लोगों के बीच हूं वह इन्हीं की बदौलत ।”

            


काफी समय पहले मेरे कुछ मित्रों ने पूछा था - मैं कौन सी चक्की का पिसा हुआ आटा खाती हूं । मैंने उनसे वादा किया था कि समय आने पर जरूर बताऊंगी । आज वह वादा पूरा करने का समय आ गया है । मैं अपने उन प्रिय मित्रों को बताना चाहूंगी कि वह चक्की है मेरी मां । तमाम मुश्किलों और तकलीफों में पिस कर भी इन्होंने मुझे कभी हताश नहीं होने दिया । इनका प्रोत्साहन पा कर ही मैं आगे बढ़ रही हूं । मेरा आज का मुकाम आपके सामने है । इससे भी बड़े मुकाम को मैं हासिल करना चाहती हूं । उसके लिए मुझे आपकी शुभकामनाएं चाहिए ।”

           


चांदनी के चुप होते ही पूरा हाल तालियों से गड़गड़ा उठा । प्रिंसिपल ने स्वयं उठ कर मां को स्टेज की सीढ़ियों से नीचे उतरने के लिए सहारा दिया । रंगनाथ और उसके दोस्तों को आज पहली बार अनुभव हुआ - उस सांवली लड़की का नाम ही चांदनी नहीं है, उसके भीतर चांदनी सा उजला एक दिल भी है ।

            


बाहर निकलते ही चांदनी को बधाई देने वाला पहला व्यक्ति था रंगनाथ, दोनों हाथ जोड़े और आंखों में क्षमा याचना लिए हुए । चांदनी ने गद्गद् होकर उसके जुड़े हुए हाथों को थाम लिया ।



०००



प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव



परिचय: 11मार्च,1929 को जौनपुर के खरौना गांव में पैदा हुए प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव मुख्यतः ग्रामीण जीवन के कथाकार हैं.चाहे उनका बाल साहित्य हो या फिर बड़ों के लिए लिखी गई कहानियां या नाटक--- उनकी अधिकांश रचनाओं में हमें गांव की मिट्टी का सोंधापन जरूर मिलेगा.

शुरुआती पढ़ाई जौनपुर में करने के बाद बनारस युनिवर्सिटी से हिन्दी साहित्य में एम0ए0।उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग में विभिन्न पदों पर सरकारी नौकरी।देश की प्रमुख स्थापित पत्र-पत्रिकाओं में कहानियों, नाटकों, लेखों,रेडियो नाटकों,रूपकों के अलावा प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य का प्रकाशन।आकाशवाणी के इलाहाबाद केन्द्र से नियमित नाटकों एवं कहानियों का प्रसारण।बाल कहानियों,नाटकोंकी पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित।वतन है हिन्दोस्तां हमारा(भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत)अरुण यह मधुमय देश हमारा”“यह धरती है बलिदान की”“जिस देश में हमने जन्म लिया”“मेरा देश जागे”“अमर बलिदान”“मदारी का खेल”“मंदिर का कलश”“हम सेवक आपके”“आंखों का ताराआदि बाल साहित्य की प्रमुख पुस्तकें।सन 2012 में नेशनल बुक ट्रस्ट,इण्डिया से प्रकाशित बाल उपन्यास “मौत के चंगुल में” काफी चर्चित।

नेशनल बुक ट्रस्ट,इण्डिया से  प्रकाशितही  बाल नाटक संग्रहएक तमाशा ऐसा भी 

   इसके साथ ही शिक्षा विभाग के लिये निर्मित लगभग तीन सौ से अधिक वृत्त चित्रों का लेखन कार्य1950 के आस पास शुरू हुआ लेखन एवम सृजन का यह सफ़र 87 वर्ष की उम्र तक निर्बाध चला।  31जुलाई 2016 को लखनऊ में आकस्मिक निधन।

 

 

 

 

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खूबसूरत बाल कविताओं का खजाना----- रंग बिरंगी दुनिया

सोमवार, 29 दिसंबर 2025

 

पुस्तक समीक्षा



खूबसूरत बाल कविताओं का खजाना----- रंग बिरंगी दुनिया










पुस्तक :दुनिया रंग बिरंगी



(बाल विज्ञान कविताएँ)



लेखक :अरविन्द दुबे



प्रकाशक :प्रकाशन विभाग



भारत सरकार



हिंदी बाल साहित्य में विज्ञान कथाएँ,उपन्यास ,नाटक तो बहुत लिखे जा रहे हैं और प्रकाशित भी हो रहे हैं ।लेकिन इनकी तुलना में विज्ञान और उसका परिचय देने वाली कविताएँ बहुत कम लिखी गई हैं ।लिखी भी गई हैं तो फुटकर रूप में पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं ।लेकिन एक पुस्तक के रूप में संकलित होकर विज्ञानं कविताएँ कम ही सामने आई हैं ।



पिछले दिनों डा0 अरविन्द दुबे की एक विज्ञानं पर आधारित बल कविताओं का संकलन “दुनिया रंग –बिरंगी” प्रकाशन विभाग से प्रकाशित होकर आई है ।इसमें बच्चों के लिए कुल 27बाल कविताएँ संकलित हैं ।जिनमें ज्यादातर प्रकृति,धरती,सूरज,चाँद,बर्फ ,आंधी जैसे विषयों पर आधारित हैं ।मतलब इसमें हमारी पूरी प्रकृति—असमान—भूमंडल ,यहाँ घटित होने वाली घटनाओं को कविता के रूप में प्रस्तुत किया गया है ।साथ ही उनके कारणों को भी बताने की कोशिश की गई है कि ये प्राकृतिक घटना या परिवर्तन कैसे होते हैं ।मसलन बच्चा अगर सूरज देखता है तो उसके मन में सवाल उठता है कि सूरज निकलता कैसे है ?कहाँ से आटा है ?ये हमें गरमी कैसे देता है ?और बच्चों के मन में उठाने वाले इन सवालों का जवाब भी उसे कविता के रूप में ही मिलता है ।



    एक खास बात और हर कविता के सामने वाले पेज पर उस चीज से या उसमें होने वाली घटनाओं को भी चित्र बना कर दिखाया गया है कि ये घटना कैसे हो रही ?इसके पीछे क्या वैज्ञानिक कारण हैं ।

  अब “सूरज कैसे गर्मी देता “कविता में शुरू में बच्चों के मन में उठने वाले प्रश्न को लिखा गया है –



“कैसे सूरज रोज चमकता



कैसे गर्म धूप है आती



यह गर्मी में बदन जलाती



और सर्दी में मन को भाती।”



फिर इसी कविता में आगे बच्चों के मन में उठने वाले प्रश्न का उत्तर भी दिया गया है—



“सूरज एक गैस का गोला



अंदर गुस्सा बहार भोला



भरा हुआ जलती गैसों से



सूरज के ईंधन का झोला ।



जब ये गैसें होती फ्यूज



सूर्य की भट्ठी दहके



पैदा होता है प्रकाश और



बेहिसाब गर्मी निकले ।”



ये तो एक कविता की बात ।और आगे बढ़ने पर आगे की कविताओं में भी बताया गया है कि सूरज किस दिशा से निकल कर किस दिशा को जाता है ।इसी प्रकार--“चम् चम् चमके चंदा,चाँद पे धब्बे क्यों ?आकार बदलता रहता चंदा जैसी कविताओं में चन्द्रमा में छुपे गूढ़ रहस्यों को भी बच्चों को बहुत सरल भाषा में बताने का प्रयास किया गया है ।अब बचपन से ही जो बच्चा माँ की लोरियों में,कहानियों में चाँद के बारे में,उसमें छुपी बुढ़िया के बारे में सुनता रहा हो उसे जब कविताओं के माध्यम से चाँद से जुड़े रहस्यों,उसकी वास्तविकताओं को बताया जाएगा तो निश्चित ही वह उन बैटन को समझ सकेगा ।

   


इस संकलन में एक तरफ सूरज,चाँद की कविताएँ हैं तो चंद्रग्रहण सूर्यग्रहण जैसी प्राकृतिक घटनाओं को भी कविताओं के माध्यम से बच्चों तक पहुँचाने की कोशिश की गई है ।दिन –रत ,तारों की बातें हैं तो बारिश,बरफ,हिमपात,बिजली गिरने जैसी घटनाओं को भी कविताओं में बुना गया है ।प्रकृति की इन्हीं घटनाओं के साथ ही शहद बनने की प्रक्रिया,मछली रानी,बिल्ली की आँखें चमकीली,जैसी कविताओं में कुछ जीवों के अजूबे रहस्यों से भी पर्दा उठाया गया है ।

     


डा०अरविन्द दुबे वैसे तो पेशे से बच्चों के एक कुशल चिकित्सक हैं ।लेकिन इसके साथ ही वो विज्ञानं साहित्य के एक सशक्त हस्ताक्षर भी हैं ।उनकी दैनिक जीवन में विज्ञानं पर आधारित कई पुस्तकें अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं ।जिनमें विज्ञानं कथाएँ,उपन्यास,नाटक लेख सभी कुछ हैं ।और ज्यादातर बच्चों या किशोरों के लिए ।डा०अरविन्द ने रेडियो के लिए कई विज्ञानं पर आधारित सीरिज लिखी हैं ।शैक्षिक दूरदर्शन केंद्र लखनऊ के लिए कई शैक्षिक फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखने के साथ बतौर प्रजेंटर भी सैकड़ों कार्यक्रमों में अपना योगदान किया है ।एक तरह से विज्ञानं साहित्य और खासकर बल विज्ञानं साहित्य का उनके पास चालीस सैलून से ज्यादा का अनुभव है ।इसी अनुभव के आधार पर उन्होंने अपनी ये बल विज्ञानं कविताएँ रची हैं ।हिंदी के बल साहित्य के पाठकों और विद्वानों द्वारा निश्चित ही इस अनोखी किताब का स्वागत होना चाहिए ।मुझे तो लगता है इनमें से कुछ कविताएँ प्राथमिक कक्षा की पाठ्य पुस्तकों में भी रखी जानी  चाहिए ।जिससे बच्चे विज्ञान के प्रति आकर्षित हों विज्ञान से जुड़ें भी ।उनके अंदर वैज्ञानिक सोच का विकास भी हो सके ।

    


इस पुस्तक का एक थोडा निगेटिव पक्ष भी है । वो यह की डिजाईनिंग में (चित्रों के रंग संयोजन) के स्तर पर बहुत मेहनत नहीं की गई है ।जिससे बहुत बेहतरीन कंटेंट ,बहुत खुबसूरत कवितायेँ होने के बाद भी ये किताब उतनी बेहतरीन नहीं बन पाई जितनी होनी चाहिए थी ।पुस्तक में कई पृष्ठों पर बैकग्राउंड का रंग इतना चटक लगाया गया है जिसका प्रभाव काले रंग के फांट वाले अक्षरों पर पड़ा है और वो कहीं दब रहे हैं ।यदि उन गहरे रंग वाले पेज पर अक्षरों का फाँट कलर रिवर्स में रखा गया होता तो अक्षर शब्द उभर कर दीखते और किताब और आकर्षक बन सकती थी ।पर इसमें लेखक का कोई दोष नहीं ।उसने तो जब प्रकाशन संस्था को पाण्डुलिपि सौंप दी तो ये प्रकाशन संस्थान,वहां के संपादक,चित्रकार या डिजाइनर की जिम्मेदारी है की वो किताब को कितनी आकर्षक और बेहतरीन बनाएं ।उम्मीद है प्रकाशन विभाग इस किताब की आगे की आवृत्तियों पर इस तरफ ध्यान देंगे ।------बहरहाल डा०अरविन्द दुबे जी से यह उम्मीद है कि भविष्य में भी अपने लेखन से हिंदी बल साहित्य को यूं ही समृद्ध करते रहेंगे ।



०००



डा०हेमन्त कुमार



9451250698  

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. ‘देख लूं तो चलूं’ "आदिज्ञान" का जुलाई-सितम्बर “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” ११मर्च २०१९ ११मार्च 1mai 2011 2019 अंक 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अक्षत अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अपराध अपराध कथा अभिनव पाण्डेय अभिभावक अमित तिवारी अम्मा अरविन्द दुबे अरुणpriya अर्पण पाण्डेय अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आनन्द नगर” आने वाली किताब आबिद सुरती आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उम्मीद के रंग उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक टिपण्णी एक ठहरा दिन एक तमाशा ऐसा भी एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महत्वपूर्ण समीक्षा एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता ओड़िया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथाकार समीर गांगुली कथावाचन कर्मभूमि कला समीक्षा कलाकार कविता कविता। कविताएँ कवितायेँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काफिला नाट्य संस्थान काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किताबों में चित्रांकन किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैंसर-दर-कैंसर कैमरे. कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं क्षणिकाएँ खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीतांजलि गिरवाल गीतांजलि गिरवाल की कविताएं गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चिड़ियाँ पिकनिक करने आईं चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छिपकली छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जन्मदिन जन्मदिवस जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जात। जाने क्यों ? जेठ की दुपहरी टिक्कू का फैसला टोपी ठहराव ठेंगे से डा० शिवभूषण त्रिपाठी डा0 हेमन्त कुमार डा०दिविक रमेश डा0दिविक रमेश। डा0रघुवंश डा०रूप चन्द्र शास्त्री डा0सुरेन्द्र विक्रम के बहाने डा0हेमन्त कुमार डा0हेमन्त कुमार। डा0हेमन्त कुमार्। डॉ.ममता धवन डोमनिक लापियर तकनीकी विकास और बच्चे। तपस्या तलाश एक द्रोण की तितलियां तीसरी ताली तुम आए तो थियेटर दरख्त दरवाजा दशरथ प्रकरण दस्तक दिशा ग्रोवर दुनिया का मेला दुनियादार दूरदर्शी देश दोहे द्वीप लहरी नई किताब नई पत्रिका नदी किनारे नया अंक नया तमाशा नयी कहानी नववर्ष नवोदित रचनाकार। नागफ़नियों के बीच नारी अधिकार नारी विमर्श निकट नित्या नित्या शेफाली नित्या शेफाली की कविताएं नियति निवेदिता मिश्र झा निषाद प्रकरण। नेता जी नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2) नेहा शेफाली नेहा शेफ़ाली। पढ़ना पतवार पत्रकारिता-प्रदीप प्रताप पत्रिका पत्रिका समीक्षा परम्परा परिवार पर्यावरण पहली बारिश में पहले कभी पहले खुद करें–फ़िर कहें बच्चों से पहाड़ पाठ्यक्रम में रंगमंच पार रूप के पिघला हुआ विद्रोह पिता पिता हो गये मां पिताजी. पितृ दिवस पुण्य तिथि पुण्यतिथि पुनर्पाठ पुरस्कार पुस्तक चर्चा पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा। पुस्तकसमीक्षा पूनम श्रीवास्तव पेंटिंग्स पेड़ पेड़ बनाम आदमी पेड़ों में आकृतियां पेण्टिंग प्यारा कुनबा प्यारी टिप्पणियां प्यारी लड़की प्यारे कुनबे की प्यारी कहानी प्रकृति प्रताप सहगल प्रतिनिधि बाल कविता -संचयन प्रथामिका शिक्षा प्रदीप सौरभ प्रदीप सौरभ। प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा। प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव। प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव. प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव। प्रेरक कहानी फ़ादर्स डे।बदलते चेहरे के समय आज का पिता। फिल्म फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति फ़ेसबुक बंकू बंधु कुशावर्ती बखेड़ापुर बचपन बचपन के दिन बच्चे बच्चे और कला बच्चे का नाम बच्चे का स्वास्थ्य। बच्चे पढ़ें-मम्मी पापा को भी पढ़ाएं बच्चे। बच्चों का विकास और बड़ों की जिम्मेदारियां बच्चों का आहार बच्चों का विकास बच्चों को गुदगुदाने वाले नाटक बच्चों को जरूर पढाएं ये किताब बदलाव बया बहनें बाघू के किस्से बाजू वाले प्लाट पर बादल बारिश बारिश का मतलब बारिश। बाल अधिकार बाल अपराधी बाल दिवस बाल नाटक बाल पत्रिका बाल मजदूरी बाल मन बाल रंगमंच बाल विकास बाल साहित्य बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक बाल साहित्य समीक्षा। बाल साहित्यकार बालवाटिका बालवाणी बालश्रम बालिका दिवस बालिका दिवस-24 सितम्बर। बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत बूढ़ी नानी बेंगाली गर्ल्स डोण्ट बेटियां बैग में क्या है ब्लाइंड स्ट्रीट ब्लाग चर्चा भजन भजन-(7) भजन-(8) भजन(4) भजन(5) भजनः (2) भद्र पुरुष भयाक्रांत भारतीय रेल मंथन मजदूर दिवस्। मदर्स डे मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला कौशल पाण्डेय मनोविज्ञान महुअरिया की गंध मां माँ मां का दूध मां का दूध अमृत समान माझी माझी गीत मातृ दिवस मानस मानस रंजन महापात्र की कविताएँ मानस रंजन महापात्र की कवितायेँ मानसी। मानोशी मासूम पेंडुकी मासूम लड़की मिशन ग्रीन वार मुंशी जी मुद्दा मुन्नी मोबाइल मूल्यांकन मेरा दोस्त मेरा नाम है मेराज आलम मेरी अम्मा। मेरी कविता मेरी रचनाएँ मेरे मन में मोइन और राक्षस मोनिका अग्रवाल मौत के चंगुल में मौत। मौसम यात्रा यादें झीनी झीनी रे युवा युवा स्वर रंग बिरंगी दुनिया रंगबाज रंगबाजी करते राजीव जी रस्म मे दफन इंसानियत राजीव मिश्र राजेश्वर मधुकर राजेश्वर मधुकर। राधू मिश्र रामकली रामकिशोर रिपोर्ट रिमझिम पड़ी फ़ुहार रूचि रोचिका शर्मा लखनऊ लगन लघुकथा लघुकथा। लड़कियां लड़कियां। लड़की लालटेन चौका। लिट्रेसी हाउस लू लू की सनक लेख लेख। लेखसमय की आवश्यकता लोक चेतना और टूटते सपनों की कवितायें लोक संस्कृति लोकार्पण लौटना वनभोज वनवास या़त्रा प्रकरण वरदान वर्कशाप वर्ष २००९ वह दालमोट की चोरी और बेंत की पिटाई वह सांवली लड़की वाल्मीकि आश्रम प्रकरण विकास विचार विमर्श। विज्ञानं बाल कविताएँ विश्व पुतुल दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस. विश्व रंगमंच दिवस व्यंग्य व्यक्तित्व व्यन्ग्य शक्ति बाण प्रकरण शब्दों की शरारत शाम शायद चाँद से मिली है शिक्षक शिक्षक दिवस शिक्षक। शिक्षा शिक्षालय शैलजा पाठक। शैलेन्द्र श्र प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव स्मृति साहित्य प्रतियोगिता श्रद्धांजलि श्रीमती सरोजनी देवी संजा पर्व–मालवा संस्कृति का अनोखा त्योहार संदेश संध्या आर्या। संवाद जारी है संसद संस्मरण संस्मरण। सड़क दुर्घटनाएं सन्ध्या आर्य सन्नाटा सपने दर सपने सफ़लता का रहस्य सबरी प्रसंग सभ्यता समय समर कैम्प समाज समीक्षा समीक्षा। समीर गांगुली समीर लाल। सर्दियाँ सांता क्लाज़ साक्षरता निकेतन साधना। सामायिक सारी रात साहित्य अमृत सीता का त्याग.राजेश्वर मधुकर। सुनीता कोमल सुरक्षा सूनापन सूरज सी हैं तेज बेटियां सोन मछरिया गहरा पानी सोशल साइट्स स्तनपान स्त्री विमर्श। स्मरण स्मृति स्वतन्त्रता। हंस रे निर्मोही हक़ हादसा हादसा-2 हादसा। हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य हिंदी कविता हिंदी बाल साहित्य हिन्दी ब्लाग हिन्दी ब्लाग के स्तंभ हिम्मत हिरिया हेमन्त कुमार होलीनामा हौसला accidents. 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