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पुस्तक समीक्षा--बच्चों का विकास और बड़ों की जिम्मेदारियां

रविवार, 2 नवंबर 2014

पुस्तक -बच्चों का सम्पूर्ण विकास
लेखिका-अर्पणा पाण्डेय
प्रकाशक-किताबघर,
24 /4855,अंसारी रोड,दरियागंज,
नई दिल्ली-110002

मूल्य-140रूपये।

        दो-ढाई दशक पूर्व तक हिंदी में साहित्य से अलग हटकर ज्ञान-विज्ञानं और जीवन चर्या के विविध आयामों पर मौलिक एवं सरल भाषा में लिखी पुस्तकें प्राय: कम ही दिखती थीं।इस तरह की ज्यादातर पुस्तकें अंग्रेजी से अनूदित होकर आतीं थीं,जिनकी सामग्री न तो हमारी जीवन शैली से मेल खाती थी और न ही उनकी भाषा में कोई खास आकर्षण या प्रवाह होता था।यह सुखद संकेत है कि विगत कुछ वर्षों में इस तरह के विषयों पर लिखने वाले न केवल नए-नए लेखक प्रकाश में आये,वरन अच्छे प्रकाशकों ने ऐसी किताबों को महत्व देकर अच्छी साज-सज्जा के साथ प्रकाशित करने की पहल भी की है।
            हाल ही में प्रकाशित अर्पणा पाण्डेय की पुस्तक बच्चों का सम्पूर्ण विकासएक ऐसी ही पुस्तक है जिसमे छोटे बच्चों के शारीरिक,मानसिक एवं व्यक्तित्व विकास सम्बन्धी विभिन्न पक्षों पर अत्यंत सरल एवं संतुलित भाषा में प्रकाश डाला गया है।                                                                   प्राय: हम बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारियों को अत्यंत ही सामान्य ढंग से लेते है,जब कि यह इतना आसान और सहज नहीं है,अर्पणा पाण्डेय की यह किताब छोटे बच्चों की माताओं (और पिताओं के लिए भी )एक मार्गदर्शक का तो काम करती ही है,साथ ही उनकी जिम्मेदारियों के प्रति आगाह भी करती है्। लेखिका ने बाइस छोटे -छोटे आलेखों के माध्यम से बच्चों की स्वाभाविक आदतो,उनके स्वास्थ्य,आहार,खेल क्रियाए,पठन-पाठन, सामाजिक आचरण,प्रारंभिक शिक्षा,भाषा विकास,योगाभ्यास, संगीत और नाटक के साथ-साथ किस हद तक सेक्स शिक्षा   दिए जाने की आवश्यकता है, जैसे विषयों से जुडी समस्याओं  को बहुत ही व्यावहारिक एवं तार्किक ढंग से,समाधान की सीमाओं तक चर्चा की है।इस पुस्तक के माध्यम से उठाई गई बातों का केंद्र बिंदु हमारा मध्यवर्ग है,भाषा सरल,स्वाभाविक तथा आम बोल-चाल की है।यही दो ऐसे कारण हैं जिससे यह पुस्तक एक व्यापक पाठक वर्ग की जरूरतों को पूरा करती है।
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कौशल पाण्डेय                                  

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“बखेड़ापुर” के बहाने वास्तविक भारत की तस्वीर।

सोमवार, 13 अक्टूबर 2014

पुस्तक -- बखेड़ापुर
लेखक - हरे प्रकाश उपाध्याय
प्रकाशकभारतीय ज्ञानपीठ
प्रकाशन वर्ष2014

                  हिन्दी कथा साहित्य में ग्रामीण परिवेश को लेकर लिखने वाले बड़े लेखकों के नामों की जब बात की जाती है तो प्रेमचंद की परम्परा का निर्वहन करने वाले कुछ चुनिंदा नाम ही हमारे सामने आते हैं।उन्हीं की चर्चाएं होती हैं उन्हीं पर विमर्श भी होते हैं।इधर हिन्दी के उपन्यासों में भारतीय गांवों पर अच्छे उपन्यास कम ही लिखे जा रहे हैं।जब की आज भी हमारे देश की आबादी का बड़ा हिस्सा गांवों में ही बसता है।आज भी हमारे गांवों में शोषण का स्वरूप वही है जो प्रेमचन्द के जमाने में था।आज भी निचले वर्ग,पिछड़े वर्ग,दलितों की समस्याएं वही हैं जो प्रेमचन्द के उपन्यासों में वर्णित है।हां शोषकों का चेहरा जरूर बदल गया है।उनकी पोशाकें और मुखौटे बदल गये हैं।और दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इधर हिन्दी साहित्य को ग्रामीण परिवेश पर आधारित ऐसे उपन्यास भी नहीं लिखे जा रहे जिन्हें हम प्रेमचन्द या रेणु की परम्परा से जोड़ सकें।
                           अभी हाल में ही प्रकाशित हरे प्रकाश उपाध्याय का उपन्यास बखेड़ापुर प्रेमचन्द और रेणु की ही परम्परा वाली एक सशक्त कृति है।जो हमारे सामने आज के गांवों की उन नंगी और भयावह सच्चाइयों की एक एक परतें इतने सहज ढंग से उघारती है,जिसे पढ़ कर पाठक को महसूस होगा कि क्या स्थितियां सचमुच इतनी भयावह भी हो सकती हैं? 
    बखेड़ापुर नाम तो गांव के प्रतीक के रूप में ही लिया गया है।लेकिन उपन्यास पढ़ते समय हमें उसमें घटने वाली हर घटना,हर कहानी यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या आज़ादी के इतने साल बीत जाने के बाद भी हमारा देश सामन्ती ताकतों और मानसिकता का इस कदर गुलाम है जिसमें एक सामान्य ग्रामीण को अपनी जिन्दगी स्वेच्छा से जीने या मरने का हक भी नहीं है?उसके हर चरित्र की कहानी हमें आज के ग्रामीण परिवेश की वास्तविकता से परिचित कराती है।
    उपन्यास की कथावस्तु बखेड़ापुर गांव से ही शुरू होती है उसी गांव में खतम हो जाती है।लेकिन इस पूरी कथावस्तु के अन्दर कई और कहानियां भी चलती हैं।इन अन्तर्निहित कहानियों के एक एक चरित्र को लेकर हरे प्रकाश ने जिस तरह से बड़ी सहजता के साथ हमारे गांवों की दलगत राजनीति,निम्न वर्ग के शोषण के विविध रूपों,प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था,निम्नवर्ग की आर्थिक बदहाली,दलितों के अंदर पनप रहे विद्रोह,उनके दमन की सामन्ती कोशिशों जैसी ढेरों समस्याओं को उकेरा है वह देखते ही बनता है।   
                   उपन्यास के पात्र सुदामा,धीरू,संगीता मैडम,पचमा मास्साब,भैरव,हेड सर,रूप चौधरी,ज्वाला सिंह,लोटीराम,बुधन तेली,भूअर,लछमिनिया,परबतिया---और भी कईजिनके बारे में पढ़ते हुये या जिनके विचार पढ़ते हुये आपको बराबर महसूस होगा कि हम सच में भारतवर्ष की असली आबादी या असली आम जन के बारे में पढ़ रहे उन्हीं के बीच उठ बैठ रहे।साहित्यिक भाषा में कहा जाये तो एक तरह का तादात्म्य स्थापित हो जाता है हमारा इन पात्रों के साथ।मतलब हमें भी लगने लगता है कि हम खुद भी इन्हीं के बीच से हैं---या कि अरे यह तो हमारी ही कहानी है।और पाठकों का  पात्रों के साथ यह तादात्म्य स्थापित होते जाना ही उपन्यास की सबसे बड़ी सफ़लता है।
     हरे प्रकाश खुद भी गांव की उसी जमीन के व्यक्ति हैं इसी लिये वहां की एक एक पीड़ा,व्यथा को उनसे बेहतर भला कौन रेखांकित कर सकता है।भूअर की मौत के बाद गांवों की बदहाली और एक आम आदमी की अशक्तता और निरीहता का दुख पचमा मास्साब के अन्दर से फ़ूट पड़ता है।---क्या होगा,जमाना कहां से कहां चला,मगर हमार गांव-जवार को दवाई बीरो का सुविधा नहीं है।आदमी जैसे जंगल में रह रहा है। कीचड़ में जांगर खटाते खटाते कीचड़ में ही समा जाना जीवन है। कहीं किसी को कोई सुख आराम नहीं।शहर में सब लोग मौज मार रहा है।------अदम गोंडवी सहीए लिखे हैं---काजू प्लेट में,भिसकी गिलास में,उतरा है राम राज विधायक निवास में।---गरीबअमीरबड़नान्हहम लोगवे लोगबेचारा भुअरा---। अब आम जन की इस जीवन्त पीडा को वही उकेर पायेगा जो खुद भी उसी माटी की गहरायी से निकल कर आया हो।
   ऐसे ही शोषण के बदलते हुये स्वरूप की एक झलक हम वहां भी देख सकते हैं जब गरीबों के झण्डाबरदारों की बात आती है।वो संगठन जो आपके हितों की बात करते हैं वही किस कदर आपके शोषण का माध्यम बन जाते हैं----संगठनों के लोग चन्दा वसूलने में ही निर्ममता से पेश नहीं आते बल्कि उनके दस्ते जिन गांवों में जाते,वहां अपने समर्थकों के घर रुकने पर खाने-पीने और रहने के नाम पर भी काफ़ी तंग करते हैं।दोनों ही संगठनों में लगभग एक ही तरह के लोग थे।अब जब आपके पक्ष में पार्टी बन्दी करने वाले लोग ही आपका शोषण करने लगेंगे तो आपका कौन खेवनहार बनेगा?
    हमारे आज के प्रजातन्त्र के महा उत्सव यानि चुनाव का इससे बेहतरीन उदाहरण भला कहां मिलेगा। चुनाव प्रचार में सभी पार्टियां दारू,नोट और नारे के बल पर वोट की सौदेबाजी में एक दूसरे को पछाड़ देना चाहती थीं। प्रत्याशियों को उनकी पार्टियों की ओर से धन के अलावा हथियार और गुण्डों की भी बजाप्ता सहायता दी जा रही थी।जैसा कंडीडेट,उसको उतने ही गुंडे--हर कीमत पर वोट चाहियें नोट की नदी बहा दो और गड़ही में दारू बहा दो,हर नुक्कड़ पर नाच करा दो,-------के सी यादव तो मजाक में यहां तक कह दे रहे हैं लोगों से कि हमारा चाहो तो पिछवाड़ा ले लो,मगर वोट दे दो।जनता को मजा आ रहा है----धन-धन हो गान्ही जी कि सुराज दिलाए कि नेता अपना पिछवाड़ा देने तक को राजी है।---जै बोलो जवाहर लाल की,बाबा साहेब अम्बेडकर जी की जै हो---।----अब इसे हम अपने सबसे बड़े लोकतन्त्र के महोत्सव यानि चुनावों का यथार्थ कहें या कि भारत वर्ष की जनता का माखौल। लेकिन जो कुछ भी लिखा गया है वो हमारे देश की भयावह तस्वीरों का एक पहलू है।
                बखेड़ापुर उपन्यास बहुत भारी भरकम नहीं है लेकिन अपने आप में एक मुकम्मल कथावस्तु को हमारे सामने प्रस्तुत करता है।इसमें हर कहानी कुछ पात्रों को साथ लेकर हमारे समक्ष ग्रामीण परिवेश के एक नये स्वरूप,उसकी एक नयी घटना,एक अलग विसंगति को प्रस्तुत करती है।और गांवों की इन्हीं घटनाओं,कहानियों विद्रूपताओं,संघर्षों का एक ऐसा ताना बाना हमारे सामने लेखक द्वारा अनायास ही बुना जाता है जो हमे उपन्यास की सम्पूर्णता तक ले जाता है।
         हममें से अगर कोई पाठक गांवों से सम्बन्ध नहीं रखता है तो भी उसके समक्ष उपन्यास की भाषा या शैली के स्तर पर कोई भी कठिनाई नहीं आ सकती है। उपन्यास की शैली इतनी रोचक और भाषा इतनी सरल और प्रवाहमय है कि हर वर्ग का पाठक इसे समझ सकेगा। पात्रों की आम बोल चाल में कुछ असंवैधानिक शब्दों का प्रयोग भी बहुत अधिक नहीं खटकता क्यों कि आज आम आदमी उतनी गालियों का प्रयोग करना अपना हक मान चुका है।
            अपनी भाषा,बोली की इसी रवानी,शैली की रोचकता और कथ्य की यथार्थता के साथ बखेड़ापुर उपन्यास भी प्रेमचन्द,रेणु,राही मासूम रजा और मिथिलेश्वर के उपन्यासों की पंक्ति में खड़ा होने में सक्षम है।
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समीक्षक- डा0हेमन्त कुमार


हरे प्रकाश उपाध्याय
बैसाडीह,भोजपुर(बिहार) में 5 फ़रवरी 1981 को पैदा हुये हरे प्रकाश उपाध्याय का यह प्रथम उपन्यास और एक कविता संग्रहखिलाड़ी दोस्त तथा अन्य कविताएंप्रकाशित।साहित्य के कई प्रसिद्ध सम्मान एवम पुरस्कार। अपने मिलनसार स्वभाव और कुशल सम्पादकीय गुणों से हरे ने साहित्यिक जगत में मित्रों,परिचितों,आत्मीयों का एक वृहत साम्राज्य भी खड़ा किया है। सम्प्रति मन्तव्य त्रैमासिक पत्रिका का सम्पादन।
      


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तकनीकी के विकास में अपराधी बनते बच्चे------।

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2014

         
(फ़ोटो-गूगल से साभार)
 
इधर अखबारों में लगातार प्रकाशित होने वाली किशोर या बाल अपराधों की खबरें बेहद चौंकाने वाली हैं।रोज ही किसी न किसी शहर,स्कूल,कालेज या गांव के कोने में कोई न कोई बालक या किशोर अपराधी बन जा रहा है।और वह भी चेन स्नैचिंग,जेबकतरी जैसे छोटे मोटे अपराधों का नहीं बल्कि समाज के सबसे संवेदनशील हिस्से यानि लड़कियों के प्रति यौन हिंसा का अपराधी।कभी किसी बच्ची के साथ उसके सहपाठियों द्वारा ही छेड़-छाड़ या अश्लील टिप्पणी,कभी मोबाइल पर अश्लील मैसेज भेजने की घटना तो कभी किसी छात्र द्वारा किसी लड़की का वीडियो बना कर उसे सोशल साइट्स पर डालना या ब्लैक मेल करना।
                 पिछली 8 मई 2014 को हिन्दुस्तान दैनिक अखबार में प्रकाशित आगरा शहर की एक खबर ने तो बड़े बड़ों के होश उड़ा दिये थे।बहुतों ने उस खबर को पढ़ा भी होगा।फ़िर भी संदर्भ के तौर पर यहां मैं उस घटना का उल्लेख करना जरूरी समझता हूं।
          घटना आगरा के ताजगंज क्षेत्र में श्याम लाल मार्ग के पास की एक छोटी सी बस्ती की है।बस्ती की एक सड़क पर पांच बच्चे कंचे खेल रहे थे।कोई कक्षा एक छत्र तो कोई कक्षा तीन का।पड़ोस की एक बच्ची ने उनके पास आ कर छत पर आए बंदरों को भगाने के लिये कहा।क्योंकि उसके मां बाप मजदूरी करने गये थे और वह बंदरों से डर रही थी।पांचों उसकी छत पर गये और बंदरों को भगा दिया।इसके बाद उन्होंने जो किया वो हतप्रभ करने वाला था। पांचों लड़कों ने मिलकर उस लड़की को दबोच लिया और उसके कपड़े फ़ाड़ने लगे।बच्ची के चीखने पर पड़ोसियों ने आकर उस बच्ची को लड़कों के चंगुल से मुक्त कराया।
    पुलिस चौकी पर जब पुलिस वालों ने उन बच्चों से पूछा कि,उन्हें मालूम है कि वो सभी गैंगरेप की कोशिश कर रहे थे?तो उन लड़कों का जवाब सुन कर पुलिस वालों के होश फ़ाख्ता हो गये।उन्होंने कहा कि वो क्या कर रहे थे ये उन्हें नहीं मालूम लेकिन उनके पड़ोस में रहने वाले कुछ बड़ी उमर के लड़के उन्हें मोबाइल पर फ़िल्में दिखाते हैं। और उन फ़िल्मों में ऐसा करते दिखाया गया था।वही फ़िल्में देख कर उन बच्चों के मन में वैसा ही करने की बात आई।
       यह खबर सिर्फ़ पुलिस वालों को ही नहीं बल्कि हमें,आपको सभी को स्तब्ध करने वाली है।साथ ही आज के हाईटेक होते जा रहे पूरे समाज को बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करने वाली है।
    आज जब कि हर हाथ में मोबाइल है।घर घर में इण्टरनेट की सुविधा उपलब्ध है। हम घर स्कूल से लेकर दफ़्तर और बाजार तक हर जगह हाईटेक होते जा रहे हैं।इन नयी बदलती परिस्थितियों के साथ चलने के लिये क्या हम अपने बच्चों को तैयार करने और सही दिशा निर्देश देने का भी काम कर रहे हैं।वाणिज्य एवं उद्योग मंडल एसोचैम के एक ताजा सर्वेक्षण से जानकारी मिली है कि हमारे देश के महानगरों और छोटे शहरों तक के 8 से 13 साल उम्र वाले लगभग 73 प्रतिशत बच्चे आज फ़ेसबुक,व्हाट्स ऐप जैसे सोशल नेटवर्क साइट्स पर मौजूद हैं।
    यदि इन आंकड़ों को पूरी तरह सही माना जाय तो हमारे लिये चिन्ता की बात यह है कि बच्चे इतनी कम उम्र में इन सोशल साइट्स पर क्या कर रहे हैं?जाहिर सी बात है कि वो इन साइट्स का उपयोग अपनी शैक्षिक दक्षता या कोई हुनर बढ़ाने के लिये तो नहीं कर रहे होंगे। अगर वो इस दिशा में कोई प्रयास कर रहे होते तो यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि होती हमारी प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था की।लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि ये बच्चे वहां मौजूद हैं तो सिर्फ़ नये दोस्त बनाने,रोज अपनी फ़ोटो अपलोड करने,अपने दोस्तों की फ़ोटो देखने या फ़िर चैटिंग करने के लिये।
   प्रश्न यह भी है कि पढ़ने लिखने की उम्र में अविकसित बौद्धिक स्तर वाले इन बच्चों का अपने कीमती समय का ज्यादा हिस्सा इन सोशल साइट्स पर बिताना क्या देश,समाज या उनके परिवार  और खुद उनके हित में है?क्या वे इन सोशल साइट्स पर जाकर उन पर अपलोड किये गये तमाम पोर्न वीडियोज,पोर्न फ़ोटोग्रैफ़्स से बचे रह सकेंगे?क्या उनके अभिभावकों और अध्यापकों की यह जिम्मेदारी नहीं बनती कि उनके हाथ में मोबाइल देते समय या उनकी मांग पर घर में इन्टरनेट लगवाते समय अपने बच्चों पर इस बात का प्रतिबंध लगा सकें कि अभी तुम्हारी उमर पढ़ने लिखने,खेलने कूदने की और अपनी स्किल्स को बढ़ाने की है।सोशल नेटवर्क पर सबय बिताने,सर्फ़िंग या चैटिंग करने की नहीं।
    अगर किसी अभिभावक ने अपने बच्चे को सोशल नेटवर्क पर जाने की अनुमति दी है तो भी उसे चाहिये कि वह बीच बीच में उसकी फ़्रेण्ड लिस्ट चेक करें।कभी उसकी वाल पोस्ट चेक करें।इससे उस बच्चे को वह बहुत सारे ऐसे खतरों से बचा सकते हैं जिनका शिकार हो जाने पर बच्चे का सारा विकास बाधित हो सकता है।
     अभी भी वक्त ज्यादा नहीं हुआ है।यदि समाज,देश के साथ ही हमें इन बच्चों का भविष्य बचाना है तो अभिभावकों,अध्यापकों को अपने बच्चों छात्रों को इस दिशा में जागरूक करना होगा।उन्हें समझाना होगा। जिससे भविष्य में किसी अन्य शहर,कस्बे में आगरा में घटित हुयी घटना की पुनरावृत्ति न हो सके।
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डा0हेमन्त कुमार

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रीना पीटर की फ़ोटो की दुनिया

बुधवार, 10 सितंबर 2014

फ़ोटोग्रैफी एक कला भी है और दुनिया को देखने की एक तीसरी आंख भी।आज मैं यहां अपनी मित्र रीना पीटर के द्वारा मोबाइल कैमरे में कैद किये गये कुछ दृश्य यहां पोस्ट कर रहा हूं।

                        
                               

                      

                        

                        

                            

                     

                              






एम0बी0ए0 कर चुकी रीना पीटर दिल्ली की एक फ़र्नीचर डिजाइन कम्पनी में इन्टीरियर डिजाइनिंग से जुड़ी हैं।रचनात्मकता और कला इनके हर कार्य में झलकती है।फ़ोटोग्रैफ़ी इनका प्रिय शौक है।

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पत्रिका ---"निकट” का नौवां अंक ---।

रविवार, 7 सितंबर 2014

           
 हिंदी साहित्य को प्रतिष्ठित कराने और पहचान दिलाने में लघु पत्रिकाओं की एक बहु-आयामी भूमिका रही है।बहुत सी पत्रिकाएं निकलीं और कुछ अंक प्रकाशित करने के बाद बंद भी हुईं,पर इनकी परंपरा और निरंतरता पर कभी विराम नहीं लगा।इन पत्रिकाओं में प्रकाशित तमाम रचनाएं वास्तव में हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर है और कई मायनों में इतिहास भी।व्यक्तिगत साधनों से निकलने वाली इन पत्रिकाओं ने हज़ारों की संख्या में नए लेखकों को मंच ही नहीं दिया,ल्कि उन्हें प्रसद्धि भी दी"निकट"एक ऐसी ही साहित्यिक पत्रिका है,जिसके ले ही वर्ष में केवल दो अंक निकलते है,पर इसमें प्रकाशित रचनाओं का सन्देश बहुत दूर तक जाता है।लघु पत्रिका निकालना निश्चित ही एक चुनौती भरा काम है।यह चुनौती तब और भी बढ़ जाती है,जब इस तरह की पत्रिका देश के बाहर रह कर निकालनी हो।  
          कथाकार कृष्ण बिहारी के सम्पादन में संयुंक्त अरब अमीरात की राजधानी आबूधाबी से प्रकाशित होने वाली पत्रिका"निकट"का अंक-9 (जुलाई,14 दिसम्बर,14)हाल ही में प्रकाशित होकर आया है।इस अंक में वह सब कुछ सामग्री है जो किसी भी साहित्यिक पत्रिका को सम्पूर्णता प्रदान करती है।स्व0अमरकांत पर लिखे रवीन्द्र कालिया के संस्मरण को पढ़ना एक ऐसे लेखक को निकट से जानने के अहसास से होकर गुजरना है,जिसने अपना पूरा जीवन अभावों में बिता दिया पर लेखन को अपने से दूर नहीं जाने दिया।लेखक बने रहने यह जिद प्राय:कम ही रचनाकारों में देखने को मिलती है।        
स्व0कवि मान बहादुर सिंह की कुछ अप्रकाशित कविताएं इस अंक की खास उपलब्धि है।मान बहादुर सिंह ने अपनी कविताओं में जिस तरह से लोक जीवन को सम्पूर्णता के साथ उकेरा है,वह उन्हें अपने समकालीन कविओं में एक अलग पहचान देता है।इसके लिए उन्हें लम्बे समय तक याद किया जाएगा।कुछ पंक्तियां दृष्टव्य हैं।
उजरा बैल उलांच रहा है,
पगहे भर में नाच रहा है,
खूंटा सूंघ चाटकर नथ को
अपने मूत लिखी जो भाषा,
मुँह बिचकाए बांच रहा है
उजरा बैल कुलांच रहा है--।
        रवींद्र कालिया,प्रेम भारद्धाज,विभारानी और प्रताप दीक्षित की कहानियां तो कथारस से भरपूर है ही,बिमल चन्द्र पाण्डेय के उपन्यास का अंश भी कम पठनीय नहीं है।हिंदी में अभी भी सिनेमा पर गंभीर आलेख प्राय:कम ही पढ़ने को मिलते है,पर सुचित्रा सेन पर दयानंद पाण्डेय और समकालीन फिल्मों पर सुदीप्ति के आलेख इस अति प्रभवशाली माध्यम के प्रति पत्रिका के सकारात्मक दृष्टिकोण को रेखांकित करते है।आज सिनेमा और रंगमंच का साहित्य से जो रिश्ता जुड़ रहा है उसमे इस तरह के आलेख निश्चित ही उस रिश्ते को मजबूती देने और   समझने में एक सार्थक भूमिका का निर्वाह करेंगे।"निकट" के अगले अंकों से और भी अपेक्षाएं है।
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कौशल पाण्डेय                                  
1310ए,वसंत विहार,
कानपुर208021
मो0-09389462070                                                                                                 
                                   

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सिर्फ़ साहित्यकार,समालोचक और समाजवादी चिंतक ही नहीं थे ---डा0रघुवंश।

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

         
पिछले वर्ष 23 अगस्त2013 को अचानक ही सुबह डा0अनुपम आनन्द ने खबर दी कि डा0रघुवंश जी का निधन हो गया।सुन कर स्तब्ध हो गया था मैं। तुरन्त ही मैंने उनके मझले पुत्र श्री ज्योति मित्र को फ़ोन किया।तो इस दुखद समाचार की पुष्टि हो गयी।काफ़ी देर तक वैसे ही जड़वत बैठा रहा।---आंखों के आगे आदरणीय डा0 रघुवंश जी के साथ बिताये एक एक सुखद पल कैमरे के फ़्लैश की चमकते गये थे।
        सन1979 में डा रघुवंश जी से मेरी पहली मुलाकात इलाहाबाद में उनके बैंक रोड स्थित आवास पर हुयी थी।मैं उनके निर्देशन में शोध करना चाहता था।पहले तो उन्होंने एकदम साफ़ मना कर दिया।पर दो तीन दिन लगातार जाने के बाद जब मैंने उनसे कहा कि मैं रिसर्च आपके साथ ही करूंगा, नहीं तो नहीं तब मुझे उनके साथ रिसर्च ज्वाइन करने का सौभाग्य मिल सका।
            डा0रघुवंश जी के साथ मैं लगभग सात-आठ साल रहा।चार साल शोध,तीन--चार साल रिसर्च असिस्टेण्ट के रूप में। इस दौरान मुझे उन्होंने एक गुरु,पिता और मित्र तीनों ही का स्नेह दिया।उनके साथ मैंने देश के हर कोने की लंबी लंबी यात्राएं की।बड़े-बड़े साहित्यकारों से मिला और खूब अच्छी अच्छी दावतें भी उड़ाईं।ऐसी ही एक यात्रा के दौरान घटित एक घटना का उल्लेख मैं यहां करूंगा जिससे रघुवंश जी की जीवटता और हिम्मत का अंदाजा लग सकता है।
     मुझे रघुवंश जी के साथ इलाहाबाद से गोरखपुर किसी सेमिनार में जाना था। उन दिनों भटनी से आगे की यात्रा छोटी लाइन(नैरो गेज)की ट्रेन से होती थी।ट्रेन बदलने हमे दूसरे प्लेटफ़ार्म पर जाना था।सिर्फ़ दो मिनट थे ट्रेन छूटने में।कुली दिख नहीं रहे थे।मैंने कहा सर ट्रेन छूट जायेगी क्या?रघुवंश जी ने कहा ---अरे ऐसे कैसे छूटेगी ट्रेन।अभी देखो ---। और अपने मुड़े हुये हाथों में ही एक में बैग और एक में छोटी अटैची उठा कर रघुवंश जी दौड़ पड़े दूसरे प्लेटफ़ार्म की ओर---अब मैं भी पीछे पीछे दो भारी वाली अटैचियां लेकर दौड़ा---और अन्ततः हमें गाड़ी मिल गयी। तो ऐसे कर्मठ,और हिम्मत वाले इन्सान थे रघुवंश जी। ऐसे महान और बहुमुखी प्रतिभा वाले व्यक्ति का इस तरह जाना---सच में हिन्दी साहित्य के साथ ही भारत के बुद्धिजीवियों की अपूरणीय क्षति कही जायेगी।
              ड़ा रघुवंश जी का जन्म 30 जून 1921 को उत्तर प्रदेश के गोपामऊ कस्बे में हुआ था।बचपन से ही हाथों की विकलांगता के बावजूद  भी आपने पढ़ाई की।अँगूठे साल तक सिर्फ़ पढ़ना ही हो सका।पर अन्ततः एक दिन अपने हाथों और पैर के अंगूठों में कलम फ़ंसा कर लिखने भी लगे।लिखने पढ़ने का ये जो सिलसिला शुरु हुआ तो इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम0ए0,डी0फ़िल0 भी कर लिया।और वहीं पर अध्यापन भी करने लगे।
                    डा0रघुवंश जी ने कभी किसी को यह अहसास होने ही नहीं दिया कि उनके दोनों हाथ खराब हैं।वो अपने सारे ही काम दोनों हाथों और पैरों के सहारे बखूबी सम्पन्न कर लेते थे।लिखने के लिये वो तखत य चौकी पर बैठ कर अपने दाहिने पैर के अंगूठे में पेन फ़ंसा कर अपने दाहिने हाथ की सहायता से काफ़ी तेज गति से लिख लेते थे।दाढ़ी बनाना,कंघी करना,खाना खाना, कपड़े बदलना हर काम वो खुद ही करते थे---हां कभी कभी बटन लगाने में उन्हें जरूर थोड़ी दिक्कत होती थी ----वो भी जल्दी रहने पर।समय रहता था तो ये भी वो खुद ही करते थे। उनके अंदर जीवन के प्रति जो जिजीवषा,कर्मठता,और कुछ अलग और नया करने की इच्छा थी शायद उसी ने उन्हें इतने बड़े बड़े उपन्यास,शोध और आलोचना की पुस्तकें लिखने के लिये प्रेरित किया। 
     एक अध्यापक के रूप में रघुवंश जी ऊपर से दिखने में जितने कठोर थे अंदर से उतने ही मृदु और कोमल स्वभाव वाले।अक्सर छात्रों को डांटते तो कुछ समय बाद ही माहौल को हलका करने के लिये उनसे मजाक भी कर देते।एक अध्यापक के साथ ही  आप देश के प्रमुख समाजवादी चिंतकों में से एक  थे।एक जमाने में इलाहाबाद में उनके बैंक रोड स्थित आवास पर हमेशा साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों का जमावड़ा रहता था।

                                                                          साहित्यकार के रूप में उन्होंने हिन्दी साहित्य को छायातप,तंतुजाल,अर्थहीन,वह अलग व्यक्ति,हरी घाटी जैसे उपन्यास दिये दूसरी ओर प्रकृति और काव्य,नाट्यकला,साहित्य का नया परिप्रेक्ष्य,कबीर,सर्जनशीलता का आधुनिक संदर्भ जैसी आलोचनात्मक पुस्तकें। इमर्जेंसी में जेल में बन्दी जीवन बिताते हुये जेल और स्वतन्त्रताजैसी पुस्तक तैयार करना डा0रघुवंश जैसे कर्मठ व्यक्ति के बस की ही बात थी। नहीं तो इमर्जेन्सी में मीसा बन्दियों की जेल में क्या हलत होती थी इसे कौन नहीं जानता। इसके साथ ही रघुवंश जी ने आलोचना,आलोचना समीक्षा,क ख गजैसी पत्रिकाओं का संपादन कार्य भी संभाला।
         डा0रघुवंश को 1992मेंउ0प्र0हिन्दी संस्थान से साहित्य भूषण,के के बिड़ला फ़ाउण्डेशन से शंकर पुरस्कार1994 में उ0प्र0हिन्दी संस्थान सेसाहित्य-भारती,2008 में भारतीय ज्ञानपीठ द्वारामूर्तिदेवीपुरस्कार प्रदान किया गया। सामन्यतः 80 वर्ष के बाद साहित्य सृजन कम ही लोग कर पाते हैं परन्तु रघुवंश जी 92 साल की उम्र में भी सक्रिय थे।उनकी अंतिम पुस्तक यूरोप के इतिहास की प्रभावी शक्तियां अभी एक डेढ़ साल पहले ही प्रकाशित हुयी है।
        रघुवंश जी के साथ मेरी अंतिम मुलाकात 2009 में दिल्ली में उनके मझले पुत्र श्री ज्योति मित्र के घर पर हुयी थी। मैं एन सी ई आर टी में किसी वर्कशाप में गया था।डा0साहब को फ़ोन किया तो उन्होंने कहा कि बेटा हेमन्त इस बार मुझसे मिल कर ही जाना। अगले दिन सुबह मैं गया। तब शायद आदरणीया सावित्री जी जीवित थीं। मेरे लिये ढेर सारा नाश्ता बनवा कर रखा था रघुवंश जी ने। काफ़ी देर बातें होती रहीं। पेट भर नाश्ता करके जब मैं चलने को हुआ तो रघुवंश जी ने मुझसे कहाहेमन्त मैं चाहता हूं तुम एक नयी परम्परा को जन्म दो? मैं बत समझा नहीं और उनकी तरफ़ प्रश्नवाचक निगाहों से देखने लगा। मेरा आशय समझकर वो बोले, देखो ये तो आम बात है कि कोई गुरु अपने शिष्य की किसी पुस्तक की भूमिका लिखता है। मैं चाहता हूं तुम उल्टा करो। मतलब मेरे नये उपन्यास की भूमिका तुम लिखो। यह एक नयी परम्परा होगी।कि एक शिष्य अपने गुरु की किताब की भूमिका लिखेगा।?
    ऐसे सरल स्वभाव वाले व्यक्ति इतने बड़े बुद्धिजीवी,साहित्यकार और चिन्तक का जाना सच में एक बड़े शून्य का बन जाना है--- जिसके भरने में वक्त तो लगेगा ही। हमारे आज के युवाओं के साथ ही उन विकलांग व्यक्तियों को भी डा0रघुवंश जी के जुझारू और सौम्य सरल व्यक्ति से प्रेरणा लेनी चाहिये जो अपनी शारीरिक विकलांगता को अपनी कमी मान कर हिम्मत हार बैठे हैं या किसी हीन भाव से ग्रस्त हैं। यही आदरणीय डा रघुवंश जी के प्रति सबसे बड़ी  श्रद्धांजलि होगी।
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डा0हेमन्त कुमार

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