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निवेदिता मिश्र झा की कविताएं।

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015


वृक्ष
तुम
पहचानते हो
बेला,जूही,कचनार
या सखुए की डाली
देवदार,चीड़ तो दूर की बात…।
चलो नेट में ढूंढते हैं
गूगल सही बताता है बात।
ये है तुम्हारा या मेरा हाल
निहारते हम दूर आकाश
तरसती दरार पड़ी धरती
रिसता रहा मन…।
कहीं हरा सा,सूखा कहीं
कारण तुम और मैं
स्वयं को तराशने में लगे
काटो वृक्ष
गर्मी में ढूंढते ठंढ
पूरा विश्व…।
जूझता सा हर ओर,मन विह्वल
कहां से आए वो नजराना
तुमने सुना सिसकियों की आवाज़?
रोते जानवर,कराहता पेड़
महलों से निकल सड़क पर आओ
वृक्ष बचाओ।
000
भाई
ये नहीं है मात्र धागा
रक्षा सूत्र
द्रौपदी कृष्ण
हुमायूँ कर्णवती के उदाहरण को
करता ही तो है सार्थकता प्रदान
आज नहीं देना २१ या ५०१ नेग
देना सरहद पर खड़े प्रहरियों की तरह
हिमालय की तरह
थोड़ी सी महँगी है
बात,,,,
शहर में खिलखिलाती
वो मासूम बेटियाँ
प्यारी सी हैं
कोई दुर्घटना
नहीं नहीं---नहीं
वो भी बहन है
और बाँधा होगा उसने भी
किसी कलाई पर मेरी तरह
राखी
पवित्रता क़ायम रहे
आश्वासन या नेग
जो भी समझो या निवेदन।
000

प्रेम
इकतरफ़ा प्रेम
निरन्तर मन की गतिशीलता
समय,उम्र ,तप,मर्यादा से अनजान
मात्र अपनी ही मनमानी है
अनायास
मृत्यु को बुलाना,
उड़ान भरने में नैतिकता को परे हटाना
चूप्पी की घोर अन्तरंग अव्यवस्था
छोड़ो इन बातों को
प्रेम तो प्रेम है
माथे पर की लकीर या....
हाथ पर की वो आड़ी तिरछी
दोष किसको
प्रेम एक बार ही होता है
क़िस्मत वाले को ही मिल पाता है
अपना ......
वैसे शहर में शायद कई बार होता है
कितने को
मगर इकतरफ़ा नहीं होता---।
000

वो चर्च
मेरी भीड़ वाली उस गली के बाद था
वो चर्च
अकेला मानों भीड़ से नाराज़गी
दीवारों पर सान्तवना के शब्द
मगर मौन
रविवार के बाद का दिन मेरा
कई मुरादें ,प्रार्थना से व्यस्त
मगर दूसरे दिन वही सीढ़ियाँ
और मेरे छूटते बचपन की दूर जाने की जिद्द !
मेरे एकतरफे प्रेम का मात्र वही गवाह
पत्थर बोलते हैं
हँसाते हैं
आज जाना चाहती हूँ
मेरे छुपाए बातों की अवधि ख़त्म है
शायद
पादरी बदलें होगें
मगर स्वप्न में पुराने दोस्त नें बताया
जीर्णोद्धार होने को है
मिल आऊँ
क्योंकि अब
उम्र ने फिर बढ़ने की जिद्द की है
ले आँऊ वो पोटली,
जो उसके पास है !
000000
कवियत्री---
निवेदिता मिश्र झा
सम्प्रति दिल्ली में निवास।पत्रकार व काउन्सलर।तीन पुस्तक प्रकाशित,चार साझा संग्रह।नीरा मेरी माँ है ,मैं नदी हूँ, देवदार के आँसू
मोबाइल--9811783898







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बचपन के दिन-(1) वह दालमोट की चोरी और बेंत की पिटाई----

मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

           
    बचपन की यादें भी कभी कभी बहुत सुख देती हैं।और कभी कभी हमे हंसाती हैं।मेरे साथ तो वैसे बचपन की कई मजेदार घटनाएं जुड़ी हैं।जिन्हें आज भी याद करने पर या अपनी दोनों बेटियों को सुनाते समय मैं खुद हंसता हूं अपने बचपन के बारे में सोच कर।घटनाओं का उल्लेख करने के पहले बता दूं कि हम दो भाई दो बहन थे और उनमें भी मैं सबसे पतला दुबला था।लेकिन मेरे एक घूंसे का प्रहार भाई बहनों और दोस्तों को दिन में ही तारे दिखा देता था।इसीलिये सब मुझसे डरते भी थे।यहां तक कि मेरे भाई साहब भी।
    अब वो मजेदार घटना।हम सभी नगर महा पालिका के स्कूलों में पढ़े हुये हैं।इलाहाबाद के मम्फ़ोर्डगंज मुहल्ले में हम रहते थे।मुश्किल से दो सौ मीटर की दूरी पर मेरा स्कूल था।मेरा दखिला मेरी काबिलियत को देख कर सीधे दर्जा चार में हुआ था।तिमाही परीक्षा के समय की घटना है।गणित का पर्चा था---और वो भी पहले दिन।मैं गणित में  वैसे ही कमजोर(फ़िसड्डी)था।चूंकि गांव से शहर आये हम लोगों को बमुश्किल तीन चार माह बीते थे।इसलिये मैं ठहरा निपट गंवई गंवार।स्कूल में परीक्षा में सही उत्तर लिखने हैं ये बात तो मुझे मेरी अम्मा और भाई( अपने पिता जी  को हम लोग बुआ की देखा देखी भाई कहते थे।)ने अच्छी तरह समझाया था।पर उसके बाद क्या करना होता है ये मुझे नहीं बताया गया था।नतीजतन ---जैसे ही अंकगणित का परचा खतम हुआ और छुट्टी की घण्टी बजी।मैं  बिना रुके और ये जाने कि बाकी बच्चे क्या कर रहे---अपनी कापी और परचा लेकर घर भाग आया।
       थोड़ी देर बाद ही मेरे भाई साहब भी आ गये।पिता जी भी।और मेरे हाथों में कापी परचा देख कर दोनों दंग----।अब सोच लीजिये ऐसी स्थिति में क्या होना चाहिये।मार तो नहीं हां डांट जरूर पड़ी।बड़े भाई साहब,पिता जी और अम्मा तीनों की। फ़िर भाई साहब वापस स्कूल गये और मेरी कापी जमा करके आये।खैर गनीमत थी कि कापी ले ली गयी।हमारे पिता जी का उस स्कूल में बहुत सम्मान था---क्योंकि वहां का हर अध्यापक मेरे पिता जी की लिखी कहानियों को अखबारों,पत्रिकाओं में पढ़ता था।
    दूसरी घटना और मजेदार।हमारे स्कूल में तब संगीत की भी कक्षा सभी के लिये होती थी और उसमें संगीत के एक मास्टर साहब हमें भजन ही गाना सिखाते थे।शायद उन्हें भजन के अलावा कुछ आता भी नहीं था।उनका गेट-अप—एक सफ़ेद कुर्ता पायजामा(शायद 15 दिनों में धुलने वाला),एक हाथ में बेंत,दूसरे में एक चीकट सा थैला। जिसमें चने की दालमोठ रहती थी।मास्टर जी रोज आते---अपनी बेंत,कुर्सी के सहारे टिकाते,दालमोट का झोला कुर्सी के हत्थे पर टांगते,और अपनी आलमारी से हारमोनियम निकाल मेज पर रखते,कुर्सी पर बैठते और दो मिनट बाद ही उनकी नाक कई तरह के ड्रम और भोंपू बजाने लगती।और हम जुट जाते उनकी दालमोट पर हाथ साफ़ करने में।पर उतनी ही निकालते कि उन्हें पता न लगे।बीच में जब उनकी नींद टूटती वो भी चने की दालमोट की एक फ़ंकी मारते और चबाते हुये हरमोनियम के सुर मिलाने लगते और फ़िर वही खर्राटे।
          एक दिन दालमोट निकालने का नम्बर मेरा।मैं चुपके से उनके पास पहुंचा—उनकी नाक बज रही थी –आंखें बंद।बस मैंने धीरे से दालमोट की एक मुट्ठी भरी और पीछे घूमा---अचानक मेरे मन में लालच समायी—चल बेटा एक मुट्ठी और ले ले---बस यही लालच थी जिसने मुझे रंगे हाथों पकड़वाया।मैं उनके थैले की तरफ़ हाथ बढ़ा ही रहा था कि चटाक---और मेरा गाल झनझना उठा।---फ़िर तो मुझे याद भी नहीं कितनी बेंत पड़ी मुझे ---बस मैं हाथों पर उन्हे रोक रहा था चीख रहा था---और मास्टर जी का चीखना सुन रहा था---चोट्टे—बदमाश दालमोट चुरा कर खा रहा था।और आप यकीन मानिये कोई भी लड़का उस संकट की घड़ी में मेरी रक्षा करने नहीं आया।बस तबसे मैंने कसम खायी कि किसी के उकसाने पर कोई काम नहीं करूंगा।बस वही करूंगा जो मेरी आत्मा,मन,दिल कहेगा।और मेरी ये कसम आज भी टूटी नहीं है।
                             00000

डा0 हेमन्त कुमार

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प्राथमिक शिक्षा से जुड़े हर व्यक्ति के लिये पठनीय पत्रिका-खोजें और जानें

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

खोजें और जानें
  
संपादक मंडल
विश्व विजया सिंह
वीरेन्द्र शर्मा
लक्ष्मी लाल वैरागी
पुष्पराज सिंह राणावत
राजेश उत्साही
कुमार अनुपम
जया राठौड़

पत्रिका का पता:
विद्या भवन शिक्षा सन्दर्भ केन्द्र
विद्या भवन सोसायटी परिसर,
मोहन सिंह मेहता मार्ग
फ़तहपुरा,उदयपुर(राजस्थान)313001
फ़ोन-0294-2451497
             प्राथमिक शिक्षा के विकास में जो अवरोध हैं उनमें से एक प्रमुख है--शिक्षकों,अभिभावकों,या प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले सभी व्यक्तियों को सही दिशा निर्देश न दे पाने वाले साहित्य का अभाव।खासकर शिक्षकों के लिये।शिक्षकों को उनके सेवा काल में समय समय पर दिये जाने वाले प्रशिक्षणों के दौरान जो भी मुद्रित,प्रकाशित सामग्रियां दी जाती हैं उनको वो कितना पढ़ते हैं या उसके निर्देशों को अपनाते हैं ये कह पाना तो कठिन होगा।हां यह जरूर है कि उन्हें दी जाने वाली सामग्री में सैद्धान्तिक पक्ष अधिक होने के कारण वो उनके लिये बोझिल अधिक होती है।सम्भवतः इसी वजह से उस सामग्री का उपयोग जितना उन्हें करना चाहिये वो नहीं कर पाते।
   पिछले दिनों मुझे प्राथमिक शिक्षा से जुड़े सरोकारों वाली पत्रिका खोजें और जानेंके दस अंकों को पढ़ने का मौका मिला।इन सभी अंकों को पढ़ना मेरे लिये अपने देश की प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था के बीच से गुजरने जैसा था।
        “खोजें और जानें का हर अंक प्राथमिक शिक्षा और बच्चों से जुड़े किसी न किसी मुद्दे पर केन्द्रित है।यह पत्रिका जितनी उपयोगी शिक्षकों के लिये है उतनी ही अभिभावकों या प्राथमिक शिक्षा से जुड़े हर व्यक्ति के लिये। क्योंकि इसमें बहुत से लेख,कहानियां शिक्षकों के अपने अनुभवों और बच्चों के साथ सीखने सिखाने की प्रक्रिया के दौरान कक्षा में किये गये प्रयोगों,बातचीत पर आधारित हैं।जिससे शिक्षक,अभिभावक या बाल साहित्य लेखक भी लाभान्वित होंगे।वो बच्चों की आवश्यकताओं के साथ ही उनके मनोभावों को भी समझ सकेंगे।कविताएं हैं जो पाठकों के सामने समाज की सच्चाइयां भी रखती हैं।अध्यापकों के लिये निर्देश भी हैं जो उन्हें बच्चों के मनोभावों को समझने में मदद करेंगे।
    
मैं यहां इस पत्रिका के “पर्यावरण और शिक्षा विषय पर केन्द्रित विशेषांक के सिर्फ़ एक लेख जमावट का उल्लेख करूंगा जिससे स्पष्ट हो जाता है कि यह पत्रिका शिक्षकों के लिये कैसे उपयोगी और मददगार साबित होगी।
तो ऐसा करो तुम सब जो पत्तियां अपने साथ लाये हो उनको अलग-अलग गुण धर्मों के आधार पर समूह बनाते हुये कागज की शीट पर जमाकर चिपकाओ।
   मास्साब थोड़ा रुक कर बोले—“जैसे कि चिकनी पत्ती,नुकीली पत्ती।लच्छू अचानक खड़े होकर एक ही सांस में बोलाजैसे कि दूध वाली पत्ती।
मास्साब ने कहा-शाबाश।
रघु बोलाजैसे कि कटे किनारे वाली पत्ती।
मास्साब के चेहरे पर खुशी थी।
भोली राम बोला-एक तरफ़ चिकनी दूसरी तरफ़ खुरदुरी। मास्साब हंसते जा रहे थे।
शाकिर-खुशबूदार पत्ती।
मास्साबबिल्कुल थीक।
डमरू-पीली पत्ती।----।
    यह अध्यापक और बच्चों के बीच कक्षा में चल रही बात चीत का एक हिस्सा भर है।इसमें न बच्चों के सर पर पढ़ाई का बोझ है न अध्यापक की मार का भय। न शिक्षक के ऊपर पढ़ाने का दबाव न ही न सिखा,समझा पाने की खीझ। अध्यापक ने नही बच्चों को रट्टा लगवाने की कोशिश की,न निबन्ध लिखवाया।न कोई बच्चा मुर्गा बनाया गया,न ही किसी को मार पड़ी।फ़िर भी सब सीख रहे समझ रहे और दनादन जवाब भी देते जा रहे।बच्चे भी खुश शिक्षक भी। पर ऐसा हुआ कैसे?
   सिर्फ़ पढ़ाने और सिखाने का थोड़ा सा तरीका बदल देने से। अध्यापक ने सिर्फ़ इतना किया कि बच्चों को कक्षा से बाहर ले गये।खेतों,पेड़ पौधों के बीच घुमाया।उन्हें तरह तरह के पौधे दिखाए पत्तियां दिखायीं।उनकी संरचना समझाई।सिर्फ़ समझाया ही नहीं बल्कि बच्चों से कहा कि वो पत्तियां देख कर खुद समझें।फ़िर बच्चों से तरहतरह की पत्तियां इकट्ठी करवाईं।और कक्षा में लौटकर उनसे ही खेल खेल में पत्तियों का वर्गीकरण भी करवा दिया।
   अब हम सभी को समझना चाहिये कि पढ़ाने का कौन सा तरीका बेहतर है?इस अध्यापक द्वारा अपनाया गया गतिविधियों से पूर्ण मनोरंजक तरीका?या फ़िर रटवाने,पेड़-पौधों पर निबन्ध लिखवाने उनको डांट डपट कर सिखाने का?उस प्रक्रिया से तो बच्चा भय से सिर्फ़ रट्टा लगा लेगा।पर सीखेगा कुछ भी नहीं यह निश्चित है।जबकिखोजें और जानें के लेख में दिये गये तरीके को अपनाने से बच्चों का मनोरंजन भी होगा,वह खुद करके अपने अनुभवों से तथ्यों को समझेगा,साथ ही जो बातें सीखेगा वो भविष्य के लिये उसके मस्तिष्क में संरक्षित भी होंगी।
         ये तो इस पत्रिका के पर्यावरण विशेषांक का सिर्फ़ एक उदाहरण भर है।इसी तरह पत्रिका का हर अंक हमारी प्राथमिक शिक्षा से सीधे जुड़े विभिन्न मुद्दों और—“सेवापूर्व एवं सेवारत शिक्षक प्रशिक्षण,बालिका शिक्षा दशा और दिशा,सामाजिक विज्ञान शिक्षण,अभिव्यक्ति,समावेशी शिक्षा की चुनौतियां,जैसे महत्वपूर्ण सरोकारों पर केन्द्रित हैं।जो निश्चित ही हमारे शिक्षकों,अभिभावकों,बाल साहित्यकारों,या बच्चों के लिये काम करने वाली स्वयंसेवी/सरकारी संस्थाओंसभी के लिये उपयोगी होंगे।उनकी सोच को नयी दिशा देने में कामयाब होंगे।शिक्षकों द्वारा एक ही लीक पर चलाये जा रहे शिक्षण के  पारम्परिक तरीकों को बदल सकेंगे।
     खोजें और जानें पत्रिका हर शिक्षक,अभिभावक के हाथों में पहुंच सके ऐसी कोशिश होनी चाहिये।तभी इस पत्रिका को प्रकाशित करने की सार्थकता होगी।पत्रिका के बहुत ही उपयोगी विषय वस्तु चयन,सम्पादन और प्रकाशन के लिये सम्पादक मण्डल को हार्दिक बधाई।

                              0000

डा0हेमन्त कुमार 

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फ़ेसबुक---शेरो शायरी,गिले शिकवे से कर लत्तम पैजार तक------

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2015

            
(फ़ेसबुक से साभार)
आज पूरी दुनिया में फ़ेसबुक का इस्तेमाल करने वालों की संख्या लगभग नब्बे करोड़ से ऊपर और हमारे अपने देश भारत में लगभग नौ करोड़ से अधिक हो चुकी है।फ़रवरी 2004 में शुरू हुई इस सोशल नेटवर्किंग साइट के संस्थापक संस्थापक मार्क जुकरबर्ग ने उस समय इस वेबसाइट की इतनी बड़ी लोकप्रियता की कल्पना भी नहीं की होगी।
            आज फ़ेसबुक पर आपको बूढ़े,युवा,बच्चे,किशोर,किशोरियां,गृहस्थ,प्रोफ़ेशनल्स,मीडिया के लोग,अभिनेता  -----सभी मिल जाएंगे। लोगों ने अपनी अपनी पसंद के हर तरह के समूह बना लिये हैं। आपको पढ़ने और देखने के लिये गंभीर से गंभीर साहित्य और सतही से सतही साहित्य मिल जाएगा। गीत,गज़ल, कविताएं मिलेंगी तो कुछ गंभीर विषयों पर लेख भी मिलेंगे।आपको फ़िल्मों के पुराने से पुराने मधुर गीत शेयर किये मिल जाएंगे तो आज का कानफ़ाड़ू संगीत भी मिलेगा। लोगों के अच्छे विचार मिलेंगे तो कुछ के मन से निकली भड़ास भी मिलेगी।लोगों द्वारा बनाए गये आपसी घरेलू रिश्तों के संबोधन दिखेंगे तो गाली गलौज और जुत्तम पैजार भी मिलेगा। यानि कि फ़ेसबुक आज अन्तर्जाल पर खुला हुआ एक ऐसा जादुई पिटारा है जिसमें आप जो भी ढूंढेंगे मिलेगा ---अब किस्मत आपकी। 
           जहां तक समाज पर प्रभाव की बात है तो हर माध्यम का समाज पर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही तरह का प्रभाव पड़ता है।चाहे वह प्रिण्ट हो या फ़िर इलेक्ट्रानिक।प्रिण्ट से ही पढ़ कर लोग ऊंचे से ऊंचे ओहदों पर पहुंच जाते हैं। और प्रिण्ट के ही सस्ते सड़क छाप साहित्य के लपेट में आकर बहुत सारे बच्चों ने अपनी डिवीजन खराब कर ली। यही बात रेडियो,टी वी,और फ़िल्म माध्यमों के साथ रही है। और यही अन्तर्जाल  सबसे लोकप्रिय पोर्टल फ़ेसबुक के बारे में भी कही जा सकती है।
         आज फ़ेसबुक का इस्तेमाल ज्यादातर लोग शुद्ध मनोरंजन, या फ़िर समय बिताने के लिये कर रहे हैं।कुछ इसका इस्तेमाल अपना(व्यावसायिक)प्रचार करने के लिये कर रहे।कुछ रचनात्मक कर्म से जुड़े नवोदित रचनाकारों को एक अच्छा खासा मंच मिल गया है अपनी रचनाओं को लोगों तक पहुंचाने का। गृहणियां जो अब तक सिर्फ़ चूल्हे चौके में व्यस्त थीं अब इस मंच के माध्यम से लोगों से बोल बतिया रही हैं। लोग अपने तमाम भूले बिछड़े दोस्तों से मिल गये।लोगों के नए नए मित्र बन गये।(अब उसमें कितने सच्चे कितने झूठे यह कौन जनता है?) बहुत सारे पुराने साहित्यकारों,लेखकों को भी एक अच्छा माध्यम मिल गया एक दूसरे से सम्पर्क में रहने और विमर्श करने का। ये सब तो कुछ इस मुख पुस्तक(फ़ेसबुक) के सकारात्मक प्रभाव हैं हीजो हमें प्रत्यक्ष रूप से दिख रहे हैं।इसके अलावा भी बहुत सारे  सकारात्मक पहलू हैं जिनका उल्लेख किया जा सकता है।
          इनके साथ ही बहुत सारे नकारात्मक पहलू भी हैं जिन पर हमें सोचना ही होगा---और उनका कोई ठोस उपाय भी खोजना होगा जिससे इस असरदार मंच का कुछ सदुपयोग हो सके।
0सबसे बड़ी बात यह है कि यह एक पूरी तरह आभासी दुनिया है जहां यह पता लगा सकना काफ़ी कठिन है कि ---जो आपका मित्र बन रहा/रही है ---वो कोई वास्तविक व्यक्ति है या फ़ेक आई डी वाला। फ़ेसबुक टीम द्वारा यह तो संभव नहीं कि हर एकाउण्ट का वेरीफ़िकेशन कर सकेक्या हमारी सरकार इसके सम्बन्ध में कोई निर्णय ले सकती है?जिस तरह बैंक एकाउण्ट के लिये औपचारिकताएं पूरी करनी होती हैंवैसा ही कुछ यहां भी हो?
0अक्सर छद्म नाम वाले व्यक्ति आपसे नजदीकी बढ़ा कर आपकी व्यक्तिगत जानकारियां लेकर उनका दुरुपयोग करते हैं।इस मामले में खासकर युवतियों और गृहणियों को ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है।यद्यपि इसके लिये पुलिस विभाग में साइबर क्राइम सेल बने हैं पर लोग वहां जाते ही कहां हैं?
0एक बात पर  और विमर्श की जरूरत है जो पिछले दिनों बहुत चर्चा में रहीवो है इस नये मीडिया पर सेंसर की---तो भाई सीधी सी बात है कि जब हम सेंसर की हुई फ़िल्में देखते हैं तो यहां सेंसर से परहेज क्यों?क्या अभिव्यक्ति की आज़ादी का यही मतलब है कि किसी को कभी भी कुछ भी कह दें?या एक निःशुल्क मिले माध्यम पर किसी की कोई भी तस्वीर या पोर्न वीडियो पोस्ट कर दें?
0चोरी या कटिंग पेस्टिंग के झगड़े तो फ़ेसबुक पर आम हो चुके हैं।किसी न किसी की कोई न कोई रचना रोज चोरी होकर किसी और के नाम से छप जाती है और फ़िर शुरू होता है लत्तम पैजार का हंगामा----।इसका भी कोई हल खोजना होगा।
  इन खामियों के बावजूद मेरा यही मानना है कि आज की तारीख में अन्तर्जाल पर फ़ेसबुक से अधिक असरदार अभिव्यक्ति का माध्यम दूसरा नहीं है।यदि इसका सही ढंग से इस्तेमाल किया जाय तो यह हमारी शिक्षा व्यवस्था से लेकर राजनीति,समाज,संस्कृति सभी के विकास में सहयोग देने वाला एक प्रभावशाली माध्यम(टूल) साबित हो सकता है।
                             000

डा0हेमन्त कुमार

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मुद्दा--हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य

मंगलवार, 13 जनवरी 2015

   
              इधर मुझे लगातार हिन्दी साहित्य से सम्बन्धित कई सेमिनारों,गोष्ठियों और सम्मान समारोहों में जाने का अवसर मिला।इन गोष्ठियों,सेमिनारों में खूब गरमागरम बहसें हुयीं,साहित्यिक चर्चायें हुयीं।हिन्दी साहित्य पर मंडरा रहे इन्टरनेट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के खतरों की बातें भी की गयीं----लेकिन ये चर्चायें काफ़ी आधी अधूरी सी लगींइनमें कुछ कमी खटक सी रही थी। और वह कमी थी हिन्दी के बाल साहित्य की चर्चा।
            आज जब कि प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य लिखा जा रहा है,प्रकाशित भी  हो रहा है।ऐसे में किसी भी सेमिनार,संगोष्ठी साहित्यिक समारोह में बाल साहित्य की चर्चा न होना इस बात का द्योतक है कि आज भी हिन्दी साहित्य के मठाधीश बाल साहित्य को साहित्य की श्रेणी में नहीं रखते। इतना ही नहीं आप हिन्दी साहित्य के इतिहास और आलोचनाओं से सम्बन्धित पुस्तकें उठा कर देखिये उसमें भी कहीं बाल साहित्य की चर्चा नहीं मिलेगी,या मिलेगी भी तो बहुत नाम मात्र की।
         जब कि वास्तविकता यह है कि खड़ी बोली हिन्दी के आरंभिक काल से ही बाल साहित्य लिखा जा रहा है।सभी बड़े साहित्यकारों ने भी थोड़ा बहुत तो बाल साहित्य लिखा ही है।चाहे वह बच्चों को उपदेश देने के लिये लिखा हो अथवा मनोरंजन के लिये।महादेवी वर्मा,डा0रामकुमार वर्मा,सुमित्रा नंदन पंत,मुंशी प्रेमचन्द सभी ने बच्चों के लिये साहित्य लिखा है।लेकिन उनके इस साहित्य को भी बड़ों के ही साहित्य में ही स्थान दिया गया।
                       उस समय भी बाल साहित्य को दोयम दर्जे का साहित्य ही माना जाता था।इतना ही नहीं उस समय बहुत से साहित्यकारों की यह सोच भी थी कि जो साहित्यकार बड़ों के लिये साहित्य लिखने में असफ़ल हो जाते हैं वो बाल साहित्य लिखना शुरू कर देते हैं।जबकि वास्तविकता इस तथ्य से कोसों दूर है।बाल साहित्य लिखना सामान्य साहित्य लिखने की अपेक्षा बहुत कठिन है।बाल साहित्य वही लिख सकता है जिसे बाल मनोविज्ञान के साथ ही बच्चों की भावनाओं,संवेदनाओं, उनकी  रुचियों अरुचियों के साथ ही उनके स्तर की भाषा की समझ हो।बाल साहित्य लिखने के लिये लेखक को खुद भी बच्चा बनना पड़ता है।
                         आज की समस्या यह है कि बाल साहित्य प्रचुर मात्रा में लिखा जा रहा है।प्रकाशित भी हो रहा है।लोगों में बाल साहित्य को लेकर काफ़ी जागरूकता,उत्सुकता सभी कुछ है। (अब यह जरूर है कि लिखा जा रहा पूरा बाल साहित्य बच्चों के लिये उपयोगी नहीं है।कुछ बाल साहित्यकार तो बहुत अच्छा साहित्य लिख रहे हैं कुछ घटिया।और यह स्वाभाविक भी है।)लेकिन---फ़िर भी बाल साहित्य को वह दर्जा नहीं मिल पा रहा है जो मिलना चाहिये।आज भी बाल साहित्य मुख्य धारा से हटकर हाशिये पर ही पड़ा है।यह तो हुयी बाल साहित्य को पहचान मिलने की समस्या।
                              इसके अलावा भी बाल साहित्य के ऊपर कई संकट हैं।मसलन प्रकाशन,पुस्तकों के आकर्षक उत्पादन और सबसे बढ़ कर बच्चों तक पुस्तकें पहुंचने की। बच्चों के लिये प्रकाशित ज्यादातर किताबों का उत्पादन इतने घटिया स्तर का रहता है कि बच्चे उन्हें पढ़ने के लिये आकर्षित ही नहीं होंगे। ज्यादातर प्रकाशक बाल साहित्य सिर्फ़ सरकारी खरीद के लिये प्रकाशित करते हैं।
                     बाल साहित्य को आगे बढ़ाने की दिशा में नेशनल बुक ट्रस्ट, चिल्ड्रेन्स बुक ट्रस्ट,और भारत सरकार के प्रकाशन विभाग का योगदान महत्वपूर्ण है।इनके अलावा कुछ एन जी ओ जैसे प्रथम बुक्स,नालन्दा,एकलव्य आदि भी बच्चों तक अच्छी आकर्षक और बढ़िया किताबें पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। इन संगठनों द्वारा प्रकाशित बच्चों का साहित्य विषयवस्तु और साज सज्जा दोनों ही दृष्टियों से बेहतरीन कहा जा सकता है।
       कुछ प्राइवेट प्रकाशक भी बच्चों की अच्छी किताबें छाप रहे हैं।लेकिन दिक्कत वही है इन किताबों की पहुंच बच्चों तक नहीं हो पा रही है।ये किताबें भी या तो सरकारी खरीद में जाकर पुस्तकालयों की आल्मारियों में बन्द हो जा रही हैं या फ़िर महंगी होने के कारण बच्चों के अभिभावकों की जेब से बाहर हैं।
                     यद्यपि बच्चों तक किताबें पहुंचाने की दिशा में नेशनल बुक ट्रस्ट का बाल साहित्य केन्द्र(एन सी सी एल) काफ़ी प्रयास कर रहा है।इसकी तरफ़ से देश भर में स्कूलों के साथ ही मुहल्लों में भी पाठक मंचों की स्थापना करवाई जा रही है। तथा उन केन्द्रों को एन बी टी अपने प्रकाशनों के साथ ही दूसरे प्रकाशकों की भी बच्चों की अच्छी किताबें सस्ते मूल्य पर उपलब्ध करा रहा है।साथ ही कई एन जी ओ भी गांवों के साथ ही झुग्गी,झोपड़ी में रहने वाले बच्चों के लिये बाल साहित्य उपलब्ध कराने की दिशा में सक्रिय हैं।फ़िर भी सरकारी स्तर पर इन कार्यक्रमों को और गति देने की जरूरत है।
                      मेरे विचार से हिन्दी बाल साहित्य को हाशिये पर से उठा कर साहित्य की मुख्य धारा में लाने के लिये सरकारी स्तर पर निम्न लिखित प्रयास होने चाहिये।
0 बाल साहित्यकारों को भी साहित्य की मुख्य धारा में स्थान दिलवाना।
0 अच्छा बाल साहित्य लिखने के लिये उचित प्रशिक्षण की व्यवस्था।
0 लिखे जा रहे श्रेष्ठ बाल साहित्य के आकर्षक उत्पादन एवम प्रकाशन की व्यवस्था।
0 चूंकि बच्चों की किताबों की डिजाइनिंग,ले आउट, और उत्पादन पर ज्यादा खर्च आता है।इसलिये बाल साहित्य के प्रकाशकों को बढिया स्तर का कागज सस्ते मूल्य पर उपलब्ध कराने,सस्ती दरों पर किताबों के छपाई की व्यवस्था ---अथवा बच्चों के लिये आकर्षक किताबें छापने वाले प्रकाशकों के लिये सरकार की तरफ़ से सब्सीडी देने की व्यवस्था।
 0 और सबसे अन्तिम और मह्त्वपूर्ण बात यह कि प्रकाशित अच्छे बाल साहित्य को बच्चों के हाथों तक पहुंचाने की व्यवस्था।
0 इस सन्दर्भ में अभिभावकों को भी यह समझाना कि वो अपने ऐशो आराम के खर्च में से कुछ अंश बचा कर अपने बच्चों के लिये अच्छा साहित्य,बाल पत्रिकाएं आदि खरीदने पर भी लगाएं।
0अगर बच्चों को उपहार देना हो तो उन्हें कुछ रंग बिरंगी अच्छी किताबें भी देकर उनमें पुस्तकें पढ़ने की आदत विकसित करें।
           यदि हमारी सरकार के साथ ही सामाजिक विकास से जुड़े कार्यकर्ता,शिक्षक,अभिभावक भी इन बिन्दुओं पर कुछ ध्यान दें तो सम्भवतः हिन्दी के  बाल साहित्य को उचित दिशा और स्थान मिल सकेगा।
                        00000000

डा0हेमन्त कुमार 

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सफ़लता का रहस्य

मंगलवार, 9 दिसंबर 2014

आचार्य द्रोण द्वारा गुरु दक्षिणा के रूप में एकलव्य से अंगूठा मांग लिये जाने के बाद से अर्जुन के मन में एकलव्य के प्रति काफ़ी सहानुभूति एवं मैत्री का भाव जागृत हो गया था।आचार्य द्रोण के मन में भी एकलव्य के प्रति काफ़ी सहानुभूति का भाव आ चुका था।स्वर्ग आए हुअ भी उन लोगों को काफ़ी समय बीत चुका था।
    एक दिन अर्जुन के मन में अचानक यह बात आई कि क्यों न वह भी पृथ्वी पर चल कर किसी विश्वविद्यालय में युद्ध विद्या में शोध कार्य करें और वहां से पी0एच0डी0 की उपाधि प्राप्त करके वापस स्वर्ग में आकर अपना एक विश्वविद्यालय स्थापित कर लें।
     यह विचार मन में आते ही अर्जुन एकलव्य को साथ लेकर आचार्य द्रोण के पास उनकी आज्ञा लेने जा पहुंचे। अर्जुन का प्रस्ताव सुनकर आचार्य कुछ देर तक विचारमग्न रहे,पर शीघ्र हि उन्होंने दोनों को पृथ्वी पर जाने की आज्ञा दे दी।
     अंत में पूरी तैयारी के साथ अर्जुन और एकलव्य पृथ्वी पर आ गये।लेकिन यह संयोग ही था कि एकलव्य और अर्जुन को स्थानाभाव के कारण एक ही विश्वविद्यालय में प्रवेश नहीं मिल सका।फ़िर भी प्रवेश मिल जाने पर दोनों ने अपने-अपने शोध निर्देशकों के साथ शोध प्रारंभ कर दिया। अर्जुन का अधिकांश समय पुस्तकालय में अध्ययन करने में बितता।प्रतिदिन शाम को वह अपने दिन भर किये गये कार्य को आचार्य के पास ले जाकर दिखलाते एवं उनसे परामर्श करते।
                     उधर एकलव्य अपने शोध कार्य के प्रति पूर्णतः उदासीन था।उसका अधिकांश समय विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच गपबाजी और अपने आचार्य की सेवा काने में बीतता था।
      एक वर्ष के बाद अचानक ही एक दिन एकलव्य घूमता  हुआ अर्जुन के पास पुस्तकालय में जा पहुंचा।वहां अर्जुन पुस्तकों के अम्बार के बीच बैठे थे।एकलव्य को अचानक वहां पाकर अर्जुन को काफ़ी आश्चर्य हुआ। अभिवादन के पश्चात एकलव्य ने प्रश्न किया, बन्धु,यह क्या हाल बना रखा है तुमने अपना?ऐसा लगता है तुम्हारा शोध कार्य शीघ्र पूरा होने वाला है।
          “कहां बन्धु---?अभी तो मेरा प्रथम अध्याय ही मेरे आचार्य जी ने स्वीकृत नहीं किया----अभी उसे ही चौथी बार लिख रहा हूं।एकलव्य के स्वस्थ और मोटे होते जा रहे शरीर को देख एक ठण्ढी सांस खींच कर अर्जुन बोले।
        “क्या----?अभी तुम्हारा प्रथम अध्याय ही नहीं पूरा हुआ?मेरे तो तीन अध्याय समाप्त हो चुके हैं और मेरे आचार्य ने उन्हें स्वीकृति भी दे दी है।एकलव्य आश्चर्य से अर्जुन को देख कर बोला।
   यह कैसे सम्भव हुआ बन्धु ?मैं तो प्रवेश लेने के बाद से ही अपना अधिकांश समय अध्ययन में ही व्यतीत कर रहा हूं फ़िर भी मेरे आचार्य महोदय मुझसे तथा मेरे कार्य से असन्तुष्ट हैं---और तुम्हारे तीन अध्याय समाप्त भी हो चुके?आखिर इसका रहस्य क्या है?अर्जुन व्यग्रता से बोले।
           हा---हा---हा---इस सफ़लता का रहस्य?कभी मेरे विश्वविद्यालय आओ तो तुम स्वयं देख लेना अर्जुन।एकलव्य एक जोरदार ठहाका लगा कर बोला। अर्जुन के साथ पूरा दिन उस शहर में भ्रमण करने  के बाद एकलव्य उसी दिन शाम को अपने शहर वापस चला गया।एकलव्य की प्रगति जानने के बादसे अर्जुन और अधिक परिश्रम के साथ शोध कार्य में जुट गये।इसी प्रकार छह माह कब बीत गये अर्जुन को पता ही नहीं चला।
   एक दिन प्रातःकाल ही अर्जुन एकलव्य के शहर में जा पहुंचे।वहां वो सीधे विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में गये।परन्तु वहां एकलव्य उन्हें नहीं मिला।वे एकलव्य का पता लगाते हुये उसके आचार्य के निवास पर जा पहुंचे।उनका परिचय जानकर आचार्य ने उनका स्वागत किया और
बताया कि एकलव्य अभी बाजार गया है आता ही होगाऽर्जुन वहीं बैठ कर कुछ पौस्तकें देखने लगे।
   कुछ ही देर में एकलव्य अपने सिर पर सब्जियों की टोकरी लादे हुये और दोनों हाथों से एक गैस का सिलिण्डर लुढ़काता पसीने से लथपथ हाजिर हुआ।वह अर्जुन को वहां अचानक देख कर थोड़ा सकपका गया। अर्जुन भी आश्चर्यचकित होकर उसे देखते रह गये।खैर---। एकलव्य जल्दी से भीतर जाकर सारा सामान अपनी गुरुमाता को दे आया। और अर्जुन के पास बैठकर उसका समाचार पूछने लगा।परन्तु आचार्य की मौजूदगी में दोनों खुल कर बातें नहीं कर पा रहे थे।कुछ ही देर बाद अचानक एकलव्य घड़ी देख कर बोला,अच्छा बन्धु ,आओ अब चलें।जरा आचार्य जी के छोटे पुत्र को विद्यालय से लाने का समय हो चुका है,और उसे घर पहुंचाकर आचार्य जी की गायों को अस्पताल तक दिखाने भी जाना है। और अर्जुन को साथ लेकर एकलव्य विद्यालय के मार्ग पर चल पड़ा।अर्जुन यह सब देख कर एकदम स्तब्ध हो गये थे।
   लेकिन एकलव्य की प्रगति देख कर---उसके कार्यों और उसकी स्थिति देखकर अर्जुन के सामने एकलव्य का वह ठाका लगाता चेहरा घूम गया जब उसने उनसे पुस्तकालय में कहा था कि मेरी सफ़लता का रहस्य मेरे विश्वविद्यालय में आकर तुम स्वयं देख लेना।और अब अर्जुन के सामने धीरे-धीरे स्थिति काफ़ी स्पष्ट होती गयी।उन्हें अब काफ़ी हद तक एकलव्य की सफ़लता का रहस्य मालूम हो गया था।एकलव्य के साथ दिन भर शहर में भ्रमण करके अर्जुन सायंकाल अपने शहर वापस लौट गये।
        अगले दिन छात्रावास के छात्रों को यह देख कर काफ़ी आश्चर्य हुआ कि सबेरे उठते ही पुस्तकालय में जाकर जम जाने वाले अर्जुन आज अपने आचार्य महोदय के बगीचे में फ़ावड़ा लेकर उनकी क्यारियों की मिट्टी समतल कर रहे थे और उनके चेहरे पर एक परम सन्तुष्टि का भाव झलक रहा था।
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डा0हेमन्त कुमार

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छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी

बुधवार, 19 नवंबर 2014

                         
                           हर युवा दम्पत्ति का यह सपना होता है कि उसके घर के आंगन में
 भी एक नन्हें कोमल प्यारे शिशु की किलकारियां गूंजें। शिशु अपनी अनोखी बाल लीलाओं से उनके सूने घर को गुंजारित करे। उनका यह स्वप्न पूरा भी होता है।उनके घर जब नन्हें मेहमान का आगमन होता है तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता।युवा दम्पत्ति जी जान से उसकी देखभाल में तो जुट ही जाते हैं। साथ ही उसकी बाल लीलाओं का भी आनन्द उठाते हैं।
       इस शिशु के बढ़ने के साथ ही उनकी खुशियां बढ़ने के साथ ही जिम्मेदारियां भी बढ़ने लगती हैं। खासकर शिशु के बकैयां चलने से लेकर उसके स्कूल जाने तक की अवधि हर अभिभावक के लिये बहुत ही ज्यादा जिम्मेदारी वाला समय होता है। इस दौरान बच्चा घुटनों के बल चलना शुरू करता है,पहले वह थोड़ी ही दूर जाता है। फ़िर घर भर में इधर उधर भागता है। हर चीज को देखकर, छू कर महसूस करने की कोशिश करता है। घर में रखे सामानों को बिखराता है। चीजों को फ़ेंकता है। उलट पलट करता है। ऐसी अवस्था में मां बाप दोनों को शिशु के ऊपर कुछ ज्यादा ध्यान देने और थोड़ा अतिरिक्त सावधानी रखने की जरूरत पड़ती है। अन्यथा शिशु को हल्के फ़ुल्के नुक्सान से लेकर बड़े हादसे तक घटित हो सकते हैं।
          मैं यहां पहले उन हादसों का जिक्र करूंगा जिन्होंने बच्चों के मां बाप के साथ ही मुझे भी बहुत गहराई तक झकझोर दिया था। और जिनकी वजह से ही आज मैं यह लेख लिख रहा हूं। आप खुद भी इन घटनाओं को पढ़कर समझ सकते हैं कि यदि उस समय थोड़ी सी सावधानी बरती गयी होती तो कुछ अबोध शिशु असमय मौत के शिकार न हुये होते। ऐसे हादसे जिनकी जिम्मेदारी उनके अभिभावकों की ही थी। ऐसा नहीं कि उन अभिभावकों ने जानबूझ कर ऐसा किया था बल्कि उनकी थोड़ी सी असावधानी ने उनके जीवन की तमाम खुशियां छीन लीं।
            पहली घटना। आज से बीस साल पहले की है। इलाहाबाद में मेरे एक पड़ोसी ठेकेदार थे। बहुत खुशहाल परिवार । घटना उनके एक साल के बहुत सुन्दर सलोने बेटे के साथ हुई। उनकी पत्नी ने कपड़े धोये। उन्हें निचोड़ा और आंगन में ही गन्दे पानी से भरी बाल्टी छोड़कर छत पर कपड़े फ़ैलाने चली गईं। पन्द्रह बीस मिनट बाद वो कपड़े फ़ैलाकर वापस नीचे आईं तो आंगन का दृश्य देखकर चीख पड़ीं। आंगन में उनका एक साल का बेटा बाल्टी में उल्टा पड़ा था। यानि उसका पैर बाल्टी के बाहर और सिर बाल्टी के अन्दर पानी में। चीख सुनकर घर के लिग इकट्ठे हुये। बच्चे को तुरन्त अस्पताल लेकर भागे । पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। चिकित्सक बच्चे को नहीं बचा सके। हुआ यह था कि उनके छत पर जाते ही बच्चा वहां आया। उत्सुकतवश उसने भरी बाल्टी के अन्दर झांकने की कोशिश की। और उसी दौरान वह उसमें उलट गया। काश कि उनके छत पर जाते समय कोई उनके बच्चे को सम्हाल रहा होता। य वो बाल्टी का पानी गिराकर गयी होतीं…।
        दूसरी घटना।मेरे अपने ही घर में।मेरी छोटी बहन सपरिवार आई थी।उनका डेढ़ साल का बेटा साथ में था।बैठक में सभी लोग बातचीत में मशगूल थे।दूसरे कमरे में बच्चे खेल रहे थे।इसी बीच कोई बच्चा चीखा।हम सभी भाग कर अन्दर के कमरे में पहुंचे।वहां मेरी बहन के सुपुत्र पाउडर से पूरे नहाये  हुये चीख रहे थे। उसने ट्रन्सपरेण्ट डिब्बे में रखे विम पाउडर को कोई खाने की चीज समझ कर अपनी तरफ़ खींचने की कोशिश की।शायद डिब्बे का ढक्कन ढीला होने के कारण पूरा
विम पाउडर  उसके ऊपर।कुछ मुंह और आंख में भी गया।हम लोगों ने जल्दी से पहले उसे नल के नीचे अच्छी तरह नहलाया फ़िर लेकर भागे डाक्टर के घर।संयोग से विम पाउडर उसके पेट में नहीं गया था। बस थोड़ा आंखों और दांतों में लगा था ड़ाक्टर ने दवायें दीं।शाम तक उसे आराम मिल गया।
        तीसरी घटना।अभी 2साल पहले मेरे पड़ोस में घटी थी।बच्ची के पिता सरकारी नौकरी में और पत्नी शिक्षिका।एक बच्ची 4साल की दूसरी बड़ी।उस दिन पिता आफ़िस और बड़ी बेटी स्कूल में थे।घर पर छुटकी और मां।मां रसोईं में।तभी छुटकी चीखी।मां कमरे में पहुंची तो एक तरफ़ प्रेस लगा था और छुटकी पड़ी चीख रही थी।हुआ यूं कि छुटकी ने मां को किचेन में मशगूल पाया, उसने सोचा कि मैं भी अपनी बड़ी बहन की तरह फ़्राक पर प्रेस कर लूं।वह प्रेस लायी,उसे लगा कर आन किया और पहनी हुई फ़्राक पर प्रेस करने की कोशिश में अपना पैर जला बैठी।
उसे भी इन्जेक्शन,डाक्टर और अस्पताल की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा।
              अब आप बताइये इन तीनों घटनाओं में उन अबोध शिशुओं की क्या गलती थी? अगर उनकी गतिविधियों पर मां बाप या किसी बड़े का ध्यान रहा होता तो शायद ये हादसे न होते। इसीलिये इस उम्र के बच्चों की देखभाल में,लालन पालन में बहुत अधिक सावधानी रखने की जरूरत है। ऐसा नहीं कि कोई मां बाप अपने बच्चे के लिये जानबूझकर ऐसी स्थितियां पैदा करता है। वह क्यों करेगा ऐसा? ये तो अनजाने में हुयी थोड़ी सी असावधानी ऐसी परिस्थितियों को जन्म देती है।
 थोड़ी सी सावधानी बच्चे कि सुरक्षा के लिये----
        आइये अब देखते हैं कि इन छोटी उम्र के बच्चों के लालन पालन के दौरान हम किस तरह की सावधानियां अपनाकर उनका जीवन सुरक्षित रख सकते हैं। मैंने पहले ही कहा है कि जब तक बच्चा गोद में ,पालने या बिस्तर पर रहता है तब तक वह आपके सहारे ही घर में इधर उधर जा सकता है। लेकिन जैसे ही वह घुटनों के बल या बकैयां  चलना शुरू करता है वह पूरे घर में घूमने लगता है। और उसकी इस क्रिया से उसके साथ आप भी आनन्दित होते हैं। इस समय बराबर  उसके ऊपर ध्यान देने की जरूरत रहती है।
0 क्या करें?
* सबसे पहले अपने घर में नीचे की तरफ़ लगे हुये सभी इलेक्ट्रिक प्लग प्वाइण्ट बन्द करवा दें। या उन्हें थोड़ा ऊंचाई पर शिफ़्ट करवा दें। क्योंकि इनके खुले रहने पर उत्सुकतावश बच्चा उनके छेदों में उंगलियां डालने की गलती कर सकता है।
*घर की आल्मारियों में नीचे के खानों में कोई भी जहरीला, खतरनाकपदार्थ(फ़िनायल,तेजाब,मिट्टी का तेल,हार्पिक्स,विम एवम डिटर्जेण्ट पाउडर इत्यादि) न रखें।इन वस्तुओं को ऐसी जगह रखें जो आपके शिशु की पहुंच से दूर हो।
*अपने घर के इलेक्ट्रानिक्स और इलेक्ट्रिकल उपकरणों को शिशु की पहुंच से दूर थोड़ा ऊंचाई पर रखें।
*घर में मौजूद दवायें हमेशा बच्चों की पहुंच से दूरऽअल्मारी के ऊपरी खानों में रखें।ताकि बच्चे उन्हें  छू न सकें।
*बाथरूम का दरवाजा हमेशा बन्द रखें।क्योंकि वहां प्रायः ही किसी न किसी बर्तन में पानी भर कर रखा ही जाता है।वहां अकेले जाना बच्चे के लिये घातक हो सकता है।
*जब भी बच्चे को फ़र्श पर छोड़ें,ध्यान रखें उसके आस पास कोई ऐसी वस्तु न हो जिसे वह मुंह में डालने की कोशिश करे। अच्छा होगा कि ऐसे समय मां बाप या कोई बुजुर्ग शिशु के साथ रहें।
*यदि आपका शिशु आंगन में खेल रहा है तो ध्यान रखें कि वह गमलों तक न पहुंचने पाये।वह  गमलों की मिट्टी या किसी जहरीले पौधे की पत्ती तोड़कर मुंह में डाल सकता है जो कि उसके  लिये हानिकर होगी।
*यदि ऊंचे बेड पर शिशु बैठा हो तो उस प्पर नजर रखें कि वह बिस्तर से गिर कर चोटिल न हो  जाय।
*शहरों में परिवार एक या दो कमरों के छोटे मकानों में रहते हैं।उन्हीं दो कमरों में पूरी गृहस्थी का सारा सामान।ऐसी स्थिति में घर का सामान शिशु के रहने के हिसाब से व्यवस्थित करें।
*शिशु को कभी रसोई के अन्दर न जाने दें।वहां वह गैस,फ़्रिज़ आदि छूने की कोशिश करके नुक्सान  उठा सकता है।
*अक्सर मां शिशु को बुरे सपनों से बचाने के लिये उसके बिस्तर के नीचे चाकू,कैंची रखती हैं।इन्हें  ऐसी जगह रखें कि बच्चा उन्हें न छू सके।
*और सबसे अन्तिम बात बकैयां चलना शुरू करने से लेकर स्कूल जाने की अवस्था आने तक मां  बाप में से कोई एक हमेशा शिशु का ध्यान रखे।ताकि कभी भी वह गलती से कोई ऐसी क्रिया न  कर बैठे जो उसके लिये घातक हो।
                ये कुछ ऐसी छोटी छोटी बातें हैं जिनपर ध्यान देकर आप अपने नन्हें,सुकोमल शिशु का जीवन सुरक्षित रखने के साथ ही अपने परिवार को खुशहाल
रख सकते हैं।
                     00000000
 डा0हेमन्त कुमार

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पेड़ों में आकृतियां--(2)

रविवार, 9 नवंबर 2014

प्रकृति ने हमारे लिये तरहतरह की वनस्पतियां और पेड़ पौधे बनाए हैं।अगर आप इन पेड़ों को ध्यान से देखें तो इनमें आपको कई तरह की आकृतियां दिखायी पड़ती हैं।मैंने अपने मोबाइल की आंखों से कुछ ऐसी ही आकृतियों को देखने की कोशिश की है।

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लेबल

. ‘देख लूं तो चलूं’ "आदिज्ञान" का जुलाई-सितम्बर “देश भीतर देश”--के बहाने नार्थ ईस्ट की पड़ताल “बखेड़ापुर” के बहाने “बालवाणी” का बाल नाटक विशेषांक। “मेरे आंगन में आओ” ११मर्च २०१९ ११मार्च 1mai 2011 2019 अंक 48 घण्टों का सफ़र----- अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस अक्षत अण्डमान का लड़का अनुरोध अनुवाद अपराध अपराध कथा अभिनव पाण्डेय अभिभावक अमित तिवारी अम्मा अरविन्द दुबे अरुणpriya अर्पण पाण्डेय अर्पणा पाण्डेय। अशोक वाटिका प्रसंग अस्तित्व आज के संदर्भ में कल आतंक। आतंकवाद आत्मकथा आनन्द नगर” आने वाली किताब आबिद सुरती आभासी दुनिया आश्वासन इंतजार इण्टरनेट ईमान उत्तराधिकारी उनकी दुनिया उन्मेष उपन्यास उपन्यास। उम्मीद के रंग उलझन ऊँचाई ॠतु गुप्ता। एक टिपण्णी एक ठहरा दिन एक तमाशा ऐसा भी एक बच्चे की चिट्ठी सभी प्रत्याशियों के नाम एक भूख -- तीन प्रतिक्रियायें एक महत्वपूर्ण समीक्षा एक महान व्यक्तित्व। एक संवाद अपनी अम्मा से एल0ए0शेरमन एहसास ओ मां ओडिया कविता ओड़िया कविता औरत औरत की बोली कंचन पाठक। कटघरे के भीतर कटघरे के भीतर्। कठपुतलियाँ कथा साहित्य कथाकार समीर गांगुली कथावाचन कर्मभूमि कला समीक्षा कलाकार कविता कविता। कविताएँ कवितायेँ कहां खो गया बचपन कहां पर बिखरे सपने--।बाल श्रमिक कहानी कहानी कहना कहानी कहना भाग -५ कहानी सुनाना कहानी। काफिला नाट्य संस्थान काल चक्र काव्य काव्य संग्रह किताबें किताबों में चित्रांकन किशोर किशोर शिक्षक किश्प्र किस्सागोई कीमत कुछ अलग करने की चाहत कुछ लघु कविताएं कुपोषण कैंसर-दर-कैंसर कैमरे. कैसे कैसे बढ़ता बच्चा कौशल पाण्डेय कौशल पाण्डेय. कौशल पाण्डेय। क्षणिकाएं क्षणिकाएँ खतरा खेत आज उदास है खोजें और जानें गजल ग़ज़ल गर्मी गाँव गीत गीतांजलि गिरवाल गीतांजलि गिरवाल की कविताएं गीताश्री गुलमोहर गौरैया गौरैया दिवस घर में बनाएं माहौल कुछ पढ़ने और पढ़ाने का घोसले की ओर चिक्कामुनियप्पा चिडिया चिड़िया चिड़ियाँ पिकनिक करने आईं चित्रकार चुनाव चुनाव और बच्चे। चौपाल छिपकली छोटे बच्चे ---जिम्मेदारियां बड़ी बड़ी जज्बा जज्बा। जन्मदिन जन्मदिवस जयश्री राय। जयश्री रॉय। जागो लड़कियों जाडा जात। जाने क्यों ? जेठ की दुपहरी टिक्कू का फैसला टोपी ठहराव ठेंगे से डा० शिवभूषण त्रिपाठी डा0 हेमन्त कुमार डा०दिविक रमेश डा0दिविक रमेश। डा0रघुवंश डा०रूप चन्द्र शास्त्री डा0सुरेन्द्र विक्रम के बहाने डा0हेमन्त कुमार डा0हेमन्त कुमार। डा0हेमन्त कुमार्। डॉ.ममता धवन डोमनिक लापियर तकनीकी विकास और बच्चे। तपस्या तलाश एक द्रोण की तितलियां तीसरी ताली तुम आए तो थियेटर दरख्त दरवाजा दशरथ प्रकरण दस्तक दिशा ग्रोवर दुनिया का मेला दुनियादार दूरदर्शी देश दोहे द्वीप लहरी नई किताब नई पत्रिका नदी किनारे नया अंक नया तमाशा नयी कहानी नववर्ष नवोदित रचनाकार। नागफ़नियों के बीच नारी अधिकार नारी विमर्श निकट नित्या नित्या शेफाली नित्या शेफाली की कविताएं नियति निवेदिता मिश्र झा निषाद प्रकरण। नेता जी नेता जी के नाम एक बच्चे का पत्र(भाग-2) नेहा शेफाली नेहा शेफ़ाली। पढ़ना पतवार पत्रकारिता-प्रदीप प्रताप पत्रिका पत्रिका समीक्षा परम्परा परिवार पर्यावरण पहली बारिश में पहले कभी पहले खुद करें–फ़िर कहें बच्चों से पहाड़ पाठ्यक्रम में रंगमंच पार रूप के पिघला हुआ विद्रोह पिता पिता हो गये मां पिताजी. पितृ दिवस पुण्य तिथि पुण्यतिथि पुनर्पाठ पुरस्कार पुस्तक चर्चा पुस्तक समीक्षा पुस्तक समीक्षा। पुस्तकसमीक्षा पूनम श्रीवास्तव पेंटिंग्स पेड़ पेड़ बनाम आदमी पेड़ों में आकृतियां पेण्टिंग प्यारा कुनबा प्यारी टिप्पणियां प्यारी लड़की प्यारे कुनबे की प्यारी कहानी प्रकृति प्रताप सहगल प्रतिनिधि बाल कविता -संचयन प्रथामिका शिक्षा प्रदीप सौरभ प्रदीप सौरभ। प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक शिक्षा। प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव। प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव. प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव। प्रेरक कहानी फ़ादर्स डे।बदलते चेहरे के समय आज का पिता। फिल्म फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति फ़ेसबुक बंकू बंधु कुशावर्ती बखेड़ापुर बचपन बचपन के दिन बच्चे बच्चे और कला बच्चे का नाम बच्चे का स्वास्थ्य। बच्चे पढ़ें-मम्मी पापा को भी पढ़ाएं बच्चे। बच्चों का विकास और बड़ों की जिम्मेदारियां बच्चों का आहार बच्चों का विकास बच्चों को गुदगुदाने वाले नाटक बच्चों को जरूर पढाएं ये किताब बदलाव बया बहनें बाघू के किस्से बाजू वाले प्लाट पर बादल बारिश बारिश का मतलब बारिश। बाल अधिकार बाल अपराधी बाल दिवस बाल नाटक बाल पत्रिका बाल मजदूरी बाल मन बाल रंगमंच बाल विकास बाल साहित्य बाल साहित्य प्रेमियों के लिये बेहतरीन पुस्तक बाल साहित्य समीक्षा। बाल साहित्यकार बालवाटिका बालवाणी बालश्रम बालिका दिवस बालिका दिवस-24 सितम्बर। बीसवीं सदी का जीता-जागता मेघदूत बूढ़ी नानी बेंगाली गर्ल्स डोण्ट बेटियां बैग में क्या है ब्लाइंड स्ट्रीट ब्लाग चर्चा भजन भजन-(7) भजन-(8) भजन(4) भजन(5) भजनः (2) भद्र पुरुष भयाक्रांत भारतीय रेल मंथन मजदूर दिवस्। मदर्स डे मनीषियों से संवाद--एक अनवरत सिलसिला कौशल पाण्डेय मनोविज्ञान महुअरिया की गंध मां माँ मां का दूध मां का दूध अमृत समान माझी माझी गीत मातृ दिवस मानस मानस रंजन महापात्र की कविताएँ मानस रंजन महापात्र की कवितायेँ मानसी। मानोशी मासूम पेंडुकी मासूम लड़की मिशन ग्रीन वार मुंशी जी मुद्दा मुन्नी मोबाइल मूल्यांकन मेरा दोस्त मेरा नाम है मेराज आलम मेरी अम्मा। मेरी कविता मेरी रचनाएँ मेरे मन में मोइन और राक्षस मोनिका अग्रवाल मौत के चंगुल में मौत। मौसम यात्रा यादें झीनी झीनी रे युवा युवा स्वर रंग बिरंगी दुनिया रंगबाज रंगबाजी करते राजीव जी रस्म मे दफन इंसानियत राजीव मिश्र राजेश्वर मधुकर राजेश्वर मधुकर। राधू मिश्र रामकली रामकिशोर रिपोर्ट रिमझिम पड़ी फ़ुहार रूचि रोचिका शर्मा लखनऊ लगन लघुकथा लघुकथा। लड़कियां लड़कियां। लड़की लालटेन चौका। लिट्रेसी हाउस लू लू की सनक लेख लेख। लेखसमय की आवश्यकता लोक चेतना और टूटते सपनों की कवितायें लोक संस्कृति लोकार्पण लौटना वनभोज वनवास या़त्रा प्रकरण वरदान वर्कशाप वर्ष २००९ वह दालमोट की चोरी और बेंत की पिटाई वह सांवली लड़की वाल्मीकि आश्रम प्रकरण विकास विचार विमर्श। विज्ञानं बाल कविताएँ विश्व पुतुल दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस विश्व फोटोग्राफी दिवस. विश्व रंगमंच दिवस व्यंग्य व्यक्तित्व व्यन्ग्य शक्ति बाण प्रकरण शब्दों की शरारत शाम शायद चाँद से मिली है शिक्षक शिक्षक दिवस शिक्षक। शिक्षा शिक्षालय शैलजा पाठक। शैलेन्द्र श्र प्रेमस्वरूप श्रीवास्तव स्मृति साहित्य प्रतियोगिता श्रद्धांजलि श्रीमती सरोजनी देवी संजा पर्व–मालवा संस्कृति का अनोखा त्योहार संदेश संध्या आर्या। संवाद जारी है संसद संस्मरण संस्मरण। सड़क दुर्घटनाएं सन्ध्या आर्य सन्नाटा सपने दर सपने सफ़लता का रहस्य सबरी प्रसंग सभ्यता समय समर कैम्प समाज समीक्षा समीक्षा। समीर गांगुली समीर लाल। सर्दियाँ सांता क्लाज़ साक्षरता निकेतन साधना। सामायिक सारी रात साहित्य अमृत सीता का त्याग.राजेश्वर मधुकर। सुनीता कोमल सुरक्षा सूनापन सूरज सी हैं तेज बेटियां सोन मछरिया गहरा पानी सोशल साइट्स स्तनपान स्त्री विमर्श। स्मरण स्मृति स्वतन्त्रता। हंस रे निर्मोही हक़ हादसा हादसा-2 हादसा। हाशिये पर हिन्दी का बाल साहित्य हिंदी कविता हिंदी बाल साहित्य हिन्दी ब्लाग हिन्दी ब्लाग के स्तंभ हिम्मत हिरिया हेमन्त कुमार होलीनामा हौसला accidents. 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